भारत की अवधारणा संक्रांति की है, क्रांति की नहीं
   दिनांक 27-जनवरी-2020
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 श्री अरुण कुमार
 
''हमारी अवधारणा संक्रांति की है, क्रांति की नहीं। परिवर्तन जो सहज आता है, वह संक्रांति बनता है, स्थायी होता है। जो परिवर्तन एकदम आता है वह प्रलय लाता है।'' उक्त बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्री अरुण कुमार ने कही। वे गत दिनों कोलकाता में भारत विकास परिषद द्वारा आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि हिन्दू समाज की सबसे बड़ी समस्या है आत्मविस्मृति। हम यह भूल गए कि भारत क्या हैं? हम कौन हैं? हिन्दू क्या है? इस हिन्दू का लक्ष्य क्या है? दुनिया के देशों की तरह भारत का जीवन नहीं है। भारत एक यात्रा है-सनातन यात्रा। यह हमको समझना है कि भारत क्या है? पश्चिम के शिक्षण से समाज का जो एक वातावरण बना, उसमें से हम भूल गए कि भारत क्या है? पश्चिमी शिक्षा की नजर से नहीं समझा जा सकता कि भारत क्या है? उन्होंने कहा कि 400 साल पहले यूरोप से अलग-अलग देशों की सेनाओं ने अमेरिका पर हमला कर दिया। यूरोप के लोगों ने अमेरिका में वहां के 6 करोड़ स्थानीय लोगों की हत्या की। फिर ब्रिटेन ने अमेरिका पर राज किया और यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका बना दिया। आज दुनिया के अंदर लोकतंत्र, मानव के अधिकार, रिलीजियस फ्रीडम, बहुलतावाद, मानवतावाद का उपदेश देने वाले अमेरिका का ये इतिहास है। विश्व युद्ध के बाद 40 नए देश दुनिया के अंदर बने। पूरी दुनिया में भारत एक अद्भुत राष्ट्र है। जहां राष्ट्र पहले बना, फिर राज्य। इस राष्ट्र का गठन किसी युद्ध से प्राप्त करके नहीं बना, यह राष्ट्र एक है और राज्य अनेक हैं।
 
उन्होंने कहा कि नागरिकता संशोधन कानून में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के शोषित लोगों के लिए प्रावधान किया गया है। फिर भी सबने तरह-तरह की बातें कीं। मैं सारे लोगों को एक ही बात कहना चाहता हूं कि आप ठंडे दिमाग से सोचिए और समझिए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में गणमान्यजन उपस्थित थे।