सर्वसमावेशी है संघ विचार
   दिनांक 09-सितंबर-2019
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई प्रतिबंधित संगठन नहीं है। हालांकि सरकार ने कई बार बिना किसी वैध कारण के संघ पर प्रतिबंध लगाया है और बाद में उसी सरकार को बिना शर्त यह प्रतिबंध हटाना भी पड़ा है। यह गुप्त संगठन भी नहीं है। इसकी दैनिक गतिविधियां खुले मैदान में की जाती हैं, जिनमें कोई भी भाग ले सकता है

 रा.स्व. संघ के नागपुर कार्यालय में जर्मनी के राजदूत वाल्टर जे. लिंडनर से भेंट करते सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत

जर्मन राजदूत श्री वाल्टर जे़  लिंडनर के नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय के हाल के दौरे से बेवजह विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई। नागपुर या दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यालयों में आने वाले श्री लिंडनर पहले राजदूत या विदेशी राजनयिक नहीं हैं। ऐसे दौरे, चाय या भोजन के साथ विचारों के आदान-प्रदान के सहज चलन का हिस्सा रहे हैं। यह अलग बात है कि इस तरह के दौरे को सार्वजनिक करने वाले वह पहले राजदूत हैं।

भारत में, ‘वाम-उदारवादी’ (लेफ़्ट-लिबरल) के नाम से एक जमात विशेषत: कांग्रेस शासन के दौरान सत्ता-व्यवस्था के सहयोग और संरक्षण में फली-फूली है। मैं नहीं जानता कि ‘वाम-उदारवादी’ जैसे विरोधाभासी शब्द को किसने गढ़ा, क्योंकि प्रत्यक्ष व्यवहार में इस जमात का आचरण ठीक इसके विपरीत, अत्यंत ‘अनुदार’ ही दिखता है। वास्तव में ये लोग, उनके बारे में अतिशय अनुदार और असहिष्णु होते हैं जो उनकी विचारधारा से सहमत नहीं हंै। इन्हीं लोगों ने लगातार झूठ और निराधार आरोपों के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विरोध तथा निषेध  किया है, और संघ कार्य की गति को रोकने का भरसक प्रयास भी किया है। लेकिन संघ कार्यकर्ताओं के निरंतर अथक प्रयास एवं ईश्वर की कृपा से समस्त भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भौगोलिक और संख्यात्मक विस्तार तथा  प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। वहीं दूसरी ओर उस ‘अनुदार-वाम’ गुट की कलई उतर रही है, जनता के बीच बहस के मुद्दों और जनमानस पर इनकी पकड़ ढीली हो रही है। भारत की जनता, दंभ में लिपटे उनके भेदभावपूर्ण रवैये और अहं भाव को पहचान कर उनका विरोध कर रही है।

भारत के निर्माताओं के मन में भारत की परिकल्पना (जो भारत के संविधान में पूर्ण रूप से अभिव्यक्त हुई है) बहुलता में विश्वास रखने वाले, विविधता का उत्सव मनाने वाले, एकत्र आकर खुले मन से स्वस्थ चर्चा-विमर्श करने वाले भारत की रही है। अनुदार वामपंथ इसके ठीक उलट है। जब पूर्व राष्ट्रपति डॉ़ प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया था, तो इसी जमात ने निमंत्रण स्वीकार करने पर उनकी कड़ी आलोचना की थी। डॉ. मुखर्जी के पास सार्वजनिक जीवन का लंबा अनुभव है, साथ ही वह एक अनुभवी राजनेता भी हैं। वह आजीवन कांग्रेस पार्टी से जुड़े रहे, फिर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों को संबोधित करने के लिए उन्हें आमंत्रित करना संघ की खुली और उदार मानसिकता का परिचायक है, वहीं जिस जमात ने उनका विरोध किया, इस प्रकरण से उसकी अनुदार-असहिष्णु मानसिकता अनावृत्त हो गई। इसी जमात  के लोगों का अनुदारपूर्ण रवैया तब खुल कर सामने आया जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अधिकारियों को जयपुर साहित्य समारोह में आमंत्रित किए जाने पर इन्होंने उसका भरसक विरोध  किया और अंत में पूरे कार्यक्रम का बहिष्कार भी किया।

