मुफ्ती और अब्दुल्ला ने ऐसी स्थिति बनाई कि कश्मीर पंडितों को छोड़ना पड़ा कश्मीर
   दिनांक 23-सितंबर-2019
विनोद कुमार शुक्ल
कश्मीरी पंडितों को घाटी से भगाने की साजिश 50 के दशक में ही शुरू हो गई थी। 1989-90 में तत्कालीन गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद और कश्मीर के मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं ताकि कश्मीरी पंडित घाटी से पलायन कर जाएं

 
श्रीनगर में पाकिस्तान और आईएसआईएस का झंडा लहराने वाले कश्मीरियत की दुहाई दे रहे हैं। (फाइल चित्र)
 देश में पंथनिरपेक्षता की तरह 'कश्मीरियत' भी सर्वाधिक दुरुपयोग किया जाने वाला शब्द बन गया है। पिछले दिनों कश्मीरियत की दुहाई देने वालों की तो बाढ़ सी आ गई। लेकिन कश्मीरियत क्या है? अचानक यह खतरे में क्यों पड़ गई?
दरअसल, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए हटाने के बाद घाटी से लेकर दिल्ली तक कश्मीरियत की दुहाई दी जा रही है। सवाल है कि क्या संसद को कश्मीर में कोई कानून लागू करने का अधिकार नहीं है? क्या कश्मीर की महिलाओं, वंचितों, वनवासियों, शिया मुसलमानों, बौद्ध अनुयायियों, हिन्दुओं व वहां 70 वर्ष से रह रहे शरणार्थियों को उनके हक से वंचित रखना कश्मीरियत है? कश्मीरी नागरिक को सभी अधिकार प्राप्त हैं, जबकि शेष भारत के नागरिकों को सीमित अधिकार ही हैं। क्या यह कश्मीरियत है? सच तो यह है कि कश्मीरियत हजारों साल पुरानी सनातन संस्कृति है, जिसे वहाबी कट्टरवाद से बदलने/खत्म करने की कोशिश की जा रही है और उसे 'कश्मीरियत' का नाम दिया जा रहा है।
कश्यप ऋषि की इस धरा की एक लंबी सांस्कृतिक व ज्ञान परंपरा रही है। कल्हण की राजतरंगिणी में इसे शारदापीठ क्षेत्र कहा गया है, जो शैव दर्शन के अध्ययन का केंद्र माना जाता है। कश्मीरी परंपरा के वाहक अभिनवगुप्त का योगदान पूरे भारत में विख्यात है। शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत की पुनर्स्थापना यात्रा में भी कश्मीर का महत्वपूर्ण योगदान है। प्राचीन ब्राह्मी लिपि के आधार पर शारदा लिपि का विकास भी यहीं हुआ, जिसके आधार पर कश्मीरी भाषाशास्त्रियों ने गुरुमुखी व तिब्बती लिपि विकसित की। शैव और वैष्णव के प्रभाव के बावजूद बौद्ध और जैन संप्रदाय यहां फले-फूले। कश्मीर के राजा ललितादित्य का साम्राज्य पूर्व में कामरूप (असम) तथा पश्चिम में कैस्पियन सागर तक फैला था। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं। तो क्या यह सब कश्मीरियत का हिस्सा नहीं है? लेकिन, दुर्भाग्य से कश्मीर में सोची-समझी रणनीति के तहत बदलाव लाए गए। मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के नेता सरदार इब्राहिम ने इस्लाम का हवाला देते हुए पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली को पत्र लिखकर कश्मीर का भारत में विलय रोकने के लिए हस्तक्षेप करने की अपील की। 13 जुलाई, 1931 का 'बट्टे लूट' (काला दिन) कश्मीर से हिन्दुओं के सफाए की शुरुआत का तानाबाना था, जिसके सूत्रधार शेख अब्दुल्ला थे। अब्दुल्ला ने अब्दुल कादिर मामले में मुसलमानों को भड़काया और कश्मीर के डोगरा राजा के विरुद्ध हिन्दू-मुस्लिम कहानी गढ़ी, जो 1947 तक विकृत हो गई। इसी शेख अब्दुल्ला से पं. जवाहरलाल नेहरू दोस्ती निभाते रहे। पूरे भारत में शेख अब्दुल्ला को मुसलमानों का नेता बनाने की कोशिश और उनके 'इस्लामीकृत कश्मीर' की मुहिम में नेहरू एक बार फिर अदूरदर्शी साबित हुए।
