ताइवान के लिए भारत एशिया का बड़ा और ताकतवर देश है निवेश के लिए सबसे बेहतर
   दिनांक 28-जनवरी-2020
भूगोल की दृष्टि से चीन की पीठ से लगा ताइवान इस मामले में खास है कि ड्रैगन के इतने करीब होने पर भी वह देश के तौर पर अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान रखता है। तकनीकी और आर्थिक शक्ति के रूप में दुनिया में इसकी धाक है. एशिया में ताइवान की स्थिति भारत के लिए इस क्षेत्र में सम्भावनाओं के द्वार खोलने वाली है। इंटरनेशनल बिजनेस मैनेजमेंट ऑफ ताइनान यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर तथा लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट के लिए रिसर्च सेंटर के निदेशक, प्रो. जोएल झेंगई शॉन से पाञ्चजन्य संपादक श्री हितेश शंकर ने विस्तृत बातचीत की। विश्व की पांचवीं तथा ताइवान की की सबसे ऊंची इमारत ताईपेई 101 के टॉप फ्लोर पर हुई इस बातचीत में भू-रणनीति मामलों से लेकर कारोबारी समीकरणों और भारतीय छात्रों के लिए उपलब्ध अवसरों जैसे उन मुद्दों पर भी व्यापक चर्चा हुई जो अत्यंत महत्वपूर्ण हैं किंतु जिनपर आमतौर पर भारत या ताइवान में बात ही नहीं होती।

hitesh ji_1  H
आप भारत और ताइवान के संबंधों को कैसे देखते हैं या ज्यादा सटीक तरीके से पूछूं तो आप इन चार आयामों का वर्णन कैसे करना चाहेंगे कि आज आप ताइवान को कैसे देखते हैं, भारत को कैसे देखते हैं, अमेरिका को कैसे देखते हैं और वर्तमान परिस्थितियों में आप चीन को कैसे देखते हैं ?
बीस साल पहले ताइवान के लोग इस विषय में ज्यादा नहीं सोचते थे और उन्होंने भारत पर कोई ध्यान नहीं देते थे क्योंकि 1990 के दशक में यहां ज्यादातर सरकारें ही नहीं उद्यमी, विद्यार्थी और यहां तक कि प्रोफेसर भी सिर्फ दो देशों, चीन और अमेरिका, पर ध्यान देते थे। उन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया की तरफ तक ध्यान नहीं दिया था। यहां तक कि 21वीं शताब्दी की शुरुआत में भी हम चीन-अमेरिका संबंधों के बारे में ध्यान देते हुए सोचते थे कि ताइवान कैसे चीन और अमेरिका के बीच महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन, जब यह एहसास हमको हुआ कि इन दो महाशक्तियों के बीच में ताइवान की स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं है तब हमने अलग तरीके से देखने की शुरुआत की और 2008 में जब नए राष्ट्रपति मा यिंग-जिओ आए तब उन्होंने चीन के साथ संबंधों को बेहतर करने की दिशा में बहुत प्रयत्न किए। उस समय ताइवान के विद्यार्थी चीन जाकर पढ़ सकते थे, यहां के उद्यमी चीन जाकर वहां निवेश कर सकते थे, लेकिन जब 2016 में त्साई इंग वेन राष्ट्रपति चुनी गई तब स्थितियां बदलनी शुरू हो गईं। वह चीन के साथ किसी भी तरह के संबंध बढ़ाने के खिलाफ थीं। वह नहीं चाहती थी कि ताइवान की कंपनियां चीन में निवेश करें वह इस बात के भी खिलाफ थी कि ताइवान के विद्यार्थी चीन जाकर उच्च शिक्षा ग्रहण करें। तब हमने दूसरे बाजारों की तरफ देखना शुरू किया और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा भारत की तरफ नजर गई। अब हमारी नई नीति चीनी बाजार के बजाय दूसरे बाजारों की तलाश है। जब 2012 में अमेरिका में आर्थिक मंदी आई तब इससे ताइवान भी प्रभावित हुआ था और हमने चीन की ओर देखना शुरू किया था। लेकिन जब 2016 में अमेरिका ने भी एशिया की तरफ रुख किया और तब हमको लगा कि हम अमेरिकी सम्मोहन से मुक्त हो सकते हैं और अपने प्रोडक्ट को नए बाजार में बेच सकते हैं और इसी दौरान ताइवान की कंपनियों ने दक्षिण एशियाई देशों की तरफ रुख किया हमने वियतनाम में बहुत ज्यादा निवेश किया अगर खासकर देखें तो पिछले कुछ सालों में ताइवान वियतनाम में निवेश करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है हम म्यामार भी गए कंबोडिया और लाओस में भी निवेश किया और उसके बाद भारत की तरफ हमने रुख किया और जाना कि भारत भी चीन की तरह एक बड़ा बाजार है और एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था अगर सच में देखा जाए तो भारत दक्षिण एशिया का एक बहुत बड़ा ताकतवर देश है तथा कह सकते हैं कि हमने 30 साल तक भारत को नजरअंदाज किया तब कोई भी ताइवान की कंपनी भारत में निवेश करने में रुचि नहीं रखती थी सिर्फ एक या दो कंपनियों को छोड़ दिया जाए जैसे कि हैदराबाद मेट्रो के काम में ताइवान की कंपनी ने रोल अदा किया लेकिन इस बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है।
यह सही है कि हैदराबाद मेट्रो में ताइवान की कंपनी के रोल के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं लेकिन दिलचस्प बात यह है कि आज भी ताइवान में 60 साल पुरानी भारतीय रेल दौड़ती है ?