हाल ही में जर्मन राजदूत की नागपुर यात्रा की आलोचना करने वाले एक लेख ने मेरा ध्यान खींचा। वह लेख विद्वतापूर्ण अंदाज में झूठी बातों का एक पुलिंदा था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ अन्य लेखों के जरिए किए जा रहे सुनियोजित दुष्प्रचार का ही एक हिस्सा मात्र था।

ऐसे दुष्प्रचार में सबसे बड़ा झूठ यह है कि ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिटलर को पूजता है, सम्मान करता है’। सच्चाई से इसका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। मैं चार दशक से  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ सक्रिय रूप से जुड़ा हूं। मैंने कभी भी  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी वरिष्ठ अधिकारी को हिटलर या नाजीवाद का महिमामंडन करते नहीं सुना। इसके विपरीत, मैंने संघ के अधिकारियों द्वारा अनगिनत बार इस्रायल, उसकी वीरतापूर्ण देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता और प्रतिबद्धता के संदर्भ में तारीफ ही सुनी है। कॉलेज के दिनों में मैंने लियोन उरिस का उपन्यास ‘एक्सोडस’ पढ़ा था, दूसरों को भी उसे पढ़ने की सलाह दी थी। उसमें इस्रायल के निर्माण की रोमांचकारी और प्रेरक कहानी को दशार्या गया है, जो 1800 वर्षों के निष्कासन के बाद वास्तविकता के धरातल पर साकार होती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक, आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की पहली अधिकृत  जीवनी के लेखक श्री ना. ह. पालकर ने इस्रायल की विजयपूर्ण उपलब्धियों पर ‘संघर्षरत इस्रायल’ नाम की पुस्तक मराठी में लिखी है। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता के तौर पर अपने कॉलेज के दिनों में मैंने हिटलर पर जो किताब पढ़ी थी उसका नाम था-‘नाजी भस्मासुर का उदय और अस्त’।

मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग में मौजूद यह अनुदार जमात हमेशा श्री एम़ एस. गोलवलकर की किताब ‘वी एंड अवर नेशनहुड डिफाइंड’ को उद्धृत करती आयी  है, जो 1938 में पहली बार तब प्रकाशित हुई थी, जब श्री गोलवलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारी नहीं थे। यह किताब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करती है। वास्तव में यह किताब श्री विनायक दामोदर सावरकर के बड़े भाई बाबाराव सावरकर की एक मराठी पुस्तक का अनुवाद थी। इसे एम़ एस. गोलवलकर ने नहीं लिखा था।

इकॉनामिक टाइम्स (8 सितंबर 2016) को दिए एक साक्षात्कार में नाथूराम गोडसे और वीर सावरकर के पौत्र  सात्यकी सावरकर ने कहा था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक एम़ एस. गोलवलकर द्वारा बाबाराव सावरकर की पुस्तक ‘राष्ट्र  मीमांसा’ का अंग्रेजी में अनुवाद का श्रेय लेने के कारण ही नाथूराम गोडसे के साथ उनके संबंधों में कड़वाहट घुल गई थी।

श्री एम़ एस. गोलवलकर उपाख्य श्री गुरुजी ने 1972 में पत्रकार सैफुद्दीन जिलानी को एक विस्तृत साक्षात्कार दिया था, जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों के संबंध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दृष्टिकोण को स्पष्ट किया था। ये वामपंथी तथाकथित शिक्षाविद् और विद्वान उस साक्षात्कार का उल्लेख या उद्धरण कभी नहीं देते हैं, क्योंकि उसमें ऐसा सत्य मौजूद है, ऐसे अंश हैं, जो उनके लिए असुविधाजनक हैं, और वे उनके दुष्प्रचार अभियान को ध्वस्त करने के लिए काफी हैं, जब कि यह साक्षात्कार प्रकाशित है। पाठकों की जानकारी के लिए मैं उस साक्षात्कार के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूं-

डॉ. जिलानी: भारतीयकरण पर बहुत चर्चा हुई, भ्रम भी बहुत निर्माण हुए, क्या आप बता सकेंगे कि ये भ्रम कैसे दूर किये जा सकेंगे?

