Chief of Defense Staff: देर से ही सही पर जरूरी कदम
   दिनांक 09-सितंबर-2019
आलोक बंसल
मोदी सरकार ने अंतत: तीनों रक्षा सेवाओं में बेहतर तालमेल और भविष्य में युद्ध की आवश्यकताओं को देखते हुए सीडीएस यानी रक्षा सेवा प्रमुख का पद सृजित करने का फैसला किया है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम वर्षों पहले उठाया जाना चाहिए था, लेकिन अब फैसला होने के बाद इसमें देरी उचित नहीं होगी

 
भारतीय रक्षा सेवा के तीनों अंगों के प्रमुख (बाएं से) एडमिरल करमबीर सिंह, जनरल बिपिन रावत और एयर चीफ मार्शल बी.एस. धनोआ
 
गत 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र्र मोदी के भाषण में सबसे महत्वपूर्ण बात थी भारत की रक्षा सेवाओं के तीनों अंगों में बेहतर समन्वय सुुनिश्चित करने के लिए लंबे समय से लंबित मांग के अनुरूप रक्षा सेवा प्रमुख (सीडीएस) के पद के सृजन की घोषणा। सीडीएस पद के सृजन की सिफारिश 1999 में के. सुब्रह्मण्यम के नेतृत्व में बनी कारगिल समीक्षा समिति के अलावा रक्षा मंत्रालय द्वारा लेफ्टिनेंट जनरल शेकतकर की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञों की समिति ने भी की थी। यद्यपि सटीक चार्टर के साथ-साथ रक्षा सेवा प्रमुख की स्थिति और उन्हें दी जाने वाली जिम्मेदारियों के बारे में अभी काफी अस्पष्टता होने के कारण अटकलों का दौर चल रहा है। फिर भी, विभिन्न सिफारिशों और संचार माध्यमों में अब तक आई रिपोर्टों के आधार पर कहा जा सकता है कि भावी सीडीएस कोई चार सितारा सैन्य अधिकारी (कैबिनेट सचिव के वेतन ग्रेड में तीन प्रमुखों के समकक्ष) होगा जो सैन्य मामलों पर सरकार के एकल बिंदु सलाहकार के रूप में कार्य करेगा।
यह होगा दायित्व
तीन अन्य समकक्षों के बीच पहला होने के नाते सीडीएस तीनों सशस्त्र बलों के साथ समन्वय करेगा और उनके बीच किसी मतभेद की स्थिति में उन्हें समाप्त करने की पहल भी करेगा।
उल्लेखनीय है कि जब तक सेना के तीनों अंग अपनी योजनाएं अलग-अलग बनाएंगे और युद्ध अपने-अपने तरीके से लड़ेंगे, तब तक कोई भी देश आधुनिक युद्ध में किसी दूसरे देश से नहीं जीत सकता। इससे भी खराब बात यह है कि भारतीय सेना की संरचनात्मक प्रकृति औपनिवेशिक है, जिसे अंग्रेजों ने दोनों विश्व युद्ध के दौरान अपने हितों के अनुरूप विकसित किया था।
स्वतंत्रता के बाद के वषोेर्ें में युद्ध के खतरों और युद्ध के तौर-तरीकों एवं प्रकृति में सिरे से बदलाव आने के बावजूद सेना के इस ढांचे में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं हुआ है। भारतीय सशस्त्र बलों का पुनर्गठन अत्यंत आवश्यक है जिसे तुरंत किए जाने की जरूरत है। कारण, भविष्य के युद्धों की प्रकृति कम अवधि के अत्यंत तीव्र संघर्षों की होगी जिनसे निपटने के लिए राज्य के सभी अंगों को एक साथ काम करने की जरूरत होगी। ऐसे परिदृश्य में नियंत्रण और निर्देशन की पूर्ण एकसूत्रता आवश्यक होगी। ऐसी एकसूत्रता व्यावहारिक रूप से केवल तभी संभव है जब देश में सीडीएस के नेतृत्व में एकीकृत कमान की संरचना हो। यह होते हुए भी, राजनीतिक तंत्र में रक्षा मामलों के बारे में अज्ञानता के चलते नौकरशाहों ने विगत वर्षों में सीडीएस की नियुक्ति को अटकाए रखा और इसके लिए पूरी व्यवस्था से छेड़छाड़ की, क्योंकि उन्हें लगता था इससे रक्षा मंत्रालय पर उनकी पकड़ कमजोर होगी।
आधुनिक भारत में रणनीतिक विचार प्रक्रिया के महारथी समझे जाने वाले दुर्लभ श्रेणी के नौकरशाह के. सुब्रह्मण्यम ने कारगिल समीक्षा समिति में राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए सीडीएस और वाइस चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (वीसीडीएस) की नियुक्ति की अनुशंसा की थी, जिस पर तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में मंत्रियों के एक समूह ने विचार-विमर्श किया था। इस समूह ने भी रक्षा सेवा प्रमुख के पद के सृजन के साथ ही, उनके साथ सेना के तीनों अंगों के संयुक्त नियोजन सहयोगियों के पदों के सृजन की अनुशंसा भी की थी। इसके परिणामस्वरूप अक्तूबर 2001 में एकीकृत रक्षा स्टाफ मुख्यालय (एचक्यू आईडीएस) बनाया गया था, लेकिन राजनेताओं के मन में सैन्य तख्तापलट का भय पैदा करके नौकरशाह सीडीएस की नियुक्ति रुकवाने में सफल रहे। इस तरह से एक अत्यंत हास्यास्पद स्थिति पैदा हुई जिसमें एक संगठन तो स्थापित हो गया, लेकिन पिछले 18 वर्ष से वह अपने संगठनात्मक प्रमुख के बिना कार्य कर रहा है।
