सद्ज्ञान व शौर्य का महापर्व
   दिनांक 29-जनवरी-2020
पूनम नेगी
वसंतोत्सव भारत की सर्वाधिक प्राचीन और सशक्त परम्परा है। इस पर्व को सद्ज्ञान की अधिष्ठात्री मां सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाये जाने के विस्तृत विवरण हमारे पुरा साहित्य में मिलते हैं

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ऋग्वेद में उल्लेख है कि सृष्टि की रचना के उपरान्त जीव जगत को स्वर देने के लिए सृजनकर्ता ब्रह्मा के आह्वान पर वीणा, पुस्तक के साथ वरमुद्राधारी मां सरस्वती ने इसी शुभ दिन अवतरित होकर मौन सृष्टि को स्वर दिया था। वाग्देवी के अवतरण की इस पावन तिथि पर मां सरस्वती की साधना से कण्ठ से सोलह धारा वाले विशुद्ध शाम्भवी चक्र का उदय होता है जिसका ध्यान करने से वाणी सिद्ध होती है। वैदिक युग से वर्तमान तक पर्व का यह तत्वदर्शन भारतीय मनीषियों के मानस को अपनी भावधारा से आबाध रूप से सिंचित करता आ रहा है।
जानना दिलचस्प हो कि सोलह कलाओं के पूर्णावतार योगेश्वर श्रीकृष्ण को वसंत का अग्रदूत माना जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में उल्लेख मिलता है कि सर्वप्रथम श्रीकृष्ण ने वसंतपंचमी के दिन ज्ञान व कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का पूजन कर इस परम्परा का शुभारम्भ किया था। इसीलिए वैष्णव धर्मावलंबी वसंत पंचमी को "श्रीपंचमी" के रूप में मनाते हैं। मान्यता है कि राधा-कृष्ण का प्रथम मिलन इसी शुभ दिन हुआ था। आज भी इस दिन वृंदावन के श्रीराधा श्यामसुंदर मंदिर में राधा-कृष्ण महोत्सव का भव्य आयोजन होता है। यह परम्परा द्वापर युग से चली आ रही है। ज्ञात हो कि सरस्वती एक ओर जहां विलुप्त नदी के रूप में जन संस्कृति का प्रतीक है तो दूसरी ओर हमारी देवभूमि की सांस्कृतिक चेतना के विकास का भी। ज्ञान-ध्यान,संयम व विवेक के साथ सरस्वती पूजन का यह पर्व कला संस्कृति के रूप में सदियों से जनमानस की आध्यात्मिक जिज्ञासा की प्यास तो बुझाता ही आ रहा है; हर्ष-उल्लास के साथ मन की कोमल भावनाओं को भी तरंगित करता है। हमारा जीवन सद्ज्ञान और विवेक से संयुक्त होकर शुभ भावनाओं की लय से सतत संचरित होता रहे, इस दिव्य भाव के साथ की गयी मां सरस्वती की भावभरी उपासना मानव के अंतस को सात्विक विचारों से भर देती है। यही वजह है कि भारतीय संस्कृति में देवी सरस्वती का स्वरूप बड़े ही प्रखर रूप में दिव्यता से वर्णित हुआ है। भविष्य पुराण में वसंत का चैत्रोत्सव के रूप में अत्यन्त सुंदर और सजीव वर्णन मिलता है। इस विवरण के अनुसार वसंत ऋतु में शुक्ल त्रयोदशी के दिन वाग्देवी के पूजन के उपरान्त उल्लास के देव काम और सौंदर्य की देवी रति की मूर्तियों को सिन्दूर से सजाकर सामूहिक रूप से पूजन कर मदन महोत्सव मनाया जाता था। प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में वसन्त ऋतु में "मदनोत्सव", "सुवसन्तक" एवं "वसन्तावतार" नामक महत्त्वपूर्ण उत्सवों का वर्णन मिलता है। राजा भोज के ग्रन्थ "सरस्वती कण्ठाभरण" में भी इस उत्सव का सुन्दर चित्रांकन मिलता है। इस ग्रंथ में यह भी उल्लेख है कि राजा भोज अपने जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में इस दिन से 40 दिवसीय उत्सव शु डिग्री करवाते थे जिसमें पूरी प्रजा के लिए प्रीतिभोज रखा जाता था। महाकवि