बघुवार में मिलती है रामराज्य की झलक
   दिनांक 03-सितंबर-2019
आजाद सिंह
 दो हजार की आबादी वाला छोटा सा बघुवार गांव रामराज्य की झलक देता है। यहां सुबह प्रभात फेरी निकलती है। गांव में आज तक कोई अपराध नहीं हुआ है। जातिगत भेदभाव का तो सवाल ही नहीं है

 
 
 गांव का मंदिर और आंबेडकर भवन
बघुवार यहां आए बिना इस गांव के बारे में जो सुना, वह सब अविश्वसनीय ही लगता था। दो हजार की आबादी वाला यह छोटा-सा गांव रामराज्य की झलक देता है। समरसता, आत्मीयता, सुन्दरता, समृद्धि, एकता, सुव्यवस्था, अनुशासन, शिक्षा... ये समस्त तत्व सब एक ही स्थान पर सिमट आए हैं। मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले का ग्राम बघुवार ऐसा ही एक रत्न है।
‘सर्वसम्मति’ वह शब्द है जहां से बघुवार के बारे में चर्चा शुरू करनी पड़ेगी। यहां हर काम मिल-जुलकर तय होता है। गांव के बारे में निर्णय लेने के लिए नियमित बैठक होती है, जिसमें हर परिवार से एक सदस्य शामिल होता है। सड़क बनानी हो, या विद्यालय अथवा सामुदायिक भवन, सारे निर्णय इसी प्रकार लिए गए। सरकार और प्रशासन की बाट नहीं देखी गई, तय किया और सब लोग जुट गए। पहली सड़क, प्राथमिक विद्यालय, सब ग्रामवासियों ने स्वयं बनाया। ग्रामीणों ने गांव के विकास के लिए निर्माण कार्यों की शुरूआत स्वयं की थी। गांव का प्राथमिक विद्यालय सभी लोगों के धन सहयोग और श्रमदान से बना। गांव में सड़कों का निर्माण भी लोगों ने स्वयं प्रारंभ किया। बाद में सरकारी सहायता मिली। गांव से संबंधित निर्माण कार्यों के लिए लोग अपने संसाधन तत्काल उपलब्ध करवाते हैं चाहे ट्रैक्टर हो अथवा बैलगाड़ी या अन्य कुछ।
राजनैतिक दलबंदी का यहां कोई अस्तित्व नहीं है। आजादी के बाद से यहां ग्राम पंचायत का हर सरपंच निर्विरोध, सर्वसम्मति से निर्वाचित हुआ है।
एक शाखा से सब शुरू हुआ
आजकल बघुवार की चर्चा तो होती है, लेकिन उसमें एक बात छिपी रह जाती है कि यह आदर्श ग्राम रा.स्व.संघ के स्वयंसेवकों की तपस्या का परिणाम है। 1945 में यहां पहली बार शाखा लगी थी। संघ के कर्मठ कार्यकर्ता, गांव के पितृपुरुष कहे जाने वाले स्वर्गीय सुरेंद्र सिंह चौहान उपाख्य सेठ भैया और उनके साथियों ने मिलकर इस गांव को वह बनाया जो
यह आज है। उनके पिता स्वर्गीय संग्राम सिंह जी भी गांव को अपना सबकुछ समझते थे।
गांव में संघ की शाखा शुरू हुई। शाखा के माध्यम से सारा गांव एक परिवार बना। मिलकर प्रेम से काम करने का संस्कार मिला और एक चमत्कारिक सामाजिक परिवर्तन हुआ। गांव ने अपने विकास के लिए कमर कस ली। परिवर्तन में हर घर की इच्छा और प्रयास शामिल हो, ऐसा संकल्प लिया गया। सुरेंद्र सिंह जी के नेतृत्व में ऐसी कायापलट हुई कि गांव मानवमात्र के लिए सुन्दर भविष्य का आशादीप बन गया। सुरेंद्र सिंह जी का नेतृत्व कैसा था इसकी मिसाल है उनके घर के सामने की कच्ची सड़क। गांव की एकमात्र कच्ची सड़क। वे पहले सारे गांव में सड़क बनवाने में इस संकल्प के साथ जुट गए कि ‘मेरे घर के सामने के सड़क सबसे आखिर में बनेगी।’
नहीं है जातिगत भेदभाव
जाति का भेदभाव यहां नहीं है। ‘एक मंदिर, एक कुआं एक श्मशान’, यहां व्यवहार में है। गांव में अनुसूचित जाति के लोगों की पुरानी बस्ती है, जिसे सबने मिलकर सुन्दर और सर्व सुविधायुक्त बनाया है। उसके तीन सुन्दर प्रवेश द्वार हैं। उल्लेखनीय बात है गांव का वह नियम जिसके तहत हर विकास कार्य सबसे पहले यहीं करवाया जाता है फिर शेष गांव में। किसी भी जाति की कन्या हो, वह सारे गांव की कन्या मानी जाती है। हर घर के दामाद को सारे गांव का दामाद माना जाता है।
