भारत में उदित हुआ ज्ञान का सूर्य
   दिनांक 03-सितंबर-2019
पूनम नेगी 
 
 
 विश्व विख्यात प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष
भारतरत्न सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन सार्थक शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे। उनकी मान्यता थी कि शिक्षा के द्वारा मानव मस्तिष्क का सर्वोत्तम सदुपयोग किया जा सकता है। शिक्षा का सही अर्थ होता है चरित्र निर्माण और अनुशासन जैसे सद्गुणों का विकास। उनकी जयंती पर एक नजर भारत की महान शिक्षा-परंपरा पर
 
हम भारतवासियों को गौरवान्वित होना चाहिए कि जब दुनिया के विभिन्न देश बस्तियां बसाकर खानाबदोश जीवन जी रहे थे, तब हमारी आर्य संस्कृति, शिक्षा और संस्कृति के नित नये प्रतिमान गढ़ रही थी। हमारा सौभाग्य है कि मानव सभ्यता के ज्ञान का सूर्य सर्वप्रथम हमारी धरती पर उदित हुआ। समूची दुनिया ने हमें ‘जगद्गुरु’ का मान दिया।
 
वैदिककाल में भारत में गुरुकुल और आश्रमों के रूप में अनेक शिक्षा केंद्र थे। 8वीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी के बीच भारत के ये शिक्षा केन्द्र समूचे विश्व में आकर्षण के केन्द्र थे। इनमें वेदाध्ययन के साथ ही ब्रह्मविद्या व तर्कविद्या, गणित, ज्योतिष, भाषा, व्याकरण, इतिहास, भूगोल, खगोलशास्त्र, धर्म-दर्शन, अर्थशास्त्र, चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, कृषि, भूविज्ञान, चित्रकला, युद्धकला, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, वैद्यक, पोत निर्माण, गायन, वादन, नृत्य, चित्रकला तथा पाककला इत्यादि 118 प्रकार के विषयों की शिक्षा दिए जाने के विवरण मिलते हैं। कादम्बरी, शुक्रनीतिसार, ललित विस्तार आदि ग्रंथों में 64 कलाओं का उल्लेख मिलता है। प्राचीन भारतीय साहित्य तथा फाह्ययान, ह्वेनसांग व अल बरूनी जैसे विदेशी यात्रियों के यात्रा वृत्तांतों से भी ज्ञात होता है कि प्राचीन भारत का शैक्षिक पाठ्यक्रम अत्यन्त विस्तृत था। शिक्षा का माध्यम संस्कृत व पाली भाषा था। उस युग के स्नातक वेदों तथा 18 शिल्पों में निपुण होते थे। इन शिक्षा केन्द्रों के संचालन के लिए राजा तथा धनिक वर्ग मुक्त हस्त से दान दिया करते थे। यही वजह थी कि उस काल में इन शिक्षा केन्द्रों में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, श्रीलंका, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी बड़ी संख्या में विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। इसके अतिरिक्त विभिन्न हिन्दू सम्प्रदायों एवं मठाचार्यों के प्रभाव से ईसा की दूसरी शताब्दी के आसपास मठ शिक्षा के महत्वपूर्ण केन्द्र बन गये थे। इनमें शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य आदि के मठ पूरे देश में प्रसिद्ध थे।
 


भारत की सांस्कृतिक विरासत एवं प्रगति का मूल आधार जीवन मूल्यों, स्वावलंबन व आध्यात्मिकतापर आधारित तद्युुगीन शिक्षा ही थी। प्राचीनभारतीय शिक्षा का मूल उद्देश्य था व्यक्तित्वका सर्वांगीण विकास 

 
प्राचीन भारत की शिक्षा के उद्देश्यों और आदर्शों पर प्रकाश डालते हुए भारतीय संस्कृति के सुप्रसिद्ध विद्वान डा. अनन्त सदाशिव अल्टेकर लिखते हैं कि भारत की प्राचीन शिक्षा मुक्ति एवं आत्मबोध के साधन के रूप में थी। भारत की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत एवं प्रगति का मूल आधार जीवन मूल्यों, स्वावलंबन व आध्यात्मिकता पर आधारित तद्युुगीन शिक्षा ही थी। प्राचीन भारतीय शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर पुरुषार्थ चातुष्ट्य (धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष) की सिद्धि का था। वैदिक कालीन शिक्षा में नैतिक आदर्शों पर अत्यन्त बल दिया जाता था। असत्य एवं पापाचार को घृणित कृत्य समझा जाता था। गुरुकुल व आश्रमों में पढ़ने वाले छात्रों के चारित्रिक विकास का संपूर्ण दायित्व ‘गुरु’ वहन करता था। स्वाध्याय एवं मनन की इस शिक्षा प्रणाली में विद्यार्थी ‘उपनयन संस्कार’ के बाद ज्ञान प्राप्ति की समूची अवधि तक गुरु आश्रम में ही रहते थे। इस शिक्षा का मूल उद्देश्य मनुष्य के व्यक्तित्व व चरित्र का बहुआयामी विकास था। खास बात है कि वैदिक युग में महिलाओं की शैक्षिक स्थिति भी अत्यन्त सम्मानजनक थी। उन्हें शिक्षा द्वारा ज्ञान अर्जित करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी।
 
