मीडिया की नकारात्मक भूमिका के बीच सोशल मीडिया
   दिनांक 27-सितंबर-2019
 
सोचना होगा कि हमारे बच्चे इतिहास की जिन किताबों को स्कूलों में पढ़ रहे हैं वे कैसे लोगों से लिखवाई गई हैं
 
देशभर में हिंदुओं के खिलाफ मजहबी हिंसा लगातार बढ़ रही है। बलपूर्वक कन्वर्जन ही नहीं, जरूरत पड़े तो हत्या और बलात्कार जैसी जघन्य घटनाएं भी रोज की बात हो चली हैं। लेकिन ऐसी तमाम घटनाओं को मुख्यधारा मीडिया में जगह नहीं मिल रही। मीडिया बाकायदा नीतिगत तरीके से इन खबरों को दबा रहा है। बिहार के अररिया में एक महिला की सरेआम पिटाई और फिर कन्वर्जन करवाने की खबर इसका आदर्श उदाहरण है। सभी अखबारों और चैनलों ने इसे मामूली खबर के तौर पर दिया। जबकि इस घटना का वीडियो सामने आ चुका है। मीडिया ने पीड़ित महिला की जाति तो बताई, लेकिन बड़ी सफाई से यह छिपा लिया कि वीडियो में लाठियां बरसाता दिख रहा व्यक्ति मुसलमान है। यह इकलौता मामला नहीं है, उत्तर प्रदेश के कौशांबी में एक बच्ची से बलात्कार का वीडियो सामने आया। लगभग सभी चैनलों और अखबारों ने बताया कि लड़की दलित जाति से है। लेकिन यह छिपा लिया कि बलात्कारी मुसलमान हैं। समाचारों की यह अघोषित सेंसरशिप संयोगमात्र नहीं है। चैनलों के संपादक और प्रबंधक एक रणनीति के तहत यह काम कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य यह साबित करना है कि देश में बहुसंख्यक हिंदू अल्पसंख्यक मुसलमानों पर अत्याचार कर रहे हैं।
 
मीडिया का यह पाखंड राजनीतिक खबरों में भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। बंगाल में जादवपुर विश्वविद्यालय में केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो के साथ मारपीट की कोशिश हुई। कैमरे पर घंटों तमाशा चलता रहा, लेकिन दिल्ली के लगभग सभी मीडिया चैनलों ने उसे नहीं दिखाया। यह भी एक संपादकीय फैसला था, ताकि लोग न जान सकें कि जो वामपंथी दिल्ली में बैठकर असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जाप करते हैं, उनका असली चेहरा क्या है। यह भी एक तरह की अघोषित सेंसरशिप है, जिसमें उन सभी समाचारों को दबा दिया जाता है जिनसे जनता में विपक्ष का असली तानाशाही चेहरा उजागर होता हो। इसी मानसिकता के कारण केरल और बंगाल में आए दिन होने वाली राजनीतिक हत्याओं की खबरें भी कभी सुर्खियों में जगह नहीं पा पातीं। हद तब हो गई जब जादवपुर में वामपंथी गुंडागर्दी के समर्थन में अखबारों ने सुबह हेडलाइन लिखीं।
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे को लेकर भी लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं, जिनमें मुख्यधारा मीडिया की छटपटाहट साफ देखी जा सकती है। प्रधानमंत्री ने 'हाउडी मोदी' कार्यक्रम में अपने भाषण में याद दिलाया कि कैसे 2016 के चुनाव में 'अबकी बार ट्रंप सरकार' का नारा दिया गया था। लेकिन पूरी बात सुनने और समझने के बजाय लगभग सभी चैनलों और अखबारों ने इसे अमेरिका में आने वाले चुनावों का प्रचार मान लिया। न सिर्फ मान लिया, बल्कि इसे भ्रामक रूप से ही रिपोर्ट भी किया गया। दो देशों के एक कार्यक्रम में भारतीय प्रधानमंत्री की बात को इस तरह से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना मीडिया के लिए बहुत सहज हो चुका है। वह पहले भी ऐसा कर चुकी है। लेकिन इस प्रवृत्ति के नतीजे खतरनाक भी हो सकते हैं। अगर स्थितियां न सुधरें तो खुद सरकार को इस बारे में मीडिया के संगठनों से बात करनी चाहिए।
 
उधर, कश्मीर घाटी के एक सीमित इलाके में संचार माध्यमों पर लगी निषेधाज्ञा पर मुख्यधारा मीडिया का रुदन जारी है। खास तौर पर एनडीटीवी इससे बहुत दुखी है। उसके लिए यह मायने नहीं रखता कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद से कश्मीर घाटी में किसी बेकसूर को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ी है। लेकिन संभवत: कुछ मीडिया समूहों की प्राथमिकता शांति और स्थिरता नहीं है। वे किसी गुप्त एजेंडे के लिए काम कर रहे हैं, जो निश्चित रूप से भारत के हित में नहीं है। कश्मीर में तोड़े गए 50,000 मंदिरों के पुनर्निर्माण की केंद्र सरकार की योजना पर भी मीडिया की ऐसी ही तिलमिलाहट देखने को मिली। कांग्रेस नेता चिदंबरम अदालत के आदेश पर तिहाड़ जेल में बंद हैं। लेकिन देश की तमाम घटनाओं पर उनकी प्रतिक्रियाएं ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बनकर चैनलों पर चल रही हैं। एक विचाराधीन कैदी को मीडिया में मिल रहे इस महत्व के पीछे कारण क्या है? वह भी तब जब सबको पता है कि उनका सोशल मीडिया खाता अन्य लोग चला रहे हैं।
 
मुख्यधारा मीडिया की इस नकारात्मक भूमिका के बीच सोशल मीडिया अपना काम ज्यादा जिम्मेदारी के साथ कर रही है। तथाकथित इतिहासकार रोमिला थापर की सच्चाई सोशल मीडिया के जरिए ही लोगों तक पहुंच पाई। रोमिला थापर ने किसी कार्यक्रम में कहा कि युधिष्ठिर ने सम्राट अशोक से प्रेरणा लेकर राज्य का त्याग किया था। यह देखकर लोगों को यह सोचने और समझने का अवसर मिला है कि हमारे बच्चे इतिहास की जिन किताबों को स्कूलों में पढ़ रहे हैं वे कैसे लोगों से लिखवाई गई हैं। ल्ल