अगस्ता बनाम अपाचे
   दिनांक 09-सितंबर-2019
‘राज किसी का हो, हमें क्या फर्क पड़ता है’ तो उससे जवाब-तलब करें। क्योंकि ‘कोउ नृप होय, हमें का हानि’ के बाद ‘चेरि छांड़ि न त हौबे रानी’ कहने वाली मंथरा की मंशा क्या थी, यह इतिहास ने हमें बताया है।

 
यूं तो गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस के अनेकानेक दोहे, चौपाइयां लोगों को याद हैं, किंतु ज्ञान और निष्कर्ष के तौर पर इन सूक्तियों के संदर्भ जान लेना दिलचस्प है। यह इसलिए क्योंकि कई बार संदर्भ से उलट सूक्तियों का प्रयोग ज्ञान की बजाय अज्ञान, सही की बजाय गलत का कारण बन जाता है। राजनीति में कोई रहे, कोई सरकार आए- ‘हमें क्या?’ इस तर्क की पालकी ढोने वाले जब ‘कोउ नृप होय, हमें का हानि’ उद्धृत करते हैं तो वे अयोध्याकांड का वह संदर्भ नहीं जानते कि यह बात जनसामान्य के लिए या उसके द्वारा नहीं कही गई है। यह बात तो राज्य शासन की बागडोर अन्यायकारी तरीके से राम से छीन लेने की कुत्सित मंशा से मंथरा द्वारा कही गई है। लोकतंत्र में नृप यानी राजा के लिए स्थान नहीं, किंतु इस बात का असर सब पर पड़ता है कि शासन के सूत्र किसके हाथ में हैं। अब इस सूक्ति के संदर्भ वर्तमान से जोड़ते हैं। सरकार के विदेश दौरे पहले भी होते थे, अब भी हो रहे हैं। रक्षा सौदे पहले भी हुए, अब भी हुए। किंतु पहले और अब के होने में साफ अंतर है।
प्रधानमंत्री का रूस दौरा पहली बार नहीं है। ये दौरे तो ‘सिर पर लाल टोपी रूसी...’ गाने के जमाने से हो रहे थे, किंतु समाजवादी ढंग की खेती या कारखानों में भारत के हित की बात नहीं है, यह समझने को भारतीय शासन तब तक तैयार नहीं था जब तक कि खुद रूस में ‘ग्लासनोस्त’ और ‘पेरेस्त्रोइका’ की खुली हवाओं ने तस्वीर को उलट-पुलट नहीं कर दिया। विदेश से आधुनिक हेलिकॉप्टर हमने पहली बार नहीं खरीदे। पूर्व रक्षामंत्री ए.के. एंटनी ने भी खरीदारी की थी और दिवंगत पूर्व रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी कुछ हेलिकॉप्टर की खरीद का आदेश दिया था। अंतर सिर्फ इतना रहा कि एंटनी ने गांधी परिवार सरीखे खास लोगों के लिए वीवीआईपी अगस्ता वेस्टलैंड ‘चॉपर’ खरीदे थे और पर्रिकर ने ‘अपाचे’ जैसे सैन्य हेलिकॉप्टर की खरीद को मंजूर दी थी।
अपाचे बनाम अगस्ता का जिक्र इसलिए भी प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि चार सितंबर को भारतीय वायुसेना ने इस हेलिकॉप्टर की पहली खेप प्राप्त की और पांच सितंबर को प्रवर्तन निदेशालय ने अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले से संबंधित धनशोधन के मामले में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी को गिरफ्तार किया। गौर करने वाली बात है कि वीवीआईपी हेलिकॉप्टरों की खरीद में दलाली की बात उजागर होने के बाद से ही कांग्रेस के कुछ प्रमुख चेहरों के अलावा खुद इस पार्टी का ‘मुखिया परिवार’ संदेह के घेरे में है। इस मामले में मुख्य दलाल क्रिश्चियन मिशेल के हाथ का लिखा नोट एक अन्य मध्यस्थ गुइडो हैशके के यहां 2013 की शुरुआत में मारे गए छापे में मिला था। इस नोट के मुताबिक, सौदे में कुल दलाली 30 मिलियन यूरो की थी, जो कि लगभग 242 करोड़ रुपए बैठती है। 12 हेलिकॉप्टरों को खरीदने का सौदा 3,600 करोड़ रुपए में हुआ था। नोट के मुताबिक, वायुसेना अधिकारियों को 6 मिलियन यूरो दिया जाना था, जो कि लगभग 48 करोड़ रुपए हुआ। रक्षा मंत्रालय में वरिष्ठ नौकरशाहों को 8.4 मिलियन यूरो यानी लगभग 68 करोड़ रुपए दिए जाने की बात थी। अंतिम श्रेणी राजनीतिक नेताओं की थी, जहां 15़16 मिलियन यूरो दिखाए गए हैं, जो लगभग 122 करोड़ रुपए बैठते हैं। इतालवी अदालत में रखे गए 15 मार्च, 2008 के एक नोट में इशारा किया गया था कि प्रमुख दल की ताकतवर नेत्री वीआईपी चॉपर खरीद के पीछे अहम भूमिका निभा रही थी।
यह तो हुई ‘अगस्ता’ की आड़ में देश का पैसा डकारने की वह कहानी जो धीरे-धीरे खुल रही है। अब बात उस ‘अपाचे’ की, जो भारत की शक्ति और इसके शत्रुओं के भय का नया प्रतीक बना है।
अपाचे को फिलहाल दुनिया का सबसे खतरनाक, तेज और तरह-तरह के सैन्य अभियानों में भिन्न-भिन्न भूमिकाएं निभाने में सबसे सक्षम हेलिकॉप्टर माना जाता है। अब परंपरागत युद्ध का दौर लद चुका है। भारत की पानी, घाटी, बर्फ, पहाड़ों वाली दुरूह सीमाओं की देखरेख और ‘हायब्रिड’ युद्ध में बढ़त बनाने की दृष्टि से अपाचे का चयन लाजवाब कहा जा रहा है।
कम शब्दों में कहें तो रणनीतिक तैनाती के लिहाज से बढ़िया, छोटे-तुरंत अभियानों के लिए सटीक और अपनी कुल भूमिका की दृष्टि से किफायती अपाचे युद्ध की स्थिति में हरावल दस्ते (या इन्फैंट्री) से भी पहले पहुंचकर उसका काम आसान करने वाला हथियार है। इसे भारतीय सीमा सुरक्षा का निवारक अस्त्र भी कहा जा सकता है।
बहरहाल, अगस्ता और अपाचे का फर्क साफ है। यह उदाहरण है जो देशनीति और प्रजा के सरोकारों के अन्य आयामों पर भी लागू होता है।
कोई यदि अब भी कहे कि ‘राज किसी का हो, हमें क्या फर्क पड़ता है’ तो उससे जवाब-तलब करें। क्योंकि ‘कोउ नृप होय, हमें का हानि’ के बाद ‘चेरि छांड़ि न त हौबे रानी’ कहने वाली मंथरा की मंशा क्या थी, यह इतिहास ने हमें बताया है।