सात्विक शक्ति की विजय के लिए कार्यरत है संघ
   दिनांक 06-जनवरी-2020
जो भारत को अपनी मातृभूमि मानता है और जन, जल, जंगल, जमीन और जानवर से प्रेम करता है,

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 कार्यक्रम को संबोधित करते श्री मोहनराव भागवत 
 
गत दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से भाग्यनगर (हैदराबाद) में विजय संकल्प शिविर का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत उपस्थित थे। स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि बड़ा संगठन बनाना संघ का ध्येय नहीं है, बल्कि संघ का ध्येय संपूर्ण समाज को संगठित करना है।
 
उन्होंने विजय का अर्थ समझाते हुए कहा कि विजय तीन प्रकार की होती हैं। असुर प्रवृत्ति के लोग दूसरों को कष्ट देकर सुख की अनुभूति करते हैं और उसे विजय समझते हैं। इसे तामसी विजय कहा जाता है। कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए दूसरे लोगों का उपयोग करते हैं और स्वार्थ के लिए लोगों को लड़ाते हैं। ऐसे लोगों की विजय को राजसी विजय कहा जाता है, लेकिन ये दोनों विजय हमारे समाज के लिए निषिद्ध हैं। हमारे पूर्वजों ने सदैव धर्म विजय का आग्रह किया है। सवाल यह है कि धर्म विजय क्या है? हिन्दू समाज ऐसा विचार करता है कि दूसरे के दुखों का निवारण कैसे किया जाए।
 
दूसरों के सुख में अपना सुख मानना और दूसरों के कल्याण की भावना मन में रखना और उसी के अनुसार आचरण करने से धर्म विजय प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि हमारे देश में भी रज और तम शक्तियों का खेल चल रहा है। लेकिन हमें सात्विक विजय चाहिए, जो शरीर, मन, आत्मा और बुद्धि को सुख देने वाली हो।
 
सर्वत्र प्रेम और सबके विकास का साधन बनने से धर्म विजय का मार्ग प्रशस्त होता है। क्योंकि जैसे मशाल को नीचे करने पर भी ज्वाला ऊपर की तरफ ही जाती है, उसी प्रकार सात्विक शक्तियां हमेशा उन्नयन की ओर जाती हैं। राष्ट्रकवि रविंद्र नाथ ठाकुर के एक निबंध 'स्वदेशी समाज का प्रबंध' का उद्धरण देते हुए उहोंने कहा कि समाज को प्रेरणा देने वाले नायकों की जरूरत है। सिर्फ राजनीति से भारत का उद्धार नहीं होगा, बल्कि समाज में परिवर्तन की आवश्यकता है।
 
रविंद्र नाथ जी ने लिखा था कि अंग्रेजों को आशा है कि हिन्दू-मुसलमान लड़कर खत्म हो जाएंगे। लेकिन आपस के संघर्षण में से ही यह समाज साथ रहने का उपाय ढूंढ लेगा और वह उपाय हिन्दू उपाय होगा। उन्होंने कहा कि संघ की दृष्टि में 130 करोड़ का पूरा समाज हिन्दू समाज है। जो भारत को अपनी मातृभूमि मानता है और जन, जल, जंगल, जमीन और जानवर से प्रेम करता है, उदार मानव संस्कृति को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करता है और जो सभी का कल्याण करने वाली संस्कृति का आचरण करता है, वह किसी भी भाषा, विचार या उपासना को मानने वाला क्यों न हो, वह हिन्दू है। प्रतिनिधि
'' विश्वविद्यालयों का काम है राष्ट्रभक्त नागरिकों का निर्माण करना''
गत 29 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रयागराज केंद्र पर स्थापना दिवस समारोह का आयोजन किया गया। इस दौरान समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह उपस्थित रहे। देश के कुछ शिक्षण संस्थानों मंव उठ रहे देश विरोधी स्वरों पर तीखा कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की स्थापना का उद्देश्य नौजवानों को डिग्रियां बांटना नहीं बल्कि सुयोग्य निस्वार्थ राष्ट्रभक्त नागरिकों का निर्माण करना है।
 
पुस्तकें छापना, शोध निबंध प्रकाशित करना, शिक्षकों-कर्मचारियों को मोटी-मोटी तनख्वाह बांटना विश्वविद्यालयों का मुख्य उद्देश्य नहीं है, बल्कि उनका उद्देश्य राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में अपनी उपादेयता सिद्ध करना है। पर अफसोस है कि राष्ट्र निर्माण के प्रमुख केंद्रों में 'ले के रहेंगे आजादी' के नारे लगाए जा रहे हैं। ऐसे में समय की मांग है कि विश्वविद्यालयों से ऐसी युवा पीढ़ी तैयार की जाए जो अपने स्वार्थ को छोड़कर राष्ट्रहित में सोचने को तत्पर हो।
 
उन्होंने कहा कि जनसंख्या हमारे देश के लिए अभिशाप नहीं बल्कि वरदान है। यहां के नौजवानों को हुनरमंद बनाकर देश के विकास में उनका योगदान प्राप्त किया जा सकता है। इस बात पर उन्होंने प्रसन्नता जताई कि पहली बार केंद्र सरकार ने नौजवानों को हुनरमंद बनाने के लिए कौशल विकास मंत्रालय की स्थापना की है। केंद्र के निदेशक प्रो. अखिलेश दुबे ने भी मूल्य आधारित शिक्षा पर अपने विचार व्यक्त किए।