जब रातों रात हिंदुओं को छोड़ना पड़ा था कश्मीर
   दिनांक 17-जनवरी-2020
ले कर्नल (से.नि.) आदित्य प्रताप सिंह
19 जनवरी 1990 का दिन भारतीय लोकतान्त्रिक इतिहास का वह स्याह दिन है जब हम स्वतंत्र भारत में भी हिंदुओं की रक्षा करने में असफल रहे थे। अगस्त 1947 के बाद हिंदुओं का सबसे बड़ा विस्थापन था। कश्मीर घाटी को एक इस्लामिक राज्य बन जाने दिया। रातों रात हजारों हिन्दू खाली हाथ और नंगे पांव कश्मीर छोडकर भागने को विवश हुये। यह प्रक्रिया तब तक चलती रही जब तक कि पूरी कश्मीर घाटी हिन्दू विहीन नहीं हो गयी।

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19 जनवरी 1990 से लेकर अप्रैल 1990 तक कश्मीर से लगभग 3.5 लाख हिंदुओं ने अपने जीवन रक्षा के लिए पलायन किया। 1989 से लेकर आने वाले अगले एक दशक में लगभग 670 हिंदुओं की हत्या की गयी, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, उनके पूजा स्थलों और घरों को तोड़ा और जलाया गया। कश्मीर घाटी में ऐसी परिस्थितियां पैदा की गयी कि हिन्दू वहाँ से शीघ्र पलायन करे।
कश्मीर से हिन्दू नरसंहार का दौर मंगोल आक्रमणकारी दुलाचा के 1320 के आक्रमण से निरंतर चल रहा है। 1339 में शाहमीर द्वारा इस्लामिक राज्य की स्थापना के साथ ही हिन्दू नरसंहार भी राजकीय संरक्षण में सुनियोजित ढंग से चलने लग गया। हिन्दू नरसंहार धर्मांतरण, हत्या, बलात्कार, दासत्त्व, जज़िया कर, धर्मस्थल विखंडन और धर्मग्रंथ अग्निसात के द्वारा सम्पन्न किया जाता रहा। 1339 से 1413 तक पूरे कश्मीर का शाहमीर एवं उसके वंशजों ने इस्लाम में धर्मांतरण कर दिया। इतिहासकर जोनाराजा के अनुसार सिकंदर के शासन की 1413 में समाप्ति तक कश्मीर में मात्र 12 हिन्दू परिवार शेष रहे थे। आज 2020 में इस जिहादी प्रक्रिया के 700 वर्ष बीत चुके है। कश्मीर 30 वर्षों से सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से हिन्दू विहीन है। कश्मीरी हिन्दू नरसंहार दुनिया की इकलौती ऐसी हिंसक घटना है जिसका कोई भी राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नामलेवा नहीं है। कश्मीरी खिलाफ़त में हिंदुओं की वापसी का जिहादियों एवं इस्लामिक अलगाववादियों द्वारा पूर्ण निषेध है। 2016 में हिन्दू पुनर्वास का जमकर हिंसक विरोध हुआ। इस हिन्दू पुनर्वास की तुलना कश्मीर में इज़राइल से की गयी। महीनों तक कश्मीर जलता रहा। इस्लामिक आतंकियों द्वारा कश्मीर स्थित हिन्दू परिगमन शिविरों को हिंसा का निशाना बनाया गया। इन शिविरों की दीवारों पर धमकी भरे पर्चे चस्पा किए गए।
कश्मीरी हिन्दू विस्थापन 1339 से लेकर 2019 तक अनेक बार हुआ। राजनीतिक इस्लाम की हिंसा ने कभी भी हिंदुओं को कश्मीर में अमन और शांति से रहने नहीं दिया। इस कालखंड का सबसे स्वर्णिम समय हिंदुओं के लिए मात्र 1819 से लेकर अक्टूबर 1947 तक था, जब कश्मीर में सिख और डोगरा शासन था। शेख़ अब्दुल्लाह के साथ ही कश्मीर में परोक्ष रूप से इस्लामिक शासन की नीव डाली जा चुकी थी। चार दशकों तक लोकतान्त्रिक व्यवस्था और कश्मीरी खिलाफ़त की लुका-छुपी चलती रही। हिन्दू इस्लामिक हिंसा का शिकार होता रहा। हिन्दू शासन व्यवस्था से धीरे-2 हासिए पर जाता रहा। कश्मीरी खिलाफ़त का पाकिस्तान प्रेम राष्ट्र की सीमा रेखाओं का उल्लंघन कर रहा था। 1980 के दशक के अफ़गान युद्ध ने वैश्विक जिहाद को जन्म दिया और इसी के साथ कश्मीर में भी गजवा-ए-हिन्द के नए जिहादी पैदा हुये। पाकिस्तान अमेरिकी और पेट्रो डॉलर की आमद से उत्साहित था और भारत में इसी से उसने पंजाब और कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देना आरंभ किया। कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी की सहायता से ‘अभियान टुपाक’ ने हिंदुओं की चयनित हत्यायों का सिलसिला शुरू कर दिया था। 1989 आते-2 हिन्दू विरोधी हिंसा अपने चरम पर पहुंच चुकी थी। 14 सितंबर 1989 को कश्मीरी हिंदुओं के सबसे बड़े नेता और सामाजिक कार्यकर्ता टीका लाल टापलू की श्रीनगर में दिन दहाड़े हत्या कर दी जाती है और उनको मारने वाले जिहादी खुलेआम हथियारों को एक विजेता की तरह लहराते हुये निकल जाते हैं। सभी प्रत्यक्षदर्शी उन आतंकियों को पहचानने से इन्कार कर देते हैं। इस हत्या ने कश्मीर में जैसे हिंदुओं की चयनित हत्यायों की बाढ़ सी ला दी। अब हिन्दू कश्मीर में राजनीतिक रूप से अनाथ था। उनकी निर्मम हत्या का असल उद्देश्य भी यही था। आतंक अपने सभी रूपों में अवतरित हो चुका था। हत्या, बलात्कार, अग्निकांड और धर्म स्थल विखंडन इस आतंक के मुख्य हथियार थे। सरकारी नर्स सरला भट को अगवा कर कई दिनों तक सामूहिक बलात्कार के बाद बहुत ही बेरहमी से कत्ल कर दिया गया। इन नृशंस हत्याओं का उद्देश्य कश्मीरी हिंदुओं के दिलों में धीरे-2 डर पैदा कर उनका पलायन था। यह हत्याएं राजनीतिक इस्लाम के अन्य धर्मों के प्रति घृणा का खुला प्रदर्शन थी।

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                             कश्मीर के शोपियां में खाली पड़े कश्मीरी हिंदुओं के घर  
कश्मीर का इस्लामीकरण 1980 के काल में सर्वाधिक हुआ जिसमे पाकिस्तान के साथ शेख़ अब्दुल्लाह और फिर फारुख अब्दुल्लाह की सांठ-गांठ रही। शेख़ अब्दुल्लाह ने अपनी मृत्यु से पहले हजारों गाँव के नाम कश्मीरी से अरबी या फारसी में किए। वह और उनके बाद के सभी मुस्लिम राजनेता हिंदुओं को भारत का मुखबिर कहते थे। यही इस्लामिक अवधारणाएं धीरे-2 घृणा का रूप लेती गयी। ईरान की इस्लामिक क्रांति, अफ़गान जिहाद और पंजाब के आतंकवाद ने कश्मीरी खिलाफ़त की स्थापना के लिए कश्मीर में भी इस्लामिक आतंकवाद को फलने-फूलने का सुअवसर दिया। फरवरी 1986 के दंगों में दक्षिण कश्मीर में अनेक हिन्दू घरों और मंदिरों को जलाया गया। यह दंगे काँग्रेस के बड़े नेता मुफ़्ती मोहम्मद सईद के इशारों पर ही हुये थे। 1988 से जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने स्वतंत्र कश्मीर के लिए आतंकी गतिविधियों का आरंभ कर दिया था। राज्य में राजनीतिक उठा पटक चल रही थी। अल्पकालिक मुख्यमंत्रियों से लेकर राज्यपाल शासन सब चल रहा था। इसी राजनीतिक अस्थिरता का लाभ पाकिस्तान लेने लगा था। टीका लाल टापलू की हत्या के बाद कश्मीर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नीलकंठ गंजू जिन्होने मक़बूल भट को फांसी दी थी को गोलियों से भून दिया गया। दिसंबर में जनता दल की सरकार के पहले भारत मुस्लिम गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी को सरकार बनने के पहले