भारतीय जनमानस एक मूवी टिकट की कीमत-ताकत जान गया है !
   दिनांक 16-जनवरी-2020
भारतीय मन हाल ही में रिलीज हुई फिल्म तानाजी के साथ है. 5 दिन में 100 करोड़ के क्लब में शामिल हो चुकी है। और छपाक महज 5 दिन में 23.92 करोड़ का आंकड़ा छू पाई है

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स्वभाव से हिन्दू सहिष्णु होता है. हिंसा जैसी कोई भी गतिविधि में वह न सरीख होना पसन्द करता है और न ही कभी इसे उकसावा देते हुए पहल करता है. "जियो और जीने दो" का सिद्धांत मानते हुए इसे कोई अगर जीता है तो वह भारतीय समाज है, हिन्दू समाज ही है.
बावजूद इसके नागरिकता संशोधन कानून बनने के बाद कट्टरपंथियों ने देश को आग में झोंका, दंगा-फसाद किया. सार्वजनिक संपत्ति को तहस-नहस किया. भारतीय समाज यह सब देख रहा था. उसने शांति से इसका प्रतिकार भी रैली, जुलूस के माध्यम से किया और आज भी कर रहा है. जबकि हकीकत है कि अगर वह चाहे तो एक दिन भी इनका उत्पात न चलने दे. मनमर्जी तो बिल्कुल भी नहीं. इस बहुसंख्यक समाज को इतनी सामर्थ्य भी है और शक्ति भी.
बहरहाल, 2014 के बाद इसी समाज में एक बड़ा बदलाव आया है. पहले अनुराग कश्यप टाइप, शाहरुख,आमिर, दिया मिर्जा, करीना, महेश भट्ट, स्वरा, सोनाक्षी, सोनम कपूर,जावेद अख्तर, एजाज खान और प्रकाश राज जैसे फ़िल्म जगत के कई नाम देश, धर्म, समाज, महापुरुषों या देश की अस्मिता पर कुछ भी ऊल—जुलूल बोल जाते थे. 
अक्सर चौक-चौराहों पर कुछ लोगों को आज से पहले यह कहते भी सुना जा सकता था," अरे यार हमारे मूवी न देखने भर से उसकी फ़िल्म फ्लॉप थोड़ी हो जाएगी. यहां लोग देखेंगे ही.और वह ऐसे ही हिंदुओं को, भारतीय अस्मिता को, भारतीय मन को रौंदता रहेगा."
लेकिन अब ऐसा नहीं रहा. समाज बदला है. वह देश की अस्मिता और भारतीयता के खिलाफ बोलने, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन देने वाले का अपनी भाषा में प्रतिकार करता है.लेकिन हिंसा से नहीं बल्कि युक्ति से.वह एक मूवी टिकट की कीमत-जान गया है.
अब वह उनके हाथ मजबूत नहीं करता जो "टुकड़े-टुकड़े" गैंग के साथ खड़े हैं बल्कि उनकी राहों को काटता है जो इस गैंग के हिस्से हैं. भारतीय समाज ने 2014 के बाद यह युक्ति बड़ी ही अच्छी तरह से सीख ली है. इस आर्थिक बहिष्कार की युक्ति ने कुछ वर्षों में कइयों को राह दिखाई तो कईयों का दिमाग भी ठिकाने लगाया. "देश में डर लगने" वालों के एजेंडे को ध्वस्त किया और बताया कि अब देश को अपशब्द कहने वाले न पसन्द हैं और न ही देश—समाज के खिलाफ विषवमन करने वाले। ऐसे एजेंडधारियों को भारतीय समाज ने उसी की भाषा में कहा,"हम देखेंगे, हम भी देखेंगे."
इसी का परिणाम है कि भारतीय मन हाल ही में रिलीज हुई फिल्म तानाजी के साथ है. 5 दिन में 100 करोड़ के क्लब में शामिल हो चुकी है। और छपाक महज 5 दिन में 23.92 करोड़ का आंकड़ा छू पाई है।
बहरहाल, इस सबके लिए दीपिका पादुकोण जिम्मेदार हैं। अगर वह जेएनयू न गई होतीं तो शायद एक अच्छे विषय पर बनी फिल्म का प्रदर्शन कुछ और होता। वह समाज में एक सार्थक बहस को खड़ा करने में कामयाब होतीं। लेकिन वामपंथी गैंग के चक्कर में फंसकर न केवल दीपिका ने खुद का नुकसान किया बल्कि एसिड अटैक से पीड़ित अनेक लड़कियों की आवाज को कुंद भी किया है। अगर वह गई थीं तो उन्हें दोनों पक्षों से मिलकर संवेदना जाहिर करनी चाहिए थी। इससे न केवल दोनों पक्षों का उनको साथ मिलता बल्कि एक मंझे हुए कलाकार की छवि उनमें झलकती। लेकिन उन्होंने टुकड़े—टुकड़े गैंग के अगुवाकारों के साथ खड़े होकर कहीं न कहीं अपनी छवि को नुकसान पहुंचाया है।
छपाक का फ्लॉप होना फिल्म जगत के लोगों के लिए भारतीय जनमानस का संदेश भी है कि वह चीजों को भूलता नहीं बल्कि तुरत—फुरत हिसाब करता है। उधारी उसे पसंद नहीं है। छपाक का बहिष्कार कर उसने बखूवी यह संदेश दे दिया है कि अब सब चलता है, नहीं चलने वाला।