निर्भया के अपराधियों को मृत्युदंड पर देरी के लिए जिम्मेदार कौन ?
   दिनांक 08-जनवरी-2020
अमित त्यागी
सात साल बाद ही सही आखिरकार निर्भया के दोषियों को फांसी की सज़ा की तारीख तय हो ही गई। पर क्या निर्भया या बलात्कार के किसी भी अन्य मामले में दोष सिर्फ दिखाई देने वाले आरोपियों का होता है। व्यवस्था के उन कारकों पर हम कब काम करेंगे जिनके कारण बलात्कार की मानसिकता पुष्पित पल्लवित होती हैं

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2012 में हुए निर्भया कांड ने पूरे देश को हिला दिया था। 2019 के अंतिम दिनों में हैदराबाद में हुये प्रियंका रेड्डी कांड ने भी देशभर के लोगों में गुस्सा भर दिया था। हैदराबाद में तो पुलिस ने सभी आरोपियों का एनकाउंटर करके जनता की वाहवाही लूट ली थी, लेकिन 2012 के निर्भया कांड में भारत की सुस्त न्यायिक प्रक्रिया अपना स्वरूप दर्शा गई। 2012 की घटना में दोषियों को फांसी 22 जनवरी 2020 में हो रही है। अब न तो हैदराबाद प्रकरण में पुलिस द्वारा आरोपियों को दोषी मानकर उनका एनकाउंटर करना न्योयोचित है न ही निर्भया के दोषियों को सात साल के लंबे अंतराल के बाद सज़ा मिलना। न्याय में देरी के कारण लोगों को पुलिस का सिंघम स्टाइल में एनकाउंटर करना रोमांचित तो कर सकता है किन्तु यह चरमराती व्यवस्था का जीता जागता उद्वारण है। अब आंध्र प्रदेश में बलात्कार के केस में 21 दिनो में निर्णय देने की शुरुआत तो हो गई है लेकिन इसके बावजूद भारत में जिस तरह से बलात्कार के मामले सामने आ रहे हैं और साल दर साल यह लगातार बढ़ते चले जा रहे हैं तब इसके समाधान का विषय सिर्फ सरकार और जनता तक सीमित नही रह गया है। कानून बनाने, धरना प्रदर्शन करने एवं मोमबत्ती जलाने से अगर कुछ सुधार होता तो अब तक कब का हो चुका होता। यह विषय इतना गंभीर हो चुका है कि अब यह राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का विषय बन गया है। सामाजिक सुधार के माध्यम से हमारे अस्त व्यस्त सामाजिक, प्रशासनिक और न्यायिक ढांचे को दुरुस्त करने का समय अब आ चुका है।
जब हम किसी समस्या का वास्तविक समाधान चाहते हैं तो हमें तर्कों से परे जाकर विमर्श पर ध्यान केन्द्रित करना होता है। जैसे अंग्रेजी में दो शब्द हैं आर्गुमेंट(तर्क) और डिस्कशन(विमर्श)। अदालत की कार्यवाही तर्कों पर आधारित होती है जहां तर्कों से तय होता है हू इज़ राइट? यानी दो में से एक सही साबित होगा और एक गलत। विमर्श में तय होता है वॉट इज़ राइट ? यह ‘हू’ और ‘वॉट’ का अंतर समस्या के हल का बीज़ मंत्र प्रदान करता है। बलात्कार और महिला संबंधी अपराध पर बात करते समय तर्क नहीं विमर्श महत्वपूर्ण एवं आवश्यक तत्व है। अब दो विषय ऐसे हैं जो हमारे विमर्श का हिस्सा होने चाहिए। एक समस्या का पूर्व निदान(प्रेवेंशन) और दूसरा समस्या का उपचार(क्योर)। कानून के द्वारा बलात्कार एवं महिला संबंधी अपराधों का उपचार मिलता है। सबसे पहले बात दूसरे विषय पर करते हैं। इस संदर्भ में पहले हम देश में बलात्कार के आंकड़ों पर गौर करते हैं। यह आंकड़े बहुत चौकाने वाले हैं। 2019 की पहली छमाही में जनवरी 2019 से 30 जून 2019 के बीच भारत में बलात्कार के 24,212 मामले दर्ज़ किए गए। इस हिसाब से 1 महीने में 4000, एक दिन में 130 और हर 5 मिनट में कहीं न कहीं बलात्कार हो रहा होता है। इसमे चौंकाने वाली एक बात यह है कि बलात्कार की शिकार महिलाओं में छह महीने की बच्ची से लेकर 60 महीने तक की महिलाएं शामिल हैं। इससे भी ज़्यादा चौकाने वाला एक आंकड़ा यह है कि साल दर साल बलात्कार के आंकड़ों में वृद्धि होती जा रही है। 