'हर कोई दहशत में था दंगे जैसे हालात थे शिक्षकों के घरों पर हमला किया जा रहा था'
   दिनांक 07-जनवरी-2020
जेएनयू में वामपंथियों ने पहले हमला किया, फिर प्रोपेगेंडा के तहत फैलाया कि बाहर से गुंडों ने आकर उनको पीटा, अब मीडिया में बयानबाजी हो रही है, लेकिन सच इससे बिल्कुल अलग है

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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुई हिंसा एक वैचारिक संघर्ष का परिणाम है । जो जेएनयू में हुआ वह नई बात नहीं है, जहां भी वामपंथियों का वर्चस्व है वहां वे हमेशा ऐसा करते आए हैं, हम जो कहें, हम जो करें वही सही, अगर विरोध करोगे तो हम उसे कुचल देंगे। दरअसल जेएनयू में वामपंथ का गढ़ ढहने लगा है, छात्र वामपंथी संगठनों की असलियत जान चुके हैं और उनसे दूर होते जा रहे हैं।
जेएनयू में जो हुआ उसे सिलसिलेवार ढंग से देखें तो सारी वास्तविकता सामने आ जाएगी। एक जनवरी को विश्वविद्यालय प्रशासन को परीक्षा कराने से रोका गया । दो जनवरी को नकाब पहले कुछ लोग और जेएनयू छात्रसंघ के लोगों द्वारा जेएनयू इंटरनेट सर्वर को बंद कर दिया गया। तीन जनवरी को जब सुबह स्कूल आफ इंटरनेशन स्टडीज को कुछ छात्रों की मदद से खुलवाया गया तो 500 से ज़्यादा छात्रों ने अपना पंजीकरण करा लिया। इसके चलते वामपंथियों में हलचल हुई बिफरे वामपंथियों ने परीक्षा के लिए पंजीकरण रोकने को जेएनयू के सर्वर को ठप कर दिया, जिससे छात्रों के पंजीकरण रूक गए।
इसके बाद जो हुआ वह सबके सामने है। जब तीन जनवरी को इंटरनेशनल अध्ययन केंद्र को खोला गया तो डीन अश्विनी महापात्रा समेत कई शिक्षकों के साथ धुक्का—मुक्की की गई। एक शिक्षक का मोबाइल छीन लिया गया।
5 जनवरी को पेरियार हॉस्टल में एबीवीपी के कार्यकर्ताओं पर सुनियोजित तरीके से हमला किया गया। 150 से ज़्यादा नकाबपोशों ने चुन—चुनकर एबीवीपी के कार्यकर्ताओं को बुरी तरह पीटा। जिनके कमरे में स्वामी विवेकानंद की तस्वीर लगी हुई थी उन्हें और बेरहमी से मारा गया।
कई छात्रों के सिर फूटे, कइयों के हाथ टूटे, बचने के लिए छात्र हॉस्टल की छत से भी कूदे जिससे उन्हें काफी चोट आई। मैं खुद पेरियार हॉस्टल के एक वार्डन के यहां रुक गया। जब हॉस्टल के भीतर वार्डन के घर पर हमला हुआ तो हम कुछ लोग बाहर की तरफ़ भागे । 5:30 बजे के क़रीब दिल्ली पुलिस के डीसीपी कुछ पुलिसकर्मियों के गेट पर आए लेकिन हॉस्टल का गेट बंद था। शाम करीब 7 बजे साबरमती हॉस्टल के दो वार्डन घर पर भागते आए की हमारे घर पर हमला हो गया है। मैंने दोनों को घर में छिपाया।
साबरमती हॉस्टल पर एबीवीपी ख़त्म करो के नारे लग रहे थे मैं अपने घर के बाहर खड़ा था एक छात्र भागता आया सर घर के भीतर जाओ आपको भी नहीं छोड़ेंगे आप भी उनकी हिट लिस्ट में हो। मैं मेरे हॉस्टल के बच्चों को साथ लेकर हॉस्टल अंदर के गेट से घर में दाखिल हुआ । पुलिस अपने दलबल के साथ 8:30 के बाद पहुंची इसके बाद जाकर स्थिति संभली।
अब प्रश्न है कि वामपंथी धड़े के द्वारा पैदा की गई हिंसा में उनके ही साथी कैसे चपेट में आ गए । सबसे ज़्यादा ज़ख़्मी छात्र आम विद्यार्थी और एबीवीपी के कार्यकर्ता क्यूं हैं ?
(जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ. प्रवेश चौधरी से हुई बातचीत के आधार पर)