चंद्रयान 2: असफल नहीं हुए हम उम्मीद अभी कायम
   दिनांक 09-सितंबर-2019
रूस ने 1958 से 1976 के बीच करीब 33 मिशन चांद की तरफ रवाना किए, इनमें से 26 अपनी मंजिल नहीं पा सके।1958 से 1972 तक अमेरिका के 31 मिशनों में से 17 नाकाम रहे। चांद पर पानी की खोज भारत का मुख्य लक्ष्य था और वो काम ऑर्बिटर कर रहा है. भविष्य में इसका डेटा ज़रूर आएगा

 
 
दक्षिणी ध्रुव पर उपस्थिति दर्ज कराना वाले इसरो के लिए ये एक और बड़ी उपलब्धि है। आज तक कोई देश चांद के दक्षिणी ध्रुव पर नहीं पहुंच सका है
पिछले दिनों इसरो द्वारा सफलतापूर्वक प्रक्षेपित चंद्रयान 2 इतिहास रचने से सिर्फ 2 कदम यानी 2.1 किलोमीटर पहले चूक गया जब उसके लैंडर का जमीनी संपर्क टूट गया. चंद्रयान-2 ने मिशन की 15 बड़ी बाधाओं को सफलतापूर्वक पार कर लिया था ऐसे में इसके पूरी तरह से सफल होने की उम्मीद बढ़ गई थी लेकिन फिर भी चंद्रयान 2 मिशन काफी हद तक सफल है क्योंकि इसका आर्बिटर अभी भी काम कर रहा है जिसकी अवधि एक साल की है . भारत इतिहास रचने से दो क़दम दूर रह गया. अगर सब कुछ ठीक रहता तो भारत दुनिया पहला देश बन जाता जिसका अंतरिक्षयान चन्द्रमा की सतह के दक्षिणी ध्रुव के क़रीब उतरता. इससे पहले अमरीका, रूस और चीन ने चन्द्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैन्डिंग करवाई थी लेकिन दक्षिणी ध्रुव पर नहीं. क्योंकि दक्षिणी ध्रुव पर जाना बहुत जटिल था इसलिए भी भारत का मून मिशन चन्द्रमा की सतह से 2.1 किलोमीटर दूर रह गया. शुक्रवार की रात चंद्रयान-2 चंद्रमा की सतह पर बस उतरने ही वाला था कि लैंडर विक्रम से संपर्क टूट गया. संपर्क टूटने से पहले चंद्रमा की सतह से दूरी महज 2.1 किलोमीटर बची थी. विक्रम लैंडर से भले निराशा मिली है लेकिन यह मिशन नाकाम नहीं रहा है, क्योंकि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर चांद की कक्षा में अपना काम कर रहा है. इस ऑर्बिटर में कई सेंसर और वैज्ञानिक उपकरण लगें हैं और वो ठीक से काम कर रहे हैं.
फ़िलहाल इस चूक में भी भविष्य के सबक हैं . ऑर्बिटर भारत ने पहले भी पहुंचाया था लेकिन इस बार का ऑर्बिटर ज़्यादा आधुनिक है. चंद्रयान-1 के ऑर्बिटर से चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर ज़्यादा आधुनिक और वैज्ञानिक उपकरणों से लैस है. यह एक बड़ा और जटिल प्रयोग था जिसमें थोड़ी विफलता मिली . ज़ाहिर है हर प्रयोग कामयाब नहीं हो पाते . वैसे भी अब तक चांद के दक्षिणी ध्रुव पर कोई भी रोबोटिक लैंडर नहीं उतर पाया है. इसीलिए चंद्रयान-2 को बिल्कुल नई जगह पर भेजा गया था ताकि नई चीज़ें सामने आएं. पुरानी जगह पर जाने का कोई फ़ायदा नहीं था इसलिए नई जगह चुनी गई थी. फ़िलहाल संतोषजनक बात यह है कि ऑर्बिटर तो काम कर रहा है. चांद पर पानी की खोज भारत का मुख्य लक्ष्य था और वो काम ऑर्बिटर कर रहा है. भविष्य में इसका डेटा ज़रूर आएगा.
