कांग्रेस से वफादारी निभाता मीडिया
   दिनांक 06-जनवरी-2020
राजस्थान के मुख्यमंत्री ने पत्रकारों को खुलेआम धमकाया, लेकिन मीडिया ने उस पर कुछ नहीं कहा

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अपनी सरकार के एक साल पूरा होने पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पत्रकारों को बुलाकर उन्हें धमकाया कि वे सरकार के कामकाज पर 'सकारात्मक खबरें' नहीं देंगे तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा। यह भी कहा कि मीडिया ने रवैया नहीं सुधारा तो सरकार विज्ञापन नहीं देगी।
 
संभवत: यह पहला मौका था जब कोई मुख्यमंत्री ऐसी धमकी देते हुए कैमरों में रिकॉर्ड हुआ। हालांकि इससे न तो मीडिया की आजादी की बात करने वाले पत्रकारों के माथे पर बल पड़ा और न मीडिया के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली किसी स्वयंभू संस्था ने इसका संज्ञान लिया। हैरानी की बात यह कि गहलोत की धमकी का असर राजस्थान ही नहीं, दिल्ली की मीडिया पर एक सप्ताह के अंदर दिखा। 
 
कोटा के सरकारी अस्पताल में बच्चों की मौत की खबरें दिसंबर की शुरुआत से ही आने लगी थीं, पर उन्हें दबा दिया गया गोरखपुर में दिमागी बुखार से मौत की तुलना में कोटा की घटना को मीडिया में बहुत कम जगह मिली। राष्ट्रीय मीडिया ने भी इसे महत्व नहीं दिया।
 
दरअसल, कुछ दिन पहले ही प्रियंका वाड्रा ने दिल्ली के सभी चैनलों और अखबारों के 'वफादार पत्रकारों और संपादकों' को बातचीत के लिए बुलाया था। उस मुलाकात में क्या हुआ, यह तो वही जानें जो वहां उपस्थित थे, लेकिन इस मुलाकात का दिल्ली के मीडिया घरानों पर गहरा असर पड़ा है। बताया जाता है कि इसी अवसर पर यह तय हुआ कि कांग्रेस के साथ 'यथासंभव सहयोग' किया जाएगा। पहले नागरिकता बिल और बाद में इसके कानून बनने के बाद सुनियोजित तरीके से जो जो अफवाहें उड़ाई गईं, उनमें मीडिया की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। इसी स्तंभ में हम बता चुके हैं कि इंडिया टुडे, एनडीटीवी, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस ने सबसे ज्यादा ऐसी खबरें दीं, जिनसे नागरिकता कानून को लेकर भ्रम पैदा हुआ।
 
अफवाह उड़ाने में इंडिया टुडे समूह सबसे आगे रहा। प्रियंका से मिले 'निर्देश' के बाद इसने सर्वाधिक सक्रियता दिखाई। इंडिया टुडे ने अपनी वेबसाइट पर समाचार प्रकाशित किया कि 'भाजपा शासित कर्नाटक ने नागरिकता कानून को अपने यहां लागू करने से मना कर दिया है।' यह मनगढ़ंत रिपोर्ट थी जिसे दिल्ली में बैठे संपादकों ने गढ़ा था ताकि यह माहौल बनाया जा सके कि नागरिकता कानून को लेकर भाजपा में आम राय नहीं है।
 
इसी समूह की एक वेबसाइट ने दिल्ली में प्रधानमंत्री के भाषण के लिए लिखा कि 'उन्होंने भर-भरकर झूठ बोला।' प्रधानमंत्री ने डिटेंशन सेंटर और एनआरसी पर जो कुछ भी कहा, वह पूरी जिम्मेदारी और तथ्यों के साथ कहा। लेकिन कांग्रेस के इशारे पर नाच रहे मीडिया संस्थानों ने सच को भी झूठ करार दिया। कई अखबारों और चैनलों ने यह झूठ फैलाया कि एनआरसी आया तो लोगों को अपना प्रमाणपत्र लेकर कहीं जमा करवाना होगा।
 
देश में संपादकों की संस्था एडिटर्स गिल्ड ने एक बयान जारी कर नागरिकता कानून के विरुद्ध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा पत्रकारों पर कथित अत्याचार पर विरोध जताया। हालांकि यह किसी से यह छिपा नहीं है कि मीडिया पर हमला करने वाले कौन थे। यह भी एक तरह की फर्जी खबर ही है, जिसके जरिए इस संस्था ने यह झूठ फैलाने की कोशिश की कि हिंसा के दौरान मीडिया पर हुए हमलों में दंगाइयों का हाथ नहीं, बल्कि पुलिस की भूमिका थी। झूठ फैलाने में विदेशी मीडिया भी बराबर का भागीदार है। ब्रिटिश समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने मेरठ दंगों के समय का एक वीडियो जारी कर दावा किया कि पुलिस वाले सीसीटीवी कैमरा तोड़ रहे हैं।
 
मेरठ पुलिस ने एजेंसी को जवाब दिया और लिखा कि आप देख सकते हैं कि वह कैमरा वीडियो रिकॉडिंर्ग कर रहा था। चंूकि दंगा हो रहा था इसलिए पुलिस ने कैमरे को सही दिशा में मोड़ा था ताकि बाद में दंगाइयों की पहचान की जा सके। आश्चर्य तब हुआ जब कई अखबारों और चैनलों ने रॉयटर्स की फर्जी खबर को प्रमुखता दी। एक खबर आई कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के 51 प्रोफेसरों ने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चलाया है। लेकिन कुछ घंटे के अंदर ही सूची में शामिल कई प्रोफेसरों ने सामने आकर बताया कि वे नागरिकता कानून का विरोध नहीं कर रहे हैं, उनके हस्ताक्षर भी फर्जी हैं। फिर भी कई चैनलों और वेबसाइट्स पर यह खबर देर तक चलती रही। जब देश के एक हजार से ज्यादा प्रोफेसर व बुद्धिजीवियों ने कानून के समर्थन में प्रधानमंत्री को पत्र लिखा तो यह खबर अंदर के पन्नों में दबा दी गई।