'कुरान में तीन तलाक का जिक्र नहीं'
   दिनांक 03-सितंबर-2019
1986 में शाहबानो प्रकरण को लेकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार में मंत्री पद से इस्तीफा देने वाले आरिफ मोहम्मद खान मुस्लिम समाज में नई सोच के प्रसार और उसे कट्टरपंथियों के शिंकजे से बाहर लाने के आग्रही रहे हैं। हाल ही में उन्हें केरल का राज्यपाल बनाए जाने की घोषणा हुई है। पिछले दिनों तीन तलाक पर कानून बनने के बाद मदरसा शिक्षा और अल्पसंख्यकों से जुड़ी गलत अवधारणाओं को लेकर पाञ्चजन्य के सहयोगी संपादक आलोक गोस्वामी ने उनसे विस्तृत बातचीत की, जिसके संपादित अंश यहां प्रस्तुत हैं.



तलाक जैसे संवेदनशील विषय पर आज फिर से एक बहस छिड़ी है। यह कदम मुस्लिम समाज की महिलाओं की भलाई से जुड़ा है लेकिन इसमें भी कुछ मजहबी नेताओं को तकलीफ होती है। इस तकलीफ का वजह क्या है?
दुनिया में एक ही चीज है जो अपरिवर्तनीय है, वह है परिवर्तन। आप उदाहरणों से खुद देखिए। पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश के हिन्दी अखबारों में एक समाचार छपा कि प्रदेश के बड़े शहरों में जो शरई अदालतें हैं, जो उन लोगों द्वारा चलाई जाती हैं जिनका संबंध मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से है या जो लोग तीन तलाक के पक्ष में हैं। रपट बताती है कि पिछले आठ-नौ महीने में, जबसे अध्यादेश के जरिए तीन तलाक को दंडनीय अपराध बनाया गया है, इन अदालतों में (इस तरह के) मुकदमे आने खत्म हो गए हैं। आप किसी भी फतवा देने वाली बेवसाइट पर चले जाइए, 90 फीसदी से ज्यादा फतवे तीन तलाक से पैदा होने वाली समस्याओं से संबंधित होते हैं। तीन तलाक समाप्त होने के बाद ये लोग क्या करेंगे? जमात को अपने इशारों पर चलाने की इच्छा पाले ये मुल्ला क्या करेंगे? इनकी चिंता यही है। रपट कहती है कि ये (शरई) अदालतें हाथ पर हाथ रखे बैठी हैं अध्यादेश आने के बाद से।

क्या मामले भय पैदा होने की वजह से नहीं आ रहे?
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद देश में जिस तरह का वातावरण बना था, उससे शायद लोग तीन तलाक देना बंद कर देते अगर पर्सनल लॉ बोर्ड ने, उनके लीडरों ने उस निर्णय के आने के आठ-दस दिन बाद भोपाल में यह न कहा होता कि अदालतें अपने फैसला दिया करें, यह प्रथा जारी रहेगी। वे लोग एक तरह से लोगों को उकसा रहे थे कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का संज्ञान लेने की जरूरत नहीं है। उन्होंने अदालत में जो वायदा किया था कि, 'आप इसमें दखल मत दीजिए, हम इसके खिलाफ अभियान चलाएंगे। हम ऐसे लोगों का समाज में बहिष्कार करेंगे। हम मॉडल निकाहनामे में संशोधन करेंगे, क्योंकि हम भी यह मानते हैं कि तीन तलाक कुप्रथा है। यह मजह​बी व्यवस्था का हिस्सा यह नहीं है। यह हराम यानी निषेध है। यह गुनाह है। यह अन्यायपूर्ण है। यह जालीमाना है।' इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा? कहा कि, 'आप जो कह रहे हैं उसमें और वादी पक्ष के कहे के बीच में तो कोई फर्क ही नहीं है, इसलिए आप एक शपथ पत्र और दे दीजिए।' उनके वकील कपिल सिब्बल ने उनकी तरफ देखा और कहा, 'हां, देंगे।' अब फैसला आ गया तो शपथ पत्र देने के बाद इनको क्या करना चाहिए था? तीन तलाक का पहला मामला आने के बाद उन्होंने अगर यह कहा होता कि 'यह तलाक नहीं हुआ, यह ज्यादा से ज्यादा एक बार घोषणा मानी जा सकती है, इसे पूरा होने में तीन महीने लगेंगे'। उन्होंने कहा होता कि 'अगर उस मुस्लिम को घर से निकाला तो हम तुम्हारा सामाजिक बहिष्कार करेंगे' तो शायद सरकार को यह कानून लाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इन्होंने तो वायदा करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय का अनादर किया है।

क्या कोई सर्वोच्च न्यायालय का इस तरह से झूठ का सहारा लेकर अपमान कर सकता है और फिर उस पर कोई कार्रवाई भी न हो?
