वायदों की कसौटी पर कितने खरे ‘आप’
   दिनांक 29-जनवरी-2020
शिवानंद द्विवेदी
राजनीतिक जीवन में तमाम नेताओं द्वारा बोले गये अनेक झूठ और वादाखिलाफी से देश अभ्यस्त है, किंतु ‘बच्चों की कसम’ वाला ऐलान अनोखा था. कोई भी सहज मान सकता था कि केजरीवाल इसलिए झूठ नहीं बोल रहे क्योंकि अपने बच्चों की कसम खा रहे हैं. 

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दाग देहलवी का एक मशहूर शेर है- वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे, तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किसका था....दिल्ली चुनावों पर यह शेर मौजूं है. यही कोई छह-सात साल पुरानी बात है. वर्ष 2013 का नवंबर-दिसंबर रहा होगा जब दिल्ली ही क्या, पूरे देश की जनता रोज नए-नए शब्दों से आह्लादित और आकर्षित हुआ करती थी. कानों को कितना सुकून देता था ऐसा सुनना कि ‘हम नए तरह की राजनीति करने आए हैं. हम न गाड़ी लेंगे, न बंगला लेंगे, न सुरक्षा लेंगे, अपना उम्मीदवार हम मोहल्ला सभा से तय करेंगे, हर फैसला जनता से पूछकर लिया जाएगा! वाकई रोचक था ये सब सुनना. वैसे राजनीति की व्यवहारिकता में ये सब हो पाना दुर्लभ है, किंतु अतिवादी प्रवचनों से झूठ पर टिका आदर्शलोक गढ़ देने वालों के लिए यह सब बेबाकी से बोलना बिलकुल कठिन नहीं था. जनता ने भरोसा जताया और 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में आदर्शलोक का पिटारा लेकर उतरी नई-नवेली आम आदमी पार्टी को 28 सीटों की जीत दे दी. झाड़ू लेकर पहले चुनाव में उतरी आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल को मिला यह जनादेश अभूतपूर्व था. यह भरोसे की नींव पर टिका जनादेश था. यह भरोसा केजरीवाल की तमाम बातों के साथ कैमरे पर ऑन रिकॉर्ड कही उस बात के लिए भी था कि ‘अपने बच्चों की कसम कहता हूँ न कांग्रेस से समर्थन लूंगा, न दूंगा.’ राजनीतिक जीवन में तमाम नेताओं द्वारा बोले गये अनेक झूठ और वादाखिलाफी से देश अभ्यस्त है, किंतु ‘बच्चों की कसम’ वाला ऐलान अनोखा था. कोई भी सहज मान सकता था कि केजरीवाल इसलिए झूठ नहीं बोल रहे क्योंकि अपने बच्चों की कसम खा रहे हैं.
दुर्भाग्य से चुनाव जीतने के बाद जो पहली वादाखिलाफी अरविन्द ने जनता से की, वह अपने बच्चों की कसम खाने के बावजूद कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में सरकार बनाई. आदर्श स्थिति तो यह थी कि उन्हें बहुमत नहीं मिला था तो भाजपा की तरह वे भी सरकार बनाने से मना कर देते. खैर, सरकार बनी और जनलोकपाल विधेयक के मुद्दे पर 49 दिनों में गिर गई. इस्तीफ़ा देते हुए अरविन्द द्वारा कहा गया कि हम जनलोकपाल के मुद्दे पर समझौता नहीं कर सकते. हालांकि इस बीच उन्होंने दिल्ली छोड़कर बनारस से मोदी को हराने का असफल प्रयास भी आजमा लिया था. आज इस सवाल का जवाब आम आदमी पार्टी नहीं दे पा रही कि पांच साल तक प्रचंड बहुमत से सरकार चलाने वाली ‘आप’ का जनलोकपाल पर क्या कहना है ? विपक्षी दल पूछ रहा है और दिल्ली सरकार के मुखिया मौन मारे बैठे हैं. सवाल वही है कि उन्होंने किन कारणों से ‘जनलोकपाल’ कानून से समझौता कर लिया ?
वर्ष 2015 फरवरी में दोबारा दिल्ली चुनाव की घोषणा हुई. हालांकि इसबार आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद के आदर्शवादी नारों के स्वर थोड़े मद्धम पड़ने लगे थे. मोहल्ला सभा से पूछ्कर चुनावों में उम्मीदवार उतारने की नीति पर भी कोई बात करने को तैयार नहीं था. जहां और जिस दल से उम्मीदवार मिले, वहां से लिया और चुनाव में उतर गये. इसबार बंगला, गाड़ी और पार्टी के आंतरिक लोकपाल की बातें भी नहीं की गईं थीं. इस बार आम आदमी पार्टी बाकी दलों की तरह अपना घोषणा-पत्र ’70-प्वाइंट एक्शन प्लान’ के नाम से लेकर आई. उस एक्शन प्लान के 70 वादों को आज जब कसौटी पर देखते हैं तो अहसास होता है कि 2015 में ‘झूठ’ एक नया लिबास ओढ़कर आया था.
