विरोध छोटा, षड्यंत्र बड़ा
   दिनांक 27-जनवरी-2020
हल्ला मचाया गया, भ्रम फैलाया गया, दबाव बनाने की कोशिशें हुईं किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने बात साफ कर दी। नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) पर तुरत-फुरत कोई रोक नहीं लगेगी !
 
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जिस तरह सरकार विरोधी दल इस मुद्दे पर एकाएक लामबंद हुए उससे यह साफ है कि मामले के तकनीकी पहलुओं पर खुली चर्चा की बजाय सारा खेल राजनीतिक रस्साकशी और उससे भी कहीं आगे का और ज्यादा गंभीर है। आश्चर्य नहीं कि यह रस्साकशी बहुत सुनियोजित तरीके से और तरह-तरह के देशी-विदेशी तालमेलों के साथ हो रही है। सीएए को मुद्दा बनाकर खड़ी की गई भारत विरोधी लामबंदी कुछ तय बिन्दुओं पर निश्चित लक्ष्य लेकर चलती दिखती है।
किसी भी कीमत पर भारत के मजबूत लोकतंत्र को दोषपूर्ण, जनादेश को भीड़तंत्र का ठप्पा लगाना और 'मोदी' को तानाशाह साबित करना।
अंग्रेजों की तर्ज पर भारतीय समाज को बांटना और देश के विरुद्ध उसके नागरिकों को ही लड़ाना।
विभाजक राजनीति के परस्पर दलीय-वैयक्तिक अंतरविरोधों पर मौन रहना और एक लीक पर चलते हुए अपने-अपने स्रोतों से विदेशों से समर्थन जुटाना
भारतीय संसद, संविधान और सीएए कानून के विरोधियों द्वारा हर कदम फूंक-फूंककर रखा जा रहा है। रोज पैंतरा बदलते हुए मामले को ज्यादा से ज्यादा गरमाया जा रहा है। विभिन्न घटनाओं के माध्यम से 'पैंतरे' और 'पासा पलटने' के इस धारावाहिक को मोटे तौर पर तीन बिंदुओं से समझिए—
आग का सपना..स्वाहा
वामपंथी साम्यवाद और कांग्रेसी समाजवाद संसद में हाशिए पर जाने तथा अनुच्छेद 370, तीन तलाक और राम मंदिर का मुद्दा सुलझने से हताश था। सीएए मुद्दा मिलने के बाद उत्साही आक्रोश ने इन्हें आपस में ज्यादा जोड़ दिया। कथित बुद्धिजीवियों द्वारा अपने असर वाले क्षेत्रों-शिक्षा संस्थानों में छात्रों के राष्ट्रीय मुद्दों पर भ्रम को मापने, फीस वृद्धि या हॉस्टल से जुड़े गुस्सा और भ्रम बढ़ाने वाले मुद्दों को तलाशने और अंतत: इस क्रोध को राष्ट्रीय मुद्दों के विरोध में क्रांतिकारी आवाजों के तौर पर दर्ज कराने का बीड़ा उठाया गया। फीस की बात कब जिहादी तरानों से होते हुए 'कैंपस वॉल' पर 'खिलाफत 2.0' लिखने तक पहुंची, युवाओं को पता ही नहीं चला। मोर्चाबंदी को बिना राजनीतिक नाम दिए पहले युवाओं के जरिए अति आक्रामक विरोध की आंधी उठाने की रणनीति पर कदम बढ़ाए गए जो ट्यूनीशिया के 'जैस्मीन रिवोल्यूशन' सरीखा रंग ले सके। विरोध के नाम पर युवाओं से पत्थरमारी कराने, सार्वजनिक वाहनों को फूंकने और संपत्ति नष्ट करते हुए ठीकरा पुलिस प्रशासन के मत्थे मढ़ने का काम हुआ। भला हो सतर्क युवाओं का कि सोशल मीडिया पर झूठी तस्वीरों और खबरों की धड़ाधड़ पोल खुलने लगी, जवाबी सवालों के साथ देशभर में उत्पातियों के खिलाफ आवाजें गूंजने लगीं। लोगों का गुस्सा देखते ही फौरन रणनीति बदली गई। पलटी मारने की गति इतनी तेज थी कि लोगों ने मुस्लिम बस्तियों में तिरंगे और वंदेमातरम् की आड़ लेते वे चेहरे देखे जो कल तक स्कूल और सिनेमा में भी वंदेमातरम् को इस्लामी लिहाज से 'कुफ्र' ठहराते रहे थे!