बदकिस्मती से ऐसा ही हुआ। इसीलिए यह कानून बनाने की जरूरत पड़ी। मैं सिर्फ उन 229 मामलों की बात नहीं कर रहा हूं, जो 2017 से इस विधेयक के सदन में आने के बीच हुए। मेरे अपने संसदीय क्षेत्र बहराइच से मेरे पास किसी सज्जन का फोन आया कि 'आपको याद है, 3 साल पहले आप मेरी बच्ची की शादी में आए थे?' मैंने कहा, हां, अच्छी तरह याद है। तो वे बोले, 'वो आंध्र प्रदेश में रह रहे हैं, छुट्टियों में यहां आ रहे थे पर आज सुबह उसने बच्ची को तलाक दे दिया। हमारे घर में उस समय खाना बन रहा था कि शाम को दोनों बच्चे साथ खाना खाएंगे'। मैंने बहराइच में अपने स्थानीय विधायक सुभाष त्रिपाठी को फोन किया। उनका बहुत सहयोग मिला। पुलिस ने पूरा सहयोग किया। कितने ही लोगों ने उस लड़के को समझाने की कोशिश की। लेकिन न तो वह लड़का माना, न उसका परिवार माना। आखिर में जब उन्होंने 5 अक्तूूबर को बिल्कुल मना कर दिया तब मैंने प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखा 6 अक्तूबर को। 7 अक्तूबर को प्रधानमंत्री के कार्यालय से बताया गया कि मुझे 8 अक्ततूबर को उनसे मिलना है। तब मैंने प्रधानमंत्री जी को बताया (यह मैंने उन्हें पत्र में भी लिखा था) कि हमने 1986 में कानून बनाकर सर्वोच्च न्यायालय के शाहबानो मामले पर आए फैसले को निष्प्रभावी किया था। आज स्थिति ऐसी है कि अगर आज इस पर (तीन तलाक पर) कानून नहीं बना तो सर्वोच्च न्यायालय का हाल का निर्णय निष्प्रभावी हो जाएगा। इस तरह के मामले को दंडनीय अपराध घोषित करना पड़ेगा। उस पत्र के साथ मैंने पाकिस्तान की इस्लामिक आडियोलॉजी काउंसिल के अध्यक्ष मौलाना शीरानी का 4 साल पहले पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री को लिखा वह पत्र भी लगाया था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि '1962 में पाकिस्तान ने तीन तलाक को अवैध घोषित किया। लेकिन तलाक एक दिन भी नहीं रुका, क्योंकि इसे दंडनीय अपराध नहीं बनाया गया।' खुशी की बात है कि अब पाकिस्तान में उस काउंसिल के नये अध्यक्ष डॉ. अयाज किबला ने यही प्रस्ताव दुबारा पास किया है और भारत के सर्वोच्च न्यायालय का संदर्भ दिया है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इसको अवैध घोषित किया है और भारत सरकार इसको दंडनीय अपराध घोषित करने वाला कानून ला रही है। आज डॉ. किबला इसको दंडनीय अपराध बनाने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय का और भारत सरकार के इसे दंडनीय अपराध बनाने का संदर्भ दे रहे हैं। यह एक बहुत बड़ी बात है। पहल भारत कर रहा है।
हमारे यहां मदरसों में मात्र 3-4 फीसद मुस्लिम शिक्षा पाते हैं जिनका 100 फीसद मस्जिदों पर कब्जा होता है और वहां से वे जो तकरीरें करते हैं, उनसे समाज में विष घोलने की कोशिश दिखती है। तो मदरसों की तालीम में ऐसा क्या होता है कि वहां से निकलने वाले छात्र समाज को बांटने वाली बातें करने लगते हैं?
