संस्कृतानुरागी रज्जू भैया
   दिनांक 29-जनवरी-2020
श्रीश देवपुजारी
 
 
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प.पू. कुंवर राजेन्द्र सिंह उपाख्या रज्जू भैया उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद के खुर्जा तहसील के बनेल ग्राम के रहने वाले थे। पुश्तैनी व्यवसाय तो खेती किसानी का था। स्वातंत्र्यपूर्व काल में एक बार आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती खुर्जा आए थे। उनके दर्शन करने मा. रज्जू भैया जी के दादाजी गांव से पैदल चलकर खुर्जा आए थे। तब से मा. रज्जू भैया जी का परिवार आर्यसमाजी बन गया। घर में मांसाहार वर्जित हो गया। वेदों के मंत्र घर में सबको कंठस्थ करा दिए जाते थे। मा. रज्जू भैया जी को भी सभी मंत्र याद थे। किन्तु संस्कृत सीखने का अवसर उन्हें कभी नहीं मिल पाया।
उनके पिता स्थापत्य अभियंता थे। ब्रिटिश सरकार की सेवा में कार्यरत बलवीर सिंह जी का कार्यालय स्थायी नहीं था। पूरा परिवार- जिसमें मां, पिताजी, दो बहने एवं तीन भाई और कार्यालय प्रवास में रहता था। कहीं डाकबंगलों में तो कहीं टेंटों में आवास होता था। बच्चों की पढ़ाई के लिए शिक्षक भी साथ चलता था। इस कारण रज्जू भैया की औपचारिक शिक्षा सीधे कक्षा 9 से प्रारंभ हुई। उन्नाव के माध्यमिक विद्यालय में उन्होंने प्रवेश लिया। उच्च माध्यमिक शिक्षा नैनिताल में एवं स्नातकोत्तर की शिक्षा प्रयाग में समपन्न हुई। नैनिताल में तो पब्लिक स्कूल था जिसमें यूरोपियन, आंग्लोइंडियन बच्चे भी साथ में थे। विश्वविद्यालय में उनका विषय भौतिक शास्त्र था। अत: कहीं संस्कृत सीखने का अवसर ही नहीं मिला।
सरसंघचालक बनने के पश्चात जब ये बात उनके कानों तक पहुंचती थी कि पूर्व सरसंघचालक मा. बाला साहेब देवरस अपने भाषणों में सटीक आशय प्रकट करने वाला संस्कृत सुभाषित अवश्य उद्धृत करते थे तो उन्हें भी ऐसा करने की इच्छा हो जाती थी। किन्तु कई स्थानों पर लिंग, संधि और उच्चारण के नियमों को न जानने के कारण त्रुटियां हो जाती थी। जैसे - 'आकशात् पतितं तोयं, यथा गच्छति सागरम्।' इस श्लोक में 'तं' का उच्चारण करते समय 'म' अनुनासिक के प्रयोग के बदले 'न' अनुनासित का प्रयोग करना चाहिए। कारण आगे 'त' वर्ग का व्यंजन है। 'गच्छति' इस गत्यर्थक क्रियापद के कारण द्वितीया विभक्ति का प्रयोग सर्वथा उचित है। यद्यपि सागर शबद पुलिंग होने के कारण प्रथमा विभक्ति एकवचन 'सागर:' होगा किन्तु यहां द्वितीया विभक्ति का प्रयोग करना है। इसलिए 'सागरम्' बोलन सही है।
संस्कृत सीखने का एक माध्यम 'संस्कृत चन्दामामा' हो सकता है ऐसा जब उन्होंने जाना तो त्वरित वार्षिक शुल्क भेजकर वे उसे मंगवाने लगे। प्रवास में सदैव उनके झोले में संस्कृत चन्दामामा रहता था और वे उसे चाव से पढ़ते थे।
उनकी इस अभिलाषा को जानकर मैंने विवाह और शौक के निमित्त भेजे जाने वाले पत्रों का प्रारुप संस्कृत भारती के तत्कालीन अखिल भारतीय संगठन मंत्री मा. चमू कृष्ण शास्त्री जी से तैयार करवाया और अपने हाथ से लिखकर 'रोटा मुद्रण' करवा लिया। उन्हीं संस्कृत पत्रों पर संबंधित व्यक्ति का नाम डालकर, मा. रज्जू भैयाजी के हस्ताक्षर लेकर मैं भेजता था। कई स्वयंसेवकों ने उन पत्रों को संग्रह में रखा होगा।