हफ्ते में ही एक षडयंत्र के तहत अपहृत कर लिया गया। बेटी के बदले में आतंकियों की रिहाई ने इस्लामिक आतंकियों के हौसलों को और भी बढ़ा दिया। अपहरणों की बाढ़ आ गयी। कश्मीर बिलकुल भी सुरक्षित नहीं रह गया था। ऐसा कोई दिन नहीं था जब बाज़ारों में बम धमाके या गोलियां न चल रही हों। हिंदुओं को कश्मीर छोडने की सूचनाये कश्मीर के अनेक स्थानीय समाचर पत्रों में प्रकाशित की जा रही थी। पलायन का दौर चालू हों चुका था। साधन सम्पन्न लोग पलायन कर रहे थे। अधिकांश कश्मीरी मुसलमानों ने अपनी घड़ियाँ पाकिस्तान के समय के साथ मिला ली थी। सार्वजनिक अवकाश शुक्रवार को लिया जाने लगा था। कश्मीर में शरिया के नियमों के पालन के लिए आतंकी महिलाओं और नवयुवकों पर निरंतर दबाव बना रहे थे। सिनेमा हाल और शराब की दुकाने बंद कर दिये गए थे। कश्मीर को इस्लामिक राज्य बनाने के लिए वहाँ से काफिरों को समाप्त करना भी आवश्यक था इसीलिए हिन्दू आतंकियों के निशाने पर थे। उनके घर और अनेक व्यावसायिक उपक्रमों को जलाया जा रहा था।
इस डर और अनिश्चितता के दौर में 19 जनवरी की भयावह सर्द रात को पूरे कश्मीर की विद्युत आपूर्ति को बंद कर मस्जिदों और सड़कों से नार-ए-तकबीर और निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा लाने के कर्णभेदी नारों ने कश्मीर को एक युद्ध क्षेत्र में बदल दिया था। हिंदुओं को कश्मीर छोडने के फरमान मस्जिदों से पढ़े जाने लगे थे। उनसे कहा जा रहा था वह कश्मीर तत्काल बिना किसी सामान और अपनी महिलाओं के छोड़ दें। जिस प्रकार से इस्लामिक भीड़ के द्वारा हिंदुओं को डराया जा रहा था वह अकथ और अकल्पनीय है। उनके घरों पर सघन पथराव और लगातार गालियां दी जा रही थीं। हिंदुओं को लग रहा था जैसे उस रात की सुबह नहीं है। वह रात से अवसर मिलते ही किराए और निजी वाहनों से कश्मीर से भागने लग गए थे। उन्होंने भविष्य के लिए भी अभी कुछ नहीं सोचा था, परंतु सबसे पहले वह उस नर्क से भागकर अपनी और अपने परिवार की जान बचाना चाहते थे। वह यह भी सोच रहे थे कि जल्द ही केंद्र सरकार हालात पर नियंत्रण कर लेगी और वह वापस अपने घरों को आ सकेंगे। 19 जनवरी की सुबह पूरा जम्मू-श्रीनगर मार्ग गाड़ियों से पटा पड़ा था। हिन्दू कश्मीरी खिलाफ़त से अपनी जान बचाकर भाग रहा था। उसने यह कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि वह शायद कभी भी अपनी जन्मभूमि पर दोबारा आकर न बस सके।
अप्रैल 1990 आते-2 लगभग 3.5 लाख हिन्दू कश्मीर से आंतरिक रूप से विस्थापित होकर जम्मू से लेकर दिल्ली और भारत के अन्य भागों में शरण ले चुका था। विस्थापन और पलायन का दर्द तो अब शुरू हुआ था। शीत ऋतु के अभ्यस्त कश्मीरियों के लिए भारत के मैदानों की गर्मी जानलेवा थी और उन फटे पुराने तंबुओं में तो वह और भी कष्ट बढ़ाने वाली थी। विस्थापन की मानसिक पीड़ा के साथ-2 राज्य और केंद्र सरकारों की उनके पुनर्वास के प्रति उदासीनता और भी हृदय विदारक थी। जम्मू, नगरोटा और उधमपुर के सभी विस्थापित शिविर सामान्य सुविधाओं से भी भी परिपूर्ण नहीं थे। पानी, बिजली और शौच आदि जैसी बुनियादी सुविधाओं की भी नितांत कमी थी। बीमारियों का कोई समुचित उपचार नहीं था। मनोरोगों के साथ-2 अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ प्रतिदिन नए रूप में जन्म ले रही थी। पौष्टिक आहार की कमी से बच्चों और माँ में अनेक रोग घर कर रहे थे। महिलाएं, वृद्ध और बच्चे इस त्रासदी से सबसे अधिक प्रभावित थे। मौसम और भूख की मार यह लोग सर्वाधिक झेल रहे थे। कश्मीरी हिंदुओं का परोक्ष नरसंहार सीधे गोलीबारी के नरसंहार से कहीं अधिक होने वाला था। नरसंहार मात्र व्यक्ति विशेष की मृत्यु से नहीं होता अपितु वह तो उसके प्राकृतिक निवास स्थान के छिन जाने से लेकर उसकी कला, संस्कृति और भाषा के विनाश तक से होता है। इन मापदंडो को देखते हुये सम्पूर्ण कश्मीरी हिन्दू जनसंख्या का सुनियोजित और सुविचारित रूप से नरसंहार हुआ है। आज कश्मीर घाटी में एक भी हिन्दू परिवार जीवंत सामाजिक इकाई के रूप में मौजूद नहीं है। यह नरसंहार नहीं तो क्या है? यदि कश्मीर के मंदिरों को तोड़ा नहीं गया तो उन्हे उससे भी बुरे हाल में कर दिया गया है। धार्मिक यात्राओं में बाधा पहुंचाना अथवा करने न देना और धीरे-2 सभी हिन्दू सांस्कृतिक और कला की धरोहरों को इस्लामिक नाम देना भी तो नरसंहार ही है। हजारों वर्ष पुरानी सनातनी सभ्यता यूँ ही नष्ट नहीं हुयी अपितु उसे इसी प्रकार कश्मीरी खिलाफ़त में नष्ट किया गया।
आज भारत के विभिन्न राज्यों में अभिशप्त जीवन जीने को विवश कश्मीरी हिन्दू समाज का दुख-दर्द सुनने वाला कोई नहीं है। उनके पुनर्वास की चिंता तो सरकार को है परंतु स्थानीय विरोध के चलते उसको ज़मीन पर साकार करना दुष्कर कार्य हो रहा है। बिना दृढ़ सरकारी इच्छा शक्ति के कश्मीर घाटी में हिन्दू पुनर्वास संभव नहीं है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अफ़जल गुरु और कश्मीर की आज़ादी के लिए तो वामपंथी छात्र संगठन आंदोलन कर सकते हैं परंतु इस्लामिक आतंकवाद से पीड़ित कश्मीरी हिंदुओं की आवाज़ इस भारत में कोई नहीं बनना चाहता क्योंकि वह कोई प्रभावी वोट बैंक नहीं है। कश्मीरी हिन्दू आज भी जम्मू, नगरोटा और ऊधमपुर के विस्थापित शिविरों के एक कमरे के जर्जर आवासों में रहने को अभिशप्त है। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भी वह कुछ छोटे-मोटे रोज़गार के साथ किसी प्रकार से जीवनयापन करने को विवश है। कश्मीरी हिंदुओं का वनवास कब समाप्त होगा कलियुग में यह शायद स्वयं श्री राम भी न बता पाएं। परंतु कश्मीरी हिंदुओं द्वारा कश्मीर में सुरक्षित स्थानों पर प्रस्तावित बस्तियों के सुझाव पर सरकार को ध्यान देते हुये इस योजना को यथा शीघ्र अमली जामा पहनाना चाहिए। अभी वह जिन परिस्थितियों में रह रहा है वह मानव निवास के प्रत्येक प्राकृतिक, सामाजिक और भौगोलिक दृष्टिकोण से विपरीत हैं। जीवन की हर आधुनिक या पुरातन सुविधा से परे इन शिविरों की स्थिति ही कश्मीरी हिंदुओं के भीतर सामाजिक परित्यक्त की प्रतिपल याद दिलाती है। वह हर समय अभिशप्त होने की पीड़ा झेलता है। वह भारत के हिन्दू समाज को भी निर्बल एवं असहाय होने का भान दिलाता है। आज हमारे सैन्यबल एवं लोकतान्त्रिक शक्ति उसके लिए मिथ्या हैं। आज कश्मीरी हिन्दू धीरे-2 अपनी कश्मीरी पहचान को नई पीढ़ियों के साथ लुप्त होता हुआ देख रहे हैं। उनकी रचनात्मकता को भी परिस्थितियों का ग्रहण लग चुका है। यह लुप्त होती सांस्कृतिक विरासत ही सबसे बड़ा नरसंहार है।