गांधी एक, विचार अनेक
   दिनांक 30-जनवरी-2020
 
डॉ. संतोष कुमार तिवारी 
 
  
महात्मा गांधी समाज-जीवन के हर विषय पर अपने विचार रखते थे। धर्म, अध्यात्म, ईश्वर, नैतिक मूल्य, आदर्श जीवन, राजा के कर्तव्य आदि विषयों पर उनके विचार बहुतायत में मिलते हैं। इस लेख में उनके कुछ विचारों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है

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गांधीजी द्वारा 18 मई, 1932 को श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार को लिखा गया पत्र,
जिसे जून, 1948 के 'कल्याण' में प्रकाशित किया गया था।
 
महात्मा गांधी पांथिक कन्वर्जन के प्रबल विरोधी और गोरक्षा के प्रबल समर्थक थे। इन बातों को कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल और उनके पिट्ठू पत्रकार लगातार जान-बूझकर स्वतंत्रता के बाद से दबाते आए हैं। गांधीजी का कहना था कि गाय के प्रति क्रूरता ईश्वर और हिंदू धर्म के प्रति अस्वीकृति है। उनको मालूम था कि कन्वर्जन पैसे का लोभ देकर सुनियोजित तरीके से कराया जा रहा है। ईसाई संस्थाएं इसके लिए अगले वर्ष का बजट भी निर्धारित करती हैं। गांधीजी भारत में कन्वर्जन को लेकर बहुत आक्रोशित थे।
 
गांधीजी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जिस पर गांधीजी ने विचार न किया हो और अपनी छाप न छोड़ी हो। अध्यात्म, धर्म, राजनीति, चिकित्सा, खानपान, पत्रकारिता, आदि हर क्षेत्र में उनका योगदान अवश्य है।
 
कन्वर्जन
गांधीजी के आश्रम में विभिन्न मत-पंथों के लोग रहते थे, परंतु किसी का कन्वर्जन करने की सख्त मनाही थी।
अंग्रेजी पुस्तक 'क्रिश्चियन मिशन्स : देयर प्लेस इन इंडिया' (1941 का संस्करण, पृष्ठ 151 और 220) में गांधीजी के विचार हैं,''ईसाई मिशनरी जिस तरह कन्वर्जन कर रहे हैं, उससे वे समस्त भारतवर्ष को नुकसान पहुंचा रहे हैं, स्वतंत्र भारत में उन्हें ऐसे काम का कोई भी अवसर नहीं दिया जाएगा।''
 
सी. एफ. एंड्रेयूज ने महात्मा गांधी पर लिखी अपनी पुस्तक में कहा है, ''पंथ के संदर्भ में बापू का स्वदेशी से मतलब था कि सब अपने-अपने पंथ में ही रहें। गांधीजी कन्वर्जन के खिलाफ थे तो इसका एक कारण यह भी था कि अधिकतर मामलों में कन्वर्जन की अपील पेट पालने के लिए की जाती थी, न कि वास्तविक आध्यात्मिक परिवर्तन के लिए। पेट पालने के लिए भोले-भाले वनवासी इसमें फंस जाते हैं।''
 
सी. एफ. एंड्रेयूज (1871-1940) एक ईसाई मिशनरी थे। वे गांधीजी से दक्षिण अफ्रीका में मिले थे। वे उन कुछ लोगों में से थे, जिन्होंने गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने की राय दी थी। उन दोनों में अच्छी मित्रता थी।
 
कन्वर्जन के मामले में गांधीजी के विचार ईसाई मिशनरियों के लिए जबर्दस्त चुनौती थे। गांधीजी सर्वधर्म कल्याण चाहते थे। वे एक ऐसे समाज के पक्षधर थे, जिसमें सभी मत-पंथों के लोग शांति के साथ रह सकें।
 
अपने साप्ताहिक पत्र 'यंग इंडिया' के 23 अप्रैल, 1931 के अंक में गांधीजी ने कहा था, ''आजकल और बातों की तरह कन्वर्जन ने भी एक व्यापार का रूप ले लिया है। मुझे ईसाई मत-प्रचारकों की पढ़ी हुई एक रपट याद है, जिसमें बताया गया था कि प्रत्येक व्यक्ति का पंथ बदलने में कितना खर्च हुआ और फिर अगली फसल के लिए बजट प्रस्तुत किया गया था।''
 