अगर आप इजाजत दें तो पहले मैं इससे निकलने वाले प्रश्न का जवाब देना चाहूंगा, उसके बाद 'ऐसा क्यों' पर बात करेंगे। पहली बात, इस परिस्थिति के लिए, बहैसियत भारतीय समाज के, हम जिम्मेदार हैं। भारत में सबसे ज्यादा मदरसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हैं। वहां किसी मदरसे में देखिए, पता चलेगा कि वे मदरसे तो वहां के लोगों के पैसे से चलते हैं लेकिन वहां के एक-दो बच्चे ही मिलेंगे। कारण यह है पश्चिमी उत्तर प्रदेश के व्यक्ति को तो यह कार्य पुण्य का बताया जाता है। वह पुण्य के नाम पर पैसे तो दे देता है, परंतु अपने बच्चे को उसमें नहीं, बल्कि वहां पढ़ाता है जहां उसे लगता है कि बच्चे को पढ़ने के बाद अच्छी नौकरी मिलेगी, वह अपना जीवन बेहतर बना पाएगा। वे क्षेत्र चिन्हित क्षेत्र हैं जहां से उन मदरसों में बच्चे आते हैं, जैसे पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और ओडिशा। मैं पूछता हूं कि समाज के दृष्टिकोण से हम इसका संज्ञान क्यों नहीं लेते। ये वे क्षेत्र हैं जहां आबादी ज्यादा है, गरीबी ज्यादा है। वहां 3-4 लड़के वाले पिता को जाकर बताया जाता है कि अगर उसका बच्चा मदरसे में पढ़ेगा तो पहली और बाद की तीन नस्लें जन्नत में जाएंगी। ऐसे आदमी के सामने विकल्प आधुनिक शिक्षा या मदरसा शिक्षा में से नहीं है, विकल्प है या तो मदरसा शिक्षा या फिर कोई शिक्षा नहीं। मैंने बंगलूरू के एक मित्र से पूछा कि यहां की मस्जिद में जो इमाम हैं वे या तो पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं या ज्यादातर बिहार के। क्या आपके यहां इमामत करने के लिए बच्चे नहीं मिलते? तो उन्होंने कहा, आप इमामों की बात छोडि़ए, यहां के मदरसों में आकर देखिए, बच्चे भी सब उन्हीं इलाकों के हैं। हमें सोचना चाहिए कि अब जबकि शिक्षा बुनियादी अधिकार है, तब भी हम उन पिछड़े इलाकों में आधुनिक शिक्षा की व्यवस्था क्यों नहीं करते? जब अटल जी की सरकार ने शिक्षा को बुनियादी अधिकार बनाया गया, तब सिर्फ एक संस्था ने उसका विरोध किया था-वह है पर्सनल लॉ बोर्ड। मैंने इस पर 3 लेख लिखे थे, जो अखबारों में छपे भी। इस्लाम में, सिर्फ धार्मिक दृष्टि से देखें तो, जिस दिन प्रोफेटहुड की शुरुआत हुई उसी दिन शिक्षा को आवश्यक करार दिया गया। ग्यारह वर्ष बाद नमाज पढ़ना लाजिमी हुआ। तो प्राथमिकता हुई शिक्षा की। हजरत अली कहते हैं कि बिना शिक्षा के इबादत भी नहीं हो सकती। मैंने सोचा कि, फिर पर्सनल लॉ बोर्ड वाले आखिर इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? बहुत छानबीन की तो पता चला कि विरोध का कारण यह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मदरसों के लिए जहां से इन्हें बच्चे मिलते हैं, यानी पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार, अगर सरकार ने वहां पूरी तरह से आधुनिक शिक्षा की व्यवस्था कर दी तो उन दोनों क्षेत्रों से पर्सनल लॉ बोर्ड वालों को बच्चे मिलना बंद हो जाएंगे। ये उन पिछड़े इलाकों में जाकर बच्चों के गरीब पिता को कहते हैं कि 'हम बच्चे को साल में छह जोड़ी कपड़े देंगे। एक सौ रुपए प्रतिमाह देंगे'। फिर पहले और बाद वालों के लिए जन्नत जाने का लालच दिया जाता है। ये सब सुनकर गरीब पिता इनकी बातों में आ जाता है। अगर किसी को अपने दरवाजे पर बच्चे के लिए अच्छा स्कूल मिल जाएगा तो वह दूर क्यों भेजेगा। अभी तो मुफ्त की तालीम के लालच में वहां भेजता है। मदरसा चलाने वालों को बच्चों की संख्या के आधार पर चंदा मिलता है। इन्हीं सब कारणों को लेकर शिक्षा को बुनियादी अधिकार बनाने का उन्होंने विरोध किया था।
