जामियानगर और शाहीन बाग में हुई फायरिंग से निकले सवाल
   दिनांक 31-जनवरी-2020
देश के टुकड़े—टुकड़े करने का नारा लगाने वाले, असम को देश से अलग करने की तकरीर देने वाले, हिंदुओं की कब्र खोदने की बात करने वाले, कथित सेकुलर मीडिया और वामपंथ और कांग्रेसी कॉकटेल गटके हुए बुद्धिजीवियों समेत सबके चेहरों से नकाब उतर चुका है, जनता सब जानती है

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हिंदू प्रतीकों का इस तरह अपमान करने पर सेकुलर चुप्पी क्यों
एक नाबालिग तमंचा लेकर गौतमबुद्धनगर के जेवर से जामिया पहुंचता है. फिर वही तमंचा निकालकर जामिया के बाहर सीएए के खिलाफ मार्च निकाल रही भीड़ के सामने डट जाता है. यहां तक कि गोली चला देता है. जो हुआ वह गलत हुआ लेकिन इसके पीछे साजिश भी तो हो सकती है। बहरहाल जो गैर कानूनी है कानून उसे उसकी सजा देगा. लेकिन पिछले डेढ़ माह में देश में क्या यही हुआ है. जी नहीं. पिछले डेढ़ माह में इस देश ने एक ऐसे कानून, जिसका किसी भारतीय नागरिक की नागरिकता पर कोई असर नहीं पड़ता, उसके खिलाफ सड़कों पर जिहाद देखी है. आगजनी देखी है. हत्याएं देखी हैं. देश ने असम को देश से अलग करने की जिहादी तकरीरें सुनी हैं. देश ने हिंदुत्व की कब्र खुदेगी एएमयू की धरती पर के नारे भी सुने हैं. इस देश ने दिल्ली के शाहीन बाग में पीएफआई जैसे देशतोड़क संगठन की फंडिंग से चलने वाला धरना देखा है. इस सबको देखने के बाद भी बहुसंख्यक समाज से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, ये किसी को नहीं दिखाई देगा. इसलिए कि वामपंथ और कांग्रेसी कॉकटेल गटके पत्रकार, बुद्धिजीवी, साहित्यकार उसे देखना नहीं चाहते. आज हम इनके दोगले मानकों, सिलेक्टिव क्रिटिसिज्म से नकाब नोचेंगे. जामिया के बाहर बृहस्पतिवार को जेवर का एक युवक पहुंचा. यह नाबालिग है, परिवार के मुताबिक मानसिक रूप से अस्थिर है. कहीं से एक तमंचा हासिल करके पहुंचे इस युवक ने फायर झोंक दिया. फायर भी जामिया के उन शांति उपासकों पर जिन्होंने चंद दिनों पहले ही सड़कों पर हिंसा का कैसा तांडव मचाया था. जो अपराध है, वह अपराध है. हम उन वामपंथियों की तरह नहीं, या हमें इस बात के लिए मैगसेसे नहीं मिला कि हम शरजील इमाम की असम को भारत से अलग करने की योजना को टीवी पर बैठकर जस्टिफाई करें, उसके इरादों को बस चक्का जाम करने की कोशिश बताएं. कानून किसी को हाथ में लेने का अधिकार नहीं है. उस नवयुवक को नहीं, और साथ ही देशभर में जिहाद का सपना पाले बैठी भीड़ को भी नहीं. उन जेएनयू के वामपंथी गैंग को भी नहीं, जो नकाब के पीछे छिपकर हिंसा करते हैं. भीम आर्मी जैसे विभाजक संगठन को भी नहीं, जिसे ये तक नहीं पता कि जोगेंद्र नाथ मंडल के साथ पाकिस्तान चले गए दलितों पर कितना अत्याचार हुआ. जरा कुछ घटनाक्रम पर गौर कीजिए. दिल्ली में एक फायरिंग पर हाय-तौबा मचाने वाले किस तरह किसी पाचक रस के साथ इतनी बड़ी घटनाओं को
हजम कर गए.
घटना-1
बुधवार को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में एक प्रदर्शन के दौरान पर बम चले, गोलियां चलीं. नतीजा ये हुआ कि दो लोगों की मौत हो गई. कई लोग इस हमले में घायल हो गए. यह हमला तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने किया. तृणमूल के एक नेता को इस पूरे हमले का सूत्रधार बताया जाता है. लेकिन आपने कहीं कोई रुदाली सुनी. कहीं किसी चैनल पर किसी पट्टी तक में ये घटना दिखाई दी. कहीं किसी अखबार के फ्रंट पेज पर ये घटना दर्ज की गई. नहीं की जाएगी. इसलिए कि पश्चिम बंगाल में सेक्युलर चोला ओढ़े एक सरकार बैठी है.
घटना-2
 