रावलपिंडी में 5 फरवरी, 1925 को दिये अपने भाषण में उन्होंने कहा था, ''कल मैंने अत्यंत खेदजनक बात सुनी और वह यह कि आपमें से बहुतों ने अपनी जान बचाने के लिए पहले इस्लाम स्वीकार कर लिया और तब यहां आए। ... चाहे हमारा अस्तित्व मिट जाए, किंतु हमें कन्वर्जन नहीं करना चाहिए। हमारा सच्चा धन रुपया-पैसा नहीं है, जर और जमीन नहीं है। ये तो ऐसी चीजें हैं जो लूटी जा सकती हैं। किंतु हमारा सच्चा धन हमारा धर्म है।'' (भारत सरकार के प्रकाशन 'संपूर्ण गांधी वांग्मय', खंड 26, पृष्ठ 79 से उद्धृत)
 
अंग्रेजी पुस्तक 'गांधी
एंड रिलीजन' (लेखक: बी. आर. नंदा, प्रकाशक: गांधी स्मृति और दर्शन समिति, 1990) में बताया गया है कि एक बार गांधीजी की ईसाई शिष्या मिस स्लेड ने हिंदू धर्म अपनाना चाहा, तो गांधीजी ने कहा कि कन्वर्जन सही नहीं है। तुम अपने ही मत में रहो। बाद में मिस स्लेड ने अपना नाम मीराबेन रख लिया। इस पर किसी ने कहा कि उनका नाम तो हिंदू हो गया। तब बापू का कहना था कि उनका नाम भारतीय हो गया है। 
 
गोरक्षा
प्रख्यात गांधीवादी विचारक और लेखक काका कालेलकर (1885-1981) की पुस्तक 'बापू की झांकियां' में पृष्ठ 98 पर गांधीजी को उद्धृत किया गया है, ''मैं स्वराज के लिए भी गोरक्षा का आदर्श नहीं छोड़ सकता।'' अपने साप्ताहिक पत्र 'हरिजन' (15 सितंबर, 1940) में गांधीजी ने लिखा है, ''गोमाता कई मायनों में उस मां से भी बेहतर है जो हमें जन्म देती है।''
बेलगांव (महाराष्ट्र) में अपने भाषण में 28 दिसंबर, 1924 को गांधीजी ने कहा, ''कई बातों में मैं गोरक्षा के प्रश्न को स्वराज से भी बड़ा मानता हूं।'' (संपूर्ण गांधी वांग्मय, खंड 25, पृष्ठ 549, प्रकाशन वर्ष 1967)।
 
गोरखपुर से प्रकाशित हिंदी मासिक 'कल्याण' के गो-अंक (अक्तूबर, 1945) के लिए दिए संदेश में गांधीजी ने लिखा है, ''भारत की सुख-समृद्धि गो और उसकी संतान की समृद्धि के साथ जुड़ी है।'' गो-अंक (पृष्ठ संख्या 107 से 111) में गांधीजी लिखते हैं, ''भागवत में हम पढ़ते हैं कि भारतवर्ष का नाश कैसे हुआ। उसमें अनेक कारणों में एक कारण यह भी बताया गया है कि हमने गोरक्षा छोड़ दी।''
 
''मेरी समझ में कुरानशरीफ में यह लिखा है कि किसी भी प्राणी का नाहक प्राण लेना पाप है। मुसलमानों को यह समझाने की मैं इच्छा रखता हूं कि हिंदुस्थान में हिंदुओं के साथ रहकर गोवध करना हिंदुओं का खून करने के बराबर है, क्योंकि कुरान कहता है कि खुदा ने निर्दोष पड़ोसी का खून करने वाले के लिए जन्नत नहीं दी है ...।'' गो-अंक में गांधीजी ने यह भी बताया कि गो-रक्षा के लिए राज्य के क्या-क्या कर्तव्य हैं।
 
