आजाद होने को छटपटा रहे बलूच
   दिनांक 24-सितंबर-2019
 डेरा बुगती/क्वेटा से हुनक बलोच
फौजी बूट से अमन की राह नापने का इरादा रखने वाले तानाशाह मुशर्रफ ने और कुछ किया हो या न किया हो, अलग-अलग कुनबों और कबीलों में बंटे बलूच आंदोलन को एक राष्ट्रीय शक्ल जरूर दे दी। आज बलूचिस्तान के लोगों में जो सामूहिक उबाल है, आजाद होने की जो छटपटाहट है, उसकी बड़ी वजह नवाब अकबर बुगती की शहादत है

नवाब अकबर बुगती, जिनकी 2006 में पाकिस्तानी फौज ने हत्या कर दी थी, उनकी शहादत के बाद से बलूच आजादी के लिए मशाल जलाए हुए हैं (फाइल चित्र)
बलूचिस्तान की आजादी की जद्दोजहद में 26 अगस्त की एक तारीखी हैसियत है। 2006 में इसी दिन पाकिस्तानी फौज ने नवाब अकबर बुगती को शहीद कर दिया था। बुगती बलूचिस्तान के गवर्नर रहे थे। बलूचिस्तान ही नहीं, पूरे पाकिस्तान में लोग उन्हें बेहद इज्जत के साथ देखते थे। उनकी शख्सियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी शहादत के बाद पूरे पाकिस्तान में लोगों ने रैलियां निकालीं और बलूचिस्तान तो कई दिनों तक जलता रहा।
बुगती कबीले के मुखिया नवाब अकबर बुगती सोच में बहुत आगे थे और वे एक ऐसी बलूच कौम के हामी थे जिसमें लोगों को बुनियादी इनसानी हुकूक हासिल हों, सबके साथ बराबरी का सलूक हो। इसके अलावा वे यह भी कहते थे कि जिस जमीन को कुदरत ने जो खजाना बख्शा है, उस पर वहां रह रहे लोगों का भी हक है। आज स्विट्जरलैंड में निर्वासित जीवन बिता रहे बलूचिस्तान रिपब्लिकन पार्टी के नेता बरहमदाग बुगती इन्हीं अकबर खान बुगती के पोते हैं और वे तमाम बलूच नेताओं की तरह पाकिस्तान से बाहर रहकर आजाद बलूचिस्तान की मुहिम चला रहे हैं। डेरा बुगती के रहने वाले इस्माइल बुगती कहते हैं, ''नवाब अकबर बुगती हमारे हीरो हैं। उन्होंने कौमी बेहतरी की खातिर अपने लिए मुश्किलों भरी राह चुनी। उन्होंने पाकिस्तानी हुक्मरानों के (पाखंड) के खिलाफ आवाज बुलंद की। उनकी शहादत बलूचों को हमेशा अपने हक के लिए खड़े होने का हौसला देती रहेगी।'' इसमें शक नहीं कि अकबर बुगती ने उम्र के जिस दौर में जैसी दिलेरी दिखाई, वह कोई आसान काम नहीं था। वे एक कौम के तौर पर बलूचों के लिए जिस तरह की जिंदगी चाहते थे, उसके लिए हमेशा कोशिश करते रहे। सियासत में थे तब भी, और जब पाकिस्तान की नाइंसाफी के खिलाफ आवाज बुलंद की, तब भी। डेरा बुगती के ही मेहताब बलोच कहते हैं, ''प्रिंस करीम खान, नवाब नौरोज खान, अकबर बुगती जैसे लोगों ने बलूचों के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। जब तक बलूचों को उनका हक नहीं मिलता, उनकी कौमी आजादी नहीं मिलती, ऐसे लोग हमें अपने हक के लिए लड़ने की हिम्मत देते रहेंगे।'' पाकिस्तान की फौज ने जब 1948 में कलात पर हमला किया था तो कलात के खान के भाई प्रिंस अब्दुल करीम खान ने बड़ी बहादुरी से अपने करीब 700 लड़ाकों के साथ मोर्चा थामा था, लेकिन उन्हें शिकस्त मिली। नौरोज खान जेहरी कबीले के मुखिया थे और उन्होंने 1954 के आसपास पाकिस्तानी फौज का पुरजोर तरीके से मुकाबला किया था। लेकिन फौज उन्हें पकड़ने में कामयाब हो गई जबकि उनके बेटे को फांसी दे दी गई। नौरोज खान ने कोहलू जेल में अंतिम सांसें ली थीं।