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लोहरदगा में सीएए के समर्थन में हुई रैली के दौरान मुसलमानों द्वारा लोहे की रॉड मारे जाने से घायल हुए नीरज ने अस्पताल में दम तोड़ दिया 
 
दूसरी घटना पर गौर कीजिए. 23 जनवरी को झारखंड के लोहरदगा में नागरिकता संशोधन कानून के पक्ष में रैली निकल रही थी. जिहादियों ने पहले ही इस पर हमले की साजिश रच ली थी. हमेशा की तरह साजिश का केंद्र एक मस्जिद थी. यहां बड़ी तादाद में हथियारबंद मुसलमान जमा थे. जैसे ही रैली मस्जिद के पास पहुंची हथियारबंद मुसलमानों ने अल्लाह हो अकबर और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारों के साथ हमला बोल दिया. हमलावरों ने रैली में शामिल नीरज प्रजापति की हत्या कर दी. लेकिन क्या आपको कहीं एक खबर किसी चैनल पर दिखाई दी. कोई बयान आपने सुना. कहीं किसी अखबार में खबर पढ़ी. नहीं. इसकी चर्चा नहीं होगी. कारण ये कि मरने वाला हिंदू है. दूसरा बड़ा कारण ये कि झारखंड में अब कांग्रेस के सेक्यूलर जल से पवित्र की गई हेमंत सोरेन की सरकार है. कांग्रेस शासित राज्यों में हिंदू की मौत, वह भी मुसलमानों के हाथों, इसमें न्यूज वैल्यू नहीं है. ये खबर खींचती नहीं है. ये खबर एजेंडा को जमती नहीं है. ऊपर जिन दो घटनाओं का ब्योरा दिया गया है, वह बस एक बानगी है. देश के कोने-कोने में ऐसा हो रहा है. चैनलों पर इस बात का बड़ा शोर है कि जिस युवक ने जामिया पर गोली चलाई, वह जय श्री राम के नारे लगा रहा था. पूछ रहा था कि किसे आजादी चाहिए. जब आप किसी एक सिरफिरे के नारों को लेकर परेशान हैं, तो आपसे ये सवाल पूछना लाजिमी है कि आप उस समय क्या कर रहे थे, जिस समय  अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में नारा लग रहा था कि 'हिंदुत्व की कब्र खुदेगी एएमयू की धरती पर'. उस समय आप कहां थे, जब 'फक हिंदुत्व के प्लेकार्ड लहराए जा रहे थे'. जिन्ना वाली आजादी मांगने वाले नारों को आप कैसे हजम कर सकते हैं. अब समझिए कुल मिलाकर क्या स्थिति बनती है. सेक्युलर गैंग जिहाद को बौद्धिक जामा पहनाएगा. जिहाद के नाम पर होने वाली हिंसा को जस्टिफाई करेगा. एक छोटे से धरने को देश की सबसे बड़ी खबर बना देगा. जामिया के बाहर हुई हिंसा को पुलिस कार्रवाई पर लानत भेजकर ढकने की कोशिश करेगा. इस सबके बीच यदि कोई सिरफिरा ऐसा कर दे तो हिंदुत्व, पुलिस, सरकार.... किसी को भी बदनाम करने का मौका नहीं चूकेगा.