गांधीजी के शब्दों में, ''गोरक्षा का अर्थ है ईश्वर की संपूर्ण मूक सृष्टि की रक्षा। गोवंश के प्रति की गई प्रत्येक क्रूरता ईश्वर और हिंदुत्व की अस्वीकृति है।'' (यंग इंडिया, 6 अक्तूबर, 1921)
 
हिन्दुस्थान के लिए धन संग्रह
सार्वजनिक कार्यों के लिए चंदा इकट्ठा करने में उन्होंने अद्वितीय कार्य किया था। लोग उन पर विश्वास करते थे। इस कारण यह सब संभव हो पाया। उन्होंने तिलक-स्वराज्य-कोष के लिए एक करोड़ रुपए से अधिक का चंदा इकट्ठा किया था। गोखले, लाला लाजपत राय, देशबंधु चितरंजन दास तथा दीन बंधु एंड्रयूज की स्मृति में भी उन्होने स्मारक कोषों की स्थापना की। जलियांवाला बाग स्मारक के लिए भी उन्होंने चंदा इकठ्ठा किया। उनको दान देने वालों में गरीब-अमीर सभी थे। एक बार उन्होंने कच्छ के लोगों द्वारा दिया जाने वाला सशर्त दान ठुकरा दिया था। इस बारे में 1 नवंबर, 1925 के गुजराती साप्ताहिक 'नवजीवन' में उनके एक भाषण के अंश छपे हैं, ''आप चाहते हैं कि मैं जो चंदा इकट्ठा करूं उसका उपयोग केवल कच्छ में ही हो। केवल कच्छ के लिए मैं आपके पास क्यों आऊं? इसके लिए तो आप स्वयं पैसा इकट्ठा कर सकते हैं। मेरे हाथ से जो पैसा इकट्ठा होता है वह हिंदुस्थान के गरीबों के लिए इकट्ठा होता है। 1921 में जब हमने बंबई में 38,00000 रुपया इकट्ठा किया था तब क्या कच्छी लोगों ने अपने पैसे का उपयोग कच्छ में करने की शर्त रखी थी? ऐसी शर्त रख कर यदि कच्छी मित्र पैसे देते हों तो मैं उनसे एक कौड़ी भी न लूंगा। मैं तो हिंदुस्थान की गरीब गायों के लिए पैसे मांगता हूं। गरीब बहनों के शील की रक्षा के लिए पैसे मांगता हूं। भूखे मरने वाले करोड़ों लोगों का पेट भरने के लिए पैसे मांगता हूं। ... मारवाडि़यों ने मुझे मद्रास में हिंदी प्रचार के लिए 1,00000 रुपया दिया है। गोरक्षा के लिए भी वे प्रचुर धन दे रहे हैं। उन्होंने बिहार के लिए ढेरों दिया है। ... उनमें से किसी ने यह नहीं कहा कि अमुक पैसा मारवाड़ में लगाना। ऐसी शर्त मैंने अत्यंत दु:ख के साथ कच्छियों के मुख से ही सुनी है। समस्त हिंदुस्थान को पैसा देना आपका धर्म है। कारण, उसके साथ व्यापार करके ही आप पैसा प्राप्त करते हैं। उसका बदले से तो आपको देना ही चाहिए।''
 

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 मालवीय जी के साथ गोसेवा करते हुए गांधीजी (फाइल चित्र)                               भाई हनुमान प्रसादजी
 
 
गांधीजी बहुत मितव्ययी थे, परंतु वे पैसा संग्रह करना भी जानते थे। ब्रिटिश सरकार ने जब उनकी पुस्तक जब्त कर ली, तो उन्होंने फेरी लगाकर चार आने की अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज' को पांच, दस और पचास रुपए में भी बेचा। 1930 में दांडी यात्रा के समय उन्होंने जो आधा तोला प्राकृतिक नमक उठाया था, उसे उनके एक मित्र ने उस वक्त 525 रु. में खरीदा था।
 