दूसरी बात, वहां क्या पढ़ाया जाता है। इस्लाम के आने के दस-पन्द्रह साल के अंदर ही दुनिया के जो दो बड़े साम्राज्य थे, उन पर मुसलमानों का कब्जा हो गया। उनमें एक पर तो पूरा कब्जा हुआ और दूसरे में आधे से ज्यादा पर कब्जा हो गया। कब्जे से बचा रह गया आधे से कम इलाका था ठंडे यूरोप में, जिसमें उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। इस तरह बने सबसे बड़े साम्राज्य के लिए कानून चाहिए था, राजा चाहिए था। कुरान में राजतंत्र के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। इस्लाम में एक ईश्वरवाद यानी तौहीद बुनियादी चीज है। इसका मतलब यह बना लिया गया है-'हम खुदा के अलावा किसी की इबादत नहीं करेंगे।' लेकिन कुरान क्या कहता है? कुरान यह नहीं कहता कि उसने इस पद्धति की शुरुआत की है। कुरान की एक आयत कहती है-'एक ऐसी चीज की तरफ आ जाओ जो हमारे और तुम्हारे बीच में समान है। यानी दुनिया को बनाने और चलाने वाला एक है (जैसा कि तुम भी मानते हो) इसकी तरफ आ जाओ।' अगली आयत में बताया है कि इसकी तरफ आने की जरूरत क्या है। कहा है-'उस एक के अलावा न तो हम किसी की पूजा करें, न ही उस एक में किसी को शामिल करें।' ये तो सिद्धांत है जिसे तुम भी मानते हो, हम भी मानते हैं, तो फिर एक की तरफ कहां आ जाएं? आगे अब बताया है-वलायत तखीदा...यानी (व्यावहारिक रूप में) 'इनसानों में हम किसी को ईश्वर के रूप के नाते नहीं देखेंगे'। यानी सब इनसान बराबर हैं। सनातन धर्म में कहा गया है-एको देव: सर्वभूतेषु गूढ: सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्ष: सर्वभूताधिवास: साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च..। एक-एक चीज वही है। कुरान में साक्षी यानी अल्लाह के लिए कहा है-शाहिद, चेता के लिए अलीम खबीर। उसे हर चीज का पता है। सर्वज्ञानी है। कुरान कहता है कि आप चाहे सारे समुद्र की स्याही बना लीजिए और सारे पेड़ों की कलम, तो भी उसकी बातें नहीं लिखी जा सकतीं। सनातन कहता है निर्गुणश्च...यानी उसके गुणों का बखान संभव ही नहीं है।
इनसानों में है कि जहां स्वार्थ आ जाए वहां तथ्य से परे की बात बता दी जाती है। इसलिए कहा कि 'यह ठीक नहीं है, सिद्धांत पर रुक जाओ। हम इनसानों के अनुसार नहीं, बल्कि सिद्धांत के अनुसार चलेंगे'। हमारे देश में इस तरह के कई उदाहरण हैं, जैसे सिखों में दसवें गुरु ने कहा कि अब आगे कोई गुरु नहीं होगा, अब गुरु है ग्रंथ। वही स्थिति है। तौहीद का मतलब मस्जिद में जाकर नमाज पढ़ना भर नहीं है, उसका मतलब है कि 'मस्जिद से बाहर निकलकर किसी को बादशाह मत मानो। जो सत्ता चलाएगा वह प्रदत्त शक्ति रखेगा, वह संप्रभु नहीं होगा'। लेकिन वे साम्राज्य तो संप्रभु चला रहे थे, इसलिए बुनियादी सिद्धांत में ही टकराव हो गया। मैंने देवबंद से कुरान की टीका के सभी खंड मंगवा रखे हैं। उनमें ठीक वही है जो कुरान में है। मिसाल के लिए, हुदल्लिल मुत्तकीना युकातिलूना...यानी 'आज्ञा दी जाती है लड़ने की, उनको (प्रोफेट के मानने वाले, जिन्हें मक्का से निकाला गया) जिनके खिलाफ लड़ाई लड़ी गयी है। जिन पर जुल्म किया गया है। जिन्हें उनके घरों से निकाला गया है। क्यों? क्योंकि वे एक ईश्वर को मानते हैं। उनको इजाजत दी जाती है लड़ने की'। अगर ईश्वर एक गुरु को दूसरे के जरिए बदलता न रहता, अगर एक वर्ग का प्रभुत्व जमा रहता तो वह दूसरे की कद्र नहीं करता। लेकिन सत्ता का संतुलन है ताकि हर एक यह समझे कि आज सत्ता हमारे पास है, कल किसी दूसरे के पास होगी। वह दूसरे के आस्था केन्द्रों पर हमले न करे। कुरान में इतनी एहतियात बरती गई है। लेकिन इतिहास बताता है कि आस्था के केन्द्रों पर हमले हुए हैं। इस्लामी कानून पढि़ये तो उसमें इसकी इजाजत है। तो यह इजाजत कहां से आई।


तो क्या कुरान की अपने हिसाब से टीका की गई है?
