जेएनयू : सच...जो छुपाया गया
   दिनांक 13-जनवरी-2020
बीते दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं पर वामपंथी गुंडों द्वारा बरपाया गया कहर और निशाना बनाकर उन पर किए गए जानलेवा हमलों के बाद एक-एक करके जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे यह स्पष्ट करने के लिए काफी हैं कि इस हि सक घटना के पीछे कौन से चेहरे छिपे हैं !

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5 जनवरी को जेएनयू परिसर स्थित छात्रावास में हिंसा, मारपीट की वारदात को अंजाम देते नकाबपोश।
 
तारीख-6 जनवरी। स्थान-जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) का मुख्य प्रवेश द्वार। समय यही कोई दोपहर 1 बजे। मुख्य द्वार पर बड़ी तादाद में पुलिस और मीडियाकर्मियों की मौजूदगी। इन्हीं सबके बीच प्रवेश द्वार के बाहर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) के घायल छात्र कार्यकर्ता बीती 5 जनवरी को विवि. में नकाबपोशों के जानलेवा हमले की आपबीती बारी-बारी से मीडिया को बता रहे थे। छात्र-छात्राओं में किसी के सिर पर गंभीर चोट थी तो किसी का हाथ टूटा हुआ था। कुछ की गर्दन पर वार किए गए तो कुछ के पैरों पर। कुछ छात्राएं तो ऐसी थीं जिनके अंदरूनी अंगों पर भी हमले किए गए। मीडिया को दुखड़ा सुनाते समय उनके चेहरे पर दर्द, उदासी, तनाव और खौफ साफ दिख रहा था। मीडिया को भरोसा दिलाने के लिए ये छात्र अपने हाथों में बाकायदा मेडिकल रिपोर्ट भी लिए हुए थे। करीब दो घंटे तक ये छात्र मीडिया के सामने अपनी आपबीती बताते रहे। इस दौरान मुख्यधारा के मीडिया को उन्होंने परिसर में हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार वामपंथी संगठनों तथा वाम छात्र समूहों सहित घटना में शामिल चेहरों को उजागर किया।
 
यह सब चल ही रहा था कि अचानक प्रवेश द्वार के बाहर एवं अंदर से वामपंथी छात्रों के झुंड के झुंड एकत्र होने शुरू हो गए। 'साधु संतों की सरकार नहीं चलेगी, गाय-गोबर की सरकार नहीं चलेगी' के नारों के साथ उन्होंने प्रवेश द्वार को दोनों तरफ से घेर लिया। इनमें एक गुट द्वार के बाहर सरकार और पुलिस प्रशासन विरोधी नारे लगा रहा था तो दूसरा गुट चार कदम दूर डफली बजाते हुए फैज अहमद फैज द्वारा लिखित 'हम देखेंगे' नज्म गा रहा था। इन झुंडों का नेतृत्व दो-तीन अधेड़ उम्र की महिलाएं कर रही थीं। हालांकि इस शोर-शराबे के बीच भी अभाविप से जुड़े घायल छात्र मीडिया के सामने अपना पक्ष रखते रहे। लेकिन उनके चेहरे पर डर का आलम यह था कि जब वामपंथी छात्र नारेबाजी कर रहे थे तो उसी झुंड में मुंह पर मफलर लपेटे कुछ युवकों को देखकर कृतिका सिंह नामक एक छात्रा जोर-जोर से चिल्लाने लगी,''देखिए, नकाबपोश फिर आ गए। ये फिर हम सबको मारेंगे। पुलिस कुछ क्यों नहीं कर रही है।''
 
सुनियोजित साजिश के तहत किया गया था हमला
प्रत्यक्षदर्शी छात्र-छात्राओं की मानें तो बीती 5 जनवरी को जेएनयू की हिंसा पूरी तरह से सुनियोजित थी। वामपंथी छात्र नेता गीता ने नकाबपोश अराजक तत्वों के साथ मिलकर पहले परिसर का वाई-फाई बंद करवाया और जिसने भी उसे रोकने की कोशिश की या विरोध किया, उसके साथ मारपीट की। दरअसल, पढ़ाई के बहाने जेएनयू में डटे अर्बन नक्सली नहीं चाहते कि विवि. में अगले सत्र के लिए दाखिला प्रक्रिया शुरू हो। उनके विरोध को देखते हुए विवि. प्रशासन ने परीक्षा के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया ऑनलाइन कर दी थी। इसके लिए विद्यार्थियों को वाई-फाई की सुविधा दी गई थी। अभाविप और आम विद्यार्थियों का बड़ा तबका पढ़ाई में किसी तरह का व्यवधान नहीं चाहता था। लिहाजा वामपंथियों के परीक्षा बहिष्कार की घोषणा के बावजूद 3 जनवरी को बड़ी संख्या में विद्यार्थी पंजीकरण कराने पहुंचे। बहिष्कार की घोषणा को नाकाम होते देख नकाब पहने वामपंथी सर्वर क्षेत्र में पहुंच गए और वाई-फाई बंद कर दिया। विद्यार्थी 'ऑफलाइन' पंजीकरण कराने प्रशासनिक भवन पहुंचे तो अराजक तत्वों ने उन्हें वहां से भी भगा दिया। 4 जनवरी को विवि. प्रशासन ने वाई-फाई दोबारा शुरू किया तो वामपंथियों का झुंड फिर आ धमका। लेकिन सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी के कारण वे कुछ नहीं कर पाए। बाद में इन्होंने सर्वर वाले कमरे को बंधक बना लिया। जो छात्र पंजीकरण के लिए पहुंच रहे थे उन्हें खदेड़ दिया जा रहा था।
जब नकाबपोश फैलाते रहे आतंक

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दंगाई नकाबपोशों का नेतृत्व करती जेएनयू छात्रसंघ की अध्यक्ष आइशी घोष
 
5 जनवरी की शाम को नकाबपोश हमलावरों ने 'स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज' में प्राध्यापकों पर हमला किया और अभाविप कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के उद्देश्य से पेरियार छात्रावास में घुसे। 400-500 नकाबपोश गुंडों ने उन्माद फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सुरक्षाकर्मियों ने जब इन अराजक तत्वों को खदेड़ा तो नकाबपोश गुंडों ने पथराव शुरू कर दिया। इस हिंसक हमले में दर्जनों विद्यार्थी, प्राध्यापक और अभाविप कार्यकर्ता घायल हो गए। इस दौरान इन गुंडों ने अभाविप से संबंध रखने वाले छात्रों के साथ-साथ सामान्य छात्रों को भी बेरहमी से पीटा। इस हिंसक भीड़ का उत्पात यही नहीं थमा। यह झुंड साबरमती एवं माही-मांडवी छात्रावास भी गया और जिस कमरे में अभाविप कार्यकर्ता थे, वहां जमकर तोड़फोड़ के बाद उनके साथ मारपीट की। इसी बीच, पुलिस जब परिसर में पहुंची तो यही भीड़ साबरमती छात्रावास में एकत्रित हो गई। जिसे जेएनयूटीए का संरक्षण प्राप्त था। सूत्रों की मानें मो इस भीड़ में जामिया से बुलाए गए कई नक्सली-जिहादी शामिल थे, ऐसे में जेएनयूटीए के लिए भीड़ को ज्यादा देर तक संभालना मुश्किल था। अभाविप कार्यकर्ताओं को चुन-चुनकर मारने के इरादे से भीड़ देर शाम साबरमती छात्रावास में घुसी और उसने एक बार फिर अभाविप कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया। हालत यह रही कि कई कार्यकर्ता छात्रावास के कमरे से कूद कर जान बचाने में सफल रहे। इन्हीं गुंडों ने जेएनयूएसयू की अध्यक्ष आइशी घोष पर भी हमला कर उन्हें लहुलूहान कर दिया।
 
तीन दिन चला हिंसा का दौर
नाम न छापने की शर्त पर कुछ छात्रों ने बताया कि वामपंथी बीते कई दिनों से परिसर में हिंसा का कुचक्र रच रहे थे। इस सुनियोजित हिंसा की पटकथा जेएनयूसयू और जेएनयूटीयू ने मिलकर लिखी थी, जिसमें बाहर से आए गुंडों ने इनका साथ दिया। दरअसल विवि. में रहने वाले अराजक तत्व नहीं चाहते कि परिसर में शांति रहे और पढ़ाई व्यवस्था सुचारु रूप से चले। दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के मुताबिक प्रशासनिक भवन के 100 मीटर के दायरे में धरना, प्रदर्शन और जमावड़ा प्रतिबंधित है। सीआईएस दफ्तर प्रशासनिक भवन के 100 मीटर के दायरे में आता है। इसके बावजूद छात्रों पर हिंसक भीड़ ने हमला किया और प्रशासनिक भवन में तक को निशाना बनाया।
 
नहीं पसीजा हमलावरों का दिल
अराजक तत्वों के हमले में यूरोपीयन स्ट्डीज में पीएचडी अंतिम वर्ष के छात्र शुभकीर्ति भी गंभीर रूप से घायल हुए। वे घटना के बारे में बताते हैं,''उस दिन करीब 4 बजे मैं हॉज खास मैट्रो स्टेशन से विवि. परिसर वापस लौटा था। कावेरी छात्रावास के पास गाड़ी खड़ी करके मैं पैसे निकालने गोदावरी के निकट एटीएम गया। वहां देखा कि कुछ लोग भागकर पेरियार छात्रावास के अंदर जा रहे हैं। मैंने अपने एक वामपंथी दोस्त से ही पूछा कि यह सब क्या हो रहा है? तो उसने बताया कि मारपीट हो रही है। मुझे ध्यान आया कि पेरियार छात्रावास में मेरा एक बहुत प्रिय दोस्त रहता है, कहीं उसके साथ तो यह सब नहीं हो रहा। लिहाजा मैं पेरियार के द्वार पर ही रुक गया। तभी देखा कि वेलेंटिना, शांभवी व एक अन्य लड़की पर भीड़ डंडे और पत्थर बरसा रही थी। शांभवी बेहोश हो चुकी थी। मैं भागकर वहां पहुंचा और हमलावरों से हाथ जोड़कर कहा कि बस करो, ये मर जाएगी। लेकिन वे मुझे भी मारने लगे। मैंने भागने की कोशिश की। इस दौरान इनकी संख्या काफी थी। उन्होंने मेरे सिर पर लाठी-डंडे से कई वार किए। लहुलूहान हालत में एक लड़का मुझे एंबुलेंस से फोर्टिस अस्पताल ले गया। उस दृश्य को याद करता हूं तो मन में सवाल आता है कि ये कैसे छात्र हैं?''
 
पुलिस से बेसिरपैर के सवाल
हम अभी बाहर ही थे कि विवि. परिसर के अंदर से 'हमें चाहिए आजादी' वाले नारे सुनाई दिए। परिसर में दाखिल हुए तो देखा, गेट के पास ही वामपंथी छात्र संगठन और उसके समर्थक जमे हुए थे। कुछ देर बाद हमारी निगाह थोड़ा आगे छात्रों के झुंड पर पड़ी। वहां जाकर देखा तो कुछ छात्र एक सफेद कार को घेर कर खड़े थे। कार में दो-तीन पुलिस वाले थे। छात्र पुलिसकर्मियों का वीडियो बनाते हुए सवाल पूछ रहे थे- कहां से आए? अंदर क्यों और कैसे आए? किसने आने दिया? टोकन कहां है? किसे बचाने आए हो? अपना परिचयपत्र दिखाओ इत्यादि-इत्यादि। काफी देर तक यह सब चलता रहा। पुलिसकर्मियों द्वारा परिचयत्र दिखाने के बावजूद वे इस बात पर अड़े रहे कि वे अंदर क्यों और कैसे आए। इतने में ही नारेबाजी कर रहे छात्रों का हुजूम साबरमती छात्रावास की ओर बढ़ा। कुछ छात्र परिसर में तैनात सुरक्षाकर्मियों और पुलिस अधिकारियों से उलझ रहे थे। एक छात्र तो इन सुरक्षाकर्मियों के साथ मारपीट तक करने पर आमादा था। हालांकि कुछ छात्रों ने बीच-बचाव कर आक्रोशित छात्र को अलग किया। काफी समय तक छात्र उनसे बहस करते रहे। कुछ छात्र पुलिस अधिकारियों पर आरोपों की झड़ी लगा रहे थे। इसी में से एक ने कहा,''आपको शर्म नहीं आती, जब हमला हुआ तब आप क्यों नहीं आए?'' इस पर पुलिस अधिकारी ने प्रतिउत्तर में कहा, ''शर्म का सारा ठेका तो पुलिस ने ले रखा है। आप सब तो बड़े नादान हैं।''

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अराजक तत्वों को कांग्रेस का साथ
इसी प्रदर्शन से कुछ दूर सक्रियता से आन्दोलन को हवा देने में लगे कांग्रेस के पूर्व सांसद संदीप दीक्षित पर नजर पड़ी। पीला कुर्ता, सफेद पायजामा और लाल थैला लटकाए संदीप के साथ एक मुस्लिम व्यक्ति था। इनकी उपस्थित ऐसा आभास दिला रही थी कि मानो आन्दोलन की पटकथा इन्होंने ही लिखी हो और बहुत कुछ इनके मुताबिक ही चल रहा हो। वह छात्रों को घेरकर कुछ समझा रहे थे। पत्रकारों को इशारों-इशारों में कुछ बता रहे थे। उनके साथ चल रहा मुस्लिम व्यक्ति तो बाकायदा एक प्रमुख चैनल के पत्रकार को साथ चलने तक का इशारा करता है। हम भी इनके साथ ही आगे बढ़े। माही-मांडवी छात्रावास जाने वाले मोड़ पर वामपंथी जमघट पहले से ही जुटा हुआ था, जो मीडिया से मुखातिब था। इस दौरान वे शुल्क वृद्धि की वापसी की मांग कर रहे थे। शाम के करीब 7 बजे उसी मोड़ पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद परिसर में हुई हिंसा के लिए पुराना राग अलापते हुए मोदी-शाह को कोस रहे थे। तब इस दृश्य को देखकर यकीन हो गया कि दोपहर में संदीप दीक्षित एंड कंपनी सलमान खुर्शीद के आने के लिए 'पिच' तैयार करने में लगे थे ताकि कांग्रेस के एजेंडे को ठीक-ठाक चलाया जा सके।
पहले हमला किया, फिर दुष्प्रचार किया
 
जेएनयू में पहले वामपंथियों ने हमला किया, फिर नैरेटिव गढ़ा कि बाहर से गुंडों ने आकर उन्हें पीटा। मीडिया ने भी एकतरफा खबरें परोसीं। लेकिन सचाई इससे कोसों दूर है। जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में सहायक प्राध्यापक डॉ. प्रवेश चौधरी बताते हैं,''परिसर में हुई हिंसा वैचारिक संघर्ष का परिणाम है। जेएनयू में जो हुआ वह कोई नई बात नहीं है। जहां भी वामपंथियों का वर्चस्व है, वहां वे हमेशा से ऐसा करते आए हैं। सच तो यह है कि जेएनयू में वामपंथ का गढ़ ढहने लगा है। वामपंथी संगठनों की असलियत जानने के बाद छात्र उनसे दूर हो रहे हैं। विवि. की घटना पर निगाह डालने पर सबकुछ साफ दिखता है। एक जनवरी को विवि. प्रशासन को परीक्षा कराने से रोका गया। 2 जनवरी को कुछ नकाबपोश और जेएनयू छात्रसंघ के लोगों द्वारा इंटरनेट सर्वर बंद कर दिया गया। 3 जनवरी की सुबह जब कुछ छात्रों की मदद से स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज को खुलवाया गया तो 500 से ज्यादा छात्रों ने अपना पंजीकरण करा लिया। इससे भड़के वामपंथियों ने पंजीकरण रोकने के लिए सर्वर को ही फिर से ठप कर दिया। यही नहीं, 3 जनवरी को जब इंटरनेशनल अध्ययन केंद्र खोला गया तो डीन अश्वनी महापात्रा सहित कई शिक्षकों के साथ धक्का-मुक्की भी की गई। एक शिक्षक का मोबाइल छीन लिया गया। इसके बाद जो हुआ वह सबके सामने है।''
वे आगे बताते हैं कि 5 जनवरी को पेरियार छात्रावास में अभाविप कार्यकर्ताओं पर सुनियोजित तरीके से हमला किया गया। नकाबपोशों ने चुन-चुनकर उन्हें बेरहमी से पीटा। जिनके कमरे में स्वामी विवेकानंद की तस्वीर लगी हुई थी वहां हमले किए। कई छात्रों के सिर फूटे, कइयों के हाथ टूटे, बचने के लिए छात्र छात्रावास से भी कूदे जिससे उन्हें काफी चोटें आई। मैं खुद पेरियार छात्रावास के एक वार्डन के यहां छिप गया। जब छात्रावास के भीतर वार्डन के घर पर हमला हुआ तो हम कुछ लोग बाहर की तरफ भागे। शाम करीब 5:30 बजे दिल्ली पुलिस के डीसीपी कुछ पुलिसकर्मियों के साथ गेट पर आए, लेकिन छात्रावास का गेट बंद था। शाम करीब 7 बजे साबरमती छात्रावास के दो वार्डन भागते हुए आए कि हमारे घर पर हमला हो गया है। मैंने दोनों को अपने घर में छिपाया। साबरमती छात्रावास पर 'एबीवीपी खत्म करो' के नारे लग रहे थे। मैं अपने घर के बाहर खड़ा था। एक छात्र भागता आया। बोला-''सर घर के अंदर जाओ। आपको भी नहीं छोड़ेंगे। आप भी उनकी हिट लिस्ट में हो।'' मैं छात्रावास के बच्चों को साथ लेकर अंदर के गेट से घर में दाखिल हुआ। पुलिस अपने दलबल के साथ 8:30 के बाद पहुंची, इसके बाद जाकर स्थिति संभली।
 
छात्राओं के साथ अभद्रता
अभाविप की राष्ट्रीय महामंत्री निधि त्रिपाठी ने बताया कि हिंसा के दौरान वामपंथी छात्र-छात्राओं ने पंजीकरण कराने जा रही लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार भी किया। उनके कागजात फाड़ दिए। दुर्व्यवहार की शिकार लड़कियां सहमी हुई हैं। जिन लोगों ने इस तरह की हरकत की है, वे सभी चिह्नित चेहरे हैं। निधि कहती हैं,''पिछले दो-तीन महीने से वामपंथियों ने साजिश के तहत विवि. परिसर में अशांति फैला रखी है। छात्र-छात्राओं को कक्षाओं में जाने व परीक्षा देने से रोका गया। अब अगले सेमेस्टर के लिए पंजीकरण नहीं करने दिया। इनकी गुंडागर्दी का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इन्होंने इंटरनेट ही ठप कर दिया। इस सबके बावजूद जब विद्यार्थी ऑफलाइन पंजीकरण कराने के लिए जा रहे थे, तो न केवल उन्हें रोका गया, बल्कि उनके साथ मारपीट भी की गई। उन पर मिर्ची पाउडर तक फेंका गया। इससे स्पष्ट है कि वामपंथी साजिश सुनियोजित थी। वे जेएनयू को अशांत करना चाहते हैं।'' वह आगे बताती हैं, ''पहले दो महीने से परिसर में अराजकता फैलाई, फिर उसे हिंसा में बदल दिया। वामपंथी जब नाकाम हो जाते हैं तो वे हिंसा का रास्ता ही चुनते हैं। वे देख रहे हैं कि उनकी जमीन दिन-प्रतिदिन दरक रही है, उनकी हकीकत सबके सामने आ रही है। वे यह सोच रहे हैं कि जब वे नहीं बचेंगे तो जेएनयू को भी नहीं बचने देंगे। इसलिए ही तो वे शिक्षा प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं।''
 
जेएनयूटीएफ छात्रों के साथ
जवाहरलाल नेहरू यूनीवर्सिटी टीचर फेडरेशन (जेएनयूटीएफ) ने नकाबपोशों द्वारा साबरमती और पेरियार छात्रावास में निर्दोष छात्रों पर बेरहमी से पिटाई, शिक्षकों पर हमले और परिसर में तोड़फोड़ की घटना की कड़ी निंदा की है। साथ ही, दो माह से भी अधिक समय से जेएनयू परिसर में जारी गतिविधियों की भी निंदा करते हुए विवि. प्रशासन और पुलिस से अपराधियों को शीघ्र पकड़ने की अपील की है।
 
आइशी घोष सहित 20 के विरुद्ध प्राथमिकी
परिसर में हुए उत्पात के मामले में जेएनयू प्रशासन की शिकायत के बाद जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष आइशी घोष सहित 19 लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई है। इन पर प्रशासनिक भवन के कर्मचारियों और महिला सुरक्षाकर्मियों से मारपीट करने, उन्हें धमकाने व गाली-गलौज के अलावा 4 जनवरी को सर्वर रूम में तोड़फोड़ करने का आरोप है। आइशी घोष भले ही मीडिया के सामने घडि़याली आंसू बहाएं, लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने उनकी कारगुजारियों को उजागर कर दिया है। यह वीडियो 5 जनवरी की शाम का है, जिसमें आइशी हमलावरों को निर्देश देती हुई दिख रही हैं कि उन्हें किस तरफ जाना है।
 
सोशल मीडिया ने खोली पोल
सोशल मीडिया ने कुछ दिन पहले सीएए के नाम पर फर्जी खबर फैलाने वाले दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की पोल खोली थी, अब जेएनयू हिंसा में शामिल कई चेहरों को बेनकाब किया है। हिंसा के बाद सोशल मीडिया पर व्हाट्सएप समूह में हुई बातचीत के स्क्रीन शॉट वायरल होने लगे, जिसमें यह दर्शाने की कोशिश की जा रही थी इसके पीछे अभाविप के छात्र हैं। वामपंथियों द्वारा फैलाए जा रहे झूठ को लुटियन गिरोह की बरखा दत्त ने हवा दी। बरखा ने 'यूनाइटेड अगेंस्ट लेफ्ट' नामक व्हाट्सएप समूह की बातचीत का एक स्क्रीन शॉट साझा करते हुए ट्वीट किया, ''जेएनयू के समर्थन में लोग मुख्य द्वार पर आ रहे हैं। वहां कुछ करना है?'' लेकिन बरखा से एक चूक हो गई और यह दांव लुटियन गिरोह पर भारी पड़ गया। उन्होंने जो स्क्रीन शॉट साझा किया, उसमें एक फोन नंबर स्पष्ट दिख रहा था। इस नंबर की पड़ताल करने पर पता चला कि यह नंबर कांग्रेस की 'क्राउड फंडिंग वेबसाइट' से जुड़ा है। इसके बाद ट्विटर पर 'कांग्रेस एक्सपोज्ड' हैशटैग ट्रेंड करने लगा। नतीजा यह हुआ कि जो कांग्रेस जेएनयू हिंसा मामले में भाजपा और इससे जुड़ी विचारधारा पर हमलावर थी, वह बैकफुट पर आ गई। खुद को घिरता देख कांग्रेस ने सफाई में ट्वीट किया कि उसकी सोशल मीडिया टीम ने लोकसभा चुनाव के दौरान क्राउड फंडिंग के लिए कई स्थानीय वेंडर्स को अपने साथ जोड़ा था, पर अब वे कांग्रेस के साथ नहीं हैं। हालांकि कांग्रेस की यह दलील किसी के गले नहीं उतर रही। क्योंकि हिंसा के बाद कांग्रेस, वामपंथी पार्टियां और फिल्म जगत में बैठे अर्बन नक्सली सक्रिय हो गए। प्रियंका गांधी, डी राजा, वृंदा करात, स्वरा भास्कर, अनुराग कश्यप, अपने काम पर लग गए। और इन लोगों ने हिंसा की आड़ में मोदी-शाह को घेरना शुरू कर दिया।
 
बहरहाल, पिछले 2-3 महीने से जेएनयू परिसर में जिस तरह की राजनीति चल रही है, उसकी कडि़यां जोड़ी जाएं तो बहुत कुछ स्पष्ट हो जाएगा। छात्रों के हक-हुकूक की लड़ाई की आड़ में जेएनयू छात्र संघ और वामपंथ के सहानुभूति रखने वाले प्राध्यापक परिसर में क्या गुल खिला रहे हैं, अब किसी के छिपा नहीं है। यकीनन इन लोगों ने अपनी निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए 'शिक्षा के मंदिर' की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई है। *
 
परिसर में वामपंथी हमले
25 मार्च, 2019: वामपंथी-नक्सलियों ने कुलपति के घर में घुस कर हुड़दंग मचाया। डर से कुलपति की पत्नी बेहोश हुईं।
 
28 अक्तूबर, 2019: वामपंथियों ने डीन ऑफ स्टूडेंट्स अशोक कदम को कन्वेंंशन सेंटर में घेरा। तबियत बिगड़ने पर उन्हें एंबुलेंस से भी ले जाने नहीं दिया गया।
 
8 नवंबर, 2019: वामपंथियों ने एडीशनल डीन ऑफ स्टूडेंट्स वंदना मिश्रा को कक्षा में 24 घंटे से अधिक समय तक बंदी बनाकर रखा। उन्हें अपशब्द कहे, उनके साथ हाथापाई और दुर्व्यवहार तक किया गया।
 
22 नवंबर, 2019: प्रो. आनंद रंगनाथन को वामपंथियों ने स्कूल ऑफ मॉलीक्यूलर मेडिसिन की लैब में घुसने नहीं दिया। इसके बाद 17 दिसंबर को उन्हें विभाग में जाने से रोका गया।
 
3 जनवरी, 2020: कुछ नकाबपोश वामपंथी गुंडों ने पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष गीता कुमारी के नेतृत्व में जेएनयू के वाई-फाई तंत्र और रजिस्ट्रेशन के सर्वर को क्षतिग्रस्त किया और सर्वर क्षेत्र को बंद करके वहीं बैठ गए।
 
4 जनवरी, 2020: सुबह 6 बजे जब विवि. के सुरक्षाकर्मियों ने सर्वर क्षेत्र खुलवाने की कोशिश की तो उनके साथ मारपीट के साथ अंजाम भुगतने तक की धमकी दी गई। उस समय आइशी घोष भी मौजूद थीं। विवि. प्रशासन ने दोबारा प्रयास किया तब भी कर्मचारियों व सुरक्षाकर्मियों को पीटा गया।
 
5 जनवरी, 2019: जेएनयूएसयू अध्यक्ष आइशी घोष 200-300 नकाबपोश वामपंथी गुंडों को लेकर पेरियार छात्रावास में घुसी तथा अभाविप कार्यकर्ताओं व आम छात्रों पर लाठी-डंडे से हमला किया।
 
'आइसा और जेएनयूएसयू से है हमलावरों का संबंध'
मैं स्कूल ऑफ फंडामेंटल साइंस में पीएचडी का छात्र हूं। दो माह से विवि. ठप है। इस दौरान छात्रों को कक्षाओं में जाने से रोका गया, फिर जबर्दस्ती परीक्षा के बहिष्कार का ऐलान किया गया। लेकिन बावजूद इसके जब एक तारीख से पंजीकरण शुरू हुआ तो बड़ी संख्या में विद्यार्थी पंजीकरण कराने लगे। इससे वामपंथी बौखला गए। इन्होंने ऑफिस, सेंटर्स को बंद कर दिया। फिर प्रशासन ने ऑनलाइन व्यवस्था शुरू की, लेकिन उसे भी रोकने के लिए वही नकाबपोश गिरोह, आइसा व एसएफआई के सीआईएस सेंटर में उत्पात मचाकर उसे तोड़ते हैं। रातभर वहां तबाही मचाते हैं। उसके बाद जब 4 घंटे के लिए सर्वर चला तो फिर सैकड़ों छात्र पंजीकरण कराने पहुंचे। उसी रात इन लोगों ने 'शांति मार्च' निकाला और 600-700 लोगों के गिरोह में रात को सर्वर तोड़ने पहुंच गए। छात्रों के साथ मैं भी पंजीकरण कराने जा रहा था। इस दौरान नकाबपोशों ने प्रशासनिक भवन के बाहर 20 लोगों पर हमला किया। जैसे-तैसे सुरक्षकर्मियों एवं प्राध्यापकों की मदद से हम विवि. कर्मचारियों के घर में छिपते-छिपाते आधा घंटा बाद पेरियार छात्रावास पहुंचे। लेकिन भीड़ वहां भी आ गई और पथराव शुरू कर दिया। ये लोग पथराव करते हुए छात्रावास में घुसे। वे तीखी आवाज में बोल रहे थे-मनीष जांगिड़ कहां है? वेलेंटीना कहां है? कहते हुए वे अंदर दाखिल हुए। उनको पता था कि किस तल पर और किस कमरे में अभाविप कार्यकर्ता रहते हैं। हम चार लोग जिस कमरे में छिपे हुए थे, उसके दोनों दरवाजे-खिड़कियां तोड़कर हमलावर अंदर घुस आए। हमें लाठी-डंडों से बेरहमी से पीटा। हमले का नेतृत्व जेएनयूएसयू की अध्यक्ष आइशी घोष और अन्य ने किया। आइसा के सतीश चंद्र यादव की नेतृत्व वाली भीड़ द्वारा मुझे पीटा गया।
गुंडों ने लोहे की छड़ से पीटा, तीन घंटे बाद आया होश

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5 जनवरी को सुबह करीब 10 बजे कुछ छात्र पंजीकरण कराने के लिए जा रहे थे, तभी उन पर हमला किया गया। मैंने विरोध किया तो वामपंथी छात्रों ने कहा कि आप पंजीकरण नहीं करा सकते, क्योंकि आपके विभाग जीवीएम से जो प्रस्ताव पारित हुआ है उसके अनुसार आपको इसका विरोध करना है। मैंने कहा कि जब आपको आतंकी अफजल की फांसी पर सवाल उठाने की आजादी है, संसदीय प्रक्रिया के तहत बने नागरिकता (संशोधन) कानून आदि का विरोध करने की आजादी है तो इसी के तहत मैं भी पंजीकरण के बहिष्कार का विरोध कर रहा हूं। इतना कहते ही वे मेरे साथ धक्का-मुक्की करने लगे। उनकी संख्या काफी थी, जिसमें लड़कियां अधिक थीं। अधिकतर लोग आइसा से संबंधित थे। उनके पास लाठी-डंडे थे। जब वे आक्रामक हो गए तो मैं जान बचाने के लिए भागा। उन्होंने प्रशासनिक भवन तक मेरा पीछा किया। वहां मैंने देखा कि कुछ गुंडे अभाविप कार्यकर्ताओं को पीट रहे थे। मैंने किसी तरह इन कार्यकर्ताओं को छुड़ाया और पेरियार छात्रावास के कमरा संख्या 24 में ले गया। लेकिन कुछ देर बाद गुंडों का झुंड यहां भी आ धमका। हमलावर कमरे का दरवाजा और शीशे तोड़कर अंदर आ गए और हमें रॉड से पीटा। इसके बाद क्या हुआ मुझे नहीं मालूम, क्योंकि मैं आधा घंटा तक बेसुध पड़ा रहा। वहां का मेस स्टाफ मुझे इलाज के लिए ले गया। जय प्रकाश ट्रॉमा सेंटर में तीन घंटे बाद मुझे होश आया। तब मैंने देखा कि वृंदा करात सामने बैठी हुई हैं, लेकिन उन्होंने मुझसे हालचाल भी नहीं पूछा। घायल छात्रों से मिलने प्रियंका गांधी भी आईं, लेकिन वे भी केवल वामपंथी छात्र संगठनों के छात्रों से ही हालचाल पूछ रही थीं।
हम पर 3 दिन तक हमले हुए

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कृतिका सिंह बीए तृतीय वर्ष की छात्रा हैं
 
मैं गोदावरी छात्रावास में रहती हूं। हम जब पंजीकरण कराने के लिए गए तो वामपंथी अराजक तत्वों ने हमें पीटा गया। इसके बाद करीब 50 विद्यार्थी स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के पास एकत्र हुए, क्योंकि यह स्थान 100 मीटर के दायरे में आता है। लेकिन उन लोगों ने वहां भी हम पर हमला किया। उनकी संख्या काफी थी। हम लोग लगभग शाम 4 बजे पेरियार छात्रावास में गए तो एक बार फिर हम पर हमला हुआ। छात्रावास कर्मचारियों को भी पीटा गया। हमारे ऊपर दिनभर पत्थर बरसाए गए। मेरा पूरा शरीर चोटिल है। हमें बचाने के लिए जो भी आया, हमलावरों ने उसे भी नहीं छोड़ा। हमने वीडियो बनाने की कोशिश की तो हमारे फोन या तो छीन लिए गए या तोड़ दिए गए। इसके बाद इन्हीं हमलावरों ने अभाविप कार्यकर्ताओं के कमरों पर हमले किए। जहां-जहां 'एबीवीपी' लिखा हुआ था, वहां-वहां उन्होंने तोड़फोड़ की और जो लोग कमरों में छिपे हुए थे उन्हें बाहर निकालकर बुरी तरह से पीटा। ये हमलावर तीन दिन से नकाब पहन कर हमारे साथ मारपीट करते रहे। यह सब जेएनयूएसयू की अध्यक्ष आइशी घोष के इशारे पर हुआ। हमलावर चेहरों की पहचान होनी ही चाहिए।
क्या अंतिम किला ढहते देख बौखलाए हैं वामपंथी ?

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डॉ.अंशु जोशी
 
देश के बहुप्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान जेएनयू का नाम सुर्खियों में है, पर तमाम गलत वजहों से। 5 जनवरी की शाम विवि. परिसर में जो हुआ, उसने सबको हिलाकर रख दिया। बीते लगभग तीन माह से विवि. परिसर में अशांति है। पिछले साल अक्तूबर में यहां विद्यार्थी उपयोगिता शुल्क में वृद्धि की गई, जिसके बाद तमाम छात्र संगठनों ने इसके खिलाफ आंदोलन शुरू किया। हालांकि उन्होंने कहा था कि आंदोलन शांतिपूर्ण होगा। लेकिन इन प्रदर्शनों में हिंसा की अनेक घटनाएं देखी गईं। जैसे- प्रदर्शन की आड़ में विभागों को जबरन बंद कराना, डीन ऑफ स्टूडेंट्स का घेराव और तबियत बिगड़ने पर एम्बुलेंस को रोकना। हद तो तब हो गई, जब अराजक तत्वों द्वारा कुलपति पर जानलेवा हमला किया गया। इसी तरह एक महिला प्राध्यापक को दो दिनों तक विभाग में बंधक बना कर रखा गया।
'सहिष्णुता' का तराना छेड़ने वाले वामपंथियों की हरकतें यहीं नहीं थमीं। उन्होंने चुन-चुनकर छात्रावास के वार्डन के घरों पर हमले किए, क्योंकि वे इनके गलत कामों का विरोध करते थे। इस सबके बावजूद जब परीक्षाएं करा ली गईं और बड़े पैमाने पर विद्यार्थी नए सेमेस्टर के लिए पंजीकरण कराने लगे तो नक्सली ताकतों का हिंसक चेहरा सबके सामने आ गया। यह बिल्कुल सच है कि अराजक तत्वों ने 4 जनवरी को परिसर में इंटरनेट सेवाएं जबरन बंद कराईं, सर्वर को क्षति पहुंचाई। फिर भी आम छात्र न तो डरे और न ही उनके बहकावे में आए। 5 जनवरी पंजीकरण का अंतिम दिन था। इसलिए विद्यार्थियों ने बड़ी संख्या में पंजीकरण कराया। अपना एजेंडा ध्वस्त होते देख वामपंथी बौखला गए। उन्होंने हिंसा की शुरुआत स्कूल ऑफ सोशल साईंसेस से की। यहां कुछ नकाबपोशों ने जमकर तोड़फोड़ की। जिसने भी उन्हें रोका, उससे दुर्व्यवहार किया। इसके बाद वे प्रशासनिक भवन में घुसे और कुलपति के कामों में डाली और तोड़फोड़ की। फिर नकाबपोशों का एक झुंड पथराव करता हुआ पेरियार छात्रावास पहुंचा और वार्डन तथा विद्यार्थियों से मारपीट की। लाठी-डंडे, सरिया और अन्य घातक हथियार से लैस इसी झुंड ने मेस में उत्पात मचाया। कुछ विद्यार्थियों को तो इन्होंने बालकनी से नीचे फेंक दिया। इसके बाद इस झुंड ने ट्रांसिट हाउस, जहां प्राध्यापक रहते हैं, को भी क्षति पहुंचाई और साबरमती छात्रावास में हिंसा का नंगा-नाच करने के बाद फरार हो गए। इसी दौरान कावेरी और कोयना छात्रावासों में भी हिंसा हुई। लिहाजा कुलपति के बुलाने पर पुलिस आई, लेकिन तब तक नकाबपोश विवि. से फरार हो चुके थे। इस हिंसा के बाद कई सवाल अनुत्तरित हैं। हिंसा में शामिल तत्व कौन हैं? भीड़ का नेतृत्व कौन कर रहा था? कहीं इस हिंसा का संबंध राजनीति या आगामी चुनाव से तो नहीं? क्या अपना अंतिम किला ढहता देख इतना बौखला गए कि हिंसा का सहारा ले रहे हैं? विद्यार्थियों में हिंसा का जहर फैलाने वाले कौन हैं? सबसे अंतिम सवाल जेएनयू विद्या का मंदिर है या राजनीति का अखाड़ा? हालांकि जेएनयू के इतिहास को देखते हुए बहुत से सवालों के जवाब पहले से मौजूद हैं। बहरहाल, इस हिंसा की जितनी भी निंदा की जाए, कम है।
(लेखिका जेएनयू में स्कूल ऑफ इंटरनेशल स्ट्डीज में सह प्राध्यापिका हैं।)
 
आइसा-एसएफआई के गुंडों ने मारा

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मनीष जांगिड़, सचिव, अभाविप (जेएनयू इकाई) (बाएं)शेषमणि साहू एम.फिल छात्र (दाएं)
 
जिस समय यह हमला हुआ, उस समय मैं गोदावरी के एक ढाबे पर था। सड़क के दोनों किनारों से भीड़ आ रही थी। देखते ही देखते यह भीड़ मेरे नजदीक आकर मुझपर टूट पड़ी। मैं बचने के लिए ढाबे में छिपने की कोशिश करता रहा लेकिन उन्होंने मुझे वहां से खींचकर बाहर निकाला और बेरहमी से पीटने लगे। उन्होंने सरिये से मेरे सिर पर हमला किया। मेरे सिर में गंभीर चोट आई है। मुझ पर हमला करने वालों में आइसा के विवेक पांडे और काशी मौसमी थे। उनके साथ आइसा और एसएफआई के और लोग भी थे। किसी तरह भागकर मैं पेरियार छात्रावास पहुंचा। हमलावर वहां भी पहुंच गए और मेरे साथ अन्य छात्र-छात्राओं के साथ मारपीट की। उस घटना के बाद से हम इतने डर गए हैं कि अभी तक छात्रावास में नहीं गए हैं। हमें डर है कि कहीं फिर से मुझ पर वे हमला न कर दें। मुझे जेएनयू परिसर अभी भी सुरक्षित नजर नहीं आ रहा है। वामपंथी गुंडे हम लोगों से कहते हैं, ''हम जो कहेंगे, उसे सभी मानो, नहीं तो ये सब झेलना पड़ेगा।''
... और वामपंथी लड़की मुझ पर टूट पड़ी

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वेलेंटीना ब्रह्मा, शोध छात्रा
 
मैं उस दिन दोपहर में परिसर में पंजीकरण कराने के लिए गई थीं। इस दौरान कुछ लोग हाथ में लाठी-डंडे लेकर दौड़ते आते दिखे। कुछ समझ पाती इससे पहले एक लड़की जो मुंह पर लाल शॉल बांधे हुए थी, मुझे मारने लगी। वह चिल्लाते हुए कह रही थी, ''तू तो एबीवीपी से है, तू यहां क्या कर रही है?'' इस आपाधापी में उसके चेहरे से शॉल हट जाती है और मैं उसे पहचान लेती हूं। वह आइसा की कार्यकर्ता डोलन सामंता है। उसके साथ और भी छात्राएं थीं जो मेरे साथ हाथापाई व गाली-गलौज कर रही थीं। इतने में मेरे कुछ साथी एवं विवि. के सुरक्षाकर्मी आ गए और मुझे बचाया। इसके बाद मैं पेरियार आ गई, पर यहां भी वामपंथियों का एक झुंड आ धमका। उस समय उनकी तादाद काफी थी। बचने के लिए हम तीन लोग जिस कमरे में छिपे उसके बाहर अभाविप का बड़ा पोस्टर लगा हुआ था। भीड़ दरवाजा तोड़कर अंदर आई और हम पर ताबड़तोड़ हमले किए। वे नाम लेकर अभाविप के लोगों को निशाना बना रहे थे। सभी के हाथ में डंडा था। इतने में मेरे एक साथी मनीष के पीछे जो गुंडे भाग रहे थे, उनमें सतीश चंद्र यादव भी था जो आइसा से जुड़ा है। हम लोग किसी तरह बचते-बचाते पीछे आए। बाहर निकलने पर देखा कि काफी संख्या में लड़कियां खड़ी थीं। सभी के हाथ में डंडा था और इसमें अधिकतर के चेहरे ढके थे। इसमें वामपंथी छात्रा डोलन भी थी जिसने दोपहर में प्रशासनिक भवन के पास मेरे साथ मारपीट की थी। मुझे देखते ही इस झुंड ने फिर से हमला किया और डंडों से पीटना शुरू कर दिया। मेरे साथी छात्रा शांभवी को भी इन गुंडों ने बहुत मारा। इस दौरान मेरे हाथ में काफी चोट लगी। मेरी उंगली टूट गई। बड़ी मुश्किल से वहां से हम जान बचाकर बाहर निकले।