कश्मीरी पंडितों को घाटी से भगाने की साजिश 50 के दशक में ही शुरू हो गई थी। 1989-90 में तत्कालीन गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद और कश्मीर के मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं ताकि कश्मीरी पंडित घाटी से पलायन कर जाएं। इस तरह निजाम-ए-मुस्तफा एक आंदोलन बन गया। इसका सबसे बड़ा प्रमाण फिल्म 'दंगल' की अदाकारा हैं, जिन्हें अभिनय से दूरी बनाए रखने के लिए मजबूर किया गया। यही नहीं, कश्मीरी लड़कियों के रॉक बैंड 'प्रगाश' को मुख्य मुफ्ती ने  'हराम' घोषित कर दिया। आलम यह है कि कश्मीरी मुसलमान रउफ नृत्य, संतूर और सूफी परंपरा को भूल गए और अब उन्हें शरियत और इस्लाम में ही कश्मीरियत नजर आ रही है।
वास्तव में वहाबी कट्टरपंथ की शुरुआत काफी पहले ही हो चुकी थी, लेकिन देश विभाजन के समय इसे अमली जामा पहनाया गया। विभाजन के बाद जब भारत-पाकिस्तान के नागरिक बिना वीजा आवाजाही करते थे, उस समय भी कश्मीर जाने के लिए परमिट अनिवार्य किया गया, जिसके लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी बलिदान हुए। जब देश के लोग विभाजन की विभीषिका झेल रहे थे, उस समय इस तरह के नियम थोपना कश्मीरियत नहीं, बल्कि इस्लामी कट्टरपंथ था। क्या लोगों को मूलभूत अधिकारों से वंचित रखना कश्मीरियत है? अल्पसंख्यकों को लेकर देशभर में चर्चा होती है, जबकि जम्मू-कश्मीर में इस पर कोई नीति ही नहीं है। अल्पसंख्यकों के मामले में संविधान का हवाला दिया जाता है, उस दृष्टि से कश्मीर में भी मुसलमान अल्पसंख्यक ही रहे और हिन्दू बहुसंख्यक। हिन्दुओं के साथ यह धोखा क्या कश्मीरियत है? इस पर चुप्पी क्यों रही अब तक? 
कश्मीर में होने वाले प्रदर्शनों में पाकिस्तान और आईएस का झंडा लहराया जाता है। अनुच्छेद 370 की समाप्ति को इस्लाम से जोड़कर कश्मीरियत की दुहाई दी जाती है। इसी कश्मीर में 2015 में जब मुफ्ती मोहम्मद मुख्यमंत्री थे, अहमदिया मुसलमानों ने एक शांति सम्मेलन करना चाहा तो बवाल हुआ और कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। शिया समुदाय के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है? गुज्जर और बकरवाल की तो कोई गिनती ही नहीं। पंडित पहले ही भगा दिए गए, जबकि डोगरा हाशिये पर हैं। तो क्या बुखारी, अंदराबी, गिलानी, हमदानी, शाह और मुफ्ती की सुविधाओं के हिसाब से कश्मीरियत की परिभाषा गढ़ी जाएगी? बट्ट, लोन, वानी, दार, तांत्रे और तुरे, जो असली कश्मीरी हैं, उन्हें पत्थरबाज और आतंकी बनाने के लिए  'बे्रनवाश' जारी रहेगा। घाटी में 1989 से अब तक जितने भी प्रदर्शन हुए, उनमें संभ्रांत मुस्लिम घरों से कोई भी शामिल नहीं हुआ। जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक सर्वेक्षण (जो कभी जारी ही नहीं हुआ) के अनुसार, कश्मीर में मुसलमानों की आबादी 2.7 प्रतिशत है, जिनका राज्य के 35 प्रतिशत संसाधनों पर कब्जा है। इन्होंने कश्मीर में वहाबी, सलाफी और जमात-ए-इस्लामी फिरकों को वैधानिकता दिलाई। इस गुनाह में कांग्रेस बराबर की भागीदार है, इसलिए गुलाम मोहम्मद सादिक ने जब शेख अब्दुल्ला से राजनीतिक लड़ाई की बात की तो कांग्रेस ने मुफ्ती मोहम्मद और मीर कासिम को साध लिया।
जब आतंकियों को सुरक्षाबलों ने घेर लिया था तब उन्हें हजरतबल दरगाह से सुरक्षित रास्ता मुहैया कराया गया। कश्मीरी नेताओं के बच्चों और रिश्तेदारों को आतंकी 'अगवा' करते रहे और बदले में दुर्दांत आतंकी छोड़े जाते रहे, तब कश्मीरियत खतरे से बाहर रही। दूसरी तरफ, मुफ्ती जैसे नेता कश्मीर में बच्चों की मौत पर राजनीति करते रहे और जश्न मनाते रहे। कश्मीरियों को दुख है कि कट्टरपंथी मुल्लाओं ने उनसे सबकुछ छीन लिया और राजनीति पर काबिज हो गए। बशीर अहमद बट्ट की पुस्तक 'के फाइल, द कांस्पीरेसी ऑफ साइलेंस' में कट्टरपंथियों की बदअमनी की राजनीति के बारे में विस्तार से बताया गया है कि कैसे मासूमों की मौत पर पिज्जा की दावतें होती रहीं। लेकिन अब कश्मीरियत के नाम पर वहां के कुछ खानदानों और दिल्ली में 'कॉन्फ्लक्टि' के नाम पर चल रहा लेन-देन अब खतरे में पड़ गया है।