गिरिजा टिक्कू, आतंकियों की बर्बरता का शिकार हुई एक कश्मीरी लड़की
   दिनांक 20-जनवरी-2020
ले. कर्नल (से.नि.) आदित्य प्रताप सिंह
कश्मीरी पंडित परिवार की युवती गिरिजा टिक्कू का 4 जून 1990 की रात आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया था, कितने ही दिनों तक सामूहिक दुष्कर्म करने के बाद आरा मशीन से उनके शरीर के कई टुकड़े करके  शव को चौराहे पर फेंक दिया गया था. आज तक टिक्कू के अपराधियों का पता नहीं लग पाया.

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16 दिसंबर 2012 को देश की राजधानी दिल्ली में हुए दुष्कर्म के इस जघन्य अपराध ने सम्पूर्ण भारत को हिला कर रख दिया था। सम्पूर्ण राष्ट्र इस घटना से उद्वेलित था। जिसप्रकार सामूहिक दुष्कर्म के बाद नृशंसता पूर्वक निर्भया को मारा गया था वह भयावह था। पूरा देश इस अपराध के विरोध में सड़कों पर आ गया। राष्ट्र की संसद को इस प्रकार के अपराधों को रोकने के लिए नया कानून तक बनाना पड़ा। राष्ट्र निर्भया को न्याय दिलाने के लिए एकजुट हुआ। 7 वर्षों की लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अन्ततः 1 फरवरी 2020 को चार अपराधियों को फाँसी के फंदे पर लटकाया जा रहा है। देर से ही सही किन्तु न्याय मिला। सम्पूर्ण राष्ट्र खुश हुआ है। परंतु न ही सब राष्ट्र की राजधानी में रहते हैं और न ही सबको इतना बड़ा जनसमर्थन मिल पाता है।
गिरिजा टिक्कू शायद इतनी भाग्यशाली न थी। 19 जनवरी 1990 को जो पलायन कश्मीरी हिंदुओं का शुरू हुआ था वह मई के अंत तक लगभग समाप्ति की ओर था। आंतरिक रूप से विस्थापित कश्मीरी हिन्दू जम्मू और दिल्ली के अनेक शरणार्थी शिविरों में रहने लग गए थे। परंतु अभी भी वह कश्मीर से संपर्क बनाए हुए थे। कुछ परिवार आर्थिक विवशता के कारण कश्मीर छोड़ने मे असमर्थ थे। कश्मीर में अभी भी हिंदुओं का चयनित नरसंहार थमने का नाम नहीं ले रहा था। उनकी हत्या और महिलाओं से दुष्कर्म जिहादियों के लिए दैनिक क्रिया बन चुकी थी। इस दौर में भी वही सब कुछ चल रहा था जो मध्ययुगीन काल के इस्लामिक शासन में होता था। ऐसे वातावरण में हिंदुओं के लिए दैनिक आवश्यक कार्यों के लिए बाहर निकलना तक सुरक्षित न था। परंतु जीवनयापन की भाग दौड़ घर कहां बैठने देती है। 4 जून 1990 को गिरिजा टिक्कू त्रहगाम, कुपवाड़ा के लिए बांदीपुरा घर से सुबह निकली। उसे उसके स्कूल से सूचना देकर बुलाया गया था। कई महीनों से वेतन नहीं लिया था। वह कन्या विद्यालय में प्रयोगशाला सहायक के पद पर तैनात थी। उसके घर से निकलते ही इस्लामिक आतंकियों द्वारा उसे लक्ष्य कर लिया गया था। स्कूल से लौटने में देर हो जाने के कारण वह अपने पैतृक गांव टिक्कर में ही अपने किसी करीबी के घर रुक गई जहां से उनका शाम को ही आतंकियों द्वारा अपहरण कर लिया गया । उस घर के सदस्यों के अतिरिक्त जहां से उन्हें अपहृत किया गया पूरे गांव में कोई भी और आतंकियों को जानते हुये भी उनका विरोध करने वाला न था। वह काफिर थीं अतः उसके जीवन का मूल्य इतना न था कि उसके लिए कोई अपना जीवन संकट में डालता।
उसे अज्ञात स्थान पर ले जाकर चारों आतंकियों द्वारा कई दिनों तक सामूहिक दुष्कर्म के बाद जिंदा ही विद्युत संचालित आरा मशीन द्वारा दो टुकड़ों में काटकर हत्या कर दी गयी। 25 जून 1990 को उसके क्षत-विक्षत शव को सड़क पर कुत्तों के खाने के लिए फेंक दिया गया। शव को देखकर कठोर से कठोर हृदय व्यक्ति भी अपनी चीख नहीं रोक सकता था। आखिर क्या दुश्मनी थी गिरिजा टिक्कू से जो उसे इस क्रूरता से मारा गया था। क्या मात्र इसलिए कि वह काफ़िर थी और इस्लामिक शासन में उसे जीने का कोई अधिकार नहीं था। उसकी मौत पर शोक मनाने की मनाही तक जिहादियों कर दी थी। आतंकियों की धमकियों के कारण उसके अंतिम संस्कार तक में गांव और आसपास का कोई आने को तैयार नहीं हुआ था। मात्र पांच-छः पारिवारिक लोगों ने उसके शरीर के टुकड़ों का अंतिम संस्कार किया। परंतु अंतिम संस्कार में भी गिरिजा को जिहादियों ने शांति न करने दी। वहां तीन आतंकियों ने आकर लोगों को डराया किन्तु एक दयालु आतंकी के कुछ कहने पर वह तीनों आतंकी तो वापस चले गए परंतु उसी रात के अंधकार में गिरिजा टिक्कू की अंतिम क्रिया करने वाले लोग भी गांव से गायब हो गए। यह था जिहादी आतंक और कश्मीरी खिलाफ़त का घिनौना और बदरंग चेहरा। इसी कश्मीर की आज़ादी की जंग आज भारत के वामपंथी और मुसलमान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया और जाधवपुर जैसे शैक्षणिक संस्थानों में लड़ रहे हैं। उन्हे कश्मीर की आज़ादी का मतलब शायद न पता हो, उनकी आज़ादी का मतलब है-“ला इलाहा इल-लिल्लाह” या “निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा” या इस्लामिक राज्य या “खिलाफ़त”। उस खिलाफ़त में काफिरों का स्थान मात्र दासों के रूप में हो सकता है। गिरिजा टिक्कू की इस वीभत्स हत्या की उस समय सुसुप्त देश को खबर तक न लगी। राज्य से लेकर केंद्र तक सम्पूर्ण शासन तंत्र निष्क्रिय था। गिरिजा की पोस्ट मोर्टम रिपोर्ट रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। उस 22 वर्ष की लड़की की तीन दिनों तक बलात्कार कर जिंदा आरा मशीन से काटते समय क्या मनोदशा रही होगी। एक परिश्रम कर अपने पैरों पर खड़ी हो परिवार चलाने वाली नव युवती जो समाज के लिए एक उदाहरण हो सकती थी उसकी हत्या राज्य सरकार में मात्र एक सांख्यिकी से अधिक कुछ न थी। राजनीतिक इस्लाम के संरक्षक प्रारम्भ से ही काफिरों के विरुद्ध ऐसी हिंसा के पक्षधर रहे हैं। कश्मीर में वह इन जघन्य हत्यायों के माध्यम से हिन्दू समाज को भयभीत करना चाहते थे। हिन्दू नरसंहार की संख्या भले ही एक हज़ार से भी कम रही हो परंतु वह जिस निर्दयता से किया गया वह हिन्दू समाज को भीतर तक झकझोर देने वाला था।
गिरिजा टिक्कू के अपराधियों को कभी पकड़ा न जा सका। कश्मीर में हुए इस जघन्यकृत्य के एक भी दोषी को यथोचित दंड न मिल सका। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के यासीन मलिक जैसे अनेक बलात्कारी और हत्यारे कश्मीर में एक सम्माननीय नागरिक का जीवन जीते रहे और पीड़ित पक्ष तिल-2 कर हर पल मरता रहा। सरला भट और बबली कुमारी और कितनी ही महिलाओं की सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्याएं हुई। कश्मीर को हिंदुओं का नर्क बना दिया गया था।