श्री गुरुजी: ‘भारतीयकरण की घोषणा जनसंघ द्वारा की गई, किंतु इस मामले में संभ्रम क्यों होना चाहिये? भारतीयकरण का अर्थ सबको हिंदू बनाना तो है नहीं।

हम सभी को यह सत्य समझ लेना चाहिये कि हम इसी भूमि के पुत्र हैं। अत: इस विषय में अपनी निष्ठा अविचल रहनी अनिवार्य है। हम सब एक ही मानवसमूह के अंग हैं, हम सबके पूर्वज एक ही हैं, इसलिये हम सबकी आकांक्षाएं भी एक समान हैं-इसे समझना ही सही अर्थों में भारतीयकरण है।

भारतीयकरण का यह अर्थ नहीं कि कोई अपनी पूजा-पद्धति त्याग दे। यह बात हमने कभी नहीं कही और कभी कहेंगे भी नहीं। हमारी तो यह मान्यता है कि उपासना की एक ही पद्धति संपूर्ण मानव जाति के लिये सुविधाजनक नहीं’।

हाल ही में आयोजित एक व्याख्यानमाला के दौरान सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कहा, ‘‘राष्ट्र के नाते हम सब लोगों की पहचान हिंदू है। कुछ लोग हिंदू कहने में गौरव मानते हैं और कुछ के मन में उतना गौरव नहीं है, कोई बात नहीं। कुछ ‘मैटेरियल कंसिडरेशंस’ या ‘पॉलिटिकल  करेक्टनेस’ के कारण सार्वजनिक रूप से कभी कहेंगे भी नहीं, लेकिन निजी रूप से कहते हैं, और कुछ लोग हैं जो यह भूल गए हैं। ये सब लोग हमारे अपने हैं, भारत के हैं। जैसे परीक्षा में जब प्रश्नपत्र हमारे हाथ में आता है, तो हम सबसे पहले आसान सवालों को हल करते हैं, बाद में कठिन सवालों को हाथ लगाते हैं। वैसे ही हम पहले उनका संगठन करते हैं, जो अपने आपको हिंदू मानते हैं। क्योंकि हमारा कोई शत्रु नहीं है, न दुनिया में, न देश में। हमसे शत्रुता करने वाले लोग होंगे, उनसे अपने को बचाते हुए भी हमारी आकांक्षा उनको समाप्त करने की नहीं है, उनको साथ लेने की है, जोड़ने की है। ये वास्तव में हिन्दुत्व है।’’

उन्होंने आगे कहा: ‘‘संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर ने यह भी कहा था कि हमारी आपस की लड़ाई के कारण विदेशी जीते और हमको गुलाम बनाया। मैं उनके भाव बता रहा हूं, उनके शब्दों को आप पढ़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि संसद में परस्पर विरोधी कैम्प में एक-दूसरे के विरोधी बनकर हम बैठे हैं, यह तंत्र की मजबूरी है, लेकिन इस के बावजूद हम सब एक हैं। यदि हमने ऐसा बंधुभाव उत्पन्न नहीं किया तो न जाने हमें कैसे दिन देखने पड़ेंगे, कह नहीं सकते।

संघ इसी बंधुभाव के लिए काम करता है और इस बंधुभाव के लिए एक ही आधार है-विविधता में एकता। परम्परा से चलते आए इस चिंतन को ही दुनिया हिंदुत्व कहती है। इसीलिए हम कहते हैं कि हमारा राष्ट्र हिंदू राष्ट्र है। इसका मतलब इसमें मुसलमान नहीं चाहिए, ऐसा बिल्कुल नहीं होता है। जिस दिन यह कहा जाएगा कि मुसलमान नहीं चाहिए उस दिन वह हिंदुत्व नहीं रहेगा।’’

