सहानुभूति बटोरने के लिए तो नहीं लिखी गई जामियानगर हमले की स्क्रीप्ट !
   दिनांक 30-जनवरी-2020
जिस तरह एक व्यक्ति हाथ में देसी कट्टा लेकर जामिया नगर में घुस जाता है, यह सब देखकर लगता है जामिया नगर में चल रहे प्रदर्शन की हर तरफ नकारात्मक बन रही छवि के बीच थोड़ी सी सहानुभूति बटोरने के लिए यह स्क्रीप्ट अंदर बैठे लोगों ने ही लिखी है

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जामिया नगर में प्रोटेस्ट के दौरान जेवर के रहने वाले गोपाल नाम के युवक ने कथित तौर पर गोली चलाई। गोली लगने से शादाब नाम का जामिया का छात्र घायल हुआ। पुलिस ने गोली चलाने वाले शख्स को हिरासत में ले लिया है। इस बात की जांच होनी चाहिए कि कहीं प्रोटेस्ट के नाम पर अराजकता फैलाने के लिए शामिल हुई पीएफआई की कट्टरपंथी ताकतों ने गोपाल का अपने हक में इस्तेमाल तो नहीं किया।
यह संदेह इसलिए होता है क्योंकि  उस एरिया में जहां दीपक चौरसिया पर हमला हुआ तो उन्हें बचाने के लिए सामने आने का साहस दिल्ली पुलिस भी नहीं जुटा पाई। बताया जा रहा है कि जब गोली चली उस वक्त मार्च जामिया से राजघाट के लिए जा रहा था। प्रतीकों का इस्तेमाल लेफ्ट यूनिटी से अधिक बेहतर कौन कर सकता है? उनका इतिहास रहा है कि वे नैरेटिव को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने के लिए प्रतीकों का बेहतरीन इस्तेमाल करते रहे हैं। जिसे थोड़ी समझदारी के साथ देखने पर उनकी धूर्तता भी साफ—साफ दिखाई देती है।
पिछले दिनों वामपंथी गिरोह ने देश के प्रधानमंत्री की तुलना हिटलर से करने का अभियान चलाया। जबकि हिटलर, माओ, स्टालिन, पोलपोट के संबंध में जो जानता है, उनकी खूनी क्रांतियों को जो समझता है, जिसने इन्हें पढ़ा है, वह पहली नजर में ही हिटलर, स्टालीन, माओ, पोलपोट से मोदीजी की तुलना को बेतुका बता देगा।
लेकिन इस तरह प्रतीकों का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर वायरल होता है। इस तरह के प्रतीकों के इस्तेमाल से आसानी से अफवाह लोगों तक पहुंचाई जा सकती है। इस बात को वामपंथी सबसे अच्छे तरीके से समझते हैं। इसी शातिर समझदारी के दम पर वे एक विदुषक कुणाल कामरा की तुलना देश के सम्मानित पत्रकार रोहित सरदाना, अमिश देवगण से कर लेते हैं और उनकी यह तुलना वामपंथ के पूरे अफवाह तंत्र द्वारा ट्रेन्ड भी करा दिया जाता है।
इस वक्त जब शाहीन बाग के कथित आंदोलन की हवा निकलनी तय मानी जा रही है। आम आदमी पार्टी द्वारा खड़ा किया गया यह पूरा आंदोलन पूरी पार्टी की लुटिया दिल्ली में डुबोने वाला है। ऐसे में यह कथित आंदोलन कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के गले में फंसी ऐसी हड्डी बन गया, जिसे इन दोनों पार्टियों ने मुसलमान मतदाताओं को लुभाने के लिए हलक के नीचे उतारने की कोशिश की थी।
शाहीन बाग के कथित आंदोलन के समर्थक अब ट्वीट कर रहे हैं। वामपंथ का पूरा अफवाह तंत्र सक्रिय है, यह बताने के लिए कि यह हमला भाजपा ने कराया है? जबकि दिल्ली के मतदाता जानते हैं कि इस हमले की जरूरत भाजपा को है ही नहीं। हमला तो वह कराएगा जिसकी तशरीफ के नीचे दिल्ली की कुर्सी है और इस कथित आंदोलन की वजह उसे खतरा हो कि यह कुर्सी उसकी तशरीफ के नीेचे से खिसक सकती है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों से सरकार को कोई आपत्ति नहीं। यह बात उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पहले ही कह चुके हैं। फिर दिल्ली में यह हमला भाजपा कराएगी, इस बात का कोई तुक नहीं बनता।
वास्तव में कुछ लोग व्यवहार से अटेंशन सीकर होते हैं और कुछ आंदोलन भी। जिसकी तरफ लोगों का ध्यान कम जाए तो वे कुछ ऐसी उल जलूल हरकत पर उतर आते हैं कि कोफ्त होने लगे।
शाहीन बाग कथित आंदोलन अब खत्म होने की कगार पर है, हर तरफ से अब एक ही आवाज आ रही है कि इसे खत्म कर देना चाहिए। इसे लगातार सोशल मीडिया और मुख्य धारा की मीडिया में अच्छा कवरेज मिला। अब समाज को लग रहा है कि इस आन्दोलन में शामिल लोगों का एजेन्डा सीएए- एनआरसी नहीं बल्कि अराजकता फैलाना है।
सोचने वाली बात है कि जिस शाहीन बाग में देश का एक बड़ा पत्रकार पिट रहा था और दिल्ली पुलिस अंदर जाने का साहस नहीं दिखा पाई। वहां कोई छुटभैया बदमाश ऐसे कट्टा लहराता हुआ यूं घुस जाएगा। जो भीड़ पुलिस के डंडों से नहीं डरती, वह इससे डरेगी। यकीन करना मुश्किल है।
जिस तरह सोशल मीडिया पर प्रचारित किया जा रहा है कि इसे भाजपा ने कराया है, वह पढ़कर—देखकर लगता है कि यह सब योजनाबद्ध तरीके से हुआ है। एक बार फिर जिस तरह शाहीन बाग चर्चा के केन्द्र में आया इससे लगता है कि इस पूरे पटकथा के मास्टर माइंड जामिया नगर में ही बैठे हैं।