देश में मंदी नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था थोड़ी सुस्त है
   दिनांक 04-सितंबर-2019
दरअसल भारत में मंदी की बजाय मंदी की धारणा अधिक फैलाई जा रही है। मंदी एक डराता हुआ शब्द है, यह एक सोची समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है


 
कश्मीर को विशेष दर्जे से संबंधित अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद से ही आर्थिक मंदी चर्चा के केंद्र में है। एकसाथ अचानक आर्थिक मंदी (Economic recession) पर इतनी खबरें आने लगी हैं कि आम आदमी भ्रमित है कि अब क्या होगा? लेकिन क्या सचमुच भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ गई है?
दरअसल ऑटोमोबाइल (Automobile) सेक्टर में विगत 9 तिमाहियों से बिक्री में गिरावट आ रही है। टेक्सटाइल (Textile) सेक्टर ने भी लगभग 34 प्रतिशत की गिरावट का विज्ञापन छापा। रियल एस्टेट में वर्ष 2011 से जो गिरावट आनी शुरू हुई, वह आज तक संभल नहीं पाई है। (हालांकि रियल एस्टेट में गिरावट के इतर कारण भी हैं।) इसके अलावा पार्ले जी बिस्किट की बिक्री में आयी गिरावट ने भी मंदी की धारणा का समर्थन किया। इसके बाद जब जून तिमाही के लिए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) विकास दर (Growth Rate) में गिरावट के आंकड़े सामने आये तो लोगों ने इसे मंदी करार दिया।
बात अर्थव्यवस्था की शब्दावलियों को समझने की है। अर्थव्यवस्था में चार स्थितियां आती हैं – तेजी, मंदी, सुस्ती और पुनरुत्थान। इसके अलावा एक स्थिति और आती है जिसे डिप्रेशन (महान मंदी) कहते हैं। इसमें सुस्ती (Slowdown), मंदी (Recession) और महामंदी (Depression) को समझने की जरूरत है। आर्थिक सुस्ती वह स्थिति है जब विकास दर में वृद्धि पूर्ववर्ती विकास दर से कम हो रही हो। यानी विकास तो हो रहा है लेकिन उसकी रफ्तार घट गयी है। इसे यूं समझें कि एक दुकान पर हर हफ्ते पुराने ग्राहकों के अलावा 7 नये ग्राहक आते हैं। लेकिन अब पुराने ग्राहकों के अलावा 6 नये ग्राहक ही आ रहे हैं। यह सुस्ती है।
आर्थिक मंदी की स्थिति में विकास दर नकारात्मक हो जाती है। यानी उस दुकान पर नये ग्राहक तो नहीं ही आ रहे, पुराने ग्राहकों में भी कमी आ रही है। ऐसा लगातार दो अवधियों (अर्थव्यवस्था के मामले में लगातार दो तिमाही) में होता है तो वह दुकान मंदी की चपेट में कही जायेगी। और यह नकारात्मक विकास दर जब कई सालों-साल चलती है तो उसे डिप्रेशन कहते हैं जो भारत में 1930 के आसपास देखी गई।
जाहिर है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी नहीं, बल्कि आर्थिक सुस्ती के दौर में है। इसकी पुष्टि वैश्विक निवेश एवं बैंकिंग विशेषज्ञ कंपनी मॉर्गन स्टेनली (Morgan Stanley) भी करती है। मॉर्गन स्टेनली ने अगस्त में जारी अपनी रिपोर्ट में आशंका जतायी है कि विश्व अर्थव्यवस्थाएं (Global Economy) आगामी 9 महीने में मंदी की चपेट में आ सकती हैं। इसके लिए वह अमेरिका और चीन के बीच छिड़े व्यापार युद्ध को कारण मानती है। अन्य संकेतक जैसे बॉन्ड-यील्ड कर्व भी 2008 की मंदी के समान स्तर पर पहुंचती दिख रहा है। हालांकि मॉर्गन स्टेनली का मानना है कि भारत मंदी के कगार पर नहीं है बल्कि अशक्तकारी (Crippling) सुस्ती (Slowdown) से गुजर रही है।