कुरान को तो छुआ ही नहीं गया (इस्लामिक) कानून लिखने में। तीन तलाक का कुरान में कोई जिक्र नहीं है। मिसाल के लिए, कुरान कहता है कि 'अगर तुम्हारा ईश्वर चाहता तो इस पृथ्वी पर जितने भी लोग हैं, सब एक ही आस्था के मानने वाले होते'। फिर कहता है कि 'क्या तुम लोगों के साथ जबरदस्ती करोगे कि वे ईमान ले आएं? और जान लो, जो आस्था तुम्हारी है वह उस शख्स की आस्था नहीं हो सकती जब तक ईश्वर न चाहे।' फिर कहा है-'ईश्वर उन लोगों पर गंदगी फेंकता है जो अपनी अक्ल का इस्तेमाल नहीं करते'। यह शाब्दिक अनुवाद है। बातचीत की भाषा में इसे कहेंगे-अफसोस है उन पर जो अपनी अक्ल का इस्तेमाल नहीं करते। लेकिन इनको (देवबंद को) पढ़ें तो लगता है जैसे इनकी जिम्मेदारी है कि ये कलमा पढ़ाकर रहेंगे। सारा पुण्य कमाकर रहेंगे।
एक इससे भी गंभीर चीज बताता हूं। मान लीजिए, आप मुस्लिम हैं। लेकिन आपकी बातों और कामों को देखकर उन्होंने कहा कि 'आप तो धर्म भ्रष्ट हो गए'। इसके लिए अरबी में शब्द है मुर्तद। कुरान में तो जो मुस्लिम नहीं हैं उनको सजा देने का प्रावधान नहीं है, उनके लिए तो कुरान में है कि आपकी कोशिश इतनी होनी चाहिए कि ये ईमान वाले हो जाएं।' लेकिन इनके (देवबंद वालों के) मुताबिक तो जो उनकी बात से असहमत हो तो वह धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। धर्म भ्रष्ट होने पर क्या होगा? पहले तो उससे कहा जाएगा कि 'तौबा करो, और जो हम बता रहे हैं उसको मानो तब तो ठीक है वरना उसका कत्ल करो'। देवबंद वालों ने तो कमाल ही कर दिया। उन्होंने लिखा है कि 'जितने आगाखानी, कादियानी, बहाई और शिया है, इन सबके ऊपर भी यही हुक्म लागू होता है'। तो अगर हम इसी को आस्था का हिस्सा मान लें, तो एक ही काम रह जाएगा कि तलवार हाथ में लेकर इन सबको मारते घूमें। यह है देवबंद की 800 साल पहले लिखी गई कानून की किताब की टीका। जो मैंने आपको बताया, साम्राज्यों के लिए लिखी गई थी और वह अपने आपमें आपत्तिजनक है। 2010 में आयी मेरी किताब-'टैक्स्ट एंड कांटैक्स्ट: कुरान एंड कंटपरेरी चैलेंजिस'-में मैंने यही दिखाने की कोशिश की है कि जिस पर्सनल लॉ को ये इस्लामिक कानून कहते हैं उसमें ज्यादातर कानून वे हैं जो इन्होंने लिखे हैं, जो कुरान की आयतों के सीधे-सीधे विरुद्ध जाते हैं। तो वह किताब (इस्लामिक कानून की) अपने आपमें आपत्तिजनक है और देवबंद ने जो उसकी टीका की है वह उससे ज्यादा आपत्तिजनक है। और यही चीजें मदरसों में पढ़ाई जाती हैं। मुझे दिक्कत इससे नहीं है कि 3-4 फीसद बच्चों को वहां क्या पढ़ाया जाता है, परेशानी की बात यह है कि उनका तकरीर के मंचों पर, जहां से संबोधन होता है, उस पर इनका कब्जा है। मैं इसमें बच्चों की नहीं, समाज की गलती मानता हूं। क्योंकि छोटे बच्चों के दिमाग में तो जो चाहे भरा जा सकता है। खासतौर पर तब जब इन मदरसों में सवाल पूछने की इजाजत नहीं है।
क्या हदीस में भी कुछ ऐसा है?
