जो गांव कभी पानी की समस्या से जूझता था अब नीति आयोग ने उसे जलग्राम मॉडल घोषित किया
   दिनांक 22-जनवरी-2020

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जखनी को पानीदार बनाने के नायक और जलग्राम समिति के संयोजक उमाशंकर पांडेय
नीति आयोग भारत सरकार ने भारत की वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स 2019 जारी किया जिस गांव जखनी के परंपरागत जल संरक्षण के सामूहिक प्रयास को देश के सामने मॉडल माना है वह गांव सूखे बुंदेलखंड के बांदा जनपद के अंतर्गत आता है।
जिस बुंदेलखंड की चर्चा पलायन, भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, जल संकट जैसी विभिन्न समस्याओं के लिए साल भर होती रहे पीने का पानी मालगाड़ी द्वारा दिल्ली से बुंदेलखंड लाया जाए। उसी बुंदेलखंड के जनपद बांदा के ग्राम जखनी के जल संरक्षण से 15 वर्ष के सामूहिक परंपरागत प्रयास ने देश के सामने गांव में पानी और पलायन रोककर देश के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया है।
नहीं लिया सरकार से कोई अनुदान
जल संरक्षण के इस सामूहिक प्रयास में न तो सरकार से कोई अनुदान लिया गया और न ही नई मशीन तकनीक का इस्तेमाल किया गया स्वयं गांव के किसानों नौजवानों बेरोजगारों ने फावड़ा उठाया, समय दिया, श्रमदान किया, मेड़ बंदी की, गांव में जल रोका, गांव के पानी को जगाया, गांव को पानीदार बनाया। अपने गांव को देश का पहला जल ग्राम बनाया देश के 1050 जल ग्रामों को जन्म देने की प्रेरणा दी।
पलायन कर गए युवा गांव वापस लौटे
जखनी को पानीदार बनाने के नायक और जलग्राम समिति के संयोजक उमाशंकर पांडेय कहते हैं कि 20 वर्ष पहले गांव छोड़कर रोजगार के लिए देश के महानगरों में पलायन कर गए थे। गांव खाली हो गया था, वीरान हो गया था, जल देवता के आगमन के कारण नौजवान वापस गांव आकर परंपरागत पानी और किसानी के संरक्षण में रोजगार कर रहे हैं। उत्साह पूर्वक संलग्न है अपने मां-बाप, भाई, बहनों परिवार के साथ स्वयं अन्नदाता मालिक बनकर कार्य करने लगे नौकर नहीं गांव का कोई नौजवान खेती करता है। कोई सब्जी उगाता है, कोई पशुपालक है, कोई दूध उत्पादक है, कोई मत्स्य पालक है, कोई फल विक्रेता है, यह सब जल संरक्षण का परिणाम है। उमाशंकर पांडेय कहते हैं, वर्ष 2005 में दिल्ली में जल और ग्राम विकास को लेकर एक कार्यशाला हुई थी. उसमें तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने बिना पैसे और बिना तकनीक खेत पर मेड़ बनाने की बात कही थी. हमारे गांव में कोई किसान ऐसा नहीं कर रहा था. इसलिए मैंने अपने पांच एकड़ खेत की मेड़ बनाई और पानी को रोका. पहले पांच किसानों ने अनुसरण किया, फिर 20 किसान आगे आए. व​ह बताते हैं कि गांव के लोगों को भी देसी तरीके से पानी की बचत करने का तरीका बताया गया. हर घर का प्रयोग किया पानी, पाइप लाइन और नालियों के जरिये छोटे-छोटे कुओं तक पहुंचाया जाने लगा.