कोटा में बच्चे मरते रहे और कांग्रेस सीएए पर राजनीति करती रही
   दिनांक 06-जनवरी-2020
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे, यह कहावत राजस्थान (rajasthan) की अशोक गहलोत (ashok gehlot) सरकार पर सटीक बैठती है। कोचिंग के लिए प्रसिद्ध कोटा (kota) शहर के सरकारी मातृ और शिशु चिकित्सालय जेके लोन में 35 दिनों में 110 बच्चों की मौत के बाद भी राज्य सरकार अर्द्धनिंद्रा में है

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गहलोत सरकार का ध्यान बच्चों से ज्यादा नागरिकता संशोधन एक्ट (caa) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (nrc) के विरोध पर है। सरकार की संवेदनहीनता इस बात से पता चलती है कि मुख्यमंत्री गहलोत ने कहा था कि बच्चों की मौत होती रहती है। बयान पर घिरने के बाद गहलोत कहने लगे कि विपक्षी दल भाजपा की यह सीएए और एनआरसी से ध्यान भटकाने की साजिश है। राज्य के चिकित्सा मंत्री डॉ. रघु शर्मा 33 दिनों बाद अस्पताल का दौरा करने पहुंचे तो उनके स्वागत में ग्रीन कारपेट बिछा दिया गया। अस्पताल की दीवारों को नए पेंट से पुतवाया गया। विडंबना यह है कि कोटा ही नहीं, मुख्यमंत्री गहलोत के गृह जिले जोधपुर में दिसंबर माह में 146 बच्चों की मौत हुई, जिनमें 102 नवजात थे। बीकानेर में एक माह में 162 बच्चे दम तोड़ चुके हैं। राज्य के दूसरे जिलों में भी स्थिति ठीक नहीं है।
23-24 दिसंबर को जेके लोन अस्पताल में 10 नवजातों की मौत हुई थी। 27 दिसंबर को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला (om birla), जो स्थानीय सांसद हैं, ने ट्वीट करके इन मौतों पर चिंता जताई थी और राज्य सरकार से तुरंत कार्रवाई के लिए कहा था। बिड़ला के ट्वीट के बाद ये मुद्दा एकाएक चर्चा में आया। तब व्यवस्थाओं की दुरुस्त करने के बजाय मीडिया से बातचीत में मुख्यमंत्री गहलोत ने बच्चों की मौत को सामान्य बताया था। ठोस उपाय करने के बजाय राजस्थान सरकार सीएए और एनआरसी के विरोध में व्यस्त रही। नवजातों के बजाय सरकार की प्राथमिकता में सीएए का विरोध कितना हावी है, यह इस बात से पता चलता है कि स्वयं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में उनके पूरे कैबिनेट ने 22 दिसंबर को राजधानी जयपुर में मार्च निकाला था। हद तो यह थी कि उस दिन जयपुर में इंटरनेट को बंद करा दिया गया था। व्यापारियों से बाजार बंद रखने को कहा गया था। जनता में ऐसा भय व्याप्त हुआ था कि अधिकांश लोग घरों में कैद होकर रह गए थे।
अपनी गलतियों को कबूलने के बजाय चिकित्सा मंत्री डॉ. रघु शर्मा ने ट्वीट कर पांच साल के आंकड़े पेशकर कहा कि हमारी सरकार के समय तो बच्चों की मौत का आंकड़ा घटा है, जबकि भाजपा (bjp) शासन के समय यह अधिक था। इतना ही नहीं, डॉ. शर्मा ने मुद्दे को गोरखपुर से जोड़ दिया। अपने ट्वीट में उन्होंने कोटा और गोरखपुर में बच्चों की मौत के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन तक पेश कर डाला। डॉ. शर्मा जेके लोन अस्पताल के आईसीयू में जिस बच्ची को देखकर आए थे, उसे भी बचाया नहीं जा सका। सरकार ने अस्पताल के अधीक्षक को पद से हटाकर अपनी जिम्मेदारियों से इतिश्री कर ली। बड़ा सवाल यह है कि सरकार किसी की भी हो, बच्चों की मौत के ये आंकड़े सुखद नहीं कहे जा सकते।
नवजातों की मौत को लेकर सरकार कितनी गंभीर है, इसकी पोल चिकित्सा मंत्री के बाद जेके लोन पहुंचे राज्य के उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट (sachin pilot) ने खोल दी। उन्होंने अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। सचिन ने यहां तक कहा कि इतने बच्चे मर रहे हैं। किसी को तो जिम्मेदारी लेनी होगी। हम 13 महीने से सत्ता में हैं। पिछली सरकारों को दोषी कैसे ठहरा सकते हैं। जब मीडिया ने पायलट से सवाल किया कि क्या आपकी राय मुख्यमंत्री से अगल है तो उन्होंने यह कहकर बात बदलने की कोशिश की कि मेरे लिए यह मुद्दा पॉलिटिकल नहीं है। हमें संवेदनशील होना चाहिए। डॉ. रघु शर्मा के पेश आंकड़ों पर पायलट ने यहां तक कहा कि हम आंकड़ों के जाल में उलझ गए हैं। जिस मां ने कोख में बच्चे को 9 माह रखा, उसकी कोख उजड़ती है तो दर्द वही जानती है। इशारों-इशारों में पायलट ने मुख्यमंत्री गहलोत पर वार किया। पायलट के बयान से यह तो साफ हो गया कि सरकार में सबकुछ सामान्य नहीं है। एक साल बाद भी सत्ता का संघर्ष जारी है और कुर्सी को लेकर अंदरुनी जंग जारी है।
