नव-वामपंथ का षड्यंत्र
   दिनांक 10-जनवरी-2020
 वामपंथ और नव-वामपंथ ने छात्रों की इसी ऊर्जा का प्रवाह गलत दिशा में ले जाकर उन्हें उनके ही हितों, उनके देश के हितों के खिलाफ खड़ा कर देने का गहरा षड्यंत्र रचा

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वामपंथी छात्रों द्वारा जेएनयू के पेरियार छात्रावास में इस तरह की गई तोड़-फोड़
भारत में छात्र आंदोलन इस समय सबसे नाजुक दौर में है। आम तौर पर हम यह मान कर चलते हैं कि अगर छात्र अपनी राह से भटकेगा, तो शिक्षक उसे सही रास्ता दिखाएगा। निश्चित रूप से, और कुछ परिस्थितियों में, असहमति और अविश्वास के भी क्षण पैदा होते हैं, लेकिन गुरु और शिष्य के यही संबंध न केवल शिक्षा के, बल्कि छात्र के व्यक्तित्व से लेकर राष्ट्र के निर्माण तक में भी बहुत कारगर रहे हैं। इन संबंधों से जिस रचनात्मकता का जन्म होता है, वही किसी भी राष्ट्र के प्राण होते हैं। हाल ही के समय की बात करें, तो आईआईटी, खड़गपुर के छात्रों ने लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी को खोज निकालने, वेल्लौर के एक तकनीकी संस्थान के छात्रों ने कम ईंधन से ज्यादा चलने वाला इंजन बनाने, एक अन्य संस्थान ने भोजन की बर्बादी रोकने की विधि का आविष्कार करने में सफलता प्राप्त की है। अरुणाचल प्रदेश में 11वीं कक्षा के एक छात्र ने ऐसा चश्मा बनाया है, जिसे पहनने के बाद दृष्टिहीन व्यक्ति को टटोलकर चलने की जरूरत नहीं रह जाती है। तमिलनाडु के एक 18 वर्षीय छात्र ने दुनिया का सबसे छोटा उपग्रह डिजाइन किया, जिसका वजन मात्र 64 ग्राम है और जून, 2017 में उसे नासा ने अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया था। ऐसे असंख्य उदाहरण हैं।
लेकिन अब समय नाजुक इसलिए है, क्योंकि उनकी शिक्षा और इस रचनात्मकता पर दोहरा वार हो रहा है। छात्रों को उनकी शिक्षा और रचनात्मकता से भटकाने वाले कई तत्व सक्रिय हैं और उससे भी बढ़कर यह कि जो शिक्षक या वरिष्ठ उनका मार्गदर्शन करते रहे हैं, सबसे पहले उन्हें ही पथभ्रष्ट करने की कोशिश हुई है, और कुछ स्थानों में यह कार्य इतना सफल रहा है कि यह आसानी से कहा जाने लगा है कि- इस संस्थान या इस विश्वविद्यालय का माहौल ही खराब है। उनकी हाल की बड़ी और उल्लेखनीय उपलब्धियों में - संस्थान का सर्वर तोड़ना, अध्यापकों के कपड़े फाड़ना, ‘देश की बर्बादी होने तक जंग’ लड़ने के नारे लगाना, भारत के जवानों के बलिदान पर जश्न मनाना, सरकारी बसें जलाना, ‘हिन्दुओं से आजादी’ के नारे लगाना, ‘हिन्दुत्व की कब्र खोदने’ के नारे लगाना, अपने परिसर में जिन्ना की तस्वीर लगाना आदि शामिल हैं।
अगर हम सतर्क रहते, तो शायद इससे बचा जा सकता था। वामपंथ और नव-वामपंथ ने दुनियाभर में जो कुछ शिक्षण संस्थानों के साथ किया है, उससे हमें समय रहते सचेत हो जाना चाहिए था।
शिक्षण संस्थानों में राजनीति का प्रवेश, इसे आप सामान्य तौर पर इस मानसिक प्रदूषण के लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं। सवाल यह है कि आपकी राजनीतिक दिशा और संदेश सकारात्मक है या नकारात्मक। ये छात्र ही थे, जिन्होंने 1828 में ‘यंग इंडियन ग्रुप आॅफ फ्री थिंकर्स’ बनाया था, जिसने 19 वीं शताब्दी के बंगाल पुनर्जागरण में अपनी भूमिका निभाई थी। 1905 में कलकत्ता के ईडन कॉलेज के छात्रों ने बंगाल के विभाजन का विरोध करने के लिए वायसराय लॉर्ड कर्जन का पुतला जलाया था, जो अंग्रेजी राज वाले भारत में छात्रों के विरोध का पहला लिखित उदाहरण माना डाता है। आजादी के पहले जेपी के नेतृत्व में बिहार में किए गए छात्र आंदोलन और 1974 में गुजरात में छात्रों का नव-निर्माण आंदोलन इतना प्रबल रहा कि उसने सरकारें ही गिरा दीं और इन राज्यों की विधानसभा भंग करनी पड़ी।
1974 में ही फिर जयप्रकाश नारायण की अगुआई में चतरा संघर्ष समिति ने भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, चुनावी सुधार, रियायती भोजन और शिक्षा सुधारों को मुद्दा बनाया। यह अहिंसक विरोध था, जो पटना विश्वविद्यालय से शुरू हुआ और उत्तरी भारत के हिंदी-भाषी राज्यों में कई अन्य शैक्षणिक संस्थानों में फैल गया। जेपी आंदोलन से कई नेता भी उभरे। आपातकाल लागू हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष अरुण जेटली और चतरा संघर्ष समिति के अध्यक्ष जयप्रकाश नारायण सहित 300 से अधिक छात्र संघ नेताओं से आपातकाल में विपक्षियों को जेल भेजने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसी तरह 1979 से 1985 तक असम में चला बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध आंदोलन आॅल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) द्वारा किया गया था। हालांकि अब वही आसू और उससे निकली असम गण परिषद नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रही है।
इसी तरह हाल में हांगकांग में छात्रों ने बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर कर चीन के उस प्रत्यर्पण विधेयक का विरोध किया, जो हांगकांग के निवासियों और आगंतुकों को चीन के कानूनी अधिकार के तहत ला देता और हांगकांग की स्वायत्तता को समाप्त कर देता। इसका विरोध अभी भी जारी है।
लेकिन वामपंथ और नव-वामपंथ ने छात्रों की इसी ऊर्जा का प्रवाह गलत दिशा में ले जाकर उन्हें उनके ही हितों, उनके देश के हितों के खिलाफ खड़ा कर देने का गहरा षड्यंत्र रचा। यह काम कैसे किया गया, यह एक लंबी कहानी है, लेकिन इसकी प्रयोगशाला रहे जादवपुर विश्वविद्यालय में 2014 में उत्पात मचाने वाले छात्रों पर पुलिस कार्रवाई हुई तो उसके खिलाफ वहीं के छात्रों ने ऐसा हंगामा किया कि कुलपति अभिजीत चक्रवर्ती को इस बात के लिए हटा दिया गया कि उन्होंने पुलिस को परिसर में प्रवेश करने की अनुमति क्यों दी थी।
नव-वामपंथ की दूसरी प्रयोगशाला है जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय। हाल के मामलों से पहले, संसद पर हमले की साजिश रचने के लिए दोषी कश्मीरी आतंकवादी अफजल की फांसी पर यहां विरोध प्रदर्शन किया गया था। अफजल को 9 फरवरी, 2013 को फांसी दी जा चुकी थी। लेकिन जेएनयू में विरोध हुआ 9 फरवरी, 2016 को। भारी हंगामे के बाद जेएनयू छात्र संगठन के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देशद्रोह के मामले में दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, या कोई और...ऐसे उदाहरण अनेक मिलेंगे।
प्रश्न यह है कि क्या देश के तौर पर हम अपने विश्वविद्यालयों को विदेशी-विभाजक हिंसक विचारधाराओं के अभ्यारण्य बनाने की छूट दे सकते हैं! क्या हिंसा की राजनीति और समाज को टुकड़े-टुकड़े, बोटी-बोटी काटने का मंसूबा बांधने वाले शिकारियों को हम अपने बच्चों का शिकार करने की छूट दे सकते हैं?
निश्चित ही नहीं, इस देश में विश्वविद्यालय की आड़ में संविधान का विरोध करने की छूट नहीं दी जा सकती। प्रदर्शन की आड़ में पत्थरमारों को छिपाने की छूट नहीं दी जा सकती। अभिव्यक्ति की आड़ में अपशब्दों की, आक्रोश के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को फूंकने की आजादी नहीं दी जा सकती। एक पंक्ति में कहें तो, संविधान से चलने वाले देश में संविधान से मिली विमर्श की स्वतंत्रता को क्रांतिकारी विध्वंस की स्वछंदता बनने नहीं दिया जा सकता। यह हमें तय करना है कि हमारे विश्वविद्यालय मेधा के पालने, नवोन्मेष की नर्सरी और सामाजिक समरसता के अभ्यारण होंगे और यहां भारत विरोध नहीं, देशप्रेम के स्वर निर्भय होंगे।
@hiteshshankar