हदीस के बारे में प्रोफेट साहब ने खुद कहा है, 'तुम जब ऐसी कोई बात सुनो जिसे मेरा कहा बताया जाए तो उसको कुरान की तराजू पर नाप लो। अगर कुरान के अनुसार है तो समझो मैंने कहा है। अगर कुरान के अनुसार नहीं है तो मान लो कि किसी ने गढ़ा है'।

लेकिन इसे मानता कौन है?
नहीं, जब उनकी अपनी जरूरत में वह बात फिट बैठती है तो वहां वे मान लेते हैं। दुनियावी बात यह है कि कुछ भी पढ़ाएं पर सवाल की इजाजत तो दें। प्रोफेट साहब ने कहा, 'ज्ञान खजाना है। खजाने तक आप पहुंच नहीं सकते जब तक आपके पास चाबी न हो'। चाबी यानी सवाल करना। मौलाना आजाद ने लखनऊ में अरबी-फारसी पाठ्यक्रम समिति के सामने 1954 के आसपास एक भाषण में कहा था कि, 'हमारी अज्ञानता का यह हाल है कि आज विश्वविद्यालयों में जिस तरह से प्रोफेसर आते हैं, लेक्चर देते हैं। छात्र नोट्स बनाते हैं। छात्र प्रोफेसर से सवाल पूछते हैं और प्रोफेसर उनके सवालों का जवाब देते हैं। उस पद्धति को पश्चिमी ठहराकर हमारे मदरसों में वर्जित कर दिया गया है'। आजाद ने कहा कि बगदाद में कायम होने वाले पहले संस्थान, बैतुल हिकमा में यही (सवाल-जवाब वाला) तरीका था जिसे अरबी में इमला कहा गया। आज इन लोगों को मालूम ही नहीं है कि इमला का यह तरीका बैतूल हिकमा में प्रचलित था। मदरसे में शिक्षक किताब से छात्रों को बस रटाता जाता है, सवाल पूछने की इजाजत नहीं होती।

आपने एक बार कहा था कि संविधान यह स्पष्ट नहीं करता कि अल्पसंख्यक कौन है। लेकिन आज अल्पसंख्यक का जिक्र आते ही उसे सीधे मुसलमान समाज से जोड़ा जाता है। यह परिस्थिति कैसे बनी?
आप कानून बदल सकते हैं, संविधान बदल सकते हैं, लेकिन आदतें बड़ी मुश्किल से बदलती हैं। दो सौ-ढाई सौ साल पहले थोड़े से अंग्रेज हिन्दुस्थान पर राज कर रहे थे। 1859 या 1860 में तबके गृह सचिव की फाइल पर नोटिंग है, जिसमें उसने लिखा है, 'हमारे सामने बड़ी विषम परिस्थिति है। अगर हम ऐसी नीतियां बनाते हैं जिससे भारत के लोगों में एक सी सोच और समानता पैदा हो तो वह हमारे लिए राजनीतिक तौर पर बड़ा खतरनाक होगा। अगर हम ऐसी नीतियां बनाते हैं जिससे उनके बीच खाइयां पैदा हों तो वे हमारे स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के लिए विषम परिस्थिति पैदा करेगा। पर सारी परिस्थिति पर समग्रता से गौर करें तो दूसरी परिस्थिति ज्यादा स्वीकार्य है।' उन्होंने तब भारत में ऐसी स्थिति पैदा की जिसे कहते हैं, 'जीरो सम गेम'। मैं और आप, दो पार्टियां बना दीं जिनकी कमान उनके हाथ में थी। और दोनों के दिमाग में यह बात डाल दी कि इनका फायदा होगा तो तुम्हारा नुकसान होगा और तुम्हारा फायदा होगा तो उनका नुकसान होगा। इसलिए चिंता करो कि दूसरे का नुकसान हो, जिससे तुम्हारा फायदा हो।
लेकिन यह 'जीरो सम गेम' तीसरी पार्टी की मौजूदगी में ही खेला जा सकता था, जो मौजूद थी। इसके लिए उन्होंने चलाया-'पृथक निर्वाचन क्षेत्र, आरक्षण, भारत राष्ट्र नहीं है, भारत विभिन्न समुदायों का समूह है' की सोच। क्यों? ताकि कोई राष्ट्र की ओर से मांग न कर सके। एक आवाज न उठे। पर 1857 में एक आवाज उठी, उस आदमी के नेतृत्व में जो 83 साल का था, जो नेतृत्व देना ही नहीं चाहता था। पर तो भी मेरठ से आए फौजियों ने कहा, तुम भले तलवार न उठाना, पर हम बहादुरशाह जफर जिंदाबाद कहेंगे और देश को आजाद कराएंगे। भारतीयों की एकात्मता का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता था? सक्षम नेतृत्व होता तो तब तख्ता पलट गया होता। डरे अंग्रेजों ने समाज को बांटने की तरकीब निकाली। 1947 तक वही सब चला। अब हमारी आदतें पड़ चुकी थीं। हम इकट्ठे नहीं रह सके। हम अपने अलग-अलग प्रतिनिधि चुनते थे। हर चीज पर लेबल लग गया।
द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत इसी सोच से उभरा था ?