2016 में बलात्कार के दर्ज़ मामलों की संख्या 38,947 थी। यह 2015 में दर्ज़ बलात्कार के मामलों की तुलना में 12.4% ज़्यादा थी। यदि 2019 के दर्ज़ मामलों की ही बात करें तो 11,981 मामलों में अभी जांच चल रही है। 12,231 मामलों में पुलिस आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है। आरोपी को सज़ा दिलवाने के क्रम में सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया ट्रायल होती है। 2019 की पहली छमाही के आंकड़ों के केस में ट्रायल सिर्फ 6449 केस का ही चल रहा है। अभी 4871 मामले ऐसे हैं जिसमे अभी ट्रायल शुरू ही नहीं हुआ है। यदि फैसलों की तरफ देखें तो न्यायालय ने अभी तक 911 मामलों में ही फैसला सुनाया है, जो कि कुल संख्या का मात्र 4% है। न्यायालय की धीमी गति से फैसले देने के कारण न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा कम होने लगता है। वह कानून अपने हाथ में लेकर निर्णय करने को बेहतर विकल्प मानने लगते हैं। हैदराबाद प्रकरण में पुलिस द्वारा जब आरोपियों का एंकाउंटर किया जाता है तो इसमे लोगों को राहत मिलने लगती है। जबकि ऐसा होना गलत परिपाटी भी शुरू कर सकता है।
सुस्त न्यायिक प्रक्रिया से कम होती विश्वसनीयता 
सुस्त न्यायिक प्रक्रिया अर्थव्यवस्था को भी धीमा कर देती है। वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट की रिपोर्ट के अनुसार कानून व्यवस्था की गुणवत्ता के विषय पर इंग्लैंड का स्थान 12वां, सिंगापुर का 13वां, अमेरिका का 20वां एवं भारत का 68वां है। 2018 में भारत का स्थान 65वां था। यानी की एक साल में हमारी न्यायिक व्यवस्था का स्थान अंतरराष्ट्रीय मापदण्डों पर घटा है। इसका असर महिला अपराधों से संबंधित और विशेष तौर से बलात्कार के मुकदमों पर भी पड़ा है। सुस्त न्यायिक प्रक्रिया की एक वजह रिक्त पद भी हैं। एक तरफ भारत प्रति हज़ार व्यक्तियों पर कम न्यायाधीश होने की मार झेल रहा है तो दूसरी तरफ स्थापित पदों में भी अधिकतर रिक्त पड़े हैं। एक आंकड़े के मुताबिक 2006 में लगभग 15 प्रतिशत पद रिक्त थे जो 2015 में बढ़कर 37 प्रतिशत तक पहुंच गए थे। चूंकि 2019 में भी रिक्त पदों की संख्या 37 प्रतिशत ही है इसलिए पिछले चार सालों में प्रतिशत का न बढ़ना एक संतुष्टि दे सकता है। त्वरित न्यायिक प्रक्रिया के क्रम में न्यायालय में न्याय त्वरित गति से मिले इसके लिए न्यायालय का खर्च बढ़ाया जाना पहली शर्त होता है। इस संदर्भ में देखें तो 2018-19 में न्यायपालिका को 4386 करोड़ का बजट दिया गया था। 2019-20 में यह बजट घटाकर 3055 करोड़ रुपए कर दिया गया। अब एक ओर तो फास्ट ट्रैक कोर्ट के द्वारा त्वरित निर्णय की अपेक्षा की जा रही है और दूसरी तरफ न्यायालय का बजट घटाया जा रहा है। अब ये दोनों बातें ही आपस में विरोधाभाषी हैं।
