अब क्यों गिड़गिड़ा रहा है अलगाववादी ​गिलानी
   दिनांक 25-सितंबर-2019
सतीश चंद्र मिश्रा
धारा 370 हटने के बाद गिलानी अपने घर का दरवाजा अंदर से जोर-जोर से खटखटाते हुए दरवाजे के बाहर तैनात सीआरपीएफ के जवान के आगे भारतीय लोकतंत्र की दुहाई देते हुए गिड़गिड़ा रहा था कि... भाई दरवाजा खोल दो

 
जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेताओं में सैयद अली शाह गिलानी को सबसे ताकतवर माना जाता है। उसकी हेकड़ी का आलम यह था कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान आपने स्वयं देखा होगा कि भाजपा को छोड़कर लगभग सभी दलों, विशेषकर भाजपा/मोदी विरोधी दलों के मठाधीश भी जब गिलानी से मिलने उसके घर पहुंचते थे तो वह अपने घर का दरवाजा तक नहीं खोलता था और उनको दुत्कार कर भगा देता था।
सितम्बर 2016 में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल बनाकर उससे मिलने पहुंचे सीताराम येचुरी, शरद यादव, डी. राजा समेत दर्जन भर नेताओं के जमावड़े को गिलानी ने इसी तरह दुत्कार के खदेड़ दिया था। वह यही व्यवहार गैरकश्मीरी मीडिया के साथ भी करता था। पिछले कुछ वर्षों के दौरान उसने केवल कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर को अपने घर के भीतर बुलाकर बात की थी। लेकिन विरोधी दल और लुटियनिया मीडिया गिलानी को इस तरह प्रस्तुत करता था मानो वह सर्वशक्तिमान है, अपराजेय है, जबकि आप मित्रों ने कुछ दिन पहले वायरल हुआ वह वीडियो अवश्य देखा होगा जिसमें गिलानी अपने घर का दरवाजा अंदर से जोर-जोर से खटखटाते हुए दरवाजे के बाहर तैनात सीआरपीएफ के जवान के आगे भारतीय लोकतंत्र की दुहाई देते हुए गिड़गिड़ा रहा था कि... भाई दरवाजा खोल दो...।
दरअसल, गिलानी और उसके जैसे अन्य अलगाववादी गुर्गे लुटियनिया और पाकिस्तानी सर्कस के वो शेर थे, जिन्हें जंगली शेर से भी भयानक और खतरनाक बनाकर एक सोची- समझी साजिश के तहत प्रस्तुत किया जाता था।
वर्ष 2008 में अमरनाथ भूमि विवाद को लेकर जम्मू में जब ऐतिहासिक जन आंदोलन हुआ था, उन दिनों मैं जम्मू के एक अखबार में कार्यरत था। सम्पादक समेत 90 प्रतिशत सहकर्मी जम्मू के ही निवासी थे। उन दिनों जम्मू के जन आंदोलन के विरोध में गिलानी श्रीनगर में बैठकर जहरीली बयानबाजी करता था। जम्मू के मुस्लिमों के बीच साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने की कोशिशें करता था। उसकी उन बातों का जम्मू के मेरे सहकर्मी मित्र मजाक उड़ाया करते थे। एक दिन मैंने उनसे इसका कारण पूछा तो उन्होंने हंसते हुए बताया कि दिल्ली के मीडिया ने उसकी औकात बहुत बढ़ा-चढ़ा रखी है, जबकि गिलानी की पकड़ श्रीनगर के डाउन टाउन इलाके और मुख्यत: सोपोर जिले तक ही सीमित है। जम्मू में उसकी सुनने वाला कोई नहीं।
उस समय उन्होंने बताया था कि अभी कुछ महीने पहले ही जम्मू की दो मस्जिदों में एक इस्लामी कार्यक्रम में वक्तव्य देने के लिए गिलानी को बुलाया गया था। लेकिन गिलानी ने उस कार्यक्रम में मंच से भारत विरोधी भाषण देना प्रारम्भ कर दिया था। उसके ऐसा करते ही मस्जिद में जमा भीड़ उस पर टूट पड़ी थी कि तुमको यहां धार्मिक प्रवचन के लिए बुलाया था, भारत विरोधी भाषण देने के लिए नहीं बुलाया था। दूसरी मस्जिद में आयोजित कार्यक्रम में भी गिलानी ने ऐसी ही कोशिश की जिसका परिणाम भी पहले जैसा ही हुआ। लिहाजा उसने भागते हुए कार में बैठकर जान बचाई थी। उस दिन स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि यदि सुरक्षाकर्मी साथ नहीं होते तो गिलानी किसी अस्पताल के आईसीयू में पड़ा होता। उपरोक्त प्रकरण बताते हुए साथी समाचार संपादक ने मुस्कराते हुए मुझसे पूछा था कि जम्मू के हर अखबार में तो यह घटना छपी थी, लेकिन दिल्ली या उत्तर प्रदेश के किसी अखबार या न्यूज चैनल पर क्या आपने यह खबर पढ़ी या देखी थी? इस सवाल के साथ ही उन मित्र ने बताया था कि इनकी जितनी ताकत और पकड़ है, राष्ट्रीय मीडिया उससे बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करता है। 
हाल के ऐतिहासिक घटनाक्रम के बाद कश्मीर घाटी में पसरी शांति देखकर मुझे 11 वर्ष पूर्व का वह वार्तालाप याद आ गया। मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि गिलानी की हैसियत का सच जो लुटियनियों ने कभी नहीं दिखाया, न कभी बताया। लेकिन मोदी-शाह की जोड़ी उस सच से भलीभांति परिचित थी।

(फेसबुक वॉल से साभार)