सुन्दरता बसती है यहां
गांव में प्रवेश करते ही सुंदर सड़कें आपका स्वागत करती हैं जिनके दोनों और हरे भरे वृक्ष लगे हैं। सब तरफ स्वच्छता है। हर ओर सुंदर पक्के मकान। महापुरुषों के सूक्त और रामायण की चौपाइयों से सजी दीवारें। गांव के चारों ओर फलदार वृक्ष। गांव के चारों ओर दशकों पहले रोपे गए बरगद और पीपल के वृक्ष अब विशाल हो चुके हैं। सघन वृक्षारोपण के कारण गांव किसी उद्यान जैसा दिखाई देता है। खाली पड़ी सरकारी जमीन पर फलदार वृक्षों का बगीचा लगाया गया है, आम-जामुन आदि के वृक्ष लगे हैं, सारा गांव इनके फल खाता है। यहां मिलेगा खोदा गया विशाल तालाब, संरक्षित की गई नदी। हर मौसम में यहां खेत लहलहाते हैं। गांव के किसान साल में तीन फसलें लेते हैं।
1947 से निकल रही प्रभातफेरी
गांव में 1947 से प्रारंभ हुई प्रभात फेरी प्रतिदिन निकलती है जिसमें तरह-तरह के वाद्य यंत्र, यहां तक कि सिंथेसाइजर भी शामिल होता है। दुर्गोत्सव में चार दुर्गा प्रतिमाएं स्थापित होती हैं, सारा गांव मिलकर पूजन करता है और देवी प्रतिमा के विसर्जन के दिन क्रमिक रूप से विसर्जन होता है, शोभायात्रा में गांव का अपना बैंड साथ चलता है। पूरे गांव में शराब की एक भी दुकान नहीं है। शराब तो छोड़िए, तंबाकू, गुटखा, पान मसाला भी नहीं मिलता। गांव में एलोपैथिक चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेदिक औषधालय भी है।
व्यवस्था विकास और पारदर्शिता
सारे गांव में सीमेंट की सड़कें हैं। गांव में प्रवेश करते ही एक मंदिर मिलता है, आगे बढ़ने पर आंबेडकर भवन है, एक सुंदर सामुदायिक भवन। गांव के लोगों द्वारा बनवाया गया एक अन्य सामुदायिक भवन, मानस भवन भी है। इन दोनों भवनों का उपयोग सारे ग्रामवासी करते हैं। शादीविवाह होने पर वधू पक्ष को मानस भवन निशुल्क उपलब्ध करवाया जाता है। वर पक्ष से 15 सौ रुपए लिए जाते हैं। भवन में हजार लोगों की व्यवस्था हो जाती है। मानस भवन से लगा राज्य का मॉडल प्रशिक्षण केंद्र है, जहां दूसरे गांवों के सरपंचों को आदर्श ग्राम व्यवस्था का प्रशिक्षण दिया जाता है. सरकारी भवन भी सुन्दर हैं। किसी का कांच टूटा नहीं दिखता। स्वच्छ और लिपे-पुते, सुविधायुक्त भवन शहरवासियों को आत्मनिरीक्षण पर मजबूर कर सकते हैं। गांव की अपनी पानी की टंकी है। सभी घरों में नलों में पानी आता है। परिवार नियोजन की दृष्टि से गांव में शत प्रतिशत काम हुआ है। हर परिवार नियोजित है। गांव के लिए किए जाने वाले व्यय में पूरी पारदर्शिता रखी जाती है। निर्माण कार्य का ब्योरा, ठेकेदार का नाम अनुमानित राशि, आया हुआ बजट इत्यादि गांव में दीवार पर लिख दिया जाता है। इस जानकारी को गांव की वेबसाइट तथा सरकार के द्वारा बनाए गए ऐप पर भी अपलोड किया जाता है।
सारे बच्चे, गांव के बच्चे