वाइस चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (वीसीडीएस) के पद को पहले चीफ ऑफ इंटीग्रेटिड डिफेंस स्टाफ और बाद में चेयरमैन चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (सीसीएससी) के रूप में बदल दिया गया। लेकिन, सीडीएस की अनुपस्थिति में इस पद पर बैठा व्यक्ति तीनों सेवाओं के प्रमुखों से नीचे के पदक्रम का होने के कारण उनके बीच किसी प्रकार की मध्यस्थता करने में अक्षम था। इसलिए वह सरकार के एकमात्र सलाहकार के रूप में भी योगदान करने की स्थिति में नहीं था। नतीजतन, एकीकृत मुख्यालय जिस उद्देश्य से स्थापित किया गया था, वह उस काम को करने के बजाय मुख्यत: तीनों सेनाओं के मुख्यालयों द्वारा किए जा रहे कार्यों की नकल कर रहा था। रक्षा सेवा प्रमुख (सीडीएस) की नियुक्ति वास्तव में भारतीय रक्षा प्रणाली में एक विशाल शून्य को समाप्त करते हुए बलों को और अधिक प्रभावी बनाएगी। हालांकि, केवल सीडीएस की नियुक्ति से समस्या पूरी तरह नहीं खत्म होगी, इसके लिए रक्षा मंत्रालय का पुनर्गठन और एकीकृत थिएटर कमांड का विकास करना होगा।
चुनौतियां और आशंकाएं
नौकरशाही हलकों में इस मामले पर असंतोष भरी कुनमुनाहट भी सुनाई दे रही है। लंबे समय से बिना किसी जवाबदेही के बहुत सारे अधिकारों से सम्पन्न रहने वाली नौकरशाही सीडीएस को सभी अधिकार सौंपने के लिए तैयार नहीं है। सामंती मानसिकता वाली नौकरशाही में आईएएस और आईएफएस संवर्गों के अधिकारी किसी ऐसे अन्य सरकारी अधिकारी की अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं जो उनके कैडर का न हो। नतीजतन, कारगिल समीक्षा समिति की अनुशंसा के अनुसार एकीकृत रक्षा सेवा मुख्यालय में एक वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी तैनात किए जाने की सिफारिश आज तक लागू नहीं हो सकी है। इसका परिणाम यह है कि सीडीएस को न केवल तीनों रक्षा बलों के कामकाज को समझने की जरूरत होगी, बल्कि उसे सरकार के कामकाज की बारीकियों के साथ ही वैश्विक सुरक्षा वातावरण को भी समझने की जरूरत होगी। इसका मतलब हुआ कि इस पद के लिए बौद्धिक रूप से अत्यंत सक्षम योद्धा की जरूरत है जिसकी नियुक्ति केवल वरिष्ठता और बारी के आधार पर नहीं की जानी चाहिए, बल्कि तीनों सेवाओं के सभी शीर्ष अधिकारियों के साक्षात्कार के बाद ही किसी एक का चयन किया जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री की घोषणा के बावजूद यह सब आसानी से नहीं होने वाला, क्योंकि रक्षा बलों के भीतर भी हितों का टकराव होना तय है। नौकरशाही के प्रतिरोध के अलावा, तीनों सशस्त्र बलों में अपना महत्व कम होने का डर सीडीएस के कामकाज में बाधा पैदा कर सकता है। हो सकता है कि इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार को अमेरिका के गोल्डवाटर-निकोलस अधिनियम से कुछ सीख लेते हुए तीनों सेवाओं को इस दिशा में प्रेरित करना पड़े। सबसे पहले तो रक्षा बलों की सम्पूर्ण भूमियों और उनके पूंजीगत बजटों को सीडीएस के अधीन करते हुए रक्षा संपदा विभाग और रक्षा वित्त एवं लेखांकन सेवाओं को उसके नियंत्रण में लाया जाना चाहिए। तीनों सेवाओं में आगे की पदोन्नति के लिए अंतर-सेवा संगठनों में तैनाती को आवश्यक बनाया जाना चाहिए। इसके अलावा, सीडीएस को प्रभावी बनाने के लिए सबसे जरूरी है कि रक्षा मंत्री तक उनकी असीमित एवं सीधी पहुंच हो तथा उनके माध्यम से वह महीने में कम से कम एक बार प्रधानमंत्री के सम्पर्क में रहे।
जरूरी है एकीकृत थिएटर कमान
अंत में, रक्षा मंत्रालय को पुनर्गठित करने के क्रम में वहां सेवारत और सेवानिवृत्त रक्षा अधिकारियों को शामिल करने की आवश्यकता है, जबकि नौकरशाहों और राजनयिकों को सैन्य कमान संरचनाओं में नियुक्त किया जाना चाहिए। समय आ गया है कि एकीकृत थिएटर कमान की स्थापना हो जो सभी युद्धक अभियानों के लिए रक्षा मंत्री के प्रति सीधे उत्तरदायी हो। प्रत्येक रक्षा सेवा के प्रमुख का उत्तरदायित्व केवल बलों को जरूरी संसाधनों से लैस करने, संगठित करने और प्रशिक्षण तक सीमित होना चाहिए।
सीडीएस की नियुक्ति नि:संदेह एक बहुत जरूरी कदम है, भले ही इस काम में कुछ दशकों की देर हो चुकी है। इसके अगले चरण के रूप में, दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ सशस्त्र बलों और रक्षा मंत्रालय के पुनर्गठन की आवश्यकता होगी ताकि वैश्विक शक्ति के रूप में विकसित होने की भारतीय आकांक्षाओं को पूरा किया जा सके।
(लेखक पूर्व नौसेना अधिकारी, इंडिया फाउंडेशन के निदेशक और न्यू डेल्ही इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में सहायक प्रोफेसर हैं)