मुस्लिम जमात पर सेकुलर मुखौटा
जानकारों के अनुसार विरोध को व्यवस्थागत रूप देने वाले राजनीतिक-एनजीओ पेचबाजों का जोर इस बात पर सबसे ज्यादा था कि उपद्रव और उत्पात जामिया या अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की बजाय अन्य विश्वविद्यालयों से उमड़ता दिखे ताकि इसकी नुमाइश इस्लामी ठप्पे से बाहर और व्यापक विरोध के तौर पर की जा सके। तिरंगा और वंदेमातरम् इसी कवायद का हिस्सा थे लेकिन इनकी तस्वीरें-वीडियो वायरल होने से पहले 'जिन्ना वाली आजादी' के नारे और सीएए प्रदर्शन में 'कश्मीर की आजादी' के पोस्टर लहराने की घटनाएं लोगों की नजर में आ चुकी थीं। ज्यादा दिक्कत तब हुई जब पैसे के प्रदर्शनकारियों की संख्या जमाए रखने के पैंतरे पर सवाल उठाता 'स्टिंग' सामने आया। लेकिन इसके अगले ही दिन से मीडिया में अन्य पंथों द्वारा कथित नि:शुल्क भोजन सेवा की चादरें तान दी गईं और मुस्लिम प्रदर्शन में पगडि़यों के फोटो और हवन की आहुतियां मीडिया-सोशल मीडिया पर परोसी जाने लगीं।
रुख बदलेंगे, रणनीति नहीं
सरल शब्दों में इसे यों समझिए! पत्थर नहीं मारेंगे लेकिन परेशान करने से बाज भी नहीं आएंगे। क्यों! ताकि भीतर-भीतर समाज का गुस्सा बढ़े! इसी राह पर खेल आगे बढ़ा और दिल्ली को उत्तर प्रदेश से जोड़ने वाला वह महत्वपूर्ण गलियारा 'शांतिपूर्ण प्रदर्शन' के नाम पर कब्जा लिया गया जिससे रोज लाखों लोगों की आवाजाही को प्रभावित किया जा सके। एक दिन जरा देर के जाम पर तन जाने वाली 'हैडलाइन' शाहीन बाग जमावड़े पर माहभर बाद तक किसके दबाव में झुकी रही, यह सोचने वाली बात है। मीडिया ने खबरें दबाईं लेकिन सोशल मीडिया के दबाव के बाद मरीजों को ले जा रही एंबुलेंस और छात्रों को ले जा रही बसों के लिए हुल्लड़बाज-प्रदर्शनकारियों को रास्ता देना पड़ा।
हिंसा को चाहिए सहानुभूति
बिगड़ैल पत्थरमारों की पहचान के साथ ही उनके 'कैंपस छात्र' होने की कलई खुल गई और समाज की थोड़ी-बहुत संवेदना भी जाती रही। लेकिन अगले ही दिन प्राथमिक स्कूलों में पढ़ने वाले मासूम सामने कर दिए गए। इस मामले में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की पहल सराहनीय रही। भड़काऊ पोस्टर थामे, बिना सोचे जहरीले नारे लगाते अबोध बच्चों के फोटो-वीडियो देखकर यह स्पष्ट था कि उनका नफरत और सांप्रदायिकता की राजनीति में मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रहा है। आयोग ने बच्चों के मानसिक उत्पीड़न की आशंका जताई है तथा प्रशासन को चिन्हित बच्चों की 'काउंसिलिंग' कराने के निर्देश दिए हैं।
बहरहाल, 140 से अधिक आवेदनों के जरिए न्यायपालिका के सामने याचिकाओं का पहाड़ भी न्यायप्राप्ति की स्वाभाविक इच्छा से ज्यादा दबाव बनाने की योजना का हिस्सा मालूम पड़ता है। पाकिस्तान से इस मुहिम को हर कदम पर मिल रही पुचकार और न्यूजीलैंड में वामपंथियों के विरोध प्रदर्शन भी बता रहे हैं कि भारत में सरकार विरोधी हाथ यदि मिलते हैं तो दुनिया में भारत विरोधी ताकतें आपस में मिलने को फड़फड़ा रही हैं।संसद के प्रति भरोसे और नागरिक सतर्कता से सीएए विरोध अब तक हर चालबाजी पर पकड़ा गया है, लेकिन शांत नहीं हुआ। चिंगारी बुझाए बिना आग को ठंडा मानना खतरनाक हो सकता है!
@hiteshshankar