बच्चे न इसके होते हैं, न उसके। बच्चे आने वाले कल के होते हैं। बघुवार ने इस बात को चरितार्थ किया है। जब कभी गांव के स्कूल में स्थानांतरण आदि के चलते, या अन्य किसी कारण से सरकारी शिक्षक उपलब्ध नहीं होता, तो इस अंतराल में गांव के शिक्षित लोग ही विद्यालय में बच्चों को पढ़ाते हैं, यहां शिक्षा कभी बाधित नहीं होती। आसपास के तीन अन्य गांवों के बच्चे भी यहां पढ़ने आते हैं। विद्यालय के बच्चे वृक्षारोपण करते हैं। बच्चों को ग्राम विकास और पर्यावरण की शिक्षा भी दी जाती है। विद्यालय में अच्छा पुस्तकालय है जिसमें पुस्तकों के साथ अखबार और पत्र पत्रिकाएं भी नियमित उपलब्ध रहती हैं। 20 वर्षों से हर शनिवार को विद्यालय में रामायण का पाठ होता है जिसमें बच्चे भाग लेते हैं। चौपाइयों का बच्चों द्वारा वाचन और बड़ों द्वारा अर्थ समझाया जाता है। संघ के बुजुर्ग स्वयंसेवक श्री नारायण प्रसाद नारोलिया कहते हैं ‘‘गांव हमारा है, बच्चे हमारे हैं सरकार के थोड़े ही हैं। तो चिंता हम ही करेंगे। ये सारे गांव का संस्कार है।’’
शिक्षा का संस्कार यहां बहुत गहरा है। सौ प्रतिशत साक्षरता है। यहां से पढ़कर निकला कोई व्यक्ति वायुसेना में है, तो कोई प्रशासनिक सेवा में। कोई शिक्षा विभाग में है, तो कोई कृषि विभाग में।
गो संवर्धन, गो संरक्षण और जैविक खेती
यहां जैविक खेती और गो संरक्षण पर सारा जोर है। श्रीपाल सिंह राजपूत गोपालक हैं, उनकी दो देसी गाय प्रतिदिन 20 लीटर दूध देती हैं, जिससे 15 हजार रुपए मासिक आय होती है। वे गोमूत्र से जैविक कीटनाशक बनाते हैं और अपनी छोटी सी जमीन और घर की छत पर जैविक खेती करते हैं। गांव का जैविक गुड़ भी बाहर बिकता है। यह 100 रुपए किलो के हिसाब से विदेशों में निर्यात होता है। इसके अलावा कोलकाता-बेंगलुरु तक यहां का गुड़ जाता है। गांव के रविशंकर रजक हर साल 5 हजार क्विंटल गुड का उत्पादन करते हैं। श्री नरोलिया के भाई श्री एमपी नरोलिया डिप्टी डायरेक्टर कृषि विभाग मध्य प्रदेश रहे। कार्यकाल के दौरान उन्होंने जैविक कृषि को बढ़ावा दिया। सेवानिवृत्त होने के बाद गांव वापस लौट आए। आस-पास के गांवों में जैविक खेती के प्रसार करने के लिए एक समूह बनाया। वे स्वयं भी काफी खर्च इसके लिए कार्य कर रहे हैं। गांव में सिर्फ जैविक खेती की जाती है। सभी घरों में देसी गाय हैं। दो हजार की आबादी में 60 से अधिक गोबर गैस प्लांट हैं। यहां गौ संवर्धन, और देसी गाय की प्रजातियों के संरक्षण का काम भी हो रहा है। गांव में 25 पिट बनाए गए हैं जिनमें ग्रामीण गोबर डालते हैं साल में एक बार इस गोबर की नीलामी होती है और मिलने वाले धन को गांव के विकास के लिए खर्च किया जाता है।
जल की हिलोरें
पानी की यहां कमी नहीं है लेकिन जल की हर बूंद का संरक्षण किया जाता है। गांव के पास बहने वाली दूधी नदी को पुनर्जीवित किया गया, गहरा किया गया किनारे पर वृक्ष लगाए गए, साथ ही इसके किनारों को अतिक्रमण मुक्त किया गया। स्टॉप डैम बनाया गया। इसके अलावा वर्षा जल के संरक्षण के लिए एक ‘स्टॉप डैम’ बनाया गया है। गांव में एक तालाब भी है, गांव का सारा वर्षा जल बह कर इसमें आए, ऐसी व्यवस्था की गई है। इन प्रयासों के कारण, भूजल का स्तर जो कभी डेढ़ सौ फुट हुआ करता था, अब 50 से 20 फुट पर आ गया है। गांव के सभी घरों से निकलने वाले पानी को एक साथ जोड़ कर एक पुराने कुएं में गिराया जाता है, इस प्रकार जल की एक बूंद भी व्यर्थ ना हो, ऐसा संस्कार घर-घर में दिखाई पड़ता है।
न्याय का मंदिर

 
 गांव का न्याय मंदिर
गांव ने आदर्श न्याय व्यवस्था का एक अनुपम उदाहरण खड़ा किया है। गांव के लोग कोर्ट-कचहरी के झंझट में नहीं पड़ते। जमीनी विवाद में पटवारी को कभी नहीं बुलाया जाता, गांव के समझदार बड़े बुजुर्ग मिलकर मामले को निपटा देते हैं। गांव के वातावरण के अच्छा होने के कारण झगड़ों की नौबत नहीं आती। अगर कभी विवाद हो जाते हैं तो ग्राम न्यायालय में निपटाए जाते हैं। जिसे न्याय मंदिर कहा जाता है-