लेखन और पत्रकारिता
उन्होंने 'हिंद स्वराज' गुजराती भाषा में लिखी थी। उनके लेखन और पत्रकारिता में मातृभाषा के प्रति और हिंदी के प्रति उनका प्रेम स्पष्ट झलकता है। उन्होंने अपनी पुस्तक 'सत्य के प्रयोग', जोकि उनकी आत्मकथा है, मूलत: गुजराती भाषा में ही लिखी। उन्होंने बच्चों के लिए 'बाल पोथी' की रचना की। वे बच्चों को किसी ऐसी बात का उपदेश नहीं देना चाहते थे, जिनका प्रयोग बच्चे अपने जीवन में न कर सकें। गांधीजी जेल से आश्रम के बच्चों को पत्र भी लिखते थे। वे करीब 40-50 पत्र रोज लिखते थे। कुछ वे अपने हाथ से लिखते थे और कुछ बोलकर दूसरों से लिखवाते थे। बापू दोनों हाथों से लिखते थे। दाहिने की तुलना में बाएं हाथ से उनकी लिखावट ज्यादा साफ और अच्छी होती थी। गांधीजी लिखने में महाभारत, रामायण, मुहम्मद साहब, ईसा मसीह आदि का भी उल्लेख करते थे। इससे उनकी बात साधारण लोगों तक आसानी से पहंुच जाती थी।
 
एक बार गांधीजी ने कहा, ''हजरत मुहम्मद और उनका शांति संदेश कहां है? यदि मुहम्मद साहब भारत आएं, तो अपने बहुत से तथाकथित अनुयायियों की हरकतों को देखकर वे यह कहेंगे कि ये मेरे नहीं और मुझे अपना सच्चा अनुयायी मानेंगे। वैसे ही ईसा मसीह भी मुझे असली ईसाई स्वीकार करेंगे।'' (बहुरूपी गांधी: लेखक अनु बंद्योपाध्याय, पृष्ठ 59)
 
35 वर्ष की आयु में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका से 'इंडियन ओपिनियन' निकाला। इसका संपादक कोई और था, परंतु सारा कार्यभार गांधीजी के ही जिम्मे था। इसमें शुरू में विज्ञापन छपते थे। इसके प्रवेशांक में 'अपनी बात' शीर्षक से गांधीजी का आलेख गुजराती, हिंदी, अंग्रेजी एवं तमिल में निकला। भारत लौटकर उन्होंने 'नवजीवन' व 'यंग-इंडिया' के संपादन का काम संभाला और बाद में अंग्रेजी में 'हरिजन', गुजराती में 'हरिजन बंधु' और हिंदी में 'हरिजन सेवक' नाम के साप्ताहिक पत्र निकाले। इनमें से किसी में भी विज्ञापन नहीं छपते थे। विज्ञापन न लेने पर भी भारत में उनका कोई पत्र घाटे में नहीं चला। उन्होंने 'नवजीवन' में अपनी आत्मकथा का धारावाहिक प्रकाशन शुरू कर दिया। इससे उनकी प्रसार संख्या काफी बढ़ गई और आर्थिक लाभ भी हुआ। इस लाभ में से 1,00000 रुपए निकालकर उन्होंने अमदाबाद में 1929 में 'नवजीवन ट्रस्ट' की स्थापना की। यह ट्रस्ट आज भी चल रहा है और देश की एक अग्रणी और दुनियाभर में सम्मानित प्रकाशन संस्था है।
 
इससे पहले 1920 में उन्होंने 'गुजरात विद्यापीठ' की स्थापना की। यह संस्था भी आजतक चल रही है और फलफूल रही है। यहां पढ़ाई गुजराती माध्यम से ही होती है।
 
गांधीजी के लिए पत्रकारिता कोई व्यवसाय नहीं था, उनके लिए पत्रकारिता एक मिशन था। उनकी पत्रकारिता नैतिकता पर आधारित थी और उसका उद्देश्य सेवा करना था। 'यंग इंडिया' में प्रकाशित अपने लेखों के कारण ही उन्हें जेल जाना पड़ा। गांधीजी ने 1933 में पुणे की यरवदा जेल में रहते हुए 'हरिजन' साप्ताहिक का प्रकाशन प्रारंभ किया। 'यंग इंडिया' की तरह इसका मूल्य भी एक आना था। यह मुख्य रूप से अछूतोद्धार के लिए निकाला गया था। शुरू के कई साल इसमें एक भी राजनीतिक लेख नहीं छपे। सरकार ने इस पत्र के लिए गांधीजी को प्रति सप्ताह तीन लेख लिखने की अनुमति दी थी।
 
