जेएनयू से ऐसे भागना पड़ेगा, सोचा न था
   दिनांक 13-जनवरी-2020
भास्कर ज्योति
 
 

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बिहार लोकसेवा आयोग में चयन के बाद से सोचा था कि अब राजनैतिक विषयों पर पोस्ट नहीं लिखूंगा, पर कल (5 जनवरी) जेएनयू मेंं जो हुआ, उससे अभी तक उबर नही पाया हूं। इसलिए लोगों को सच्चाई बताना कर्तव्य समझता हूं। उस दिन शाम 8 बजे मैं किसी तरह जंगलों के रास्ते जेएनयू परिसर से बाहर निकला। अभी किसी मित्र के घर शरण ली है, क्योंकि परिसर में यदि रात को रुकता तो पता नहीं हमारे साथ क्या होता। मेरे बेहद करीबी मित्र 'ब' का सिर फोड़ दिया गया। वह कावेरी छात्रावास से पेरियार छात्रावास यह देखने आ रहा था कि मैं सुरक्षित हूं या नहीं। इसी दरम्यान उसे नक्सल गुंडों ने पीट-पीट कर अधमरा कर दिया।
 
मैं तीन रात से ठीक से सो नहीं पाया था। 5 जनवरी को दिन में करीब 12 बजे मैं बेंगलुरु से पेरियार छात्रावास पहुंचा। विंटर सेमेस्टर के पंजीकरण का आखिरी दिन था, पर नक्सलियों ने 2 दिन पहले ही पूरे परिसर का वाई-फाई बंद कर दिया था, केबल काट दिए थे। करीब 3 माह से नक्सलियों ने जेएनयू के सारे केंद्रों को जबरन बंद कर रखा था। जो छात्र पंजीकरण करा रहे थे, नक्सली उनकी सूची बना रहे थे, ताकि उन पर नक्सल कार्रवाई की जा सके।
 
मित्र 'क' और 'ख' सुबह चार बजे तक मेरे कमरे पर बैठकर बातें कर रहे थे। मैंने बोला- ''बहुत नींद आ रही है, कुछ देर सोता लेता हूं। फिर वे लोग चले गए। उन्हें गए आधा घंटा भी नहीं हुआ था कि अचानक पेरियार छात्रावास के नीचे काफी शोर होने लगा। मैं इतना थका हुआ था कि उठकर देखने का साहस नहीं हो रहा था। 5 मिनट के अंदर ही लगा कि छात्रावास के शीशे टूट रहे हैं। मैं फटाफट उठ कर लॉबी में गया, देखा लगभग 200 नकाबपोश लोग हाथों में सरिया-डंडे लिए पेरियार छात्रावास के दरवाजे और खिड़कियों को तोड़ रहे हैं। उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो गालियां देते हुए मेरे कमरे की ओर झपटे। किसी तरह मैं घुसकर दरवाजे के पीछे लकड़ी का आलमारी, टेबल तथा कुर्सिंया लगाकर दरवाजे को जाम किया। वे 3-4 मिनट दरवाजे पर लाठियां बरसाते रहे, फिर दूसरी तरफ चले गए। तब तक छात्रावास से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आती रहीं।
 
उनके जाने के बाद मैं कमरे की बालकनी में गया। मेरी बालकनी छात्रावास के मुख्य द्वार की ओर खुलती है। देखा करीब 500 नकाबपोश हाथों में डंडों से गोदावरी छात्रावास में छात्रों को पीट रहे हैं, नकाबपोश लड़कियां पत्थर फेंक रही थीं। यह बहुत ही सिहरा देने वाला दृश्य था। मैं यकीन नहीं कर पा रहा था कि यह क्या हो रहा है मेरे जेएनयू में! लगभग आधे घंटे में सारे नक्सली पेरियार से यह कहते हुए निकल गए कि ''चलो अब माही मांडवी छात्रावास चलकर पीटते हैं।''
 
20-25 मिनट के अंदर एकबार फिर से पेरियार छात्रावास में 500 नकाबपोश नक्सली दौड़ते हुए आए। इस बार छात्रावास के गेट पर ही उन्होंने छात्रों को बेतहाशा पीटा। मैं बालकनी से यह सब देख रहा था। मुझे वे नीचे से इशारा कर रहे थे कि छोड़ेंगे नहीं। इसी बीच, 50 लोगों की एक टुकड़ी फिर से छात्रावास के अंदर घुसी। फिर से दरवाजे-खिड़कियों को तोड़ने का क्रम शुरू। इस बार मैं काफी डर गया था। मैंने पुलिस को फोन किया कि हम बेहद खराब स्थिति में फंसे हुए हैं, कृपया हमें बचाया जाए। मैंने जेएनयूएसयू अध्यक्ष आइशी घोष को पेरियार छात्रावास के हमारे विंग में भागकर आते देखा। उस समय तक वह दुरुस्त थी। मुझे नहीं पता उसे चोट कब आई। करीब एक घंटे तक पेरियार के गेट पर पत्थरबाजी होती रही।
 
लगभग एक घंटे के बाद मेरे मोबाइल पर एक शिक्षक 'द' के कई कॉल आए कि ''मेरा मित्र 'ब' फोर्टिस अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में है। मुझे हॉस्टल छोड़कर निकल जाना चाहिए।'' छात्रावास का कार्यकारी अध्यक्ष मेरे कमरे में आया और बताया कि छात्रावास के मेस में भी तोड़फोड़ की गई है। आज खाना नहीं मिलेगा। रात को और भी नक्सली हमले होने की संभावना है, यदि निकल सकते हैं तो निकल जाइए। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी दिन इस तरह जेएनयू छोड़कर जाना होगा, जिस जेएनयू में हम सबसे सुरक्षित होने का अभिमान करते थे। जैकेट में मुंह छिपाकर मैं जंगल के रास्ते करीब 8:30 परिसर से बाहर निकल।
 
मुझे मित्रों से पता चला कि मीडिया में लोग बता रहे हैं कि एबीवीपी वालों ने हमला किया है। मेरे पास सफाई में बोलने के लिए कुछ नहीं है। जेएनयू के अंतिम दिनों में मैंने वामपंथ का चरमपंथी आतंकी रूप अपनी आंखों से देखा।
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