चंद्रयान-2 के इस मिशन पर दुनिया भर की नजरें टिकी थीं और उसकी वजह ये थी कि भारत के वैज्ञानिकों ने चांद के सबसे मुश्किल हिस्से पर पहुंचने को अपना लक्ष्य बनाया था. मिशन के मुताबिक चंद्रयान- 2 को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरना था. चांद के इस हिस्से पर सूरज की रोशनी बहुत कम पहुंचती है. इस वजह से लैंडर और रोवर के लिए सौर ऊर्जा हासिल कर पाना मुश्किल होगा.
मिशन में ये बड़ी चुनौतियां थी
चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अभी तक दुनिया के किसी देश की पहुंच नहीं हो पाई है, इसलिए वैज्ञानिकों को यहां की सतह की जानकारी नहीं थी. अमेरिका के अपोलो मिशन सहित ज्यादातर मिशनों में लैंडिंग चांद के मध्य में की गई और चीन का मिशन चांद के उत्तरी ध्रुव की तरफ था. चांद की पथरीली जमीन भी सॉफ्ट लैंडिंग के लिए बड़ी चुनौती थी, लैंडर विक्रम को दो क्रेटरों के बीच सॉफ्ट लैंडिंग की जगह तलाशनी थी.
भले ही चांद पर मानव के पहुंचने के 50 साल हो गए हों लेकिन तमाम विकसित देशों के लिए भी चांद को छूना आसान नहीं रहा है. रूस ने 1958 से 1976 के बीच करीब 33 मिशन चांद की तरफ रवाना किए, इनमें से 26 अपनी मंजिल नहीं पा सके. वहीं अमेरिका भी इस होड़ में पीछे नहीं था. 1958 से 1972 तक अमेरिका के 31 मिशनों में से 17 नाकाम रहे.
यही नहीं अमेरिका ने 1969 से 1972 के बीच 6 मानव मिशन भी भेजे. इन मिशनों में 24 अंतरिक्ष यात्री चांद के करीब पहुंच गए लेकिन सिर्फ 12 ही चांद की जमीन पर उतर पाए. इसके अलावा इसी साल अप्रैल में इजरायल का भी मिशन चांद अधूरा रह गया था. इजरायल की एक प्राइवेट कंपनी का ये मिशन 4 अप्रैल को चंद्रमा की कक्षा में तो आ गया लेकिन 10 किलोमीटर दूर रहते ही पृथ्वी से इसका संपर्क टूट गया.
ऑर्बिटर से बड़ी उम्मीदें हैं
चंद्रयान-2 को मंजिल के करीब ले जाने वाला ऑर्बिटर अब भी चंद्रमा की कक्षा में घूम रहा है. अब वैज्ञानिकों को इंतजार है कि आंकड़ों से निकलने वाले नतीजों का और ऑर्बिटर से मिलने वाली तस्वीरों का. जिससे आखिरी 15 मिनट का वैज्ञानिक विश्लेषण मुमकिन हो सके.
लैंडर विक्रम के साथ संपर्क टूटने की वजहों का अध्ययन विश्लेषण किया जाएगा. जिन चुनौतियों की वजह से इस मिशन को अब तक का सबसे कठिन मिशन माना जा रहा था. उससे निपटने के नए तरीके भी ढूंढे जाएंगे. इस लिहाज से चंद्रयान-2 का अभियान इस बेहद मुश्किल लक्ष्य की तरफ बढ़ने के लिए वैज्ञानिकों के अनुभव को और समृद्ध करने वाला साबित होगा.
