शाहीन बाग: ये प्रदर्शन नहीं तानाशाही है
   दिनांक 14-जनवरी-2020
सड़क किसी की बपौती नहीं है. लगभग एक महीने से लोग परेशान हैं, करोड़ों रुपए का रोजाना नुकसान हो रहा है, लोग समय से अपने ऑफिस नहीं पहुंच रहे हैं, बीमार लोग अस्पताल नहीं जा पा रहे हैं. चंद लोग शाहीन बाग इलाके में सड़क पर जाम लगाए हुए हैं.

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शाहीन बाग में गुजरते हुए सबसे अधिक शोर आजादी का सुनने को मिल रहा है। लगता है कि यह आवाज लगाने वाले ही नहीं जानते कि आजादी का मतलब क्या है? वास्तव में आजादी है सबको अपनी बात रखने का हक देना। वह आपसे सहमत हो या असहमत। आजादी मांगने वालों को पहले दूसरों की आजादी का सम्मान सीखना चाहिए। आजादी पाने का हक उसे है, जो दूसरों की आजादी न छीने। यदि शाहीन बाग में जी न्यूज या फिर रिपब्लिक के पत्रकारों के साथ धक्का—मुक्की होती है, इसका साफ मतलब है कि सीएए—एनआरसी विरोधी आंदोलन तानाशाही को बढ़ावा देने वाला आंदोलन है।
जहां लोग अपनी बात कहना तो चाहते हैं लेकिन एक भी ऐसे स्वर को सुनने को तैयार नहीं है, जो उनसे असहमत हैं। शाहीन बाग में जमा लोग आंदोलनकारी की जगह एक खास समुदाय की भीड़ में तब्दील हो गए हैं। जो मुसलमानों की भीड़ है। जो किसी भी असहमति की आवाज को सुनने को तैयार नहीं हैं। आप उनसे सहमत हैं, उसके बाद ही आप वहां मौजूद रह सकते हैं। यह तानाशाही प्रवृत्ति है। जहां भीड़तंत्र के न्याय का सिद्धान्त चलता है। इसलिए ऐसी भीड़ में असहमति के स्वर के लिए हाथों में सिर्फ पत्थर है।
पत्रकार समीर अब्बास ने शाहीन बाग आंदोलन के संबंध में लिखा — दिल्ली के शाहीन बाग में सड़क जाम कर सीएए—एनआरसी के खिलाफ चल रहे धरने को ख़त्म कराने के कोई सीधे निर्देश तो आज हाईकोर्ट ने नहीं दिए, पर अदालत ने ये ज़रूर कहा है कि दिल्ली पुलिस इस मामले में कानून के मुताबिक और जनहित को देखते हुए अपनी ज़िम्मेदारी निभाए। सो अब गेंद पुलिस के पाले में है।''
क्या सारी जिम्मेवारी कोर्ट, सरकार और दिल्ली पुलिस की ही है। इसमें नागरिक की जिम्मेवारी का सवाल कौन पूछेगा? कौन पूछेगा कि धरना पर बैठकर एक महीने से जिन लोगों ने दिल्ली की एक मुख्य सड़क को बंद कर रखा है। उससे हजारों लोग प्रभावित हो रहे हैं। जिस रास्ते को वे पन्द्रह मिनट में पार कर लेते थे, धरना की वजह से उस रास्ते को पार करने में उन्हें डेढ़ घंटे का समय लग जाता है। कौन पूछेगा कि इस धरने की वजह से जिन बच्चों का स्कूल छूट रहा है, जिन बुजुर्गों का जीना मुहाल हो रहा है, जिन लोगों को आफिस पहुंचने में देरी हो रही है। बीमार समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे। कब तक इन सब लोगों को यह सब झेलना होगा? धरने में बैठे लोग बताए कि ऐसे हजारों लोगों को कब तक अपनी सहिष्णुता का परिचय देना होगा?
जबकि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) व एनआरसी के विरोध में दिल्ली-नोएडा मार्ग पर शाहीन बाग के सामने धरने पर बैठे लोगों को अब एक माह होने को जा रहा है। जिसके कारण दिल्ली-नोएडा-फरीदाबाद आने-जाने वाले लाखों लोगों को कई किलोमीटर का चक्कर काटकर आना-जाना पड़ता है। इस मार्ग के बंद होने के कारण रिंग रोड, मथुरा रोड व डीएनडी पर यातायात का अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। जाकर देखा जा सकता है कि किस तरह इन मार्गो पर शाहीन बाग धरने की वजह से लंबा जाम लगा रहता है। इससे दो-चार किलोमीटर का मार्ग तय करने में भी लोगों को अब कई घंटे लग जाते हैं।
जाम और धरने की वजह से आस—पास के बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। बच्चों की स्कूल बसें उनके घर तक नहीं पहुंच पा रही हैं। सबसे ज्यादा परेशानी मदनपुर खादर गांव और सरिता विहार के लोगों को हो रही है। लेकिन इस परेशानी की परवाह शाहीन बाग—जामिया नगर के लोग नहीं कर रहे। उन्हें इस बात की कोई चिन्ता नहीं है कि उनके पड़ोस में रहने वाले लाखों लोगों की जिन्दगी उनके धरने की वजह से मुहाल हुई पड़ी है।
स्कूल तो वे हजारों बच्चे नहीं जा पा रहे जो धरने में शामिल नहीं हैं। जिन बच्चों को जबरन धरने का हिस्सा बनाया जा रहा है, उनका हाल भी अच्छा नहीं है। धरने में शामिल किए गए बच्चों से धरने के नाम पर जिस तरह हाथ में तख्ती देकर अल्लाह—आजादी से जुड़े नारे लगवाए जा रहे हैं, उसे सही नहीं ठहराया जा सकता। धरने में शामिल लोगों को बताना चाहिए कि इससे वे क्या साबित करना चाहते हैं? जिन बच्चों को आज स्कूल जाना चाहिए, उन्हें धरना में बिठाया जा रहा है। जिन बच्चों को एनआरसी और सीएए की जानकारी नहीं, उनसे अनर्गल नारे लगवाए जा रहे हैं। आंदोलन के नाम पर इस तरह छोटे—छोटे बच्चे शाहीन बाग में इस्तेमाल हो रहे हैं।
रास्ता बंद होने के कारण सारा यातायात मदनपुर खादर गांव की संकरी गलियों से होकर गुजर रहा है। गलियों की हालत बहुत खराब है। डायवर्जन की वजह से गलियों से होकर गुजर रहे भारी यातायात के लिए ये गलियां बिल्कुल तैयार नहीं हैं। इतना नहीं हुआ, बढ़े यातायात ने गांव के बच्चों को घर में कैद करके रख दिया है। वे तो घर से निकल तक नहीं पा रहे हैं। अब बच्चे जाम की वजह से स्कूल बसों के ना आने के कारण स्कूल नहीं जा पा रहे हैं और न ही जाम के कारण ही कुड़ा ले जाने के लिए गलियों में निगम की गाड़ियां भी नहीं पहुंच पा रही हैं, और न ही यहां सीवर की सफाई हो पा रही है। ऐसी हालत में बीते एक महीने से यहां रहने वाले हजारों परिवारों की नर्क हो रही जिन्दगी का अनुमान लगाना किसी के लिए मुश्किल नहीं होगा।
शाहीन बाग में चल रहे धरने को हटाने की मांग को लेकर स्थानीय लोगों ने 12 जनवरी को मथुरा रोड पर पदयात्रा निकाली। यह पदयात्र सरिता विहार स्थित दिल्ली जलबोर्ड पार्क से शुरू हुई। इस यात्रा में खिजराबाद, तैमूर नगर, सराय जुलैना, भरत नगर, जसोला, मदनपुर खादर, आली गांव, आली विस्तार, बदरपुर, जैतपुर, मीठापुर, सरिता विहार, मदनपुर खादर जेजे कॉलोनी, गौतमपुरी, मोलड़बंद, मोहन एस्टेट, तुगलकाबाद, तेहखंड गांव, हरि नगर, ओम विहार आदि गांवों व कॉलोनियों से लोग शामिल हुए। नागरिकता कानून और एनआरसी के विरोध में पिछले 25 दिनों से नोएडा को दिल्ली से जोड़ने वाली कांलिदी कुंज रोड को ब्लाक के विरोध में यह यात्रा निकाली गई थी। जिस यात्रा को पुलिस ने रोका तो दोनों पक्षों में झड़प हुई। यह यात्रा रास्ता खुलवाने के लिए निकाली गई थी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले 25 दिनों से रोड़ बंद होने की वजह से स्थानीय लोगों को काफी दिक्कत हो रही है। पुलिस ने रास्ते पर बैरिकेट्स लगा दिए हैं। ऐसे में लोगों को दूसरे रास्ते से होकर नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गुरुग्राम जाना पड़ रहा है। इसमें काफी समय भी लग रहा है।
लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि इस सड़क को नहीं खोला गया तो वे मथुरा रोड को ब्लाक कर देंगे। हालांकि स्थानीय लोगों ने कहा आज का प्रदर्शन रास्ते को खोलवाने के लिए है। कांलिदी कुंज रोड के बंद होने की वजह से वे देर से ऑफिस पहुंच रहे हैं। बच्चों का स्कूल छूट रहा है। कारोबार भी प्रभावित है।
सीएए के विरोध में रोज-रोज सड़क जाम करने से स्थानीय लोग परेशान हैं, सबसे ज्यादा दिक्कत बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को हो रही है। उन्हें थोड़ी दूर जाने के लिए काफी लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा है। इससे उनका समय, पैसा दोनों का नुकसान हो रहा है।
यह बात सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिल रही है कि कुछ लोगों की वजह से बहुत लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। प्रदर्शन करने वाले लोगों को आम लोगों की चिंता नहीं है, सिर्फ अपनी राजनीति चमकानी है। इसीलिए वे लोगों को भड़काकर ऐसा करा रहे हैं। जबकि अच्छा हो कि धरने पर बैठे लोग खुद आगे बढ़कर इस भीड़ को लेकर रामलीला मैदान की तरफ रूख करें या फिर जंतर मंतर की राह देखें।
बहरहाल दिल्ली पुलिस लाखों लोगों की परेशानी देखकर कार्रवाई को मजबूर है। आने वाले समय में शाहीन बाग के लोगों को दिल्ली पुलिस के साथ मिलकर कोई बीच का रास्ता निकालना चाहिए। इस वक्त मुसलमानों के वोट के प्यासे एक—दो राजनीतिक दलों को छोड़कर कोई नहीं चाहेगा कि किसी भी तरह की टकराव की स्थिति उत्पन्न हो। गौर तलब है कि दिल्ली में 08 फरवरी को विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है।