तरफदारी में लगे हैं सेकुलर दरबारी
   दिनांक 28-जनवरी-2020
फेसबुक और ट्विटर पर लोग आम आदमी पार्टी सरकार की विफलताओं की कहानी आम लोग बता रहे हैं, लेकिन मीडिया की आंखें बंद हैं।
 
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पिछले दिनों बांटे गए रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार पाने वालों में दागी चेहरे भी शामिल
 
 
सेकुलर मीडिया के खेल समझना अब बहुत मुश्किल नहीं है। सोशल मीडिया रोज उसके पक्षपात की पोल खोल रहा है। झारखंड में 7 वनवासियों को पत्थलगड़ी आंदोलन का विरोध करने पर गला काटकर मार डाला गया। लेकिन दिल्ली के तमाम अखबारों और चैनलों ने ऐसी चुप्पी साधी कि भरोसा नहीं हुआ कि ये वही हैं, जिन्होंने कुछ दिन पहले उसी झारखंड में एक चोर की पिटाई पर आसमान सिर पर उठा लिया था। कारण साफ है पत्थलगड़ी के पीछे ईसाई मिशनरियों का हाथ है। रांची से छपने वाले स्थानीय अखबारों ने इस घटना को प्रमुखता से जगह दी, लेकिन दिल्ली के मीडिया ने ज्यादा तूल नहीं दिया। जिन्होंने छापा भी तो झारखंड सरकार की मदद से यह दलील डाल दी कि यह हत्याकांड 'आपसी झगड़े का नतीजा' था और इसका मिशनरियों से कोई लेना-देना नहीं है। सवाल यह है कि पिछले दिनों झारखंड में होने वाली हर आपराधिक घटना को हिंदुओं और हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों से जोड़ने वाला मीडिया इस मामले में इतना रक्षात्मक क्यों है?
 
'टाइम्स ऑफ इंडिया' समेत कुछ अखबारों ने 2 दिन बाद बड़ी ही सहजता के साथ छापा कि मारे गए लोग 'ईसाई वनवासी' थे। यह स्पष्टीकरण ही अपने आप में बहुत कुछ कहता है कि अखबार किसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल गांधी छत्तीसगढ़ और झारखंड की रैलियों में बोला करते थे कि 'केंद्र सरकार ने एक कानून पारित कर दिया है, जिसमें वनवासियों को देखते ही गोली मार दी जाएगी'। राहुल गांधी के इस बयान को मीडिया जस का तस चलाता था, बिना यह बताए कि वे झूठ बोल रहे हैं। वह एक सोची-समझी चाल थी, जिसमें दोनों राज्यों के भोले-भाले वनवासियों को फंसाया गया। अब जब वहां पर कांग्रेस की सरकार बन चुकी है तो वनवासियों की जमीन हड़पने और कन्वर्जन का खुला खेल जारी है। ऐसे में क्यों न मानें कि इस पूरे दुश्चक्र में मीडिया भी सक्रिय भागीदार है?
 
राहुल गांधी की आलोचना पर मुंबई विश्वविद्यालय के प्रोफेसर योगेश सोमण को लंबी छुट्टी पर भेजने का मामला भी अभी तक मीडिया के संज्ञान में नहीं आया है। कार्रवाई के विरोध में छात्रों और दूसरे संगठनों ने प्रदर्शन की घोषणा की तो पुलिस ने अनुमति नहीं दी। आश्चर्य होता है कि नागरिकता संशोधन कानून के नाम पर बसें जलाने और सड़कें बंद करने का समर्थन कर रहा मीडिया का यह वर्ग इस मामले पर मौन क्यों है? दूसरी तरफ दंगों में शामिल रह चुके चंद्रशेखर रावण नाम के एक व्यक्ति को 'नायक' बनाने का काम जारी है। खास तौर पर 'आजतक' और 'इंडिया टुडे' में उसके लंबे-लंबे साक्षात्कार मिल जाएंगे। उसकी गतिविधियां 'ब्रेकिंग न्यूज' बनाकर दिखाई जाती हैं। वह खुद को दलितों का नेता बताता है, लेकिन काम ऐसे करता है जिससे दलितों का विरोध झलकता है। उसका कोई राजनीतिक या सामाजिक महत्व भी नहीं है।
 
सवाल उठता है कि मीडिया किसके इशारे पर उसे इतना महत्व दे रहा है? 'इंडियन एक्सप्रेस' समूह के रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार पिछले दिनों बांटे गए। ये पुरस्कार एक खास विचारधारा के पत्रकारों को दिए जाते हैं। निष्पक्षता का भ्रम बना रहे इसके लिए कुछ अपवाद जरूर होते हैं, लेकिन पुरस्कृतों की सूची देखते ही सचाई सामने आ जाती है। इस बार की सूची में यौन शोषण के आरोपी से लेकर वह पत्रकार भी शामिल है जिस पर एक जवान को आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला चल चुका है। इस सूची में 'इंडिया टुडे' और 'बीबीसी' जैसे संस्थानों के नाम हैं, जिन्होंने पिछले एक साल में सबसे ज्यादा फर्जी खबरें फैलाईं। लेकिन आपको इसमें 'ऑपइंडिया', 'स्वराज्य' जैसे राष्ट्रवादी संस्थानों का एक भी नाम नहीं मिलेगा जिन्होंने उनके झूठों की पोल खोली। शायद यही कारण था कि पुरस्कार समारोह की अध्यक्षता कर रहे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भी कहना पड़ा कि फर्जी खबरों की समस्या का कुछ हल निकाला जाना चाहिए। मजेदार बात यह कि खुद 'इंडियन एक्सप्रेस' ने भी राष्ट्रपति के इस महत्वपूर्ण वक्तव्य को ज्यादा प्रमुखता नहीं दी।
 
दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी के लिए मीडिया की 'सकारात्मक कवरेज' जारी है। किसी भी राज्य में चुनाव होते हैं तो समाचार पत्र और चैनल पिछले 5 साल के कामकाज की समीक्षा करते हैं, लेकिन दिल्ली में आपको ऐसा कुछ नहीं मिलेगा। विज्ञापनों का दबाव ऐसा है कि अखबारों ने निष्पक्षता का दिखावा करना तक छोड़ दिया है। फेसबुक और ट्विटर पर लोग आम आदमी पार्टी सरकार की विफलताओं की कहानी आम लोग बता रहे हैं, लेकिन मीडिया की आंखें बंद हैं।