 
चंद्रयान-2 अंतरिक्ष यान में तीन खंड हैं -ऑर्बिटर (2,379 किलोग्राम, आठ पेलोड), विक्रम (1,471 किलोग्राम, चार पेलोड) और प्रज्ञान (27 किलोग्राम, दो पेलोड). विक्रम दो सितंबर को आर्बिटर से अलग हो गया था. चंद्रयान-2, 30 किलोमीटर की ऊंचाई से 1,680 मीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से 1,471 किलोग्राम का विक्रम चंद्रमा की सतह की ओर बढ़ना शुरू किया, तब तक सबकुछ ठीक था. इसरो के टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क केंद्र के स्क्रीन पर देखा गया कि विक्रम अपने निर्धारित पथ से थोड़ा हट गया और उसके बाद संपर्क टूट गया. लैंडर बड़े ही आराम से नीचे उतर रहा था, और इसरो के अधिकारी नियमित अंतराल पर खुशी जाहिर कर रहे थे. लैंडर ने सफलतापूर्वक अपना रफ ब्रेक्रिंग चरण को पूरा किया और यह अच्छी गति से सतह की ओर बढ़ रहा था. लैंडर का नियंत्रण उस समय समाप्त हो गया होगा, जब नीचे उतरते समय उसके थ्रस्टर्स को बंद किया गया होगा और वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया होगा, जिसके कारण संपर्क टूट गया. हालांकि चंद्रयान-2 मिशन का सबकुछ समाप्त नहीं हुआ है. मिशन का सिर्फ पांच प्रतिशत लैंडर विक्रम और प्रज्ञान रोवर- नुकसान हुआ है, जबकि बाकी 95 प्रतिशत -चंद्रयान-2 ऑर्बिटर- अभी भी चंद्रमा का सफलतापूर्वक चक्कर काट रहा है. एक साल मिशन अवधि वाला ऑर्बिटर चंद्रमा की कई तस्वीरें लेकर इसरो को भेज सकता है. ऑर्बिटर लैंडर की तस्वीरें भी लेकर भेज सकता है, जिससे उसकी स्थिति के बारे में पता चल सकता है.
वैसे भी चंद्रमा की सतह को छूने से चंद मिनट पहले लैंडर ‘विक्रम’ का जमीनी स्टेशन से संपर्क टूटने के बाद भी चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर चंद्रमा की कक्षा में सुरक्षित है और सामान्य तरीके से काम कर रहा है. 2379 किलोग्राम ऑर्बिटर के मिशन का जीवन काल एक साल है. चंद्रयान-2 ने धरती की कक्षा छोड़कर चंद्रमा की तरफ अपनी यात्रा 14 अगस्त को इसरो द्वारा ‘ट्रांस लूनर इन्सर्शन’ नाम की प्रक्रिया को अंजाम दिये जाने के बाद शुरू की थी. यह प्रक्रिया अंतरिक्ष यान को ‘लूनर ट्रांसफर ट्रेजेक्ट्री’ में पहुंचाने के लिये अपनाई गई. अंतरिक्ष यान को पिछले 20 अगस्त को चंद्रमा की कक्षा में पहुंच गया था. चंद्रयान-2 के ‘ऑर्बिटर’ में चंद्रमा की सतह का मानचित्रण करने और पृथ्वी के इकलौते उपग्रह के बाह्य परिमंडल का अध्ययन करने के लिए आठ वैज्ञानिक उपकरण लगें हैं. इसरो के पूर्व अध्यक्ष जी. माधवन नायर ने कहा कि चंद्रयान-2 अपने मिशन के 95 प्रतिशत उद्देश्यों में सफल रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उदास इसरो के वैज्ञानिकों से कहा कि साहसी बनें. वैज्ञानिकों के साथ बातचीत में प्रधानमंत्री ने कहा, "आपने अभी तक जो हासिल किया है, वह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है. कुल मिलाकर चंद्रयान 2 मिशन की आंशिक विफलता भारत के लिए एक सबक का काम करेगी और भविष्य के चंद्र मिशन की सफलता में सहायक सिद्ध होगी ।
(लेखक मेवाड़ विश्वविद्यालय में डायरेक्टर और टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं )