सीएए पर उजागर होता कांग्रेस का दोगलापन
   दिनांक 20-जनवरी-2020
बाकायदा दिहाड़ी के रूप में पांच से सात सौ तक रुपये हर प्रदर्शनकारी को दिये जा रहे हैं और शिफ्ट में उनको धरने का माहौल बनाये रखने की जिम्मेदारी दी जा रही है

caa_1  H x W: 0
नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम पर कांग्रेस के दो-गलेपन की पोल खुलने लगी है। एक ओर तो पंजाब विधानसभा में कांग्रेसी इस कानून के खिलाफ प्रस्ताव पास करते हैं और दूसरी तरफ पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और सलमान खुर्शीद जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी बयान देते हैं कि ये कानून नहीं लागू करने की बात यदि कोई राज्य सरकार करती है तो ये असंवैधानिक होगा। कपिल सिब्बल वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में भी कांग्रेस की ओर से अनेक बार सुप्रीमकोर्ट में पेश होते रहे हैं, इस कारण उनका ये बयान बहुत मायने रखता है। कपिल सिब्बल का साफ तौर पर कहना है कि संसद में पारित हो चुके कानून को लागू करना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है और इससे मना करने का कोई भी विकल्प नहीं है। अगर कोई भी राज्य सरकार इसे लागू करने से मना करती है तो इसे संविधान का उल्लंघन माना जाएगा। कांग्रेस नेता सिब्बल ने माना कि कुछ राज्यों द्वारा नागरिकता संशोधन कानून को लागू करने से मना करना असंवैधानिक है। कांग्रेस के एक अन्य वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद से इस बारे में पूछे जाने पर उनका कहना था कि इस कानून की संवैधानिकता संदिग्ध है।
आश्चर्य की बात ये है कि जब कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ कानूनविद कांग्रेसी भी साफ तौर पर मान रहे हैं कि इस कानून को न मानने या न लागू करने वाली राज्य सरकार के कदम असंवैधानिक माने जाएंगे, तब ऐसी स्थिति में कांग्रेस की पंजाब सरकार जानबूझकर विधानसभा में इस कानून के खिलाफ प्रस्ताव पास कर के संविधान की खुलेआम अवहेलना क्यों और किस मकसद से कर रही है? क्या कांग्रेस हाईकमान यानी कि सोनिया गांधी के निर्देश पर गत शुक्रवार को पंजाब विधानसभा में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रस्ताव पारित कराया? इस प्रस्ताव में नागरिकता संशोधन कानून को संविधान विरोधी और समाज को बाटने वाला बताया गया। आम आदमी पार्टी ने भी इस प्रस्ताव के समर्थन में वोट दिया।
गौर करने वाली बात ये है कि पंजाब विधानसभा में ये प्रस्ताव मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पहल पर नहीं पास कराया गया है, बल्कि इसके पीछे कांग्रेस की बाकायदा एक सुविचारित टीम काम कर रही है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत को सोनिया गांधी की ओर से ये जिम्मेदारी दी गयी है कि कांग्रेस शासित राज्यों में सीएए और एनआरसी के खिलाफ प्रस्ताव लाकर उसे पास कराएं। पंजाब विधानसभा में पास हुए प्रस्ताव में कहा गया है कि सीएए संविधान की धर्मनिरपेक्षता की धारणा के खिलाफ है।
ऐसा ही एक प्रस्ताव पंजाब के पहले केरल विधानसभा में भी पास हो चुका है। जबकि केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने साफ तौर पर कहा कि संशोधित नागरिकता कानून केंद्रीय सूची का विषय है, वह किसी राज्य का विषय नहीं है। सभी राज्यों को इसे लागू करना ही पड़ेगा, और कोई रास्ता ही नहीं है। इसे 254 के तहत लागू किया जाएगा।
इस कानून पर विचार कर इसे रद्द करने के लिए सुप्रीमकोर्ट में अनेक याचिकाएं विचाराधीन हैं। याचिकाकर्ताओं में जाहिर है कि कुछ कांग्रेसी भी हैं। सुप्रीमकोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि इस मुद्दे पर विचार तभी किया जा सकता है जब कुछ स्थानों पर इस कानून के विरोध में चल रहे हिंसक प्रदर्शन बंद हों। अब इस संदर्भ में कपिल सिब्बल सहित कुछ अन्य कानूनविदों के बयान आ जाने के बाद लगता है कि कांग्रेस को ये भलीभांति मालूम हो चुका है कि नागरिकता संशोधन कानून संविधान की किसी भी धारा का उल्लंघन नहीं करता है। इसके बावजूद दिल्ली के शाहीनबाग में करीब सवा महीने से चल रहे धरना-प्रदर्शन को समर्थन देकर कांग्रेस अपने किस गुप्त एजेंडे को आगे बढ़ा रही है? ये सवाल कांग्रेसियों से लगातार पूछे जा रहे हैं। अपनी सरकार वाले राज्यों में इस कानून के खिलाफ प्रस्ताव पास कराके आखिर कांग्रेस कौन सा मकसद हासिल करना चाह रही है? क्या दिल्ली के शाहीनबाग जैसे धरना-प्रदर्शन देश के अनेक हिस्सों में कराकर कांग्रेस अराजकता फैलाना चाहती है? शाहीनबाग़ में जो हो रहा है, उससे आम हिन्दू आक्रोशित है। वहां पर अधिकांश मुसलमान ही धरने पर हैं और विरोध प्रदर्शन के नाम पर कानून व्यवस्था का मज़ाक़ बना दिया है। क्या कांग्रेस यही चाहती है कि जिस जगह भी मुसलमानों की जनसंख्या ज़्यादा है वहां हाइवे पर क़ब्ज़ा कर लें, सड़क पर नमाज़ पढ़ें? शाहीनबाग में प्रदर्शन के नाम पर बैनर पोस्टर में जिहाद फैलाया जा रहा है। खबरें हैं कि बाकायदा दिहाड़ी के रूप में पांच से सात सौ तक रुपये हर प्रदर्शनकारी को दिये जा रहे हैं और शिफ्ट में उनको धरने का माहौल बनाये रखने की जिम्मेदारी दी जा रही है। बिरयानी बंट रही हैं। मुशायरा भी आयोजित हो रहा है। दिल्ली-नोएडा को जोड़ने वाली एक मुख्य सड़क करीब सवा महीने से बंद पड़ी है। दिल्ली पुलिस प्रदर्शनकारियों को नागरिक सुविधाओं का हवाला देकर कम से कम एक रास्ता खाली करने के लिए मिन्नतें कर रही है। प्रदर्शनकारियों द्वारा रणनीति के तहत दिखाने की कोशिश हो रही है कि देशभक्ति से ओत-प्रोत साम्प्रदायिक सौहार्द के बीच सत्याग्रह का स्वर्णिम दौर आ गया है। लेकिन क्या सच में ऐसा है? इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया पर जो सच्चाई सामने आ रही है वो ठीक इसके उलट है। ये पूरा जमावड़ा संसद से पारित उस नागरिक संशोधन कानून के विरुद्ध है, जिसका अल्पसंख्यकों सहित भारत के एक भी नागरिक पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं होने वाला है। सरकार के मंत्री और अधिकारी इस बात को समझाने की कोशिश में लगातार लगे हुए हैं, पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सब कुछ समझते हुए भी माहौल खराब करने के लिए मुसलमानों में गलतफहमी बैठाने की कोशिश में लगे हैं।
