ध्रुवीकरण के दौर में तटस्थता खतरनाक
   दिनांक 06-जनवरी-2020
बदलते समय की आहट हमें लगनी ही चाहिए। इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति श्री जगदीश उपासने ने भी अपने विचार व्यक्त किए। 
 
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कार्यक्रम में विचार व्यक्त करते श्री जे. नंद कुमार 
''वर्तमान में देश में एक बहुत बड़ा सामाजिक और सांस्कृतिक ध्रुवीकरण हो रहा है। इस स्थिति में विचारकों और बुद्धिजीवियों का तटस्थ होना खतरनाक है इसलिए उन्हें स्पष्ट भूमिका लेनी चाहिए।'' उक्त बात प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक श्री जे. नंदकुमार ने कही। वे गत दिनों पुणे में ऋतम एप और महाराष्ट्र एजुकेशन सोसाइटी द्वारा आयोजित मीडिया संवाद परिषद के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे।
 
राष्ट्र की वर्तमान स्थिति की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि देश की स्वतंत्रता का समर आम नागरिकों ने लड़ा था। आम नागरिक के खड़े रहने के कारण ही यह समर हो सका। यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति या परिवार द्वारा नहीं लड़ी गई। इस बात का ध्यान रखते हुए आम नागरिकों को जागरूक होने की आवश्यकता है। इस समय राष्ट्र के भविष्य के लिए वैचारिक आंदोलन चल रहा है। सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में ध्रुवीकरण के प्रयास हो रहे हैं। सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय की लड़ाई चल रही है। ऐसी स्थिति में विचारक तथा बुद्धिजीवियों का तटस्थ होना ठीक नही है। तटस्थ भूमिका लेकर कुछ नहीं होता। उन्होंने कहा कि देश के प्रत्येक नागरिक की नस-नस में सर्वधर्म समभाव कूट-कूट कर भरा है। इसलिए हमें पंथ निरपेक्षता जैसे शब्दों की आवश्यकता नहीं है। हमारे आसपास क्या चल रहा है, इसका आंकलन हमें करना ही होगा। बदलते समय की आहट हमें लगनी ही चाहिए। इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति श्री जगदीश उपासने ने भी अपने विचार व्यक्त किए।  विसंकें, पुणे