नहीं, हमारी संविधान सभा का तो यह मानना था कि इसी पृथक निर्वाचन क्षेत्र के चलते देश का विभाजन हुआ। इसीलिए संविधान सभा ने दो चीजों को मूल से खत्म करना चाहा-एक, जाति व्यवस्था, और दो, अलगाववादी चुनाव व्यवस्था। लेकिन हमारी आदत पड़ चुकी थी इसलिए संविधान में एक प्रावधान डाल दिया गया-अनुच्छेद 29-30. जिसमें कहा गया कि 'अगर कोई धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक समूह अपनी शिक्षण संस्था बनाते हैं, तो सरकार जैसे दूसरे निजी संस्थानों की मदद करती है, उनको भी मदद करने में कोई भेदभाव नहीं बरतेगी'। मिसाल के तौर पर, उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों का कोई समूह आंध्र या तमिलनाडु में रहता है, और वहां वह अपनी शिक्षण संस्था कायम करता है। वे कहें कि 'हम हिन्दी भाषी हैं और उस प्रदेश में रह रहे हैं जहां बहुसंख्यक तमिलभाषी हैं। यहां हम सबके लिए अपने पैसे से संस्थान खोल रहे हैं, उसमें सरकार हमारी मदद करे।' वे उसे अल्पसंख्यक संस्थान की मान्यता दिला सकते हैं। मौलाना आजाद कहते थे कि हिन्दुस्थान में हमारे दिमागों में एक गलत चीज यह बैठ गई है कि मुसलमान अल्पसंख्यक हैं। इस एक बुनियादी गलती ने हजारों गलतियों को जन्म दिया है। दरअसल, हम आजादी से पहले हिन्दू-मुसलमान की बात किया करते थे। अब संविधान हिन्दू-मुसलमान की बात करने की इजाजत नहीं देता। तो अब हमने बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक कहना शुरू कर दिया, और अल्पसंख्यक का मतलब मुस्लिम लगा लिया।

मीडिया और राजनीति में एक ऐसा वर्ग है जो चाहता है कि इस भेद को भड़काए रखो। मुसलमानों को अलग रखो। इस पर क्या कहेंगे?
बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है यह। हाल की मिसाल है, मैं चैनल का नाम नहीं लूंगा लेकिन वह अपने आपको बहुत लिबरल, बहुत सेकुलर चैनल कहता है। तीन तलाक के हक में उसने एक घंटे का इंटरव्यू चलाया और उसके विरोध में पांच मिनट का भी इंटरव्यू नहीं किया किसी का। अभी कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री ने मेरे एक पुराने साक्षात्कार का कुछ संदर्भ दिया था। मेरे पास सारे मीडिया वाले आने लगे। वह साक्षात्कार राजीव सरकार से मेरे इस्तीफे के तीन-चार महीने बाद 1986 में छपा था, टेलीग्राफ में। पिछले दस साल में कम से कम दस चैनलों पर वह साक्षात्कार मौजूद है। तो उपरोक्त चैनल के जो साहब मेरा साक्षात्कार लेने आये, वे मेरे ऊपर आरोप लगा रहे थे कि आज नरसिंह राव जी नहीं हैं और आपने उनके ऊपर आरोप लगाया है। मैंने कहा, आप अपने तथ्य ठीक करें, नरसिंह राव जी के जीते जी यह छप चुका है। फिर वह बोले, कि नहीं, सब लोग तो यही कह रहे हैं कि आप भाजपा को मदद करने के लिए यह सब बोल रहे हैं। मैंने कहा, 'उस समय संसद में भाजपा के सिर्फ दो सदस्य थे जब मैंने इस्तीफा दिया था।' अब उस चैनल वालों के कुतर्क का तो कोई जवाब नहीं है। यह उनका एजेंडा है जिसे पीछे से एक राजनीतिक वर्ग से शह भी मिलती है। उस वर्ग की मिसाल देता हूं। 28 फरवरी 1986 को न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर, जो न्यायमूर्ति बनने से पहले वामपंथी सरकार में मंत्री थे, ने एक पत्र लिखा था तत्कालीन प्रधानमंत्री को, जिसमें उन्होंने लिखा, 'आप जो काम कर रहे हैं उससे एक जंग शुरू हो जाएगी, मुस्लिम फंडामेंटलिस्ट और हिन्दू फंडामेंटलिस्ट के बीच। आने वाले चुनाव में आप जिस सेकुलरिज्म के तहत यह कानून ला रहे हैं, उस सेकुलरिज्म के पक्ष में बहुत थोड़े ही लोग होंगे।' और आखिर में उन्होंने लिखा- 'इसके नतीजे देश के लिए भयानक और भयावह होंगे। उसे सिर्फ वही लोग महसूस कर सकते हैं जिनको इतिहास का कुछ बोध है।' एक और मिसाल देता हूं। उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विभूति नारायण राय जी घोषित वामपंथी हैं। करीब दस महीने पहले भोपाल के कार्यक्रम में वे भी थे और मैं भी था। कुछ और वामपंथी भी थे। वहां विभूति नारायण जी ने खुले तौर पर कहा कि 'इस देश में एक क्रांतिकारी काम होने जा रहा है। तीन तलाक खत्म होने वाला है, इसे दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती'। आश्चर्य है कि अपने आपको लिबरल, सेकुलर, वामपंथी कहने वाले लोग रूढि़वादियों के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। और जिस पार्टी पर इल्जाम लगाया जाता है कि वह रूढि़वादी है, यानी भाजपा, वह प्रगतिशील सोच रखने वालों के साथ खड़ी नजर आ रही है।

हिन्दुत्व को लेकर कुछ लोग माहौल बना रहे हैं कि 'हिन्दुत्व बढ़ा तो मुस्लिम दोयम दर्जे का नागरिक बन जाएगा। मुस्लिमों को मॉब लिंचिंग का शिकार बनाया जा रहा है'। इस पर आपका क्या कहना है?
हिन्दुत्व कोई नई चीज है क्या? अगर हिन्दुत्व ऋग्वेद पर आधारित नहीं, अगर हिन्दुत्व उपनिषद पर आधारित नहीं तो हिन्दुत्व कहां से रह जाएगा? इसमें तो हर विविधता को स्वीकार करने के लिए जगह है। सर्वसमावेशी है। मैं मानता हूं कि अगर आप पूर्वाग्रह ग्रसित हों या आपके दिमाग में कोई नफरत भर दे, तो आप वास्तविकता को नहीं देख पाते। उपनिषदों में कहा गया है जिसे आप पराया मान लेंगे, उससे आपके मन में भय उत्पन्न हो जाएगा। भारतीय परंपरा कहती है कि शरीर तो नश्वर है-अहं ब्रह्मास्मि तत्वमसि...यानी मैं और आप आत्मा के रिश्ते से बंधे हुए हैं। चैतन्य आत्मा एक दूसरे से जुड़ी हुई है। अगर मैं लिंचिंग कर रहा हूं तो किसको मार रहा हूं? अपने आप को ही तो मार रहा हूं।
भारत में इतना बड़ा तंत्र इसलिए बना है कि अगर कोई अपराध करे तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई हो। आरोप लगाने के बजाय तथ्य इकट्ठे करके बताइए कि फलां आरोप हुआ है जिस पर कार्रवाई नहीं हुई। लेकिन इन अपराधों पर साम्प्रदायिकता का लेबल मत लगाइए। अगर हम मरने वाले को लेकर कहते रहेंगे कि फलां वर्ग वाला मारा गया, तो याद रहे, बदकिस्मती से, हमारा देश इसी के नाम पर बंटा था। तो जो लोग लेबल लगाते हैं वे असल में माहौल को और खराब करना चाहते हैं ताकि वे उससे राजनीतिक लाभ उठा सकें।