जन्म-दिवस विशेष: युगों में जन्म लेते हैं पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोग
   दिनांक 25-सितंबर-2019
 
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी, व्यक्ति नहीं विचारधारा थे। स्वतन्त्र भारत में राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिये उन्होंने सत्ता और समाज को विकास का ऐसा मार्ग सुझाया था, जिस पर चलकर हम अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में अधिक सफ़ल रहते और तब भारत की तस्वीर बिलकुल अलग होती। पंडितजी का एकात्म मानव दर्शन भारतीय संस्कृति और ऋषि परम्परा को अपनाकर सम्पूर्ण जीवन के रचनात्मक पक्ष को समझने का मार्ग देता है। एकात्म मानव दर्शन के माध्यम से उन्होंने बड़ी सहजता से व्यक्ति से राष्ट्र तक के सम्बन्ध को परिभाषित किया है। व्यष्टि से समष्टि एवं उसमें अन्तर्निहित चैतन्यता को एकात्म मानव दर्शन के समग्र चिंतन में स्पष्ट किया गया है। शारीरिक आत्मा की तरह राष्ट्र की भी आत्मा होती है, जो कभी खत्म नहीं होती। राष्ट्र की इस चेतनामयी आत्मशक्ति को उन्होंने चिती के नाम से सम्बोधित किया। अर्थात, आत्मा की तरह राष्ट्र का अमरत्व तत्व भी अखण्डित है तथा राष्ट्र रूपी देह के रक्षण, संरक्षण, संवर्धन का दायित्व व्यक्ति का है जो समाज की मूलभूत इकाई है।
पंडितजी ने भारत की सनातन विचारधारा के नित्य नूतन तत्व को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानव दर्शन की विचारधारा दी। एकात्म मानव दर्शन के उनके चिंतन में जीवन का पूरा रहस्य निहित है। उन्होंने व्यक्ति को समाज की प्राथमिक इकाई बताया था। अर्थात, समाज को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाने की पहली सीढ़ी व्यक्ति है। व्यक्ति एवं परिवार के हित के मध्य यदि चयन का प्रश्न हो तो परिवार का हित सिद्ध करने के लिये व्यक्ति निज हित छोड़ देता है। इसी प्रकार समाज का हित हो तो परिवार का हित छोड़ देना चाहिए। देश हित में समाज का हित छोड़ देना चाहिए। उनका यह चिंतन राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनने की प्रक्रिया में प्रत्येक भारतीय नागरिक के लिये मन्त्र के समान है। एकात्म मानव दर्शन में दीनदयालजी ने मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन के विविध आयामों को रचनात्मक ढंग से समाहित किया है।
उनका दिया हुआ अन्त्योदय का सूत्र, आज के समय की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों में रचनात्मक परिवर्तन करने का सर्वाधिक प्रासंगिक मन्त्र है। उन्होंने तब कहा था कि सत्ता व समाज दोनों के जिम्मेदारी से काम करने से ही सम्पूर्ण विकास का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। गत तीन दशकों में वैश्विकरण और उदारीकरण का एक लम्बा दौर गुजर गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देश में अमीर व गरीब के बीच की खाई जितनी कम होनी चाहिए, उतनी नहीं हुई। यह आर्थिक विषमता हमारे चिन्ता का बड़ा कारण है। उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ में जिस प्रकार का विकास हुआ, उसमें व्यक्ति तेजी से उपभोक्तावादी बना और असंतुलित विकास ने शहर की आधुनिकता तथा गांव के पिछडेपन की दरार को और चौड़ा कर दिया। शहर सांस्कृतिक बदलाव के अंधकार की तरफ बढ़ते गए और गांव अपनी अस्मिता, अपनी धरोहर बचाने का संघर्ष करते रहे। विकास के इस नव उदारवादी ढांचे की अच्छाई तथा बुराई के मध्य आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक सन्तुलन साधकर राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने का सामर्थ्य रखने का सूत्र अन्त्योदय है।
स्वतंत्रता के सात दशक बाद पहली ऐसी सरकार आई है, जो पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों के अनुरूप सत्ता और समाज को साथ मिलाकर राष्ट्र को विकास की दिशा में ले जाने का काम कर रही है। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी अन्त्योदय की परिकल्पना को साकार रूप देने का काम कर रहे हैं। यह अतिशयोक्ति नहीं है, अपितु गत पांच वर्ष के कामकाज का आकलन करके ही देश की जनता ने उनके नेतृत्व में पुनः विश्वास व्यक्त किया है। अन्त्योदय का लक्ष्य समाज के उस वर्ग को संबल देना है, जो राष्ट्र की मुख्यधारा से काफी पिछड़ गया है। इसके पहले की सरकारों ने समाज को विकास में सहभागी बनाने की बजाय उन्हें उपभोक्तावादी, उपभोगवादी बनाने का काम किया। गांवों की हालत यथावत रही। शहर तेजी से विकसित हुए। आकर्षण के नये केन्द्र बने, नतीजा, गांव संकट में आए और पलायनवादी हो गए।