यरवदा जेल यात्रा: कुछ अनूठे आयाम
अनु बंद्योपाध्याय के अनुसार महात्मा गांधी (2 अक्तूबर, 1869 - 30 जनवरी, 1948) ने अपने जीवन काल में यदि अपनी सभी तरह की कारागार अवधि पूरी की होती, तो वे 11 वर्ष और 19 दिन जेल में रहते। परंतु उनकी सजा बीच-बीच में कम की गई। इस प्रकार उन्होंने छह साल दस महीने जेल में गुजारे। पहली बार जब वे जेल गए, तब वे 39 वर्ष के थे और अंतिम बार जब उन्होंने जेल के बाहर कदम रखा तब वे 75 वर्ष के थे।
 
1932 में गांधीजी यरवदा जेल (महाराष्ट्र) में बंद थे और उनके पुत्र देवदास गांधी गोरखपुर जेल (उत्तर प्रदेश) में। यरवदा जेल में गांधीजी बहुत बीमार भी रहे। उन्होंने संतुलित आहार संबंधित कई प्रयोग भी इस जेल में किए।
 
गोरखपुर में देवदास गांधी से संपर्क रखने का कार्य गांधीजी ने 'कल्याण' के प्रथम संपादक श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (1892-1971) को सौंपा हुआ था। 8 अप्रैल, 1932 को गांधीजी ने यरवदा जेल से पोद्दारजी को एक पत्र लिखा। इसमें वे लिखते हैं, ''मेरा स्वास्थ्य अच्छा है। दिनचर्या यह है- 3.40 बजे उठना। 4 बजे प्रार्थना। पीछे शहद, पानी और सोडा पीना। 4.45 से 5.30 बजे तक घूमना। 5.40 से 6 बजे तक सो जाना। 6-6.30 बजे तक शौचादि। 6.30-7 बजे तक गरम पानी में पिसे हुए बादाम मिलाकर उसमें रोटी भिगोकर खाना। 7-10 बजे तक वर्तमान पत्र सुनना, कुछ पत्र लिखना और अमलदार लोग आएं, तो उनसे मिलना। बीच में सोडा, नींबू और ठंडा पानी पीना। 10-11 बजे तक शौच, स्नानादि। 11-2 बजे तक गरम पानी में खजूर डालकर खाना, साथ थोड़ी सी पिसे हुए बादाम, कातना और थोड़ा (शायद 20 मिनट) सोना। 2-3 बजे तक पत्र लिखवाना। 3-4 बजे तक लिखना-पढ़ना। 4-5 बजे तक रोटी, बादाम कोई एक तरकारी के साथ खाना। 5-6 बजे तक आश्रम का इतिहास लिखवाना। 6-7 बजे तक घूमना। 7-7.15 बजे तक प्रार्थना। 7.15 से 8 या सवा 8 बजे तक वार्तालाप, पढ़ना, पैरों में घी मलवाना इत्यादि। सवा 8 बजे आकाश-दर्शन करते-करते सो जाना। दिनचर्या छापने के लिए हरगिज नहीं है। बात यह है, सरकारी लोग मेरे खतों या विचारों को प्रकट नहीं होना देना चाहते हैं। उनकी दृष्टि मैं समझ सकता हूं और उसके अनुकूल यथाशक्ति चलता हूं। इससे मित्र वर्ग के साथ पत्र व्यवहार आसानी से चला सकता हूं। इस शर्त से कि राजकारण के बारे में कोई चर्चा न करूं। यह सब व्यवहार विश्वास से चलता है। सत्य को ही परम ईश्वर मानने वाला मैं इस विश्वास का घात नहीं करना चाहता हूं।''
 