पानी पर ‘बेपानी’ केजरीवाल
केजरीवाल सरकार ने अपने 2015 के एक्शन प्लान में छह बिंदुओं का वादा दिल्ली की जनता से शुद्ध पेयजल को लेकर किया था. पहला बिंदु था- ‘वाटर एज ए राइट’. इसके लिए वाटर स्टोरेज बनाने, पानी माफियाओं का तंत्र तोड़ने, हर घर तक शुद्ध पीने योग्य पानी मुहैया कराने सहित कुछ वादे जाहिर किए गए थे. किंतु केजरीवाल सरकार के साढ़े चार साल बीत जाने के बाद 2019 के अंत में आई भारतीय मानक ब्यूरो की रिपोर्ट में दिल्ली के पेयजल को 19 मानकों पर विफल बताया गया. दिल्ली की जनता को शुद्ध पानी नहीं मुहैया करा पाने के सवाल पर हाल ही में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का जवाब तो और भी असंवेदनशील तथा हास्यास्पद है. अपनी गलती मानने की बजाय सिसोदिया ने पानी के अशुद्ध होने के पीछे ‘फिजिक्स’ का कारण बता दिया. खैर, इसके बाद तो शुद्ध पानी मुहैया करा पाने में असफल साबित हुई केजरीवाल सरकार द्वारा पानी को लेकर किये बाक़ी वायदों पर बात करना ही निरर्थक लगता है.
परिवहन: नाकामी पर पर्दादारी
यातायात और परिवहन को लेकर 2015 में केजरीवाल की पार्टी ने पांच बिंदुओं का एक्शन प्लान दिया था. उसमें से 51वे बिंदु में आम आदमी पार्टी द्वारा दिल्ली परिवहन की 5000 नई बसें उतारने का वादा किया गया था. आज जब उस वादे की पड़ताल करते हैं तो सरकार का प्रदर्शन फिसड्डी नजर आता है. पांच हजार नई बसें चलाने का वादा करने वाली पार्टी की सरकार रहते पिछले पांच वर्षों में कितनी बसें चली हैं, इसका अंदाजा ताजा आंकड़ों से लगाया जा सकता है. नवंबर 2019 में प्रकाशित इंडिया टुडे वेबसाईट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2015 में जब केजरीवाल सरकार बनी थी, तब जितने बसें चल रहीं थीं उससे भी कम बसें वर्तमान में मौजूद हैं. वर्तमान में सरकार के पास उपलब्ध बसों की संख्या दिल्ली की जरूरत के एक तिहाई से भी कम है. यहां तक ऑड-इवेन के दौरान दिल्ली सरकार को निजी बसों से काम चलाना पड़ा था. सवाल है कि यातायात को लेकर यह सरकार पांच साल सोई क्यों रही ? सवाल यह भी है कि क्या अपनी इस नाकामी पर पर्देदारी के लिए सरकार ने चुनावी मौसम में महिलाओं के लिए ‘फ्री बस सेवा’ का शिगूफा छोड़ दिया ? वहीँ ऑटो वालों के लिए केजरीवाल द्वारा किए गए वादों पर नीतिगत स्तर पर कुछ किया गया हो, ऐसा नहीं नजर आता.
सेहत से किया खिलवाड़
2015 में आम आदमी पार्टी के ’70 प्वाइंट एक्शन प्लान’ में वादा था कि उनकी सरकार आने पर 900 नए प्राथमिक उपचार केंद्र और 30,000 बेड का विस्तार किया जाएगा. दुर्भाग्यपूर्ण है कि पांच साल में एक भी स्तरीय प्राथमिक उपचार केंद्र बनाने का काम केजरीवाल सरकार द्वारा नहीं किया गया. साथ ही 30,000 बेड विस्तार का वादा करने वाली सरकार ने महज 400 के आसपास बेड का विस्तार अस्पतालों में किया. मोहल्ला क्लिनिक को लेकर केजरीवाल सरकार ढोल पीटती नजर आती है. किंतु मोहल्ला क्लिनिक में बुनियादी व्यवस्थाओं का अकाल किसी से छिपा नहीं है. प्रति 1 हजार व्यक्तियों पर 5 बेड की उपलब्धता के वादे की स्थिति का अंदाजा पांच साल में केजरीवाल सरकार द्वारा किए गए असंतोषजनक कार्यों से लगाया जा सकता है. दवाईयों की उपलब्धता के मानकों पर भी केजरीवाल सरकार के कार्य निराशाजनक नजर आते हैं.