अब त्वरित न्याय के दूसरे विषय कार्य दिवस पर बात करते हैं। भारत में उच्चतम न्यायालय में 190 कार्यदिवस में काम होता है। उच्च न्यायालय में 232 दिन और ज़िला न्यायालयों में यह औसत 244 दिन का आता है। अब एक और पदों की रिक्तता एवं दूसरी तरफ कार्य दिवस की कम संख्या इस बात का दर्शाती है कि क्यों भारत में न्याय में देरी होती है। इन सबसे जुड़ा एक विषय वकीलों का जजों के बीच तालमेल से भी जुड़ा है। अधिकतर वकील तारीख के हिसाब से फीस लेते हैं। ऐसे में वह स्वयं चाहते हैं कि मुक़दमा लंबा चले। इसके साथ अभी भारत के निचली अदालतों में तकनीक के द्वारा तेज़ी पर ध्यान नहीं हैं। निचली अदालतों में वाद की स्थिति ऑनलाइन प्राप्त नहीं होती है। इस कारण समय और ऊर्जा दोनों व्यर्थ जाती है। एक वजह न्यायाधीशों की जवाबदेही और समय सीमा तय न होने के कारण भी है। समय सीमा को फैसले की गुणवत्ता में बाधक बता कर न्यायाधीश अपनी ज़िम्मेदारी से बच जाते हैं। किन्तु इसके साथ यह भी एक बात उल्लेखनीय है कि जहां न्यायाधीश एवं वकीलों में बेहतर तालमेल बैठ जाता है वहां फैसले भी त्वरित होते हैं और न्याय होता भी दिखने लगता है। अब सिर्फ न्यायपालिका के स्तर पर समस्या हो ऐसा भी नहीं है। पुलिस की कार्यप्रणाली और प्रक्रिया में सुधार की बड़ी गुंजाइश है।
बहुत आवश्यक है पुलिस सिस्टम में सुधार 
कहा जाता है कि ‘एव्री पुलिसमैन इज़ ह्यूमन इन यूनिफ़ोर्म एंड एव्री ह्यूमन इज़ पुलिसमैन विदाउट यूनिफ़ोर्म’ । इसलिए सिर्फ व्यक्ति के रूप में पुलिस को जिम्मेदार ठहराने से सुधार संभव नही है। पुलिस की व्यवस्था में सुधार आवश्यक है। जब भी कोई अपराध घटित होता है तब पीड़ित का पहला सामना पुलिस से होता है। क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम(सीजेएस) में पुलिस एक अहम कड़ी है। पुलिस से सामना होने पर सबसे पहले एफ़आईआर दर्ज़ की जाती है। पुलिस द्वारा दुष्कर्म की एफ़आईआर और बाकी एफ़आईआर दर्ज़ करवाने की प्रक्रिया में सुधार के लिए कई संस्थानों ने सुझाव भी दिए हैं। राष्ट्रीय पुलिस आयोग, मलिमथ समिति, द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस के अनुसार पुलिस को एफ़आईआर की परिपाटी में बदलाव करते हुये प्राथमिकता तय करनी होगी। दुष्कर्म की एफ़आईआर और बैंक धोखाधड़ी, डेटा चोरी की एफ़आईआर में जांच के अंतर को समझना होगा। इसके साथ ही अगर अनावश्यक दीवानी मुक़दमे अगर पुलिस थानों से बाहर रहते हैं तो उस समय और ऊर्जा का उपयोग पुलिस सही स्थान पर कर सकती है। अब यदि दुष्कर्म के मामलों की बात करें तो उसमे साक्ष्यों का का संकलन महत्वपूर्ण होता है। भारत में आधुनिक फोरेंसिक लैब्स के बुनियादी ढांचे में सुधार की एक बड़ी गुंजाइश है। इसके लिए काफी मात्रा में धन किन्तु उससे कम मात्रा में राजनीतिक इच्छा शक्ति की आवश्यकता है। दुष्कर्म पीड़ितों को न्याय दिलवाने के क्रम में अभियोजन का पक्ष भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। अभियोजन अधिकारियों की गुणवत्ता वर्तमान में गंभीर चिंता का विषय है। राज्य सरकार के हाथ में होने के कारण यह न्याय दिलवाने का माध्यम न बनकर सिर्फ राजनीतिक नियुक्तियां मात्र बन गई हैं। इसके साथ ही पुलिस द्वारा विवेचन के बाद आरोप पत्र दाखिल करने में न्यूनतम समय लगाना भी पीड़ित को तेज़ी से न्याय दे सकता है। इसके साथ आदतन अपराधियों से निपटने के लिए पुलिस और अभियोजन पक्ष को जितनी मेहनत और होम वर्क करना चाहिए वह भी नहीं दिखता है। इस कारण से मुक़दमे लंबे खींचते हैं। तारीख पर तारीख मिलती जाती हैं और न्याय में देरी होती जाती है।