यदि स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात पंडित दीनदयालजी के विचारों को अपनाकर आगे बढ़ा गया होता तो देश में आज आर्थिक, सामाजिक विषमता की स्थिति निर्मित नहीं होती। पंडितजी का चिंतन बहुत स्पष्ट था, उनका मत था- प्रकृति से मिलने वाली चीजें समाज के हर वर्ग तक पहुंचनी चाहिए। उसका दोहन करने की बजाय हमें उसका आवश्यकतानुसार उपयोग करना चाहिए। पंडितजी ने गांव की मूल पूंजी कृषि को उन्नत बनाने के लिए गंभीरता से प्रयास करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। इसके लिए दीनदयाल जी ने ‘हर खेत को पानी, हर हाथ को काम ’ का विचार दिया था। उनका चिंतन था- खेती लाभप्रद होगी, भण्डारण बाजार की उचित व्यवस्था होगी, तो गांव उन्नतिशील हो जाएंगे। गांव के लोग शहर की ओर पलायन नहीं करेंगे। तब बड़ी संख्या में हमारे युवा कृषि कार्य में लगेंगे। लेकिन हुआ क्या? किसान तेजी से मजदूर बनते गए। उन्हें रोकने का कारगर प्रयास नहीं हुआ। शहर व गांव दोनों के बीच असंतुलन स्थापित हो गया। विकास चाहे जितना हो जाए मगर हर हाथ को काम नहीं मिला। उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण कृषि व उद्योग व्यापार में अनावश्यक टकराव की स्थिति पैदा हो गई। दीनदयालजी की वैचारिक अवधारणा के अनुरूप मोदी सरकार उस असंतुलन को संतुलित बनाने का प्रयास कर रही है।
दीनदयालय जी के इन्हीं प्रेरणादायी विचारों को अपनाकर देश की वर्तमान कृषि समस्याओं का समाधान करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा जा रहा है। यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी देश को फिर से विकास के ढर्रे पर लाकर नये प्रतिमान गढ़ने का काम कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने कृषि को प्रधानता का दर्जा दिलाने और किसान को पुन: सामर्थ्यवान बनाने का बीड़ा उठाया है। पिछले पांच साल में सिंचाई क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ है। कृषि उत्पाद की खरीददारी में भारी छूट का प्रावधान किया गया है। बजट में कृषि की हिस्सेदारी पहले से ज्यादा की गई है। किसानों को साल में 12 हजार रूपए की सम्माननिधि देकर मोदी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह राष्ट्र के समग्र विकास का उद्देश्य लेकर काम कर रहे हैं। सरकार अन्नदाता किसान भाइयों की तय समयावधि में आय दोगुनी करने का बड़ा लक्ष्य लेकर चल रही है।
आज सत्ता और समाज मिलकर राष्ट्र को विकसित करने की जिम्मेदारी निभाने एक साथ आए हैं। प्रधानमंत्री मोदीजी ने 70 साल के पिछड़ेपन से समाज को निकालने के लिए कई ऐसी योजनाएं धरातल पर उतारी हैं, जिसके सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं। उज्जवला योजना के जरिए समाज की गरीब महिलाओं को धुंआ भरे जीवन से बाहर लाने का बहुत बड़ा काम किया जा रहा है। सौभाग्य योजना के जरिए अंधकार में डूबे गांवों को रोशनी देने का काम किया गया है। प्रधानमंत्री सड़क योजना के जरिए देश में दो लाख किमी सड़क का निर्माण कर गांवों को पगडंडी से बाहर निकाला गया है। प्रधानमंत्री आवास योजना में अभी तक दो करोड़ गरीब परिवारों को मकान दिए जा चुके हैं। गरीब परिवारों की स्वास्थ्य समस्या के निदान के लिए लाई गई आयुष्मान योजना में देश की आधी आबादी को लाभ से जोड़ा गया है। अब गरीब परिवार देश के किसी ख्याति प्राप्त अस्पताल में 5 लाख तक का उपचार मुफ्त में करा रहा है।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के सत्ता और समाज की साझी जिम्मेदारी से राष्ट्र विकास के संकल्प को उनके ‘ सबका साथ, सबका विकास ’ के स्लोगन से समझा जा सकता है। यह सरकार पंडित दीनदयालजी के अन्त्योदय के सूत्र को केन्द्र में रखकर सामाजिक पुर्ननिर्माण का कार्य कर रही है। पंडितजी ने अन्त्योदय के सूत्र से समाज के जिस वर्ग के उत्थान का सपना देखा था, आज वह सपना साकार होता दिख रहा है।
केन्द्रीय संस्कृति, पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)