शिक्षा-व्यवस्था: खुद की वाहवाही का बेसुरा राग

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केजरीवाल सरकार ने अपने स्वभाव के अनुरूप एक आडंबर जरूर खड़ा किया कि उन्होंने शिक्षा व्यवस्था के कोई क्रांति ला दी है! किंतु उनके पांच साल पहले किए वादों और वर्तमान की सचाई में जब तुलना करते हैं तो उनका यह दावा भी खोखला नजर आता है. 2015 के अपने एक्शन प्लान में आम आदमी पार्टी ने 500 नए सरकारी विद्यालय तथा 20 नए महाविद्यालय खोलने का वादा किया था. पांच साल सरकार चलाने के बाद अगर इस वादे की पड़ताल करें तो स्थिति ढाक के तीन पात नजर आती है. पांच साल में संभवत: एक नया विद्यालय दिल्ली सरकार ने पांच साल में खोले हैं. 20 नए महाविद्यालय खोने के अपने वादे को केजरीवाल सरकार ने कभी भूल से भी याद नहीं किया. पहले से प्रस्तावित विद्यालयों की रंगाई-पुताई करके अपनी पीठ थपथपाने के अलावा इस सरकार ने कुछ ख़ास नहीं किया है. गुणवत्ता युक्त शिक्षा के अपने वादे पर भी सरकार पूरी तरह खरी नहीं उतरी है. दिल्ली सरकार के विद्यालयों में रिक्त पदों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है. विद्यार्थियों के प्रदर्शन के मामले में दिल्ली सरकार की स्थिति केन्द्रीय विद्यालयों की तुलना में बेहतर नहीं रही है.
विधायी शक्ति से परे वादे
आम आदमी पार्टी एक्शन प्लान में शुरू के तीन वादे थे- जनलोकपाल बिल, स्वराज बिल और दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा. ये तीनों ही वादे दिल्ली सरकार के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र से बाहर के थे. सवाल है कि संविधान सम्मत व्यवस्था में क्या कोई दल सिर्फ वोट के लिए ऐसा कोई वादा कर सकता है, जो उसके अधिकार क्षेत्र में न हो ? लेकिन यह सच है कि आम आदमी पार्टी ने ऐसा किया. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इन विषयों पर आम आदमी पार्टी ने ज्यादा कुछ मुखरता से जाहिर भी नहीं किया है. कहना गलत नहीं होगा कि आम आदमी पार्टी की सरकार 2015 में किये वादे के अपने शुरूआती तीन बिंदुओं पर मौन का रास्ता अख्तियार कर चुकी है.
कहा बहुत कुछ पर किया कितना ?
आम आदमी पार्टी के वादों की फेहरिस्त बहुत लंबी है. आधारभूत संरचना के विषय सड़क निर्माण, मुफ्त वाई-फाई की सुविधा, 15 लाख सीसीटीवी कैमरे, यमुना से जुड़ा प्रोजेक्ट, दिल्ली के ग्रामीण इलाकों का विकास, भूमि- सुधार जैसे वादों पर केजरीवाल सरकार ने पांच साल तक अनोखी चुप्पी साधे रही. न्यूनतम वैट लागू करने का वादा करके सत्ता में आई केजरीवाल सरकार ने शायद इस तरफ ध्यान नहीं दिया कि पेट्रोल की कीमतों पर दिल्ली से कम वैट भाजपा शासित गोवा और हरियाणा जैसे कई राज्यों में लागू रहा.
दरअसल वादों के पिटारे खोलने में कंजूसी नहीं करने वाली आम आदमी पार्टी अब जब दोबारा चुनाव में हैं तो इन वादों पर बोलने में कंजूसी दिखा रही है. तुष्टिकरण की राजनीति में वे उसी तरह डूबे हैं जैसे तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले अन्य दल डूबे दिखते हैं. यह सच है कि चुनाव में किए सभी वादे निभाना कठिन होता है, किंतु यह भी ठीक नहीं कि कोई दल अपने घोषित एजेंडे के अधिकांश मसलों को ठंडे बस्ते में डाल दे. अब जब सवाल खड़े हो रहे हैं तो इन सवालों का जवाब तो देना ही चाहिए.

( लेखक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर रिसर्च फेलो हैं.)