हां यह बहुत दिलचस्प है हम कह सकते हैं कि 1960 या उससे पहले 1950 में ताइवान के राष्ट्रपति च्यांग काई शेक के भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ अच्छे संबंध थे और दोनों ने एक दूसरे देशों की मदद के लिए काफी कोशिश की इसीलिए हमने शायद भारत से हथियार भी खरीदे और कुछ भारी धातुएं हासिल कीं।
च्यांग काई शेक और पंडित नेहरू की गहरी दोस्ती थी आपका इस बारे में क्या मानना है लेकिन दोनों ही नेताओं का चीन के प्रति झुकाव भी था ?
हां यह पुरानी कहानी है उस समय ताइवान संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य था और भारत नहीं था लेकिन 1971 में जब ताइवान को यूएन से बाहर किया गया तब स्थिति बदल गई कोई नहीं कह सकता कि उस समय स्थिति विचित्र नहीं थी मैं यह कह सकता हूं कि उस समय युद्ध का डर बिल्कुल अलग था जैसा कि अब है। चीन भी उस समय अलग तरह का कारक था। अब हम यह नहीं कह सकते कि उस वक्त यानी कि 60 साल पहले क्या सही था और क्या गलत लेकिन यह कहा जा सकता है कि तब तक ताइवान और भारत चीन के प्रति रवैया एक जैसा ही था दोनों चीन को एक खतरा मानते थे और अब भी मानते हैं।
तो क्या आप भी चीन को खतरा मानते हैं ?
हां बिल्कुल, हालांकि यह एक अवसर भी है। चीन एक साथ अवसर और खतरा दोनों है। मैं मानता हूं कि ताइवान में ऐसे बहुत से लोग हैं जो कि मानते हैं कि चीन के साथ संबंध स्थापित करने में फायदा है हालांकि बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो कि चीन को खतरा भी मानते हैं। मैं यह नहीं जानता है कि भारत वाकई में चीन के बारे में क्या नजरिया रखता है लेकिन मेरा ऐसा विश्वास है कि भारत की सरकार और भारत के लोग चीन को अवसर से ज्यादा एक खतरे के तौर पर देखते हैं।

hitesh ji_1  H
आप कह रहे हैं कि ताइवान ने अभी हाल ही में वियतनाम में बहुत निवेश किया और अब आप भारत की तरफ फोकस कर रहे हैं लेकिन अभी हाल ही में आपकी एक बड़ी कंपनी ने वादा करके भारत में निवेश करने से अपने पैर पीछे हटा लिए क्या कारण है ?
मुझे लगता है कि भारत में दो तरह की समस्या है। पहली है मजदूरों की उत्पादकता और दूसरा है इंफ्रास्ट्रक्चर। बहुत से स्थानों पर भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर उतना अच्छा नहीं है यानी कि हाईवेज और लॉजिस्टिक सिस्टम बेहतर नहीं हैं। बिजली और पानी की भी समस्या है। मजदूरों की उत्पादकता कम है और सरकारी सिस्टम में भ्रष्टाचार व्याप्त है। हालांकि सरकार बहुत कोशिश कर रही है कि ताइवान से निवेश आए इसलिए मैं आशा कर सकता हूं कि आज या कल में चीजें बदलेगी और भारत में निवेश बढ़ेगा ताइवान की जीडीपी इस समय बहुत बेहतर (लगभग 10,000 डॉलर प्रतिव्यक्ति) है। हो ची मिन्ह जैसे कई शहर ऐसे हैं जहां जमीन की कीमतें और दूसरी चीजें काफी महंगी हैं। इसीलिए ताइवान में बहुत सी कंपनियां अब सस्ते बाजारों की तरफ रुख कर रही हैं और भारत उसमें से आता है। यहां पर बाजार बहुत बड़ा है और चीजें बेहतर हैं लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह देश सांस्कृतिक रूप से हमारी संस्कृति से बहुत भिन्न है।
आप जो कह रहे हैं वह कुछ हद तक सही है लेकिन पूर्वी एशिया के तमाम देशों जैसे कि कोरिया और जापान जैसे देशों ने भारत में बहुत बड़ा निवेश किया है और वह उसी परिवेश में काम भी कर रहे हैं सफलता भी प्राप्त कर रहे हैं तो ताइवान भी ऐसा क्यों नहीं करता वह किसका इंतजार कर रहा है ?