इस बारे में गांव के लोग सुरेंद्र सिंह जी की कार्यशैली बतलाते हैं। जब कभी कोई विवाद ग्राम न्यायालय में आता, तो वे एक दिन पहले बारी बारी-दोनों पक्षों के लोगों के पास जाते, उनके साथ बैठते, समझते और समझाते, और अगले दिन न्यायालय में जब दोनों पक्ष आमने-सामने पहुंचते तो उनका अधिकांश विवाद पहले ही सुलझ चुका होता, और ग्राम न्यायालय का निर्णय सर्वसम्मति से मान्य हो जाता। इसीलिए गांव के 70 वर्ष के इतिहास में कोई आपराधिक या न्यायिक मामला नहीं हुआ। मान सम्मान और मयार्दा के कारण लोग उनके वचन स्वीकार करते थे। 1962 में न्याय मंदिर का निर्माण हुआ।
बघुवार यही आशा जगाता है कि संस्कृति और संगठन की ताकत विकास की गंगा बहा सकती है, समृद्धि और सुंदरता से युक्त समाज की रचना कर सकती है। व्यक्ति-व्यक्ति में एक ध्येय के लिए काम करने की प्रतिबद्धता और सभी में सामूहिक जिम्मेदारी का भाव कैसे परिवर्तन का वाहक बन सकता है। समाज का पौरुष जाग जाए तो वो कैसा चमत्कार कर सकता है।
स्वयंसेवकों का गांव
सुभाष सिंह, उम्र 30 वर्ष, संघ के स्वयंसेवक। जैविक खाद और जैविक कीटनाशक का व्यापार है। कुछ बहुराष्ट्रीय कीटनाशक कंपनियों ने उन्हें 40 से 50 प्रतिशत तक लाभ का प्रस्ताव देकर डीलरशिप देने की कोशिश की परन्तु सुभाष ने सामाजिक हित को ऊपर रखते हुए मात्र जैविक उत्पाद विक्रय का ही निर्णय लिया।
श्री हरनाम सिंह, उम्र 75 वर्ष, सेवानिवृत्त शिक्षक, संघ के स्वयंसेवक (तृतीय वर्ष शिक्षित)। आपातकाल के दौरान करेली के तहसील कार्यवाह होने के कारण 4 माह तक मीसाबंदी रहे एवं भूमिगत आंदोलन में सक्रिय रहे। वे कहते हंै- ‘‘संघ की शाखाओं के संगठन और सहयोग की भावना के संस्कार हमारी समझ में बैठ गए, गांव के विकास की परंपरा बन गए। 1952 में स्वर्गीय संग्राम सिंह जी शाखा लगाया करते थे’’
गांव के भागीरथ सुरेन्द्र सिंह जी के साथी 93 वर्षीय श्री नारायण प्रसाद नारोलिया सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं। वह बलिया जिले में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर के साथ पढ़े। 1952 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए पूर्व सरसंघचालक स्वर्गीय रज्जु भैया के छात्र रहे। नारोलिया जी कहते हैं- ‘‘1946 में इस क्षेत्र में 18 शाखाएं लगती थीं संघ संस्कार और संस्कृति की पाठशाला है। यहां रा.स्व. संघ के संस्कार मूर्तरूप में हैं। हम अपने गांव को भोपाल और दिल्ली की राजनीति के लिए अखाड़ा नहीं बना सकते। राजनीतिक विचारधारा अलग होने पर भी कोई बहिष्कृत नहीं होता। वह प्रेमपूर्वक साथ खाना खायेगा ही। हमारे गांव में कोई भी बाहरी व्यक्ति भूखा नहीं रह सकता। वह गांव का अतिथि होता है।’’
गांव के भागीरथ सुरेन्द्र सिंह जी के बारे में वे बताते हैं, ‘श्री चौहान को मध्य प्रदेश सरकार ने ग्राम विकास में उनके योगदान को देखते हुए राज्य का ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया। उन्होंने अपनी पहल से आसपास के 50 गांवों में निर्विरोध चुनाव करने की परंपरा डाली। उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। ’
अनामिका, कक्षा 11वीं की छात्रा हैं। वे कहती हैं ‘गांव के सभी बड़े, सरपंच और अध्यापक बच्चों की शिक्षा और जरूरतों का ध्यान रखते हैं। पौधारोपण व स्वच्छता अभियान में बच्चों का भी योगदान रहता है।’