वैदिक साहित्य में अपाला, घोषा, लोपमुद्रा, विश्ववारा, गार्गी, मैत्रेयी जैसी अनेक विदुषी नारियों के उल्लेख मिलते हैं। वेदों की अनेक ऋचाओं के सृजन का श्रेय ऐसी ही कई ब्रह्मवादिनियों को जाता है। वैदिक युग की ये महान ऋषिकाएं अनेक गूढ़तम विषयों पर शास्त्रार्थ करके अपने पाण्डित्य का परिचय देती थीं तथा वाद-विवाद, तर्क-वितर्क व यज्ञ तथा कर्मकाण्डों में अपने पतियों के साथ सक्रिय रूप से भाग लेती थीं।
 
दुर्भाग्य से 12वीं शताब्दी के आस-पास ऐसे अनेक विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय हमलावरों की बर्बरता की भेंट चढ़ गए। मुगल आक्रांताओं ने भारत के शिक्षा केन्द्रों को आग के हवाले कर दिया। मुगल आक्रमण के बाद ब्रिटिश शासन ने हमारे इन उज्जवल विद्या केंद्र्रों को छल व षड्यंत्रों के तहत उजाड़ दिया।
 
लेकिन चिंताजनक बात यह भी है कि आजादी के बाद हम अपनी इस अमूल्य धरोहर को सहेज नहीं सके। दरअसल आजाद भारत की सरकारों की भारत के सांस्कृतिक व शैक्षिक जीवन मूल्यों के संरक्षण के प्रति उदासीनता के कारण हमारे वे जीवंत जीवन मू्ल्य अंग्रेजी रीति-नीति में पगे नेताओं की अनदेखी की भेंट चढ़ाए जाने लगे। दरअसल, जीवन विद्या के ज्ञान से विरत कोरी पुस्तकीय जानकारी शुष्क, संवेदनहीन समाज को जन्म देती है। जरा सी विफलता से हार जाना, मनोबल खो देना, आत्महत्या करना, आज के समाज की इन अंतहीन घटनाओं को हम आखिर कब तक अनदेखा करेंगे? दुनिया अब पर्यावरण संरक्षण सीख रही है, जबकि हमारे यहां तो पेड़ों, नदियों व अन्य जलस्रोतों के पूजन व संरक्षण की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। आज हम गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा जैसी महान नदियों की सफाई को लेकर चिंतित हैं पर हमारे पूर्वजों ने तो इसे पूजा का ही अंग बना लिया था ताकि लोग पानी को दूषित करने के पहले सौ बार सोचें।
 
भारतरत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन सार्थक शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे। उनकी मान्यता थी कि शिक्षा के द्वारा मानव मस्तिष्क का सर्वोत्तम सदुपयोग किया जा सकता है। शिक्षा का सही अर्थ होता है चरित्र निर्माण और अनुशासन जैसे सद्गुणों का विकास। देश के प्रथम शिक्षा आयोग के अध्यक्ष के रूप में विश्वविद्यालयीन व माध्यमिक शिक्षा के उत्थान के लिए अनेक सुधारवादी कदम उठाने वाले डॉ. राधकृष्णन शिक्षा के व्यवसायीकरण के कट्टर विरोधी थे। वे कहते थे कि शिक्षा ऐसा सूरज है जिसकी ज्ञानरूपी प्रकाश किरणें समूचे विश्व ब्रह्मांड को आलोकित कर देती हैं। डॉ. राधाकृष्णन मूलत: एक सुधारवादी आदर्श शिक्षक थे, 5 सितम्बर को हर वर्ष जिनकी जयंती को हम ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाते हैं। एक गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्मे राष्ट्र के इस महान मनीषी ने जिस तरह समूचे विश्व में भारत के ज्ञान-विज्ञान की पताका फहराई, वह हम सबके लिए गौरव का विषय है।