अब ये बातें तो हुईं उस विषय पर जिसमें अपराध होने के बाद की कार्यवाही शामिल है। यह समस्या के उपचार की प्रक्रिया है। इसमे ज़्यादा से ज़्यादा सुधार यह हो सकता है कि हम किसी भी पीड़िता को न्याय दिलवाने का समय कम कर सकते हैं। उसके परिवार को एक सहानुभूति प्रदान कर सकते हैं। पर इस व्यवस्था के द्वारा अपराध के पूर्व की स्थिति वापस नहीं लौट सकती है। जिसके साथ घटना हो चुकी होती है उसका दर्द उसे एवं उसके परिवार को पूरी उम्र रहता है। इसलिए समस्या के पूर्व निदान (प्रेवेंशन) का विषय बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। पूर्व निदान के लिए हमें अपने सामाजिक ढांचे में बदलाव करना होगा। भोगवादी व्यवस्था में हर बिकने वाली चीज़ पर नारी देह के होने को ही वास्तविक समस्या मानना होगा। फ्री डेटा मिलने के बाद सबके लिए आसानी से उपलब्ध पॉर्न साइट और शराब के कॉकटेल को समझना होगा।
शराब और अश्लीलता का दुर्भाग्यपूर्ण कॉकटेल
जब बात शराब की होती है तब कुछ लोग इसे सुरूर और आनंद का नाम देते हुए इसके समर्थन में तर्क गढ़ने लगते हैं। कुछ लोग इसे खुशी बांटने का माध्यम बताते हैं तो कुछ ग़म मिटाने का एक तरीका। कुछ लोग इसे थकान मिटाने के रूप में देखते हैं तो कुछ इसे दोस्ती बढ़ाने का विकल्प बताते हैं। सबके अपने तर्क होते हैं शराब को जायज़ ठहराने के । इसी तरह जब हम पॉर्न की बात करते हैं तब हमारे ज़ेहन में नग्नता और अडल्ट फिल्म की तस्वीर उभरती है। हम यह मान कर चलते हैं कि यह व्यस्कों के मनोरंजन का साधन मात्र है। क्षणिक सुख के लिए समाज का एक वर्ग पॉर्न फिल्मों की तरफ आकर्षित होता है। यहां तक देखने पर कोई भी व्यापक दुष्प्रभाव दिखाई नहीं देता है किन्तु शराब और पॉर्न फिल्मों का कॉकटेल समाज में एक नए तरीके का अपराधी वर्ग पैदा कर रहा है। इन दोनों के बीच में उत्प्रेरक का काम करता है उत्तेजना फैलाने वाला विज्ञापन उद्योग। विज्ञापनों में उत्तेजित करते दृश्य धीरे धीरे कब मानसिक विकृति पैदा कर देते हैं हमको पता भी नहीं चलता है।
अब एक परिदृश्य के जरिये अपराध को समझने का प्रयास करते हैं। विज्ञापनों मे सिगरेट का धुआं उड़ाता नौजवान चुटकियों मे बड़े बड़े काम कर देता है। खूबसूरत लड़की उसके आस पास मंडराने लगती है। डीओ की खुशबू जैसे लड़की पटाने का माध्यम ही दिखाई जाती है। डिओ लगाओ और अपने आस पास कम कपड़े वाली लड़कियों का जमावड़ा पाओ। इसके बाद खूब जमता है रंग जब मिल बैठते हैं तीन यार। यही दर्शक वर्ग जब इन उत्पादों के प्रयोग के बाद नशे की हालत मे पॉर्न को देखता है तो ये उसकी विकृत मानसिकता के लिए एक उत्प्रेरक का कार्य करती है। अब वो मानसिक रूप से अपराध करने के लिए तैयार हो चुका है। हालांकि, उसे खुद मे अभी ज्ञान नहीं है कि उसके द्वारा किया जाने वाला कृत्य एक घिनौना अपराध है। कुछ समय बाद जब व्यक्ति को होश आता है तब तक घटना हो चुकी होती है। उसके द्वारा अपराध किया जा चुका होता है। उत्प्रेरक अपना दुष्प्रभाव दिखा चुका होता है। अब उसे समझ आता है कि विज्ञापन और पॉर्न मे दिखने वाली सुंदर कन्याएं तो विषकन्याएं थीं जिन्होंने उसे अपराधी बना दिया है। अब समाज भी उसे धिक्कार रहा है और परिवार भी। जेल की सलाखों के पीछे वो तीन यार भी नदारद हैं जिनके साथ रंग जमाने का दावा किया गया था।
नशे से प्राप्त राजस्व बनाम दुष्कर्म के बढ़ते अपराध 
