जेएनयू हिंसा के बाद मीडिया ने फैलाई फर्जी खबरें
   दिनांक 13-जनवरी-2020
 पांच साल में दिल्ली सरकार के विज्ञापनों से मालामाल हो चुके कई पत्रकार और संस्थान अब 'अहसान' चुकाने में जुट गए हैं 

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दिल्ली में चुनाव की घोषणा होने के पहले से ही तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया का एक वर्ग आम आदमी पार्टी की प्रचार शाखा में बदल चुका है। बीते पांच साल में दिल्ली सरकार के विज्ञापनों से मालामाल हो चुके कई पत्रकार और संस्थान अब 'अहसान' चुकाने में जुट गए हैं। शुरुआत एनडीटीवी ने की, जिसने अरविंद केजरीवाल का साक्षात्कार प्रसारित किया। इसमें 'आम जनता' के सवाल भी लिए गए। लेकिन जिन्हें आम जनता बताया गया, उनमें से ज्यादातर पार्टी के कार्यकर्ता थे। यह सीधे तौर पर प्रायोजित कार्यक्रम था।
 
एनडीटीवी को वैसे भी ऐसे साक्षात्कार करने का अनुभव है, उसने लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी का भी ऐसा ही प्रायोजित साक्षात्कार किया था। केजरीवाल ने इस साक्षात्कार में नागरिकता कानून से लेकर अपनी सरकार के कामकाज तक पर खुलकर झूठ बोला, ताकि लोगों में भ्रम फैले। लेकिन चैनल की पत्रकार उनकी हां में हां मिलाती रहीं। आम आदमी पार्टी के कामकाज पर लगभग ऐसी ही 'प्रचारात्मक रिपोर्टिंग' आजतक चैनल और नवभारत टाइम्स अखबार में देखने को मिल रही है।
 
उधर, जेएनयू में हिंसा के फौरन बाद मीडिया का पूरा फेक न्यूज तंत्र सक्रिय हो गया। विवादित पत्रकार बरखा दत्त और झूठी खबरें उड़ाने के लिए कुख्यात पोर्टल न्यूजलाउंड्री इनमें सबसे आगे रहे। दोनों ने खबर चलाई कि अस्पताल में भर्ती एबीवीपी के छात्रों को लगी चोटें बहुत मामूली हैं। लेकिन स्वराज्य मैगजीन ने कुछ मिनटों के अंदर ही इस झूठ की पोल खोल दी।
 
पता चला कि जिस कथित डॉक्टर के हवाले से यह अफवाह फैलाई जा रही थी, उसका एम्स से कोई लेना-देना ही नहीं था, बल्कि वह कांग्रेस पार्टी का पदाधिकारी था। यह झूठ भले ही खुल गया लेकिन मुख्यधारा मीडिया ने एकतरफा और पक्षपाती रिपोर्टिंग जारी रखी। वामपंथी संगठनों के छात्रों की करतूत के कैमरों में कैद होने के बावजूद उन्हें पीडि़त दिखाया गया और घायल विद्यार्थी परिषद के छात्रों को खलनायक बनाने की कोशिश की गई।
 
छात्रसंघ की अध्यक्ष, जो कथित नकाबपोशों की अगुआई करते हुए कैमरों में दिखी है, उसे क्रांतिकारी के तौर पर दिखाया गया। विद्यार्थी परिषद को बदनाम करने के लिए व्हाट्सएप ग्रुप पर बातचीत के नकली स्क्रीनशॉट तैयार किए गए और सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें फैलाने की जिम्मेदारी बरखा दत्त ने निभाई। लेकिन सोशल मीडिया पर ही उनके झूठ की धज्जियां उड़ा दी गईं। लोगों ने ढूंढ निकाला कि जिन व्हाट्सएप नंबरों की बात की जा रही थी वे कांग्रेस पार्टी के थे।
 
 
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी भारत के खिलाफ नकारात्मक छवि बनाने का काम चल रहा है। विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले ज्यादातर दुष्प्रचार से भरे लेख भारतीय पत्रकारों के ही लिखे हुए होते हैं। ऐसे सभी पत्रकार जाने-पहचाने लोग हैं जो विदेशों में अपने ही देश और सरकार की छवि बिगाड़ने के लिए हर झूठ बोलने को तैयार हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स ने छापा कि जेएनयू में हिंसा के दौरान जयश्रीराम के नारे लगाए गए। सवाल है कि इस दुष्प्रचार के पीछे मंशा क्या है? समय आ चुका है कि ऐसे तथाकथित पत्रकारों को उनके झूठों के लिए जवाबदेह ठहराया जाए। सरकार की आलोचना तक बात ठीक है, लेकिन देश की छवि मलिन करने और हिंदू धर्म को लेकर ओछी टिप्पणियों की अनुमति नहीं दी जा सकती।
 
नागरिकता कानून को लेकर मीडिया का एक वर्ग भ्रम फैलाने की पूरी कोशिश में है। कुछ दिन पहले आईआईटी कानपुर के छात्रों और अध्यापकों के एक छोटे से समूह ने विरोध प्रदर्शन किया। यह कार्यक्रम बिना अनुमति के अवैध रूप से हुआ था। साथ ही इसमें फैज अहमद फैज की विवादित नज्म गाई गई। आईआईटी के ही एक प्रोफेसर ने कार्यक्रम के विरोध में संस्थान के प्रशासन से शिकायत की।
 
जिस पर मीडिया ने झूठ फैला दिया कि आईआईटी जांच करेगा कि क्या फैज की नज्म हिंदू विरोधी है। संस्थान के प्रशासन ने जो बयान जारी किया था उसमें ऐसी कोई बात नहीं थी। 'द प्रिंट' नाम की एक वेबसाइट ने फेक न्यूज पोस्ट की कि शिकायत करने वाले प्रोफेसर वाशी शर्मा दलितों की स्थिति में सुधार के प्रयासों के विरोधी हैं। रिपोर्टर को अंदाजा नहीं था कि प्रोफेसर ने उससे अपनी बातचीत को रिकॉर्ड कर लिया था।
 
उन्होंने पूरी बातचीत को सोशल मीडिया पर जारी कर दिया, जिसमें उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कही थी। 'द प्रिंट' अक्सर ऐसे झूठ फैलाने के लिए बदनाम रहा है। खास बात यह है कि इसके संपादक शेखर गुप्ता हैं, जो एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष हैं, जिन पर पत्रकारिता का स्तर बनाए रखने की जि़म्मेदारी है लेकिन वही शेखर गुप्ता झूठी खबरें उड़ाने के लिए कुख्यात रहे हैं।