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मा. रज्जू भेया जी स्वास्थ्य लाभ के निमित्त प्रतिवर्ष एक महीना करेल राज्य के त्रिशूर जनपद के तैक्काट्टूशेरी ग्राम के आयुर्वेदिक चिकित्सालय में रहे। तीन वर्ष के इस चिकित्सा काल में अंतिम वर्ष मा. सरकार्यवाह शेषाद्री जी भी साथ थे। समय था। चिकित्सा निमित्त आए अन्य जनों में मेरे पिता, मामा, ममेरा भाई और व्यवस्था में लगे प्रबंधक, लोल्लूर तालुका प्रचारक और हम सबके पालक स्वरूप मा. तालुका संघचालक माधवन् नम्बूद्री- इतने विद्यार्थियों के लिए दस दिन का प्रतिदिन दो घंटो का संस्कृत सम्भाषण शिविर लगाया गया। संस्कृत भारती की ओर से एक शिक्षक प्रतिदिन आकर पढ़ाया करते थे और उनके विद्यार्थी थे प. पू. सरसंघचालक एवं मा. सरकार्यवाह। आयु के 55 वर्ष पूर्ण करने के पश्चात एवं विश्वव्यापी बलाढ्य संगठन के मुखिया पद पर आरूढ़ होने के उपरांत विद्यार्थी मानसिकता में जाकर संस्कृत भाषा सीखना अपने आप में एक अद्भुत एवं प्रेरणादयी दृश्य था। संस्कृत सीखने की तीव्र इच्छा का ही यह प्रकटीकरण था।
1996 में कर्नाटक प्रांत के स्वयंसेवकों द्वारा संचालित जनसेवा न्यास ने एक 'वेद-विज्ञान-गुरुकुलम्' चलाने का निर्णय किया। इस गुरुकुल की विशेषता यह है कि इसमें वेद, संस्कृत, व्याकरण, न्यायशास्त्र (तर्क या लॉजिक) तो पढ़ाया जाता ही है साथ-साथ आंग्ल भाषा, आधुनिक विज्ञान एवं संगणक भी पढ़ाया जाता है। इस गुरुकुल का शुभारंभ किनके हाथों किया जाय यह जब न्यासियों के सामने विचार आया तो पू. रज्जूभैया जी का नाम सामने आना स्वाभाविक था। जिस गुरुकुल की व्यवहार भाषा संस्कृत है ऐसे 'वेदविज्ञान-गुरुकुलम्' का उद्घाटन मा. रज्जूभैया के हाथों संपन्न हुआ। बाद में भी जब कभी बैठकों के निमित्त चेन्नेहल्ली जाना होता था तो गुरुकुल के आचार्य रामचन्द्र भट से वे गुरुकुल के प्रगति के विषय में अवश्य पूछते थे।
कर्नाटक के स्वयंसेवकों ने और एक क्रांतिकारी प्रयोग उस काल में आरंभ किया था। वह यानी उपेक्षित घरों की किसी भी जाति की 4 थी कक्षा उत्तीर्ण कन्याओं का गुरुकुल चलाकर उनसे ब्रह्मवादिनियों का निर्माण करना। सोलह वर्ष हुए आज भी वह कन्या गुरुकुल अबाध रीति से चल रहा है। उस मेत्रेयी गुरुकुल को देखने रज्जूभैया ने अपने व्यस्त कार्यक्रमों में से समय निकाला। अनुसूचित जाति की कन्याओं तक को वेद मंत्रों का शुद्ध पाठ करते हुए सुनकर उनका आर्यसमाजी मन भावविभोर हो उठा।
केवल रामोहल्ली स्थित मैत्रेयी गुरुकुल ही नहीं तो बेंगलूरम नगर में स्थित संस्कृत भारती के 'अक्षरम्' कार्यालय में भी वे समय निकाल कर कार्य का अवलोकन करने पहुंचे और संस्कृत संभाषण शिविरों को आधार बनाकर भारत में परिवर्तन लाने का स्वप्न देखने वाले संस्कृत भारती के कार्यकर्ताओं का उत्साह द्विगुणित किया। ईश्वरी इच्छा से आज मैं उन हजारों संस्कृत भारती के कार्यकर्ताओं में सम्मिलित हूं और संस्कृतानुरागी पू. रज्जूभैया जी की संस्कृत भाषा सीखने की अतृपत इच्छा को परीक्षा रूप से करने में लगा हूं। संस्कृत कार्य को गति प्रदान करने में उनक आशीर्वाद सदेव संबल बनकर मेरे साथ रहेगा यह विश्वास है।
( लेखक संस्कृत भारती के अखिल भारतीय महामन्त्री हैं )