मोहिनी तस्वीरों का बदरंग सच
   दिनांक 08-जनवरी-2020
जिनकी बुद्धि उन्हें गुंडे, बदमाशों वाली भाषा और कृत्यों पर उतार दे क्या हम उन्हें बुद्धिजीवी कह सकते हैं? और अगर हम ऐसे लोगों को बुद्धिजीवी मानते हैं तो मानना होगा कि एक समाज के तौर पर कहीं न कहीं हमें भ्रमित करने का काम किया गया है या कोई खामी रही है। वास्तव में ये बुद्धिजीवी हैं ही नहीं

edit_1  H x W:
 
वैचारिक जहर फैलाने वाले इरफान हबीब और अरुंधति राय
 
कुछ चीजें दूर से कई बार आकर्षक, लुभाने वाली लगती हैं, लेकिन अगर आप उन्हीं चीजों को पास जाकर देखें तो वे बहुत बदसूरत हो सकती हैं, बोसीदा हो सकती हैं, बौनी हो सकती हैं, अभद्र हो सकती हैं और कई बार घिनौनी भी हो सकती हैं। पिछले कुछ दिनों में देश में ऐसे अलग-अलग दो चित्र देखने को मिले। अगर हम उन पर बात करें तो वस्तुत: वे दो अलग-अलग झांकियों के स्वरूप में सामने आते हैं। पहले चित्र में वामपंथ की एक चमकीली नेत्री हैं, जिनकी लंबे समय तक चर्चा होती रही है। उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को पढ़े बिना उसमें नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) का घालमेल करते हुए लोगों में भ्रम फैलाने की कोशिश की। इस कोशिश के दौरान उन्होंने जो बातें कहीं उनसे पता चला कि उनका ज्ञान कितना छिछला है, भाषा कितनी अभद्र है और तुच्छता में वे किस हद तक जा सकती हैं। यह बात है सुजैना अरुंधति राय की।
उनका हृदय बस्तर, अबूझमाढ़ में खून की खेती करने वाले नक्सलियों के लिए द्र्रवित होता है। उनको झारखंड के खूंटी में संविधान की छाती पर पत्थर गाड़ने की कोशिश करने वालों की चिंता रहती है। पाकिस्तान की शह पर कश्मीर में भारत को छलनी-छलनी करने का सपना बुनने वाले जिहादी उन्मादियों के पक्ष में भी वह खड़ी हुई दिखाई देती हैं!
पिछले दिनों उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून पर दिए अपने बयानों में जिन रूपकों-प्रतीकों का प्रयोग किया, उससे उनके भीतर के भावों की एक बार फिर पुष्टि हो गई। उन्हें रूपकों में बलात्कारी ही मिलते हैं, प्रतीकों में भी दरिंदे, बच्चों के निर्मम हत्यारे मिलते हैं।
तथ्यों के आईने में देखें तो महात्मा गांधी पर उंगली उठाने वाली, कश्मीर को भारत से अलग बताने वाली, जंगल, जमीन और जनजातियों की बात करने वाली अरुंधति राय सोच से धूर्त और व्यवहार से पाखण्डी रही हैं।
उन्होंने होशंगाबाद और पचमढ़ी में टाइगर रिजर्व के भीतर की जमीन-बंगले पर अवैध कब्जा किया था। बहुत हीला-हवाली करते हुए अपने अवैध कब्जे पर वह लंबे समय डटी रही थीं, कुछ ऐसी ही पट्टी वह पिछले दिनों घुसपैठियों और उनके पैरोकारों को पढ़ा रही थीं।
ऐसी ही दूसरी हस्ती इरफान हबीब हैं। इरफान हबीब केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को धकियाने की कोशिश करते हैं। शैक्षिक जगत के भीतर प्रोफेसर इरफान हबीब की ख्याति इतिहासकार से ज्यादा राजनीतिक आंदोलनकारी की रही है। क्योंकि शिक्षा में सकारात्मक भूमिका निभाने की बजाय वामपंथी राजनीति को धार देने में उनका योगदान ज्यादा रहा।
भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) की पीठ पर रहते हुए उन्होंने कैसे एक प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान को बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के कार्यालय में बदल डाला था, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में किस तरह यही काम हुआ और साथ न देने वाले शिक्षाविदों को प्रताडि़त किया गया, इस सबकी चर्चा आज भी शैक्षिक जगत के लोग करते हैं।