यह पत्र बाद में 'कल्याण' के जून, 1948 के अंक में प्रकाशित हुआ था। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इन दोनों पत्रों के अंतिम 'पैराग्राफ' भारत सरकार के प्रकाशन 'संपूर्ण गांधी वांग्मय' में नहीं छापे गए हैं। चार लाख से अधिक पृष्ठों वाले लगभग 100 खंडों का यह वांग्मय पहली बार भारत सरकार ने 1958 में प्रकाशित किया था। तब हनुमान प्रसाद पोद्दार जीवित थे। उनसे यह पत्र मांग कर या 'कल्याण' के उपरोक्त अंक से लेकर इन्हें पूरा प्रकाशित किया जा सकता था। हम आशा कर सकते हैं कि भविष्य में इसके नए संस्करण में इसे पूरा प्रकाशित किया जाएगा।
 
ईश्वर के संबंध में विचार
'कल्याण' का 'ईश्वरांक' निकल रहा था। उस समय गांधीजी यरवदा जेल में थे। इस अंक के लिए गांधीजी से कुछ प्रश्न किए गए थे। उन्होंने उनका उत्तर तो लिख दिया था, परंतु जेल के नियमों का पालन सचाई से हो, इसलिए उस समय उसे प्रकाशित करने से रोक दिया था। अत: उस समय 'कल्याण' में उसे नहीं छापा गया था। गांधीजी ने उत्तर में दो पत्र लिखे थे। जून, 1948 के 'कल्याण' में प्रकाशित गांधीजी का दूसरा पत्र इस प्रकार था-
'यरवदा-मंदिर 18.5.32
 
भाई हनुमान प्रसादजी!
आपका पत्र मिल गया। मेरे जीवन में ऐसी कोई वस्तु का स्मरण मुझको नहीं है जिसे मैं यह कह सकता हूं कि उस समय ईश्वर की सत्ता और दया में मेरा विश्वास जम गया। थोड़ा ही समय था जब विश्वास खो बैठा था। या तो कहो मैं सशंक था। उसके बाद दिन-प्रतिदिन विश्वास बढ़ता ही गया है और बढ़ रहा है। बढ़ रहा है इसलिए कहता हूं कि बुद्धि के लिए तो कोई प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। परंतु जब तक हृदय में थोड़ा-सा भी विकार भरा है, वहां तक पूर्ण विश्वास का दावा नहीं किया जा सकता है। यह प्रश्न मुझको किस कारण पूछा गया है। यदि निजी शांति के लिए ही है तो तो ठीक है। यदि भविष्य में भी 'कल्याण' के लिए पूछा गया है तो ऐसे प्रश्न का पूछना मुझको निरर्थक सा प्रतीत होता है। यदि निजी शांति के लिए है तो इतना समझ लिया जाए कि दूसरे के विश्वास की कितनी भी घटनाएं हम समझें, उससे हमारे ह्रदय की श्रद्धा बैठ नहीं सकती। बुद्धि को अवश्य थोड़ी मदद मिलती है। हृदय के लिए निजी पुरुषार्थ आवश्यक है। और यह पुरुषार्थ संयममयी श्रद्धा ही शक्य है। देवदास मिलते रहते हैं, वह अच्छा है। वहां जेल-सुपरिटेन्डेन्ट कौन है? मैंने एक पत्र हिंदी-शब्दकोष के लिए लिखा था, वह मिला होगा। भाई मैथिलीशरणजी ने हिंदी शब्दसंग्रह नामक एक पुस्तक भेजी है।
 
यहां पाठकों को यह बताना भी उचित होगा कि 1926 में जब 'कल्याण' का प्रकाशन शुरू हुआ, तो गांधीजी ने यह सुझाव दिया था कि इस पत्रिका में कोई भी विज्ञापन या पुस्तक समीक्षा न छापी जाए।
(लेखक झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, रांची में प्रोफेसर रहे हैं)
 
गांधीजी द्वारा 18 मई, 1932 को श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार को लिखा गया पत्र,
जिसे जून, 1948 के 'कल्याण' में प्रकाशित किया गया था।
 
मालवीय जी के साथ गोसेवा करते हुए गांधीजी (फाइल चित्र) 
भाई हनुमान प्रसादजी