झूठी बिसात, फर्जी मोहरे
   दिनांक 28-जनवरी-2020
संदीप महापात्रा

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नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी के विरुद्ध जगह-जगह लोगों का मजमा जुटाकर हाय-तौबा मचाने वाले सेकुलर दल तक इस कानून की वैधानिकता को लेकर जनता को गुमराह कर रहे हैं। ज्यादातर प्रदर्शनकारियों को इस कानून के बारे में कुछ पता नहीं है। मुम्बई के इस प्रदर्शन में लड़की ने 'फ्री कश्मीर' का पोस्टर थामा हुआ था 
 
तीन पड़ोसी इस्लामिक देशों-अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान-में उत्पीड़न के शिकार हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई अल्पसंख्यकों को गरिमापूर्ण पहचान देने के लिए भारत ने नागरिकता संशोधन कानून-2019 बनाया है। यह कानून उन पर लागू है जिन्होंने मजहबी उत्पीड़न के कारण 31 दिसम्बर 2014 या उससे पहले भारत में शरण ली। लेकिन, विडंबना है कि इस कानून का विरोध करने के लिए सेकुलरों और कुछ विपक्षी दलों, जिनमें कांग्रेस मुख्य है, की शह पर मतान्ध मुसलमान सड़क पर उतर आए और 'कागज नहीं दिखाएंगे', 'हम देखेंगे', 'असंवैधानिक, फासीवादी कानून' जैसे उग्र नारों से वातावरण को विषाक्त करने लगे।
हैरानी की बात है कि इन प्रदर्शनकारियों और उनके राजनीतिक आकाओं को उस समय अपने कागज दिखाने, यहां तक कि बायोमेट्रिक जानकारी देने में भी कोई परेशानी नहीं हुई थी जब उन्हें किसी सरकारी योजना का फायदा या वित्तीय सहायता हासिल करनी थी या महज सिम-कार्ड लेना था। लेकिन निहित स्वार्थी तत्वों की अंधी, अविवेकी भीड़ नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने के लिए इन्हीं औपचारिकताओं को 'अन्याय' बता रही है और कई नए सेकुलर चेहरे इस मजहबी हंगामे की आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। 
विपक्ष का असंवैधानिक कदम
विभिन्न सेकुलर संगठनों की ओर से सवार्ेच्च न्यायालय में दायर करीब 140 याचिकाएं मानो पर्याप्त नहीं थीं कि केरल में माकपा ने भी भेड़चाल में शामिल होते हुए संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत मुकदमा दायर कर दिया है। इससे विपक्षी दलों द्वारा शासित अन्य राज्यों के भी इसी संविधान विरोधी रास्ते पर चलने की आशंका खड़ी हो गई है। कोई आश्चर्य नहीं अगर पंजाब, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्य भी इस कानून के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने के एकमात्र एजेंडे के साथ विधानसभा सत्र बुलाने पर विचार करने लगें। विडबंना यह है कि जो राज्य सरकारें शासन का दायित्व लेते समय संविधान की शपथ लेती हैं और कभी-कभी अपने किसी दोषपूर्ण कदम को भी वैध ठहराने के लिए संवैधानिक मूल्यों की आड़ लेती हैं, वही आज संविधान के बुनियादी स्वरूप यानी संघीय ढांचे के विपरीत काम कर रही हैं, जिसे केशवानंद भारती मामले (1973) में और बाद में एस़ आऱ बोम्मई मामले (1994) में सवार्ेच्च न्यायालय स्पष्ट कर चुका है। विश्वास करना मुश्किल है कि ये सभी राज्य सरकारें, जो देश के सर्वश्रेष्ठ कानूनविदों की सलाह लेती रहती हैं, हमारे संविधान के इस मूल पहलू से अनजान होंगी। साफ है कि यह सारा खेल राजनीतिक शतरंज का हिस्सा है। हमारे संविधान का अनुच्छेद 1 कहता है कि भारत राज्यों का संघ होगा। इस तरह हम भारतीय एक संघीय संविधान के अधीन हैं।
हम जानते हैं कि कुछ विषय केंद्र के क्षेत्राधिकार में हैं तो कुछ राज्यों के पास हैं। उन्हीं आधारों पर केंद्र और राज्यों को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। इसे और सहज और पारदर्शी बनाने के लिए संविधान की 7वीं अनुसूची में संघीय सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची (सूची 1, 2, 3) का प्रावधान किया गया है। यह भी सुनिश्चित किया गया है कि संघीय सूची में शामिल सभी विषयों के संबंध में कानून बनाने का एकमात्र विशेषाधिकार केंद्र के पास है, जबकि राज्यों को सूची 2 में शामिल विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है। सूची 3 के अंतर्गत विषयों पर केंद्र और राज्यों दोनों को कानून बनाने के समवर्ती अधिकार प्राप्त हैं।