जहां तक इरफान हबीब की बात है तो अयोध्या मामले में दशकों तक देश में जहरीला वातावरण उत्पन्न करने की जो कोशिश की गई उस नर्सरी के माली के तौर पर गलत विचारों और तथ्यों को रोपने का काम इनका था।
अगर कोई इतिहासकार अपने नाम के साथ खुद को किसी 'वाद' का अनुयायी बताए तो इससे पता चलता है कि वह तथ्यात्मक इतिहास के बजाय इतिहास को अपने वाद के अनुसार निर्देशित करने की कोशिश कर रहा है। अयोध्या मामले में इरफान हबीब ने यही किया। तथ्यों से खिलवाड़ की हद देखिए कि सरस्वती सभ्यता की खोज मामले में उन्होंने पूरी सरस्वती नदी को ही कपोल कल्पित ठहरा दिया था।
कारण यह कि आर्य-द्र्रविड़ संघर्ष का कल्पित सिद्धांत दरअसल सरस्वती सभ्यता को झुठला कर ही जिंदा रह सकता था। कमाल देखिए कि विभाजक राजनीति के हथकंडे के लिए इन कथित इतिहासकारों ने इतिहास का ही गला दबाने का काम किया।
वह तो भला हो प्रो. वसंतराव शिंदे जैसे पुरातत्वविदों का, जिन्होंने गुणसूत्र से जुड़े महत्वपूर्ण अनुसंधानों के जरिए दुनिया के सामने इरफान हबीब और रोमिला थापर जैसे स्वनामधन्य इतिहासकारों की कलई खोल कर रख दी। इसके अलावा राखीगढ़ी के अनुसंधानकर्ताओं ने भी दुनिया को सरस्वती का सच बताया।
सरस्वती सभ्यता मामले में विज्ञान ने बताया कि ये इतिहासकार दरअसल हवा में चौकड़ी मार रहे थे और लोगों को भ्रमित कर रहे थे। इतिहास में डीएनए की खोजों से पता चला कि सरस्वती नदी का अस्तित्व था। ऐसे लोगों द्वारा आर्य-द्र्रविड़ सिद्धांत के नाम पर लोगों को लड़ाने-भिड़ाने का काम किया गया।
जो काम सरस्वती सभ्यता मामले में विज्ञान ने किया, ठीक वैसा ही कथित इतिहासकारों को आईना दिखाने वाला काम अयोध्या मामले में इस देश के न्यायतंत्र ने किया। अयोध्या मामले में न्यायालय ने बताया कि राम मंदिर को लेकर साक्ष्य सही थे और ये इतिहासकार गलत थे। प्रकारान्तर से जो काम साहित्यकार-आंदोलनकारी के रूप में अरुंधति राय कर रही थीं वही काम शिक्षाविद-इतिहासकार के चोगे में रहकर इरफान हबीब कर रहे थे।
यह बताता है कि वैचारिक आंदोलन के नाम पर समाज को काटने, बांटने और जहर बोने का काम करने वाले मोहरे कैसे आकर्षक दिखाए जाते हैं और असल में कैसे हैं।
वे संवैधानिक संस्थाओं पर पत्थर उछालने के लिए इकट्ठे हो सकते हैं, संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों से धक्कामुक्की-अभद्र्रता करने और गला पकड़ने के लिए आगे बढ़ सकते हैं। अपनी छवि की चकाचौंध में वे युवा पीढ़ी को औजार बनाते हैं, उसकी पीठ पर बंदूक रखकर आगे बढ़ते हैं। दरअसल, व्यक्ति हो या विचार, यदि उसकी बुनियाद में ही झूठ हो तो उस छद्म अस्तित्व को किसी बैसाखी की आवश्यकता तो होती ही है।
जिस तरह चावल की देग का एक दाना बता देता है कि चावल कितना पका है, इसी तरह वामपंथ की देग से पिछले दिनों ये दो चावल छिटके हैं। अरुंधति या इरफान, घटनाएं बता रही हैं कि बुद्धि-जीविता की वामपंथी देग में जहर ही पक रहा था और वह कितना पका है वह उनकी भाषा, रूपक और अभद्रता से पता चलता है।
जिनकी बुद्धि उन्हें गुंडे, बदमाशों वाली भाषा और कृत्यों पर उतार दे क्या हम उन्हें बुद्धिजीवी कह सकते हैं? और अगर हम ऐसे लोगों को बुद्धिजीवी मानते हैं तो मानना होगा कि एक समाज के तौर पर कहीं न कहीं हमें भ्रमित करने का काम किया गया है या कोई खामी रही है। वास्तव में ये बुद्धिजीवी हैं ही नहीं। ये राजनीति के प्यादे हैं, जिनकी सोच बहुत बौनी है, लेकिन प्रचार तंत्र मजबूत, राजनीतिक प्रचार तंत्र ही इन्हें महान विभूति की तरह प्रस्तुत करता है। सो, बुद्धिमानी यही है कि ऐसे बुद्धिजीवियों सेेे बच कर रहा जाए !
 
 @hiteshshankar