प्रदर्शनकारियों के हाथ में तमाम तख्तियां उस एनआरसी के विरोध में भी दिख रही हैं, जिस पर सरकार ने यह कई बार स्पष्ट किया है कि अभी ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं आया और न ही उस पर विचार हुआ है। तो फिर विरोध भला क्यों हो रहा है? सीएए/ एनआरसी के विरोधी शाहीनबाग की भीड़ को स्वत: स्फूर्त बताते नहीं थक रहे। वहीं ऐसी खबरें और वीडियो भी सोशल मीडिया में आ रहे हैं कि प्रदर्शनकारियों को दिहाड़ी पर लाया जा रहा है और प्रदर्शनकारी शिफ्ट ड्यूटी कर रहे हैं। महिलाएं घर का काम निबटाकर प्रदर्शन स्थल पर ऐसे आ रही हैं, जैसे वो उनका कार्यस्थल हो। लहराते तिरंगों के बीच ‘आजादी’ की भी बात हो रही है। संसद के बनाए कानून के विरुद्ध प्रदर्शन में देशभक्ति पूरी तरह से बेतुकी और अटपटी लगती है। जबकि कानून से असहमति के विधायी रास्ते भी हो सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय में इस पर विचार करने के लिए याचिकाएं डाली गई हैं। उस पर सुनवाई और न्यायालय के मत की आखिर प्रतीक्षा क्यों नहीं कर लेते ये लोग? एक आशंका ये भी तार्किक लगती है कि इस असहमति और विरोध के तार दिल्ली विधानसभा के आगामी चुनाव से भी जुड़े हो सकते हैं।
इस आंदोलन को सभी से जोड़ कर दिखाने की भरपूर कोशिश की जा रही है। लेकिन यह बात भी निराधार नहीं है कि पोस्टरों में स्वास्तिक के टूटने से लेकर महिलाओं के लिए एक विशेष ड्रेस कोड तक कहीं न कहीं एक मजहब के लिए सॉफ्ट कार्नर एवं दूसरे के प्रति घृणा का भाव भी दिखाता है।
पिछले लोकसभा चुनावों के समय सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, वीडियो में प्रियंका गांधी को कुछ बच्चे घेरे खड़े थे और प्रधानमंत्री मोदी के लिए अभद्र नारे लगा रहे थे। हाल ही में कुछ बच्चों की वीडियो सोशल मीडिया पर पुनः वायरल हुई हैं। वीडियो में कुछ बच्चों ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए ऐसी बातें कहीं जो विचलित करती हैं। वहां प्रदर्शनकारियों के सपनों का डिटेंशन सेन्टर भी बन गया है और उसके आचार भी तैयार कर दिए गए हैं। तभी तो वीडियो में एक बच्ची यह कह रही है कि डिटेंशन सेन्टर में सिर्फ एक समय खाना दिया जाएगा और परिवार वालों को मुझसे दूर कर दिया जाएगा। यह ठीक है कि लोकतंत्र सिर्फ बहुमत का शासन नहीं है और उसमें असहमति को भी सुनने की जगह होनी चाहिए पर असहमति की अभिव्यक्ति का भी एक तरीका होता है, एक सीमा होती है। सरकार का या किसी कानून का विरोध करने के लिए घृणा निर्माण का यह तरीका दूर का कोई खतरा तो नहीं दिखा रहा? देश को इस पर विचार करने का समय आ गया है। इस विरोध प्रदर्शन ने नागरिक सुविधाओं को बुरी तरह से प्रभावित किया है। इसके बावजूद पुलिस ने अब तक काफी धैर्य का परिचय दिया है। हालांकि आजकल न्यायालय तमाम मुद्दों पर जनहित में स्वत: संज्ञान लेते हैं लेकिन इस मामले पर माननीय उच्च न्यायालय ने कोई साफ आदेश नहीं दिया। शाहीनबाग़ को दिल्ली पुलिस के विवेक के आधार पर कानून का पालन कराने के लिए छोड़ दिया गया है। प्रदर्शन कर रहे लोगों को बताया जा रहा है कि केंद्र सरकार दमनकारी है, शाहीनबाग पर केन्द्र का अब तक का ट्रीटमेंट कुछ लोगों को धैर्य लग सकता है तो कुछ लोगों को सरकार की अकर्मण्यता दिखेगी लेकिन पुलिस के लिए फैसला इतना आसान भी नहीं है। निर्लज्ज प्रदर्शनकारियों ने साथ में छोटे छोटे बच्चों और बुजुर्गों को भी बैठा रखा है, पुलिस यदि सख्ती करके उनको हटाती है तो इन बच्चों-बुजुर्गों के साथ ज्यादती होने का प्रपोगंडा फैलाने का विरोधी दलों को मौका मिलेगा। प्रदर्शन के पीछे अपना एजेंडा साध रहे विरोधी दलों का मकसद भी यही लगता है। फिर भी पुलिस को कुछ तो करना ही होगा, सड़क कितने दिनों तक जाम रहेगी? या तो प्रदर्शनकारी स्वयं हटें या पुलिस उन्हें हटाए, आगामी गणतंत्र दिवस की सुरक्षा का भी ख्याल करना लाजिमी है दिल्ली पुलिस के लिए।