कानून निर्धारण के अधिकार का यह सीधा-सा बंटवारा इस हो-हल्ले में बड़ी चतुराई से पर्दे के पीछे खिसका दिया गया है। उनकी बदनीयती का आलम यह है कि वे संघीय सूची की प्रविष्टि 17 को अहमियत देने के लिए भी तैयार नहीं हैं, जो केंद्र को नागरिकता संबंधी कानून तय करने का अधिकार देता है। संविधान के अनुच्छेद 256 के अनुसार जब राज्य संशोधन लागू करने के लिए बाध्य हैं, तो ऐसे में उनका विरोध कहां से जायज है? संविधान द्वारा अनिवार्य संशोधन को लागू करने के बजाय राज्य निहित स्वार्थ के तहत भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं।
आज की परिस्थितियों में संविधान सभा में हुई एक चर्चा मार्गदर्शक बन सकती है। अनुच्छेद 5-11 पर संसद में हुई चर्चा के दौरान डॉ़ बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था कि इन प्रावधानों का कतई मतलब नहीं कि संसद को समय की आवश्यकता के अनुसार उचित नागरिकता कानून बनाने का अधिकार नहीं होगा। आज इस बात को याद करना प्रासंगिक है कि इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए नागरिकता अधिनियम-1955 में नागरिकता प्राप्त करने के साथ इसके खोने का भी प्रावधान रखा गया था। उस कानून के अनुसार नागरिकता पांच तरीके से हासिल की जा सकती है-(क) जन्म (ख) वंशानुक्रम (ग) पंजीयन (घ) देश में रहने के आधार पर, और (ड़) किसी नए क्षेत्र के शामिल होने की स्थिति में। इनमें कुछ स्थितियों में नागरिकता छीन लेने का भी प्रावधान है।

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अपनी 'दलित राजनीति' की बैसाखी तलाश रहे भीम आर्मी के चंद्रशेखर भी जामा मस्जिद जाकर मुसलमानों को रिझा रहे थे और नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ उन्हें उकसा रहे थे 
संसद में हुआ गहन मंथन
इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि नागरिकता कानून में संसद ने दस से भी अधिक बार संशोधन किए और इन संशोधनों को हर बार राज्यों ने बिना किसी विरोध के लागू किया। यह जानना भी दिलचस्प है कि जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने 2003 में इस मुद्दे को औपचारिक कानून के जरिये हल करने की ओर पहला कदम बढ़ाया था तब पूर्व प्रधानमंत्री डॉ़ मनमोहन सिंह ने खुलकर इसका समर्थन किया था। 2004 में नागरिकता से संबंधित एक नियम अधिसूचित किया गया जिसमें गुजरात और राजस्थान के जिलाधीशों को एक साल के लिए विशेष अधिकार दिया गया ताकि वे '1965 और 1971 के युद्धों के बाद पाकिस्तान से विस्थापित अल्पसंख्यक हिंदुओं' को नागरिकता दे सकें। संप्रग सरकार ने भी 2004 में इस नियम को दो साल के लिए और फिर 2005 में तीन साल के लिए बढ़ा दिया था। आज नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे किसी भी राजनीतिक दल को तब इस बात पर कोई परेशानी नहीं हुई कि सिर्फ हिंदुओं को क्यों नागरिकता दी जा रही है! बल्कि वास्तविकता तो यह है कि संप्रग-2 के दौरान प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाली गृह मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति ने तो यह सिफारिश की थी कि सरकार को पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए नागरिकता अधिनियम में संशोधन करना चाहिए। इतना ही नहीं, 2011 में वेंकैया नायडू की अध्यक्षता वाली राज्यसभा की समिति ने भी ऐसी ही राय दी थी, जिसमें सभी राजनीतिक दलों के लोग शामिल थे। पिछले संशोधन के दौरान 2015 में जब नागरिकता संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया था, तो वहां भी कुछ अलग नहीं हुआ था। समिति ने इस पर लोगों से राय मांगी जिसके बाद लगभग 35,000 ज्ञापन आए। समिति ने पूरे देश में घूम-घूमकर लोगों के विचार जाने। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से किसी भी ज्ञापन में यह नहीं कहा गया था कि इस तरह का कानून बनाना संविधान के विरुद्ध होगा क्योंकि इसमें किसी समुदाय को धार्मिक आधार पर नागरिकता देने की बात की जा रही है। यह भी दिलचस्प तथ्य है कि तब किसी ने भी इसमें अहमदिया या उस जैसे अन्य इस्लामी पंथों को शामिल करने की बात नहीं की थी। तब तो किसी ने समानता या पंथनिरपेक्षता का सवाल नहीं उठाया था! यह पूरा दस्तावेज पिछले पांच साल से सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है, लेकिन आज ऐसी हाय-तौबा मचाई जा रही है और लोगों को गुमराह किया जा रहा है मानो यह सब विपक्षी दलों से बातचीत किए बगैर ही किया गया।
बेबुनियाद दलील
दरअसल, वोट बैंक की राजनीति देश के लिए एक अभिशाप बन गई है। आज नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों ने वोट बैंक के कारण ही दुष्प्रचार अभियान छेड़ रखा है। फिर भी, नागरिकता कानून अधिनियम को लेकर उनकी जितनी भी शंकाएं हैं, उनका समाधान मुश्किल नहीं है। उनका सबसे बड़ा तर्क यह है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है क्योंकि यह मुस्लिमों को नागरिकता से वंचित करता है। यह दलील सरासर बेबुनियाद है क्योंकि नागरिकता कानून अधिनियम किसी भी अन्य मत के व्यक्ति के लिए नागरिकता पाने की प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं करता। इसके आने के बाद भी दूसरे मतावलंबी नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह भी तथ्य है कि पिछले पांच साल के दौरान पाकिस्तान के 600 मुसलमानों को भारत की नागरिकता दी गई। वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमान भी भारत में रहने के आधार पर यहां की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। अंतर केवल इतना है कि सीएए के तहत धार्मिक तौर पर उत्पीडि़त अल्पसंख्यकों को नागरिकता पाने के लिए भारत में रहने की न्यूनतम अवधि पांच साल कर दी गई है जबकि मुसलमानों के लिए पहले की तरह यह अवधि 11 साल होगी।
दूसरी दलील यह दी जा रही है कि नागरिकता कानून अधिनियम में कुछ खास अल्पसंख्यकों की ही बात करना स्पष्ट भेदभाव है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि नागरिकता कानून अधिनियम में उन संप्रदायों को इस कारण शामिल किया गया है क्योंकि उन्हें धार्मिक उत्पीड़न के परिणामस्वरूप अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भागना पड़ा है और यह बात इस तथ्य से ही स्पष्ट है कि इन तीनों देशों में इन अल्पसंख्यकों की संख्या में भारी गिरावट आई है। इसके अलावा, इस तरह के धार्मिक उत्पीड़न का विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भी स्पष्टता के साथ उल्लेख किया है।
पंथनिरपेक्षता पर आंच नहीं
तीसरा तर्क पंथनिरपेक्षता से जुड़ा है। विपक्ष हमेशा इस दलील के साथ आसमान सिर पर उठा लेता है कि पंथनिरपेक्षता का उल्लंघन हो रहा है। लेकिन इस संदर्भ में भी यह कानून किसी भी देश के मुसलमानों को भारत में नागरिकता देने से नहीं रोकता। लिहाजा, यह तर्क अपने आप खारिज हो जाता है। नागरिकता संशोधन कानून के विरुद्ध एक और तर्क दिया जा रहा है कि आखिर रोहिंग्या और अहमदिया मुसलमानों को नागरिकता क्यों नहीं? जहां तक रोहिंग्या की बात है, उन्हें न केवल उनके अपने मूल देश म्यांमार में बल्कि बांग्लादेश में भी सुरक्षा के नजरिये से खतरे के तौर पर देखा जाता है। ऐसे में देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा करने वाले इन लोगों को नागरिकता