कालिदास के ग्रंथ "ऋतु संहार" में भी वसन्तोत्सव पर प्रकृति और मानव सौंदर्य के अनेक पहलुओं का वर्णन किया गया है। वे लिखते हैं कि वसन्तोत्सव पर सारा गांव-नगर आमोद-प्रमोदमय हो जाता था। राजपथ केशर मिश्रित अबीर से नहा उठता था। वसंत उत्सव वैदिक धर्मावलम्बियों तक ही सीमित नहीं है। बौद्ध व जैन मतावलम्बी भी देवी सरस्वती की उपासना व इस ऋतु पर्व को हर्षोल्लास से मनाते हैं। बौद्ध धर्म ग्रन्थ "साधनमाला" में इनका महासरस्वती, वज्रशारदा व वीणा सरस्वती आदि रूपों में उल्लेख मिलता है। सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ "गुरु ग्रंथ साहब" में 31 शास्त्रीय रागों का प्रयोग हुआ है। इन्हीं रागों में से एक राग है- राग वसंत। इस दिन गुरुद्वारों में राग वसंत का मनोहारी कीर्तन श्रद्धालुओं के दिलों में भक्ति, स्नेह, प्रेम और श्रद्धा भाव जागृत कर देता है। होलिका दहन के लिए होलिकाओं की स्थापना भी वसंत पंचमी से ही करने की परम्परा है। इस परम्परा के पीछे यह संदेश निहित है कि होली का पर्व आने वाला है व ग्रीष्म ऋतु दस्तक देने वाली है।
जानना दिलचस्प हो कि बसंत पंचमी केवल भक्ति, शक्ति और बलिदान का प्रतीक भी है। इसी दिन प्रभु श्रीराम ने माता शबरी के जूठे बेर खाकर उन्हें नवधा भक्ति का ज्ञान दिया था। यह शुभ दिन क्षत्रीय वीर शिरोमणि पृथ्वीराज चौहान व वीर बालक के हकीकत राय के बलिदान की भी याद दिलाता है। गौरतलब हो कि विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज चौहान से 16 बार पराजित हुआ था मगर 17वीं बार छल से बंदी बनाकर गौरी उन्हें अफगानिस्तान ले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं। गौरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। तब अपने कवि मित्र चंदबरदाई के संकेत " चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण। ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।।" पर जो शब्दभेदी बाण मारा, वह गौरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया। 1192 ई. में यह घटना भी वसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी।
यह तिथि लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान) के आठ वर्षीय वीर बालक हकीकत राय के अनूठे बलिदान से भी जुड़ी है जिसने कुर्बानी दे दी पर मुसलमान नहीं बना। कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी थी। तब हकीकत ने तलवार उठाकर उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो? इस पर जल्लाद ने दिल मजबूत कर तलवार चला दी, पर उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा। वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया।
वसंत पंचमी हमें गोहत्या के खिलाफ मुखर आंदोलन चलाने वाले गुरु रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है। 1816 ई. में वसंत पंचमी के दिन लुधियाना के भैणी ग्राम में जन्मी इस महान विभूति ने अंग्रेजों की सत्ता की चूलें हिला दी थीं। यह पावन तिथि हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" की जयंती के रूप में भी मनायी जाती है। निराला जी के मन में निर्धनों के प्रति अपार प्रेम और पीड़ा थी। वे अपने पैसे और वस्त्र खुले मन से निर्धनों को दे डालते थे। इस कारण लोग उन्हें "महाप्राण" कहते थे।