बलूचिस्तान विश्वविद्यालय के एक पढ़ाने वाले एक प्रोफेसर नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ''पाकिस्तानी फौज के खिलाफ बलूचों की जद्दोजहद तो 1948 से ही शुरू हो गई थी। कलात पर पाकिस्तानी फौज ने जिस तरह जबरन कब्जा जमाया था, उसके खिलाफ तब भी हथियारबंद झड़पें हुई थीं और यह सिलसिला आगे भी चलता रहा। अकबर बुगती के दौर में भी वही सब हो रहा था। लेकिन, अगर अकबर बुगती को मुशर्रफ की हुकूमत ने शहीद नहीं किया होता और उनके साथ बातचीत का रास्ता अख्तियार किया होता, तो शायद आज हालात कुछ और होते। लेकिन फौजी मुशर्रफ बलूचिस्तान के नाजुक हालात का गलत अंदाजा निकाल बैठे और नतीजा सामने है।'' बलूचिस्तान विश्वविद्यालय में तालीम ले रहे हमीद बलोच कहते हैं, ''अकबर खान बुगती का नाम बाअदब लिया जाएगा। वे तब जिन मुद्दों की बात करते थे, वे आज भी बने हुए हैं और बलूच बुनियादी तौर पर उन्हीं के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।''
नवाब अकबर बुगती को एक और बात के लिए याद रखा जाएगा। उन्होंने अलग-अलग खांचों में बंटे बलूचों को एकजुट किया। बलूचिस्तान विश्वविद्यालय के एक अन्य प्रोफेसर नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, ''यह मानना होगा कि अकबर बुगती की शहादत ने बलूचों को इकट्ठा कर दिया। उससे पहले बलूच कबीलों, उनके सरदारों और सियासी हालात को सोचने-समझने के अलग-अलग तरीकों में बंटे थे। यह सही है कि ज्यादातर कबीलों में बलूच आबादी के खिलाफ पाकिस्तानी हुकूमत, पाकिस्तानी फौजी दहशतगर्दी के खिलाफ गुस्सा था, फिर भी वे काफी हद तक अलग-अलग चल रहे थे। लेकिन अकबर बुगती की शहादत के बाद ये सभी कबीले जाने-अनजाने हमकदम हो गए। तारीखी तौर पर यह कोई छोटी बात नहीं।''
छात्र नेता रहे हकीम बलोच मानते हैं कि अकबर बुगती की शहादत ने बलूचों को वह रास्ता दिखा दिया, जिस पर चलकर सभी मकसद पूरे किए जा सकते हैं। वे कहते हैं, ''इस बात से इनकार नहीं कि अकबर बुगती की कुर्बानी से बलूचों में एकजुटता आई, लेकिन आज भी यह वैसी नहीं जैसी होनी चाहिए। एक बात बिल्कुल साफ है कि बलूचिस्तान के मसले का फौजी हल नहीं हो सकता। यह जब भी होगा, एक सियासी फैसला होगा जो सियासी तरीके से होगा। बलूचों को उस सूरतेहाल के लिए भी खुद को तैयार करना होगा।''
दिक्कत की बात यह है कि हकीम जिस बातचीत की बात कर रहे हैं, उसके लिए बलूचिस्तान में कोई जमीन फिलहाल तो नहीं दिखती। बातचीत के लिए जरूरी होता है एक अच्छा माहौल तैयार करना। लेकिन बलूचिस्तान में जो हाल है, जिस तरह वहां सरकारी सरपरस्ती में दहशतगर्दी हो रही है, आए दिन आम लोगों को उठा लिया जा रहा है, लोगों पर हवाई हमले किए जा रहे हैं, वहां बातचीत के बारे में सोचना भी मुश्किल है। पाकिस्तानी हुकूमत जुल्म करने से बाज नहीं आ रही और हर जुल्म के साथ बलूचों में मर-मिटने का जज्बा पुख्ता होता जा रहा है। ऐसे में क्या उम्मीद की जा सकती है? इस पर हकीम कहते हैं, ''उनकी नजर में बलूच मुद्दे का हल नस्लकुशी में है और पाकिस्तानी हुकूमतें इसी रास्ते पर चलती रही हैं। बलूच 1948 से फौजी जबर का जवाब दे रहे हैं और वे आगे भी इससे पीछे नहीं हटेंगे।''
पाकिस्तान दहशतगर्दी के सियासी इस्तेमाल की जिस पतली रस्सी पर बाजीगरी कर रहा है, उस पर लंबे अरसे तक नहीं टिका जा सकता। जिस दिन उसके पैर इधर-उधर पड़े, उसके लिए संभलना मुश्किल होगा और तब दुनिया का ध्यान बलूचों की ओर जाएगा। जब तक दुनिया के बड़े देशों को लगता रहेगा कि पाकिस्तानी दहशतगर्दी की आग से उनके अपने घर सुरक्षित हैं, वे बलूचों के साथ हो रही ज्यादतियों को समझते हुए भी कुछ खास नहीं करेंगे। इसलिए मानकर चलना होगा कि जब तक दुनिया पाकिस्तान के खिलाफ कोई मुकम्मल फैसला नहीं करती, बलूचों को अकबर बुगती जैसे किरदारों से हौसला पाते हुए जद्दोजहद की मशाल को जलाए रखना होगा।