अब जब घटना हो चुकी है तो घटना के बाद तरह तरह के प्रदर्शन और बयानबाज़ी होती है। कुछ लोग महिलाओं पर अत्याचार के नाम पर झण्डा बुलंद करते हैं। कुछ लोग कानून को कमजोर बताते हैं। कुछ लोग भारतीय संस्कृति के नैतिक पतन पर व्याख्यान देते हैं। कुछ बुद्धिजीवी टीवी चैनल पर प्राइम टाइम की शोभा बढ़ाने बैठ जाते हैं। विपक्ष धरना, प्रदर्शन और रेल रोको के माध्यम से खुद पर ध्यान केन्द्रित करवाने में कामयाब हो जाता है। यानि कि सब कहीं न कहीं अपनी अपनी जिम्मेदारियों मे व्यस्त हो जाते हैं और कहीं दूर कोई अन्य धुआं, डिओ और तीन यार से प्रभावित होकर पॉर्न देखने के बाद एक नई घटना को अंजाम दे रहा होगा। आसान शब्दों मे कहें तो गुनाह को प्रेरित करने वाले तत्वों को समाप्त करने से ज़्यादा चर्चा गुनहगार पर होने लगती है। मूल समस्या से ध्यान हटाने की एक वजह है। प्रेरित करने वाले तत्व एक बड़े बाज़ार का हिस्सा है। राजस्व प्राप्ति के स्रोत हैं। सत्ता और सरकार तक जिनकी पहुंच है। इसलिए जब जब शराबबंदी पर रोक की बात उठती है तब तब शराब सिंडिकेट का माफिया इतना शक्तिशाली बन जाता है कि वह अराजक तत्वों को आगे कर शराबबंदी होने से रोक देता है। कुछ बिकाऊ अर्थशास्त्री शराबबंदी के द्वारा होने वाली राजस्व हानि का विधवा विलाप शुरू कर देते हैं। ज़्यादातर राजनेता इस सिंडिकेट के आगे घुटने टेकते हुये इनसे अर्थ लाभ भी ले लेते हैं। ऐसे में तमाम हानियों के बावजूद शराब बंदी नहीं हो पाती है।
अब जिस जिस प्रदेश में शराब बंदी हुई है वहां के नेता वास्तविकता में बधाई के पात्र हैं। गुजरात और बिहार में शराब बंदी के बाद नागरिकों का जीवन स्तर सुधरा है। जो पैसा यहां के लोग शराब में खर्च करते थे वह अब उनके बच्चे कुछ समान खरीदने में कर रहे हैं। शराब के जरिये जो पैसा सरकार के पास पहुंच रहा था अब वह बाज़ार में घूम रहा है। कुल मिलाकर राजस्व की हानि तो हुई लेकिन नागरिकों का जीवन स्तर बेहतर हो गया। यदि आंकड़ों की बात करें तो बिहार में शराब बंदी के बाद से 6,000 करोड़ की राजस्व हानि हुयी। इसके साथ ही एक चौकाने वाला आंकड़ा यह सामने आया है कि शराब बंदी के बाद बिहार में दुग्ध उत्पादों का उत्पादन 17% बढ़ गया है। सिर्फ दुग्ध उत्पादन के द्वारा 10,000 करोड़ रुपये बैंकों में जमा हुए। इस तरह देखा जाए तो शराब बंदी के बाद कुल मिलाकर राजस्व हानि नहीं बल्कि लाभ हुआ। वर्तमान में देश में 30 लाख मौते प्रतिवर्ष शराब के कारण होती हैं। शराब पीने से होने वाली बीमारियों पर खर्च भी बड़ा होता है। कुल मिलाकर शराब से एक और राजस्व मिलता है तो दूसरी तरफ चिकित्सा पर वह धन खर्च भी हो जाता है। एक आंकड़े के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 3% लोग सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े खर्चे के कारण बीपीएल में शामिल हो रहे हैं। इसके साथ ही शराब के द्वारा अपराध की बढ़ती मनोवृत्ति पर चर्चा हम कर ही रहे हैं।
इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सिर्फ कानून के भरोसे अपराध नहीं रोके जा सकते हैं क्योंकि भारतीय न्याय प्रक्रिया मे एक जुमला प्रचलित है। “भारत में विधि का शासन है न्याय का नहीं”। उस घटना को अपराध माना जायेगा जिसको विधि में अपराध माना गया है। इस प्रक्रिया मे न्याय हुआ है या नहीं ? इस पर विधि मौन है। शायद, इसलिए ही गुनाह को प्रेरित करने वाले तत्वों पर कोई खास कार्रवाई नहीं हो पाती है। ऐसे में यदि गुनाह के तत्वों को हम पूर्व में ही नियंत्रित कर लें तो महिला के साथ होने वाले दुष्कर्म जैसे अपराधों पर लगाम लग सकती है।
(लेखक विधि विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )