वनवासियों के कल्याण के लिए जीवन समर्पित करने वाले संत थे प्रोफ़ेसर खेरा
    दिनांक 25-सितंबर-2019
समाजसेवी, शिक्षाविद व बैगा आदिवासियों के रहनुमा कहलाने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के पूर्व प्रोफेसर डॉ. प्रभुदत्त खेरा नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद 23 सितंबर को उन्होंने बिलासपुर के अपोलो अस्पताल में अंतिम सांस ली

सतपुड़ा पर्वतमालाओं के बारे में आपने खूब सुना होगा. सदानीरा नर्मदा और ताप्ती से नहाते हुए निकलते ऊंघते और अनमने जंगल. इसी जंगल श्रेणी में मैकाल श्रेणी की पहाड़ियों से आच्छादित है अचानकमार. बस्तर के अबूझमाड़ की तरह यह छत्तीसगढ़ का एक अलग अचानकमार. यह नाम इसलिए शायद कि अचानक से क्या ‘मार’ जाए. घने जंगलों के बीच बाघ, तेंदुआ, जंगली सूअर, जंगली भैंसा, जंगली भालू जैसे खतरनाक जानवरों में से कौन अचानक कहां से निकल जाय. गौर, अनेक प्रजातियों के हिरण और दो सौ से अधिक पशु-पक्षियों की प्रजाति से संपन्न भारत के ह्रदय में बसा 553 वर्ग किलोमीटर के इस क्षेत्र में कब अचानक क्या निकल कर आपको विस्मित कर दे, पता नहीं.
बाहर से हालांकि जितना रोमांचकारी ये जंगल लगते हैं, यहां निवास करने वाले वनवासियों के लिए यह उतना भी रंगीन नहीं है. सदियों से प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार रहे, सभ्य कहे जाने वाले शहरी मानव के शोषण की प्रवृत्ति की अंतहीन कहानियों को कहते ऐसे तमाम भारतीय पर्वतश्रेणियों के बीच सतपुड़ा भी आपको अपनी अकथ कहानी कहता नज़र आयेगा. शर्त यह की उन्हें सुन और समझ सकने की संवेदना हो आपके भीतर. उनकी तकलीफों से एकाकार हो जाने का सामर्थ्य हो आपके पास.
ऐसे ही संवेदना और सामर्थ्य के साथ 1984-85 के मध्य दिल्ली विश्विद्यालय का समाजशास्त्र का एक व्याख्याता अपने छात्रों की टोली के साथ शोध करने आया था अचानकमार. तबके मध्यप्रदेश के तब के बिलासपुर जिला के अंतर्गत अचानकमार, जो आज छत्तीसगढ़ प्रदेश के नवनिर्मित जिला मुंगेली का हिस्सा है. छात्रों की टोली के साथ प्रोफ़ेसर प्रभुदत्त खेरा तब तो लौट गए ही लेकिन मन इनका इन्हीं वन्य क्षेत्रों में टंगा सा रह गया था. तबसे अपनी नौकरी के काल तक तो किसी तरह उन्होंने दिल्ली को दिया, अचानकमार के संपर्क में सतत रहते हुए लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद अंततः यहीं आ कर ‘लमनी’ नामक गांव में खेरा जी ने बसेरा बना ही लिया था.
एक छोटी सी कुटिया को ही अपनी दुनिया बना प्रोफ़ेसर खेरा अपने झोले में ही अपनी सारी गृहस्थी और सारा संसार बना बैठे थे. खुद से रांध कर एक समय भोजन करना और ऋषि की तरह जंगल भर में रमन करते रह सेवा करते रहना. यही जीवन क्रम था खेरा जी का. पाकिस्तान के लाहौर से विस्थापित होकर भारत आने वाले प्रोफ़ेसर न केवल विस्थापन की पीड़ा जानते थे बल्कि शायद भौतिक संपदाओं की क्षणभंगुरता का भी अहसाह उन्हें था ही. सो सेवानिवृत्ति के बाद भौतिक सुख-सुविधाओं से संपन्न एक आरामदायक जीवन को छोड़ उन्होंने अशिक्षा और अस्वास्थ्य से जूझ रहे बैगा वनवासियों के पीड़ाहरण में ही सुकून और सुविधा, सार्थकता की तलाश कर ली थी प्रो. खेरा ने. भारतीय मनीषा के ध्येय वाक्य को ही अपने जीवन का ध्येय बना – न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम. कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम.
अपने झोले में बैगा वनवासियों की पीड़ा को मुस्कान में बदलने का सारा सामान रखे हुए खेरा गांव-गांव घूमने लगे थे. शिक्षा और स्वास्थ्य की कमी को उन्होंने पहचान लिया था और इसी पर फोकस रखते हुए वे हर बीमार के पास अस्पताल बन पहुंच जाते, बच्चों के पास सरस्वती बनकर. अपने पेंशन की सारी राशि इसी यज्ञ में खर्च कर स्थितिप्रज्ञ सा घुमते वे समूचे क्षेत्र में ‘दिल्ली वाले साहब’ के नाम से विख्यात थे. वनवासियों के निर्दोष चेहरे की सहज मुस्कान उनके लिए हमेशा नोबल जैसे पुरस्कारों से ज्यादा ज्यादा कीमती थी. यह इसलिए क्योंकि अपनी सारी कामनाओं को छोड़ आए खेरा जी की रूचि न तो वनवासियों को दी गई दवा के बदले उनका धर्म छीन लेने में थी, न ही उनका जीवन छीन कर कोई पुरस्कार प्राप्त कर लेने की.
इस समूचे सुन्दर अंचल को युद्ध क्षेत्र में बदल देने की मंशा रखने वाले ‘कालनेमि’ यहां आते-विचरते ही रहते हैं, तो खेरा को भी शुरुआत में संदेह की दृष्टि से देखा गया. जिस तरह वाम पोषित ‘डिजायनर समाजसेवियों’ ने समूचे देश ख़ास कर छत्तीसगढ़ में भरोसे का संकट पैदा करके रखा हुआ है, वैसे में निस्संदेह ही संदेह होना उचित था भी लेकिन, जल्द ही अपने सनातनत्व, संतत्व, सेवात्व से शंका समाधान कर साबित कर दिया था खेरा जी ने कि वे ‘प्रभुदत्त’ हैं और प्रभु प्रदत्त भी सच्चे अर्थों में. उसके बाद खेरा जी अंचल के सर्वमान्य सेवैत के रूप में प्रतिष्ठापित हुए. पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह जी ने अपने कार्यकाल में उनके पास जा कर इन्हें सम्मानित भी किया था और उनकी मंशा के अनुरूप स्कूल बनाने के लिए अलग से एक बड़ी राशि भी घोषित की थी. बैगा जनों के लिए काम करते हुए भी खेरा जी न केवल निष्काम भाव से, स्थितिप्रज्ञ सा –तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा, जैसे भाव से कार्य करते रहे बल्कि ये सब करते हुए वे उनके आत्मसम्मान को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देते रहे. सतत उनके संपर्क में रहे प्रदेश के पूर्व महाधिवक्ता कनक तिवारी कहते हैं – ‘एक बार अपने सात्विक अहंकार में हम कुछ मित्रों ने कुछ पुराने कपड़े इकट्ठे किए अन्य सामानों के अतिरिक्त. उन्हें जा कर बैगा बच्चों और पुरुषों महिलाओं आदि के लिए देने की पेशकश की. दवाइयां खाद्य सामग्री आदि उन्होंने स्वीकार कर लीं. लेकिन अपनी अत्यंत संजीदगी और विनम्रता में बोले पुराने कपड़े इन्हें नहीं देना चाहिए. उनके आत्मसम्मान को चोट पहुंचती है. उन्हें लगता है कि वे समाज की अतिरिक्ताएं हैं. हम शर्मसार हो गए और तत्काल हमने बिलासपुर लौट कर अपने आप को संशोधित किया और बच्चों के लिए नए कपड़े और खाद्य सामग्री वगैरह फिर से उन्हें भिजवाई.’
वास्तव में अगर आप किसी ऐसे क्षेत्र में सेवा के इच्छुक हों तो सबसे पहले आपको अपना अभिमान बाहर रखना होता है और उसके बाद उन क्षेत्रों के निवासियों के स्वाभिमान का भी ख़याल रखना होता है. ईसाई/वाम प्रेरित ‘सेवकों’ को यही सीख लेने की आवश्यकता है।
व्यक्ति मोटे तौर पर तीन कारणों से प्रवासी होता है. सेवा के लिए, रोजगार के लिए और शासन के लिए. यह विडंबना है कि शासन/शोषण करने की मंशा रखने वाले लोग भी बहाना तो सेवा का ही बनाते हैं जैसे माओवादी वंशज बनाते हैं. इसके उलट वास्तव में सेवा करने वाले खेरा जी जैसे लोग अपनी सहज विनम्रता से कोई दावा ही नहीं करते बल्कि कृतज्ञ होते रहते हैं कि उन्हें अपना जीवन धन्य करने का अवसर मिला.