देश के जाने-माने अर्थशास्त्री और भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. बिमल जालान मांग में आयी इस कमी को आर्थिक सुस्ती (Economic Slowdown) मानते हैं और कहते हैं कि यह सुस्ती चक्रीय (Cyclical) है न कि संरचनात्मक (Structural)। डॉ. जालान यह भी बताते हैं कि आर्थिक सुस्ती महज कुछ सेक्टर्स तक सीमित है न कि पूरी अर्थव्यवस्था में व्याप्त है। डॉ. जालान के मुताबिक वैश्विक आर्थिक सुस्ती भारत के लिए 7.5-8 प्रतिशत की विकास दर हासिल करने में बाधक नहीं होगी क्योंकि उत्पादन के सभी कारक जैसे निवेश, बचत, भूमि और प्रौद्योगिकी हमारे पक्ष में हैं। डॉ. जालान ने मीडिया को दिये एक साक्षात्कार में उम्मीद जतायी कि इस सुस्ती से बाहर निकलने में एक-दो वर्ष लगेंगे।
नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ.. राजीव कुमार भी कहते हैं कि जून में ख़त्म तिमाही में विकास दर में गिरावट का ये अर्थ नहीं है कि अर्थव्यवस्था मंदी की शिकार हो गई है। वे कहते हैं, "भारत में धीमी गति से विकास के कई कारण हैं जिनमे दुनिया की सभी अर्थव्यवस्थाओं में आई सुस्ती एक बड़ा कारण है।" श्री कुमार कहते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत हैं। उन्होंने उम्मीद जतायी कि वित्त मंत्री द्वारा बीते हफ़्ते घोषित किये गये कई कदमों का सकारात्मक असर निवेशकों और ग्राहकों के मूड पर पड़ेगा। हम त्योहारों के सीज़न में प्रवेश कर रहे हैं और हमें उम्मीद है कि दूसरी तिमाही तक विकास दर में वृद्धि नज़र आयेगी।"
भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने भी मौद्रिक नीति समिति की बैठक में 7 अगस्त को कहा कि जून 2019 के बाद आर्थिक गतिविधियों से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती और बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक ने पिछले तीन बार से रेपो रेट में जो कटौती की है, उसका असर धीरे-धीरे दिखाई दे रहा है।
दरअसल भारत में मंदी की बजाय मंदी की धारणा अधिक फैलाई जा रही है। मंदी एक डराता हुआ शब्द है। मंदी महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी में वृद्धि का भाव आता है। इस धारणा के शुरू होने पर चेन रिएक्शन होता है। जब यह धारणा शुरू होती है तो उद्यमी और ग्राहक दोनों सतर्क हो जाते हैं। उद्यमी अपने उद्यम में आ सकने वाली परेशानियों से बचने के लिए निवेश रोक देता है, लागत में कटौती करने लगता है जिसके फलस्वरूप कर्मचारियों की छँटनी होती है। इस छंटनी से जनता की खर्च करने की ताकत में कमी आती है। ग्राहक भी सतर्क हो जाता है और बुनियादी वस्तुओं का भंडारण करने के साथ अन्य वस्तुओं की खरीदारी स्थगित कर देता है। इससे उत्पादों की मांग में कमी आती है। जिससे कंपनी उत्पादन घटाती है, फिर छंटनी और यह प्रक्रिया तेज होती है। इसे वैज्ञानिक मंदी कह सकते हैं। लेकिन यह मनोवैज्ञानिक मंदी भी अर्थव्यवस्था को नुकसान तो पहुँचाती ही है। केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने इसी धारणा पर लगाम लगाने के लिए राहत उपायों की घोषणा की है जिसका असर त्योहारी सीजन की मांग के साथ मिलकर भारतीय अर्थव्यवस्था को सुस्ती के दौर से निकाल सकता है, मंदी तो बहुत दूर की कौड़ी है।