देने की दलील आग से खेलने जैसी है। रही बात अहमदिया की तो, अहमदिया पाकिस्तान में कोई मजहबी अल्पसंख्यक नहीं हैं। वे मुसलमान ही हैं और पाकिस्तान की सरकार उन पर जो भी अत्याचार कर रही है, उसका कोई राजनीतिक आधार नहीं है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वे अहमदिया ही थे जो पाकिस्तान को एक इस्लामी मुल्क बनाने के अभियान में आगे थे इसलिए ऐसे लोगों को भारत में नागरिकता देने का मतलब उन लोगों को एक ठिकाना देना होगा जिन्होंने न केवल दो राष्ट्र का सिद्घांत दिया, बल्कि उसके लिए लक्षित उद्देश्य के साथ आंदोलन भी किए। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि 2016 में गठित संयुक्त संसदीय समिति को ऐसा कोई ज्ञापन नहीं मिला जिसमें रोहिंग्या या अहमदिया को नागरिकता देने की बात की गई थी। अगर आज सेकुलर इसे मुद्दा बना रहे हैं, तो कारण विशुद्ध राजनीतिक है।
सामने आया असली चेहरा
नागरिकता कानून अधिनियम को रद्द करने की मांग लेकर सर्वोच्च न्यायालय पहुंचने वाले सभी 144 याचिकाकर्ताओं ने अगर खानापूर्ति नहीं की, तो इन सभी ने कभी-न-कभी देश में दलित हितों की बात की है, उनके मुद्दे को उठाया है। लेकिन यह बात चौंकाने वाली है कि इन याचिकाकर्ताओं ने सहूलियत के मुताबिक इस तथ्य की ओर से मुंह फेर लिया कि संशोधित नागरिकता कानून से पाकिस्तान और बांग्लादेश के उन दलितों का भला होगा जो धार्मिक आधार पर उत्पीड़न के शिकार हुए हैं। न्यायालय में डाली गईं याचिकाओं में पेश दलीलों ने इन याचिकाकर्ताओं के साथ-साथ माकपा जैसी पार्टियों के भी तथाकथित दलित-हितैषी होने की कलई खोल दी है।
गौरतलब है कि पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री जोगेंद्रनाथ मंडल को अपनी जान बचाने के लिए वहां से भागना पड़ा था क्योंकि वह एक हिंदू थे। पीछे रह गए लाखों दलितों की किस्मत पर ग्रहण लग गया। वे या तो मारे गए या कन्वर्ट कर दिए गए या उन्हें जान बचाकर भागना पड़ा। मीडिया के जरिए अक्सर खबरें आती रहती हैं कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में आज भी अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार हो रहे हैं जिसमें उनके घरों की महिलाओं के अपहरण और नृशंस हत्याएं तक शामिल हैं। अगर भारत ने इस मसले का समाधान करने के लिए यह जरूरी कदम उठाया है तो इसे गलत ठहराना कहां से जायज है?
वोट बैंक के लालची
आमतौर पर देखा गया है कि विपक्षी दल और उनके समर्थक देश भर में किसी भी मामले पर प्रदर्शन के लिए निकल पड़ते हैं और अक्सर हिंसक हो जाते हैं। वे हिंदू आस्था और देवी-देवताओं तथा प्रतीकों का अपमान करते हैं और नारे लगाते हैं। दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में एक महीने से आवागमन बाधित है जिससे लाखों लोगों को बेहद असुविधा झेलनी पड़ रही है। यहां तक कि एंबुलेंस, स्कूल बसों को भी नहीं जाने दिया जा रहा। विभिन्न विपक्षी दलों के नेता वहां पहुंचकर चिंगारी को हवा देने और उसे जिलाए रखने के लिए धन और बाहुबल, सभी आजमा रहे हैं। दुख की बात यह है कि विरोध प्रदर्शन करने वालों ने नागरिकता संशोधन कानून के वास्तविक मसौदे को न तो ठीक से पढ़ा है, न ही समझने की कोशिश की है। उनमें से कई लोग सवाल पूछने पर रटा-रटाया जवाब देते हैं कि 'यह कानून मुसलमानों के खिलाफ है', पर यह नहीं बता पाते कि इसका वास्तविक अर्थ क्या है। साफ है कि यह पूरी कवायद मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए है।
सर्वोच्च न्यायालय में इस कानून पर शुरू हुई पर सुनवाई से उम्मीद है, यह प्रक्रिया देश के लिए हितकारी रहेगी जिस कानून के बनने से देश के अधिकांश नागरिक खुश हैं।
( लेखक सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता और जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष हैं )