लीजिए... ये है रोमिला थापर का असली सीवी
   दिनांक 03-सितंबर-2019
कांग्रेस काल में सातवें आसमान में विचरकर इतिहास के नाम पर मार्क्सवादी प्रदूषण फैसालने वाली रोमिला थापर को इस पर एतराज है. होना ही चाहिए. उनके बायोडाटा में अंग्रेजों और जर्मनों से उधार लेकर इतिहास के नाम पर लिखे सेमी फिक्शन के अलावा है क्या. जिसका पूरा अस्तित्व ऑक्सफोर्ड, मैक्समूलर, सर जोंस जैसे भारत के इतिहास को विकृत करने वाले माध्यमों पर टिका हो, उसे एक्सपोज होने के डर से शहादत की मुद्रा बना ही लेनी चाहिए.
 
सेक्युलरों द्वारा तमाम किस्म के सम्मानों से विभूषित, अंग्रेजी में प्राचीन भारत का अध्ययन करने वाली, संस्कृत न जानने वालीं , भगवान श्रीराम के अस्तित्व को काल्पनिक मानने वालीं, आर्यों के मध्य एशिया से भारत आने की निराधार थ्योरी की पोषक स्वयंभू इतिहासकार रोमिला थापर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्लाय के कुलपति को अपनी बायोडाटा भेजने को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया जा रहा है. सभी प्रोफेसर एमिरिट्स से बायोडाटा मांगा गया है, लेकिन कांग्रेस काल में सातवें आसमान में विचरकर इतिहास के नाम पर मार्क्सवादी प्रदूषण फैसालने वाली रोमिला थापर को इस पर एतराज है. होना ही चाहिए. उनके बायोडाटा में अंग्रेजों और जर्मनों से उधार लेकर इतिहास के नाम पर लिखे सेमी फिक्शन के अलावा है क्या. जिसका पूरा अस्तित्व ओक्सफोर्ड, मैक्स मूलर, सर जोंस जैसे भारत के इतिहास को विकृत करने वाले माध्यमों पर टिका हो, उसे एक्सपोज होने के डर से शहादत की मुद्रा बना ही लेनी चाहिए. लेकिन रोमिला थापर का असली बयोडाटा आप संक्षेप में यहां पढ़ सकते हैं. रोमिला थापर और उनके वामपंथी इतिहासकारों के गैंग का अपराध भारतीय और सनातन धर्म के इतिहास के संहार का है. पूरे भारतवर्ष से उसके गौरव चिह्नों, प्रतीकों, महापुरुषों, सभ्यताओं, शौर्यगाथाओं को छीनने के प्रयास का मुकदमा किसी अदालत में तो चल नहीं सकता. लेकिन जनता की अदालत में दुत्कारे जाने के बाद ये कांग्रेस प्रायोजित वामपंथी गैंग का सच सबके सामने आ चुका है.
तमाम विज्ञान और अध्ययन शाखाएं हर नए तथ्य और खोज के साथ खुद को अपडेट करता है. नई चीजें सामने आती हैं, नए सिरे से उनकी व्याख्या होती है. लेकिन आजादी के बाद से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के रूप मे अर्धशिक्षित इतिहासकार भारत पर थोप दिया गया. जो डिस्कवरी आफ इंडिया जैसे सेमीफिक्शन को दिमाग में बसाए था. उसी दिमाग में हावी थी, अंग्रेजियत और मार्क्सवाद. ऐसे अनुकूल माहौल में भारत में भारत के विचार को नकारने वाले इतिहासकारों, विचारकों, लेखकों, पत्रकारों, राजनीति शास्त्रियों, भाषाविदों के रूप में खरपतवार की एक पूरी खेप तैयार हुई. आइडिया यही था कि भारत का विचार सनातन धर्म और वैदिक संस्कृति पर आधारित है. वैदिक संस्कृति और सनातन धर्म को खारिज करो, उसके विश्वासों को बदनाम करो, प्रतीकों को काल्पनिक बताओ. हिंदू धर्म को बौना करने की साजिश में इन्होंने इस्लाम की लंबी लकीर खींचने की कोशिश की. महमूद गजनवी से लेकर पूरा मुगलकाल इनके लिए भारत का असली इतिहास बन गया. मार्क्सवादी चाहे दंडकारण्य में हो या दिल्ली में, गिरोह की तरह काम करते हैं. इस गिरोह की जड़ें जेएनयू और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से निकलीं और पूरे भारत पर छा गईं. इतिहास ही नहीं, हर विचार और शिक्षा से जुड़ी हर संस्था और माध्यम पर ये गिरोह छा गया. इस गिरोह के सरगना , विश्वनाथ काशिनाथ राजवाड़े, रामशरण शर्मा, बिपिन चन्द्रा, रोमिला थापर, दामोदर धर्मानंद कोसंबी,  सुमित सरकार, इरफान हबीब, सव्यसाची भट्टाचार्य आदि रहे. इन्होंने एक बहुत बड़ी खेप तैयार की.
