सोलन में प्राध्यापक संगोष्ठी संपन्न
   दिनांक 27-सितंबर-2019
 
 
कार्यक्रम को संबोधित करते श्री मोहनराव भागवत
 
 
संतों, महात्माओं ने भारत की विशेषता सदियों से चली आ रही संस्कृति को बताया है। सदियों से अपने देश की एक संस्कृति रही है 
 
गत दिनों हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित डॉ. यशवंत सिंह परमार वानिकी एवं बागवानी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि संतों, महात्माओं ने भारत की विशेषता सदियों से चली आ रही संस्कृति को बताया है। सदियों से अपने देश की एक संस्कृति रही है, जो विभिन्न पूजा-पद्धतियां होते हुए भी सम्पूर्ण देश को जोड़ती है। इसलिए हमें अपनी संस्कृति का गौरव होना चाहिए। जिस मनुष्य को अपने राष्ट्र की पहचान नहीं, उसका जीवन व्यर्थ है। राष्ट्र हमको जोड़े रखने के लिए एक शक्ति व प्रेम देता है। अपने कर्तृत्व से सुख-शांति प्राप्त कर अपना जीवन ठीक करो, ये सब अपनी संस्कृति कहती है। इस प्रकार की प्रामाणिकता और नि:स्वार्थ बुद्धि से नई पीढ़ी को तैयार करेंगे तभी राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका सार्थक होगी। उन्होंने कहा कि आज के दौर में शिक्षकों को राष्ट्र की परिकल्पना स्पष्ट होनी चाहिए। जैसे कई वर्षों से हमको पढ़ाया गया कि आर्य बाहर से आए, लेकिन हरियाणा के राखीगढ़ी के उत्खनन से अब यह एक मिथक साबित हो रहा है। आर्य भारत के ही निवासी थे, यह सिद्ध हुआ है। उन्होंने यूरोप में उत्तम शिक्षा प्रणाली के लिए प्रसिद्ध देश फिनलैंड में शिक्षा प्रणाली के विषय में बताया कि वहां पर अभिभावक बच्चों पर अधिक अंक लाने पर जोर नहीं देते हैं, वे कहते हैं कि हम अपने बच्चों को वर्तमान समय में जीने के लिए संघर्ष करना सिखाते हैं। इसलिए वे स्वत: ही अध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय स्थान प्राप्त करते हैं। स्कूलों में चौथी कक्षा तक का पाठ्यक्रम मातृभाषा में रहता है। इसके बाद यदि छात्र या उनके अभिभावकों का विचार छात्र को अन्य व विदेशी भाषा का भी ज्ञान देने का हो तो आगामी कक्षाओं में उसकी व्यवस्था रहती है। उन्होंने कहा कि हम भी भारत वर्ष में ऐसी और इससे बेहतर शिक्षा की व्यवस्था कर सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी शिक्षकों की है जो उस व्यवस्था की अहम कड़ी है। (विसंकें, सोलन)
 
‘‘कर्म ही हमें धर्म की ओर प्रेरित करता है’’

 
 
नवनिर्मित मंदिर में पूजा करते हुए श्री मोहनराव भागवत और अन्य अतिथि
 
‘‘भारतीय सभ्यता-संस्कृति 5,000 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है तथा विविधता में एकता के सह-अस्तित्व की विशिष्टता को दर्शाती है। धर्म वास्तविकता में एकता का एकीकृत दृश्य प्रदान करता है, क्योंकि भगवान एक हैं और उनके द्वारा बनाई गई वास्तविकता, एकता और अखंडता का प्रतीक है।’’ उक्त बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कही। वे गत दिनों सोलन में नवनिर्मित श्री कृष्ण मंदिर का विधिवत् पूजन-अर्चन करने के बाद कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस मौके पर मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री जयराम ठाकुर, मंदिर के संरक्षक परमहंस कारंजेकर जी आदि उपस्थित थे।
 
इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म का उद्देश्य मानवता को एकजुट करना है। हममें से प्रत्येक को अपने समाज और राष्ट्र के विकास के लिए ईमानदारी और समर्पण के साथ कार्य करना चाहिए, क्योंकि यह कर्म ही है जो हमें धर्म की ओर प्रेरित करता है। श्रीमद्भगवद्गीता हमें बिना फल की चिंता किए अपने कर्तव्य का पालन, समर्पण और परिश्रम के साथ करने का उपदेश देती है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री जयराम ठाकुर ने कहा कि भारत विभिन्न संस्कृतियों, मत-पंथों और भाषाओं का देश है। यहां विभिन्न जातियों और समुदायों के लोगों ने कई कठिनाइयों के बावजूद एकता और सामंजस्य को बरकरार रखा है। धर्म, समाज के हर वर्ग को एकजुट बनाए रखने वाली एक अलौकिक शक्ति है। आज के आधुनिक युग में, हमें अपने धर्म और संस्कृति को बनाए रखने के लिए हरसंभव प्रयासकरना चाहिए।