डॉ़ हेडगेवार की जीवनी के लेखक लिखते हैं कि वह एक महान देशभक्त और अपनी मेहनत के बल पर सफलता हासिल करने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने किसी व्यक्ति को अपना गुरू या मार्गदर्शक नहीं बनाया था। हालांकि, विभिन्न क्षेत्रों के अलग-अलग विचारों के लोगों के साथ भी उनके बहुत अच्छे संबंध थे। उनके निर्णय  स्व-बोध, स्व-विवेक और स्वेच्छा से हुआ करते थे। लोकमान्य तिलक के प्रति उनके मन में बहुत सम्मान था। 1920 में तिलक जी के निधन के बाद कांग्रेस का नेतृत्व संभालने के लिए डॉ. हेडगेवार पांडिचेरी से डॉ. मुंजे को लेकर योगी अरविंद से मिलने पहुंचे। 1921 में जब लोकनायक बापूजी अणे की अध्यक्षता में बेरार प्रांत की कांग्रेस कार्यसमिति स्वतंत्रता हेतु चल रहे क्रांतिकारी आंदोलन की निंदा का प्रस्ताव लाने वाली थी तो डॉ. हेडगेवार ने मध्यस्थ बनते हुए उन्हें ऐसा करने से परावृत्त किया था। वह क्रांतिकारी गतिविधियों से,  कांग्रेस में ही-तिलक समर्थकों और गांधी समर्थकों से, हिंदू महासभा के नेताओं और यहां तक कि समाज सुधारकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी समान रूप से जुड़े थे।

डॉ. मुंजे, वीर सावरकर और महात्मा गांधी के साथ उनके संबंध सौहार्दपूर्ण थे। वह कभी-कभी उन्हें स्वयंसेवकों को संबोधित करने के लिए आमंत्रित करते थे, लेकिन उन्होंने इस बात का हमेशा ध्यान रखा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्णय, इन नेताओं से प्रभावित न हो कर, स्वयंसेवकों द्वारा चर्चा और आम सहमति के बाद ही लिए जाएं। डॉ. मुंजे और श्री सावरकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा नहीं थे।1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के समय हुई पहली बैठक में डॉ. मुंजे नहीं थे। इसलिए, डॉक्टर मुंजे का मत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मत मानना गलत होगा। वास्तव में, डॉ़ मुंजे के लंदन में गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर डॉ. हेडगेवार ने अपनी असहमति और विरोध जताया था।

पुणे में डॉ. हेडगेवार द्वारा संबोधित एक बैठक में एक व्यक्ति के पूछने पर कि ‘कौन मूर्ख कहता है कि भारत हिंदू राष्ट्र है’? डॉ. हेडगेवार ने बिना किसी पुस्तक या विद्वान (वीर सावरकर की किताब ‘हिंदुत्व’ तब प्रकाशित हो चुकी थी) का उद्धरण दिए, शांत, लेकिन दृढ़तापूर्वक कहा-‘मैं, डॉ. हेडगेवार, कहता हूं कि भारत हिंदू राष्ट्र है।’

1937 में विदर्भ में, वीर सावरकर के एक महीने के दौरे की योजना बनी। डॉ. हेडगेवार इस दौरे में पूरे समय उनके साथ रहे और दौरा सफल हो, इसकी चिंता भी की। सावरकर जी संघ के काम से प्रभावित हुए। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सराहना की और डॉ. हेडगेवकर के सामने संघ का स्वयंसेवक बनने की इच्छा व्यक्त की। हालांकि, डॉ. हेडगेवार ने विनम्रता से उन्हें समझाया कि इस उदीयमान संगठन की आपने सार्वजनिक सभा में सराहना की, यही हमारे लिए पर्याप्त है।

यह भारत की परंपरा रही है कि यहां किसी धर्मग्रंथ या सिद्धांत की विभिन्न व्याख्याएं की जाती रही हैं। भगवद्गीता की अनेक विद्वानों एवं चिंतकों द्वारा  विभिन्न व्याख्याएं की गयी हैं। यही बात हिंदुत्व के लिए भी लागू होती है। लोकमान्य तिलक ने ‘हिंदू कौन है’ इसकी एक परिभाषा दी थी कि जो भी वेदों को मानता है वह हिंदू है-‘प्रामाण्य बुद्धिरवेदेषु उपास्यानाम् अनियम:।’

लेकिन इसमें जैन और बौद्ध शामिल नहीं होते थे, जबकि वे भी भारत का ही अहम हिस्सा हैं। तब स्वातंत्र्यवीर  सावरकर ने एक व्यापक परिभाषा देते हुए कहा कि हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक, इस भूमि पर रहने वाले सभी लोग हिंदू हैं जो इस भूमि को पुण्यभूमि और अपनी पितृभूमि मानते हैं।