रोमिला थापर वाला ये गिरोह कैसे काम करता है, यह भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की सदस्य एवं दिल्ली यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट उपाधिधारक डॉ. मीनाक्षी जैन द्वारा दिए उदाहरण से स्पष्ट होता है. खुद को जेएनयू का डायनासोर बताने वाली रोमिला थापर और उनके गैंग ने किस तरीके से एक सीधे मामले को देश में हिंदू-मुस्लिम का सवाल बना दिया. 1989 से ही वामपंथी इतिहासकारों ने इस मसले में टांग अड़ाना शुरू कर दिया. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने जब विवादित स्थल की खुदाई शुरू की, तो वामपंथी समझ गए कि इनका सारा फर्जी कथ्य ढह जाने वाला है.
डॉ. जैन के मुताबिक एक अकथित समझौते के अनुसार ये चार नामी इतिहासकार – आर एस शर्मा, डी एन झा, रोमिला थापर और इरफान हबीब स्वयं कभी अदालत में नहीं गये लेकिन अपनी बातों को वहां तक पहुंचाने के लिये अपने सहयोगियों और छात्रों का सहारा लेते रहे. अदालत में इनकी डमी के रूप में पेश होने वाले व्यक्तियों में से एक सुप्रिया वर्मा थी जिन्होंने शेरीन रत्नागर के निर्देशन में अपनी पीएचडी की. शेरीन ने भी अदालती कार्यवाही में भाग लिया. अदालत जाने वालों में दूसरा नाम सुविरा जैसवाल का था जिनके गुरू आर. एस. शर्मा हैं. राम मंदिर मामले में पेश होने वालों में आर सी ठकरान (सूरज भान), सीता राम रॉय (आर एस शर्मा) और एस सी मिहरा (डी एन झा). सुप्रिया वर्मा, शेरीन रत्नागर, सूरज भान, आर सी ठकरान आदि को सुन्नी बक्फ बोर्ड ने अपनी ओर से अदालत में पुरातत्व विशेषज्ञ के रूप में प्रस्तुत किया. इनमें से सूरजभान के अलावा किसी को पुरातात्विक सामान्य ज्ञान तक नहीं था. अदालत की सुनवाई में इनके मुखौटे उतरे. किसी को ये नहीं पता था कि पुरातात्विक पर्यवेक्षण होता कैसे है. इस गैंग के गवाह बाबरी मस्जिद या राम जन्मभूमि के बारे में सिर्फ अखबारों में छपी खबरों के आधार पर अदालत में राम का अस्तित्व नकारने पहुंचने गए थे. सूरजभान को तो तुलसीदास रामायण का ही पता नहीं था. कोई गवाह कहता था कि पृथ्वीराज चौहान गजनी के राजा थे. इनके ज्ञान (अज्ञान) की अदालत में इतनी किरकिरी हुई कि इन्होंने ध्यान बांटने के लिए राम मंदिर पर इलाहाबाद उच्च न्यायलय के फैसले की ही आलोचना शुरू कर दी.
रोमिला थापर जैसे लोग शोर मचाते हैं. शोर मचाकर खुद को सही साबित करना चाहते हैं. ये न तो तथ्यपरक आलोचना सुन सकते हैं और न ही खुद की गलतियों पर कभी शर्मिंदा होते हैं. डीएनए और अन्य साक्ष्यों से यह से साबित हो चुका है कि आर्य कहीं से नहीं आए थे. यहीं के मूल निवासी थे. लेकिन रोमिला थापर की नजर में आज भी आर्य आक्रांता है. यह मुस्लिम आक्रांताओं के भारत पर अत्याचार को जायज ठहराने का ओछा हथकंडा है. एन राजाराम या कोटा वेंकटचलम जैसे योग्य इतिहासकारों ने रोमिला थापर के सारे लेखन की धज्जियां उड़ा दीं और रोमिला थापर की आज तक जवाब देने की हिम्मत नहीं हुई. उनके पास कोई जवाब नहीं है और हिम्मत देखिए कि कहती हैं कि ये बातें जवाब देने लायक नहीं हैं. कुछ ऐसा ही तो वह अपने बायोडाटा के मामले में कर रही हैं.
भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद से ही रोमिला थापर और उनके शहरी नक्सल साथी परेशान हैं. इस कदर की रामचंद्र गुहा दक्षिण भारत को एक अलग देश बताने लगे हैं. इन शहरी नक्सलों को छुड़ाने के लिए जो देशद्रोही सुप्रीम कोर्ट तक गए थे, उनमें रोमिला थापर भी एक हैं. जेएनयू के वीसी रोमिला थापर का सीवी मांग रहे हैं... रोमिला थापर का असली सीवी यह है, जो आपने अभी पढ़ा है.