कोटा के जेके लोन अस्पताल में अव्यवस्थाओं का आलम यह है कि वार्डों में ठंड से बचने के लिए आए 27 नए हीटर गायब थे। खुद नर्सिंग अधीक्षक रामरतन मीणा कह रहे हैं कि उन्हें नए हीटरों की जानकारी नहीं है। सेंट्रल टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि अस्पताल के 77 प्रतिशत वार्मर काम नहीं कर रहे थे। (इतना ही नहीं, 9 महीने पहले आई केंद्रीय टीम ने जेके लोन अस्पताल को 100 में से शून्य नंबर दिए थे।) वार्डों में दरवाजों और टूटी खिड़कियों से आ रही ठंडी हवा के कारण मरीज परेशान हैं। अस्पताल की दीवारें सीलन से भरी पड़ी हैं। अस्पताल परिसर में गंदगी का आलम यह है कि यहां सूअर घूमते रहते हैं। 11 वेंटिलेटर्स खराब हैं। 28 में से 22 नेबुलाइजर और 111 में से 81 इंफ्यूजन पंप काम नहीं कर रहे थे। 101 में 28 मल्टी पेरा मॉनीटर खराब पड़े थे। 38 में से 32 पल्स ऑक्सीमीटर बेकार मिले। बड़ा अस्पताल होने के बावजूद में ऑक्सीजन पाइप लाइन ही नहीं है। बच्चों की जिंदगी सिलेंडरों के भरोसे हैं। यह स्थिति जोधपुर, उदयपुर, अजमेर और बीकानेर की भी है। उप मुख्यमंत्री पायलट के सामने ही पीड़ित परिजनों ने अस्पताल की बदहाली की शिकायत की। जिन मांओं ने अपने नौनिहालों को खाया है, उनके सवालों का जवाब सरकार के पास नहीं है। वो तो केवल आंकड़ों का खेल खेलने में व्यस्त है।
राज्य सरकार भले कितने भी आंकड़े अपने बचाव में पेश कर रही हो, लेकिन राज्य के 37 सीएचसी पर किसी बच्चे की जांच की सुविधा नहीं है। 11 जिला अस्पतालों में बच्चों की सात तरह की जांच की सुविधा नहीं है। बच्चों के लिए कार्डियो, न्यूरो और नेफ्रो जैसे सुपर स्पेशलिटी का एक ही डॉक्टर नहीं है। हकीकत यह भी है कि जिला अस्पताल सहित अन्य अस्पतालों में सुविधाएं नहीं होने से जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, बीकानेर और अजमेर के मेडिकल कॉलेजों में हर दिन 108 बच्चे रेफर होकर आ रहे हैं। राज्य में 124 चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स की तत्काल जरूरत है।
कमाल की बात यह है कि गोरखपुर में बच्चों की मौत पर खूब हल्ला मचाने वाला मीडिया भी शुरुआत में चुप रहा। मीडिया ने न कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) और न ही राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका वाड्रा (priyanka Gandhi) से कोई सवाल पूछा। सीएए पर आक्रमक हो रहीं प्रियंका वाड्रा ने कोटा के जेके लोन अस्पताल में बच्चों की मौत पर एक ट्वीट तक नहीं किया। राहुल गांधी (rahul Gandhi) ने अपनी प्रतिक्रिया तक नहीं दी। उनकी तरफ से भी कोई ट्वीट नहीं किया गया।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (yogi adityanath) ने अपने सिलसिलेवार ट्वीट्स में तंज भी कसा कि सोनिया गांधी और प्रियंका वाड्रा महिला होकर भी माताओं का दुःख समझ नहीं पा रही हैं। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती (mayawati) ने कई ट्वीट्स कर प्रियंका वाड्रा से सवाल पूछा कि मिसेज वाड्रा कोटा में गरीब मांओं के आंसू पोंछने कब जाएंगी? प्रियंका ने अपनी सरकार से सवाल पूछने और खुद कोटा जाने के बजाय मायावती से ही सवाल किया कि आप स्वयं क्यों नहीं जाती कोटा। जो कांग्रेस महासचिव की झल्लाहट को ही दर्शाता है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला की पहल पर इंडियन ऑयल कॉपोरेशन अपनी सीएमआर एक्टीविटी के तहत जेके लोन अस्पताल को 50 लाख रुपए के उपकरण दे रहा है। बिड़ला ने 29 दिसंबर और 4 जनवरी को अस्पताल का दौरा कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। उन्होंने कहा भी कि आरोप-प्रत्यारोप के बजाय बच्चों को बचाया जाए। कोटा शहर के भाजपा विधायकों ने अस्पताल में ठंड से बचाव के हीटर लगाए हैं। देर से जागी राज्य सरकार ने भी ऑक्सीजन लाइन के निर्माण से लेकर उपकरणों की खरीद को स्वीकृति दी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन (dr. harshvardhan) की बातचीत हुई। गहलोत ने डॉ. हर्षवर्धन से स्वयं कोटा के जेके लोन अस्पताल आने का अनुरोध किया। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने ट्वीट करके जानकारी दी कि जेके लोन अस्पताल के लिए नेशनल हेल्थ मिशन के तहत 91.1 लाख रुपए एडवांस में भेजे जा चुके हैं। विशेषज्ञों की टीम अस्पताल का दौरा कर रही है।
उम्मीद की जानी चाहिए कि कोटा के जेके लोन अस्पताल समेत राजस्थान के प्रत्येक अस्पताल में बच्चों की मौत का सिलसिला रुक जाएगा। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हर मुद्दे पर केंद्र सरकार का विरोध करने के बजाय राज्य की बदहाली पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )