'हिंदुइज्म का अर्थ हिंदुत्व नहीं है'
   दिनांक 28-जनवरी-2020
हिंदुत्व सोचने के लिए एवं एक वैकल्पिक सोच रखने के लिए भी स्थान देता है. वह जड़ नहीं है,वह परिवर्तनशील है. वह हमेशा बढ़ती हुई एवं विकसित होती हुई परम्परा है जो परिवर्तनों को सहज स्वीकार करती है

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विगत दो वर्षों की भांति ही वर्ष 2020 में दिल्ली में आयोजित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेला में "शब्द उत्सव -2020" का आयोजन किया गया. विभिन्न विषयों पर विमर्श के द्वार खोलने वाला शब्द उत्सव स्वयं में एक अनूठा आयोजन है. पुस्तक मेले के प्रथम दिन एक सत्र में जहां एक तरफ प्रख्यात विचारक एवं प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक श्री जे. नंदकुमार से हिन्दू-दर्शन, संस्कृति और राजनीति पर भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक श्री के. जी. सुरेश ने उनकी पुस्तक 'हिंदुत्व – फॉर द चेंजिंग टाइम्स' के परिप्रेक्ष्य में बातचीत की.
जे नंदकुमार ने कई पहलुओं पर चर्चा की. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि हिंदुइज्म का अर्थ हिंदुत्व नहीं है, बल्कि हिंदुत्व को किसी वाद या इज्म के साथ जोड़ने की आवश्यकता ही नहीं है. यह उससे कहीं बढ़कर है. उन्होंने कहा कि यह हिंदुत्व ही है जो इस पूरे देश को एक साथ जोड़े हुए है. हिंदुत्व को उन्होंने एक सांस्कृतिक अवधारणा बताया. उन्होंने कहा कि जो इस धरती को अपना मानता है और जो इस संस्कृति को अपना मानता है. यह हिंदुत्व ही है, जो कई विचारों को अपनाने के लिए स्थान देता है.
हिंदुत्व को किसी इज्म के साथ जोड़ने के खतरों के विषय में उन्होंने कहा कि यदि आज हमने यह मान लिया कि हिंदुत्व का अर्थ हिंदुइज्म है तो आने वाली पीढ़ी हिंदुत्व की मूल अवधारणा से एकदम कट जाएगी तथा वह हिंदुत्व जो कि एक जीवन शैली है, उसे मात्र एक वाद और विचार समझेगी.
हिंदुत्व को और स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदुत्व सोचने के लिए एवं एक वैकल्पिक सोच रखने के लिए भी स्थान देता है. वह जड़ नहीं है,वह परिवर्तनशील है. वह हमेशा बढ़ती हुई एवं विकसित होती हुई परम्परा है जो परिवर्तनों को सहज स्वीकार करती है. उन्होंने कहा कि हमारे यहां जितना सम्मान ऋषि वशिष्ठ का है उतना ही चार्वाक का है. हिंदुत्व वह है जो हर दर्शन को स्थान देता है यहाँ तक कि यौन विषयों को भी, तभी कामसूत्र की रचना करने वाले वात्सायन भी ऋषि कहलाए जाते हैं.
हालिया चल रहे नागरिकता संशोधन क़ानून पर विवाद के विषय में उन्होंने कहा कि जो लोग इस भूमि की संस्कृति को अपनी संस्कृति नहीं मानते हैं, जो लोग अपना मुख्यालय मोस्को में मानते हैं, तो उनका डरना स्वाभाविक ही है. उन्हें तो डर लगना ही चाहिए, और जो इस संस्कृति को अपना मानते हैं, उन्हें किस बात का भय! चर्चा के अंत में श्रोताओं से भी प्रश्न का सत्र रखा गया था.