आप सही कह रहे हैं ताइवान की कंपनियों को अभी तक चीन और अमेरिका में काम करने की ही जानकारी थी और यही एक बड़ी समस्या है। भारत चीन और अमेरिका से अलग बाजार है और यहां काम करना सीखना होगा। वैसे ताइवानी कम्पनियों ने दक्षिण पूर्वी एशियाई बाजारों से काफी कुछ सीखा है लेकिन वे बाजर बहुत हद तक हमारे जैसे हैं, लेकिन भारत हम से बिल्कुल अलग है। हालांकि ताइवान की कंपनियां अब इस को सीखने में दिलचस्पी दिखा रही हैं और वह चाहती हैं कि भारत में व्यापार को बढ़ाया जाए। खासकर भारतीय लोग काफी चतुर हैं और उन्हें पता है कि आप कैसे पैसा बना रहे हैं या कैसे संसाधनों का लाभ ले रहे हैं।
आप भारत में जापानी ऑटोमोबाइल कंपनी सुजुकी और भारतीय कंपनी मारुति की सफलता के बारे में जानते होंगे, उन्होंने ऑटोमोबाइल क्षेत्र में एक इतिहास बनाया है और यह आज भी सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी है। दूसरी ओर, आप देख सकते हैं कि आपके यहां कई अन्य ऑटोमोबाइल ब्रांड हैं। लेकिन आपने अपनी अगली पीढ़ी की उपेक्षा की है, आपने अपने आसुस की उपेक्षा की, आपने एचटीसी की उपेक्षा की। आप लोग जापान की तरह भारत में अपने ब्रांडों को अच्छी तरह से प्रोत्साहित क्यों नहीं कर रहे हैं, साझेदारियां क्यों नहीं कर रहे हैं ?
ताइवान के बारे में दिलचस्प बात यह थी कि पांच साल पहले तक ताइवानी कंपनियां अमेरिकी और चीनी बाजार से संतुष्ट थीं। अब भी वे बहुत चुनिंदा तरीके से काम करती हैं और मानती हैं कि अगर आप चीन और अमेरिका में पैसा कमा सकते हैं तो अच्छा है। आपको अधिक या किसी भी अन्य स्थान के बारे में सोचने की ज़रूरत नहीं है। वे विस्तार नहीं करना चाहते थे। यह उनकी क्षमता के अनुरूप था क्योंकि उनके पास वह दृष्टि नहीं थी... महत्वाकांक्षा नहीं थी। लेकिन, अमेरिका और चीन में कठिनाइयों के बाद लोग तीसरे बाजार के बारे में सोचने लगे हैं। और तीसरा बाजार कहां था? उन्हें लगा कि कि दक्षिण पूर्व एशिया में जहां इंडोनेशिया के फिलीपींस को मिला कर 60 करोड़ की आबादी है। इसलिए हमने वहां व्यापार करने की कोशिश की। तभी, अचानक हमने पाया कि एक और बड़ा बाजार है जो 1.3 अरब आबादी वाले भारत में है। लेकिन जब उन्होंने भारतीय बाजार को देखना शुरू किया, तो उन्हें समस्या का सामना करना पड़ा क्योंकि सैमसंग और सुजुकी यहां पहले से ही थे, हुंडई पहले से ही था। उन्होंने सोचा कि हम इस बाजार में कैसे लड़ सकते हैं? हमें यह बाजार थोड़ा देर से मिला लेकिन फिर भी आपके पास हमेशा एक मौका है। भारत में आपके पास हमेशा अवसर हैं। भारत में मेरा मतलब है कि आपके पास बहुत सारे लोग हैं, जो दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से हैं। सबसे बड़े मध्यम वर्ग के हैं। भारत का मध्यम वर्ग बाजार काफी दिलचस्प है। वे केवल 20,000 डॉलर में कार चाहते हैं और यहां टाटा से लेकर मर्सिडीज एक तक लंबी रेंज है।