भगवा पर बोलने से पहले अपने परिवार के कारनामे देखें प्रियंका
   दिनांक 02-जनवरी-2020
कांग्रेस का विरोध कहीं से भी शुरू हो, लेकिन आखिरकार हिंदू मान प्रतीकों पर जाकर क्यूं खत्म होता है ? उत्तर प्रदेश में अक्कड़-बक्कड़ नुमा राजनीति कर रही हैं कांग्रेस की महासचिव प्रियंका वाड्रा गांधी भी आखिरकार भगवा तक पहुंच ही गईं.
 
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर हमला करने के लिए उन्होंने भगवा को निशाना बनाया. असल में कांग्रेस की परंपरा है, कांग्रेस हिंदू संतों, प्रतीकों, आराध्यों से चिढ़ती है. भगवा धारण करने की मर्यादा एक योगी को सिखाने वाली प्रियंका गांधी बताएंगी कि उनकी नानी इंदिरा गांधी ने क्या इसी धर्म को धारण करके हजारों संन्यासियों पर गोली चलवाई थीं. प्रियंका शायद ये भी नहीं बता पाएंगी कि उनकी माता सोनिया गांधी के रिमोट वाली सरकार भगवान श्री राम को अदालत में काल्पनिक बता रही थी. प्रियंका वाड्रा गांधी को ये भी बताना चाहिए कि उनकी पार्टी के शासन वाले राज्यों में क्यों हिंदू शौर्य और धर्म प्रतीकों को पाठ्यक्रमों से हटाया जा रहा है.
प्रियंका की धार्मिक आस्था ही संदिग्ध
वरिष्ठ भाजपा नेता एवं राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि प्रियंका वाड्रा गांधी ईसाई हैं. उनके घर में चैपल है. एक दक्षिण भारतीय पादरी उनके घर में प्रेयर कराने के लिए आता है. अगर यह सही नहीं है, तो आज तक प्रियंका वाड्रा, राबर्ट वाड्रा या कांग्रेस के किसी नेता ने सुब्रमण्यम स्वामी के दावे का खंडन नहीं किया है. जिन प्रियंका की अपनी धार्मिक आस्था संदिग्ध है, उन्होंने नागरिक संशोधन कानून पर कहा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री ने योगी आदित्यनाथ ने वस्त्र धारण किया है. भगवा धारण किया है. यह भगवा आपका नहीं है. भगवा हिन्दुस्तान की धार्मिक आध्यात्मिक परंपरा का है. हिन्दू धर्म का चिह्न है. उस धर्म को धारण करिये ... उस धर्म में रंज, हिंसा और बदले की भावना की कोई जगह नहीं है. प्रियंका जी, हिंदुओं के इस प्रतीक पर भी ज्ञान दो 12 सितंबर 2007 को रामसेतु को तोड़ने के खिलाफ याचिका पर केंद्र की यूपीए सरकार ने हलफनामा दाखिल किया. जरा भाषा देखिए- निसंदेह वाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस भारत के प्राचीन साहित्य में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं. (इन्हें हमारे आराध्य ग्रंथ प्राचीन साहित्य लगते हैं). लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि इसके पात्र (यानी भगवान श्री राम) और इनमें लिखी घटनाओं के घटित होने का कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है. ये हलफनामा सीधे-सीधे कहता था कि भगवान राम और उनके जीवन का कोई सुबूत नहीं है. इनके सहयोगी द्रमुक सुप्रीमो एम. करुणानिधि तब ताल ठोककर कहते थे कि राम काल्पनिक है. रामसेतु कोई मानव निर्मित रचना नहीं है. लेकिन 2018 आते-आते भगवान ने लीला दिखाई. भारतीय नहीं, अमेरिकी एजेंसी नासा ने कहा कि रामसेतु मानवनिर्मित होने के पर्याप्त सबूत हैं. अब जरा सोचिए, जिन्हें भगवान राम के होने के सुबूत नजर नहीं आते, उन्हें दुश्मन पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक और उसमें मारे गए आतंकवादियों के क्या सुबूत नजर आएंगे. बहरहाल सिख दंगों की तरह की मोदी सरकार ने राम और रामसेतु के होने के सुबूतों के मद्देनजर सेतु समुंद्रम प्रोजेक्ट पर सुप्रीम कोर्ट को बता दिया है कि राम सेतु अपनी जगह कायम रहेगा. और ये सबूत की बात करते हैं...
संन्यासियों पर क्यों चलवाई थी दादी ने गोली
भगवा की रट लगाने वाली प्रियंका गांधी जरा इस बात का जवाब देंगी कि उनकी दादी इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए संतों का नरसंहार कैसे हुआ था. 7 नवंबर 1966. कार्तिक शुक्ल की अष्टमी. इसे गोपाष्टमी कहते हैं. देश के कोने-कोने से गौमाता की हत्या पर रोक की मांग को लेकर दिल्ली में हिंदू इकट्ठा हुए. संत थे, साधु थे, महिलाएं थीं, बच्चे थे और गऊ माता थीं. कांग्रेस पर काबिज होने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी गौ हत्या पर कानूनी रोक का वादा किया. बाद में वह इससे मुकर गईं. इंदिरा की सरकार ने गौ भक्तों, संतों और गऊ माता पर गोली चलाने का हुक्म पुलिस को दिया. सैंकड़ों लोग हताहत हुए. लिंचिंग इसे कहते हैं. लिंचिंग की परिभाषा ये है कि किसी बात पर गुस्सा होकर बिना कानून, सुनवाई की परवाह किए किसी को मार डालना. गऊ माता की हत्या रोकने की बात से भड़की इंदिरा गांधी की सरकार ने न संत देखे, न महिला-बच्चे. न ही गऊ माता. क्या ये संतों, भगवे, गऊ माता और हिंदुओं की सरकारी लिंचिंग नहीं थी. ऐसा जघन्य नर और गऊ संहार, जिसे किसी उन्मादी भीड़ ने नहीं, सरकार ने अंजाम दिया था. ये गोरक्षा अभियान अनूठा था. केरल से लेकर कश्मीर तक से गौ हत्या बंद करो की आवाज उठ रही थी. सभी संत, शंकराचार्य, सारे अखाड़े, संत, महंत, मंडलेश्वर मतभेद भुलाकर एक मंच पर थे. हिंदुओं की इसी एकता से तो कांग्रेस और उस जैसे मुस्लिम परस्त दलों को डर लगता है. धर्म के आधार पर देश बंट गया. हिंदुओं के हिस्से में जो देश आया, वह अपनी आराध्य गाय की हत्या रोकने की मांग तक नहीं कर सकते. इतिहासकार आचार्य सोहनलाल रामरंग लिखते हैं कि फायरिंग अंधाधुंध थीं. लाशें गिर रही थीं. हजारों लोग मरे. लेकिन कांग्रेस सरकार ने केवल 11 लोगों की मौत की बात कबूली.
एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि सरकार की ओर एडवाइजरी आई थी. जो सरकार बताएगी, बस वही छपना है. अपने राज्यों का हिंदू विरोध तो देख लो मैडम कांग्रेस के शासन वाला हर राज्य हिंदू प्रतीकों, शौर्य गाथाओं को दफन कर देने के लिए तैयार है. असल में कांग्रेस के शासन वाले राज्यों में दस जनपथ के कठपुतली मुख्यमंत्री जानते हैं कि कैसे एक परिवार को खुश करना है. इसका सबसे आसान रास्ता है. हिंदुओं को गाली दो, उनके गौरव एवं धार्मिक चिह्नों को गायब कर दो. राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकार ने एक कमेटी बनाई. यह कमेटी सिलेबस के लिए थी. सबसे पहले कक्षा 12 की किताब के चैप्टर से सावरकर के आगे वीर हटाया गया. इसके साथ ही हल्दीघाटी की लड़ाई का इतिहास ही बदल डाला गया. पहले कक्षा दस में पढ़ाया जाता था कि अकबर हल्दीघाटी की लड़ाई में नाकाम रहा. वह न तो महाराणा को पकड़ सका और न ही उनके राज्य पर पूरी तरह कब्जा कर सका. अब बच्चों को पढ़ाया जाता है कि महाराणा प्रताप हल्दीघाटी की लड़ाई छोड़कर भाग गए और उस दौरान उनके मशहूर
घोड़े चेतक की मौत हो गई. भगवा प्रेमी प्रियंका गांधी बताएंगी कि क्यों राजस्थान सरकार ने राजनीतिक विज्ञान की किताब मजलिस ए एतेतहादुल और सिमी जैसे आतंकी संगठनों के साथ हिंदू महासभा का नाम जोड़ा है. पाकिस्तान के प्रॉक्सी वॉर के उद्देश्यों में से कांग्रेस की सरकार ने जिहाद को ही गायब कर दिया. अब प्रियंका बताएं कि उन्हें जिहाद की ज्यादा फिक्र है या भगवे की. भगवा प्रेमी प्रियंका बताएं शंकराचार्य को क्यों गिरफ्तार कराया हिंदुओं के मान प्रतीकों की चिंता अब प्रियंका गांधी को हो गई है, तो उन्हें बताना चाहिए कि कांची पीठ के शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी के पीछे किसका हाथ था. कांग्रेस नवंबर 2004 में सत्ता में आई. चंद दिन बाद ही दीवाली के मौके पर हत्या के एक झूठे आरोप में शंकराचार्य को गिरफ्तार कर लिया गया.
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब द कोएलेशन इयर्स 1996-2012 में इस बारे में लिखा है. उन्होंने लिखा है-मैं इस गिरफ्तारी से बहुत नाराज था. मैंने यह मसला कैबिनेट की बैठक में उठाया. मैंने पूछा कि देश में धर्मनिरपेक्षता का पैमाना क्या सिर्फ हिंदू संतों के लिए है. क्या राज्य की पुलिस ईद के मौके पर किसी मुस्लिम मौलाना को गिरफ्तार करने की हिम्मत रखती है. प्रणब मुखर्जी के इस खुलासे से साफ है कि शंकराचार्य की गिरफ्तारी सिर्फ जयललिता की कारनामा नहीं थी. इसमें सोनिया गांधी के रिमोट से चलने वाली मनमोहन सरकार शामिल थी. बताया तो ये भी जाता है कि इस पूरी साजिश में वेटिकन शामिल था. यह कन्वर्जन की साजिश थी. हम जानते हैं कि प्रियंका गांधी के पास या उनके पूरे परिवार के पास इन सवालों के जवाब नहीं होंगे. धर्म राजनीति का विषय नहीं है. भगवा तो बिल्कुल नहीं. वेंटिलेटर पर पड़ी कांग्रेस में जान फूंकने के लिए प्रियंका अपनी स्टंटनुमा राजनीति करें, करती रहें. लेकिन हिंदु संतों, प्रतीकों और आराध्यों को बख्श दें.