‘आसिंधुसिंधुपर्यंता यस्य भारतभूमिका। पितृभू पुण्यभूश्चैव स वै हिंदुरिति स्मृता।।

इस परिभाषा में भारतीय ईसाई, मुस्लिम और पारसी छूट जाते थे।

फिर श्री गुरुजी ने इससे भी व्यापक परिभाषा दी कि, एक मातृभूमि, समान पूर्वज और समान परंपराओं ने भारत में रहने वाले सभी लोगों को सदियों से एक विशिष्ट पहचान दी है। यह पहचान हिंदू है। भारतीय संदर्भ में,  लोग ही राष्ट्र बनाते हंै, न कि राज्य। हम अलग-अलग शासकों या राज्यों के बावजूद एक राष्ट्र थे।

‘इंडियन आइडियोलॉजी’ पुस्तक के लेखक पेरी एंडरसन ने महात्मा गांधी को उद्धृत किया है, ‘भारत पर कोई भी आक्रमण होने के पूर्व से ही, निसर्गत: भारत अखंड रहा है। यह भूप्रदेश एक राष्ट्र के रूप में सुख से रह रहा था और हमारे पूर्वजों की राष्ट्रियत्व की संकल्पना इतनी प्रखर थी कि वह उस समय विश्व के किसी भाग के लोगों को समझ में नहीं आ सकती थी।’

लेखक आगे लिखता है: ‘इस उपमहाद्वीप के पुराणत्व की विशेषता ऐसी है कि यहां कमाल की एकता दिखाई देती है। यहां के सभी रहवासी इस सम्पूर्ण दीर्घकाल में भारतीय थे। उनकी मानसिकता में कमाल की एकता थी। उन्हें एक ही परम्परा का एहसास था। किसी भी संस्कृति की सुबह होने से पूर्व सभी भारतीयों में एकात्मता का समान एहसास  था।’

यह एकता, यह वैशिष्ट्य, जिसे दुनिया हिंदुत्व के रूप में जानती है, सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों में अभिव्यक्त, अनुभूत और प्रकट होनी चाहिए। यह हिंदू राष्ट्र (समाज) का प्रकटीकरण है। इसका किसी मजहब शासित राज्य व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं। बल्कि, एक मजहब शासित राज्य व्यवस्था, यह बात ही हिंदुत्व और भारत के लिए पराई है।’

अब, ‘बंच आफ थॉट्स’ के बारे में बात करें। यह किताब एम़ एस. गोलवलकर (श्री गुरुजी) के विचारों का संकलन है, जो उन्होंने 1940 से 1964 तक विभिन्न अवसरों पर और तत्कालीन विशिष्ट परिस्थितियों में व्यक्त किए थे। इसमें 1964 के बाद से 1973 तक दिए गए व्याख्यान शामिल नहीं हैं।

वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने हाल ही में दिल्ली में अपने भाषण के दौरान ‘बंच आॅफ थॉट्स’ का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ बातें, जो बोली जाती हैं, वे परिस्थिति विशेष, प्रसंग विशेष के सम्बंध में बोली जाती हैं। वे शाश्वत नहीं रहती हैं। श्रीगुरुजी के जो शाश्वत विचार हैं, उनका एक संकलन प्रकाशित हुआ है- ‘श्री गुरुजी-विजन एंड मिशन’। उसमें तात्कालिक संदर्भ से आने वाली सारी बातें हटाकर हमने उनके केवल सर्वकालिक उपयुक्त विचार रखे हैं। अक्सर, ‘बंच आॅफ थॉट्स’ के  ‘आंतरिक चुनौतियां-ईसाई, मुस्लिम और कम्युनिस्ट’ नाम के अध्याय का उल्लेख किया जाता है। आज के संदर्भ में इसकी व्याख्या ‘सुनियोजित ईसाई कन्वर्ज़न’, ‘जिहादी इस्लामी कट्टरवाद’ और ‘नक्सलवाद या माओवाद’ के रूप में होनी चाहिए। ये सभी गतिविधियां संविधान निर्माताओं द्वारा परिकल्पित भारत के अस्तित्व के लिए एक खतरा हैं। सभी ईसाई नहीं, लेकिन कुछ चर्च और मिशनरी सुनियोजित कन्वर्ज़न को अंजाम दे रहे हैं और वे ईसाइयत के नाम पर ईसाई समुदाय के कुछ सदस्यों का छुपा समर्थन पाने में सफल भी रहे हैं। यही कारण है कि 1967 में कांग्रेस शासन के दौरान मध्य प्रदेश और ओडिशा में पहला कन्वर्जन विरोधी कानून लागू किया गया, जिसके तहत बल, धोखाधड़ी या पैसे के लालच के बूते कराए जाने वाले कन्वर्जन को गैर कानूनी ठहराया गया। चर्च और मिशनरियों ने इसका कड़ा विरोध किया था। इसी तरह, भारत में सभी मुसलमान नहीं, लेकिन कुछ मुस्लिम संगठन इस्लाम के नाम पर जिहादी कट्टरपंथ का प्रचार और प्रसार करने में शामिल हैं और वे मजहब के नाम पर मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों से समर्थन प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। माओवादियों और शहरी नक्सलियों की विध्वंसक और विघटनकारी गतिविधियों पर से अब पर्दा हट चुका है और जनता सब समझने लगी है। क्या आपने कभी किसी कम्युनिस्ट संगठन को, नागरिकों और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना कर्तव्य निभाते हुए नक्सलियों और माओवादियों से मोर्चा लेते भारतीय सुरक्षाबलों पर हुए क्रूर हमलों और उनकी हत्या पर बेचैन होते या उसकी  निंदा करते देखा है? ये वही लोग हैं जो सुरक्षाबलों के जवानों के मारे जाने पर मौन साधे बैठे रहते हैं और नक्सलियों और माओवादियों की विध्वंसक गतिविधियों को रोकने के दौरान उन उपद्रवियों के मरने पर हाय-तौबा मचाने लगते हैं। इन तीन राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के बारे में भारतीय नागरिकों को चेतावनी देना बेहद महत्वपूर्ण और आवश्यक है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई प्रतिबंधित संगठन नहीं है। हालांकि सरकार ने कई बार बिना किसी वैध कारण के संघ पर प्रतिबंध लगाया है और बाद में उसी सरकार को बिना शर्त यह प्रतिबंध हटाना भी पड़ा है। यह एक गुप्त संगठन भी नहीं है। इसकी दैनिक गतिविधियां (शाखा) खुले मैदान में की जाती हैं, जिनमें कोई भी भाग ले सकता है। समस्त भारत में इसकी शाखाएं फैली हुई हैं और दिन-प्रतिदिन इसका विस्तार, शक्ति और प्रभाव बढ़ता जा रहा है। जनता में इसके लक्ष्य, कार्यप्रणाली और दर्शन के बारे में जानने की जिज्ञासा और उत्सुकता स्वाभाविक रूप से बढ़ रही है।

कुछ साल पहले, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल भारत की यात्रा पर आया था और उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं से मिलने की इच्छा व्यक्त की थी। जब वह बैठक आयोजित हुई, तब मैं दिल्ली में था। हमने चाय पर विभिन्न मुद्दों पर अपने विचारों का आदान-प्रदान किया। उन्होंने हमसे इस बैठक का प्रचार नहीं करने का अनुरोध किया था। मुझे नहीं लगता कि वे इसे चीन में अपने आकाओं से छुपाना चाहते थे, लेकिन उन्हें इस बात की चिंता रही होगी कि भारत में वामपंथी-अनुदार मीडिया और बुद्धिजीवी इस पर न जाने कैसी प्रतिक्रिया दें।

हम उदारमना लोगों का स्वागत करते हैं। विडंबना यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हमेशा से विरोध करने वाले अनुदार-वामपंथी बुद्धिजीवी वर्ग और मीडिया को संघ के स्वयंसेवकों से मिलने और उन्हें जानने में कभी दिलचस्पी रही ही नहीं। जर्मन राजदूत ने खुले तौर पर यह किया है। जर्मन राजदूत वाल्टर जे़ लिंडनर का उदार और साफ रुख स्वागत योग्य है।   

(लेखक रा. स्व. संघ के सह सरकार्यवाह हैं)