पाकिस्तान में मिले दर्द पर अब लगा है मरहम
   दिनांक 08-जनवरी-2020
 डॉ. क्षिप्रा माथुर
अपनी सरज़मीं का न होना, किसी की सरपरस्ती न होना, एक भरा पूरा घर-अपनी मिट्टी यूं ही छोड़ आना और जिसे अपना मुल्क मानकर आए, वहां भी खुली बाहें न होना यानी अपना अस्तित्व ही न होना क्या होता है, ऐसी यहां-वहां बिखरी हजारों जिंदगियां है जो इस बेबसी को बयां करती हैं

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5 साल हुए सुबिया और जयरामजी को पाकिस्तान के रहमियार खान इलाके से प्रताडि़त होकर भारत आए। इन्हें अभी तक नागरिकता नहीं मिली है। जयरामजी यहां दर्जी का काम करके घर चलाते हैं। बाकी का परिवार अभी पाकिस्तान में ही है। चित्र में उनके तीन में से दो बच्चे-हंसिका और विनोद भी दिखाई दे रहे हैं 
 
करीब चार साल पहले देशव्यापी मीडिया अभियान के दौरान राजस्थान सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे पाकिस्तान से भारत में शरण लेेने आए लोगों की दुश्वारियां जानने को मिलीं। मेरी जिज्ञासा एक युवा को निजी कम्पनी से निकाले जाने को लेकर शुरू हुई। इस कम्पनी ने एक प्रतिभाशाली फोटोग्राफर को बेहद कम वेतन पर काम पर रखा था। एक दिन बिना वजह बताए उसे उस वक्त बिना मोहलत दिए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया जब उसने कागजात मांगने पर पाकिस्तान से आए विस्थापित परिवार से होने की सचाई बताई। झूठ नहीं बोलने का खामियाज़ा भुगतने वाला यह मायूस युवा अपने पिता के साथ अपने वीज़ा और परिवार का लेेखा-जोखा लेकर यह साबित करने आया कि वेे गैर-कानूनी लोग नहीं हैं। तब उनसे हुई बातचीत के दौरान मुझे उनकी तकलीफ और उनके साथ हो रही नाइन्साफी का अन्दाज भर लगा। फिर तो इसकी तह में जाते-जाते महसूस हुआ कि ये लोग यातनाओं के कैसे जाल में फंसे हुए हैं। ये मेहनत-मजदूरी कर खामोशी से अपना जीवन जीने के साथ ही इस उम्मीद में हैं कि एक दिन ये कानूनी कागज उनकी दमदार पैरवी करेंगे और यह देश पनाह दे देगा। बहुतों को कई साल की मशक्कत के बाद नागरिकता मिली भी है। मगर पढ़े-लिखे हों या अनपढ़, भारत में न इनके लिए कोई काम है, न ठौर। बच्चांे को बिना नागरिकता और आधार कार्ड के न पढ़ाई नसीब है, ना कॉलेजों में दाखिला, नौकरी का तो सवाल ही नहीं। तिस पर दोराहा भी कि पाकिस्तान छोड़ता नहीं और भारत आसानी से अपनाता नहीं। हालांकि पिछले कुछ साल में बहुत कुछ बदला है और कुछ बेहतर होने की उम्मीद जगी है।
शोषण और दोहन

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 पाकिस्तान में दुर्व्यवहार झेलने के बाद भारत आकर बसे गोवर्धन अपने परिवार के साथ। इन्हें भी नहीं मिली है नागरिकता 
गोवर्धन, नज़ीर, मूमल, केवली, चिदम, दिव्या, सुबिया जैसे कई लोगों से मिलकर यही लगा कि आज भी मीडिया के सामने अपना दर्द खुलकर कहने से डरते हैं ये लोग, क्योंकि उस पार इनके परिवार अब भी रह रहे हैं और ज्यादतियों की कहानियां ज़ाहिर होने पर वहां उनके लिए खतरा बढ़ जाता है। 32 साल के जयरामजी 5 साल पहले ही रहमियार खान इलाके से पत्नी और बच्चों सहित भारत आए। वहां दुकान से सब्जी लेते वक्त छांटने तक के लिए भी सब्जी को हाथ नहीं लगाने देता कोई, जरा सी गहमागहमी हो जाने पर मारपीट की नौबत और अछूत जैसा बर्ताव जि़न्दगी का हिस्सा है। धार्मिक वीज़ा के बहाने यहां आ तो गए, लेकिन न आधार बना, न पहचान मिली। जब पत्नी गर्भवती हुई तो किसी अस्पताल ने भर्ती तक नहीं किया। आखिरकार कई गुना पैसे देकर निजी अस्पताल में प्रसव करवाया। किराए का मकान, सिलाई का छोटा-मोटा काम, साल में पासपोर्ट नवीनीकरण करवाने के लिए दिल्ली जाने सहित 5-6 हजार का प्रति व्यक्ति खर्च और आधार कार्ड के लिए चक्कर पर चक्कर। बावजूद इसके भारत आकर उन्हें मरना भी मंजूर है, लेकिन वहां तो हरगिज गुजारा नहीं। किसी के बेटे का धर्म बदलवा दिया गया तो किसी का फला-फूला व्यापार बर्बाद कर दिया। न बच्चों को पढ़ा सकते हैं, न बहू-बेटियों को घर से बाहर जाने दे सकते हैं। कुछ वहां से निकल कर आ गए तो अब पीछे छूटे परिवार भी जिल्लत की जिन्दगी से बाहर निकलने की फिराक में हैं। यहां रह रहे विस्थापित मजदूरी, सिलाई, कढ़ाई के छोटे-मोटे काम करके गुज़ारा कर रहे हैं। एमबीए और एमबीबीएस की डिग्री वाले भी बेगार कर रहे हैं। अपनी सरज़मीं का न होना, किसी की सरपरस्ती न होना, एक भरापूरा घर-अपनी मिट्टी यूं ही छोड़ आना और जिसे अपना मुल्क मानकर आए, वहां भी खुली बाहें न होना यानी अपना अस्तित्व ही न होना क्या होता है, इस बेबसी को बयां करती हज़ारों कहानियां हैं बिखरी हुई, हज़ारों जिन्दगियां हैं टूटी हुई।
कैसे मिला हक
भारतीय नागरिकता कानून, 1955 में अमल में आया। दुनिया के बाकी देशों में अपनाई जाने वाली सामान्य प्रक्रिया के अलावा बंटवारे के बाद की परिस्थितियों के सन्दर्भ में भारत ने अनुच्छेद 5-1-ए के जरिए एक खास प्रक्रिया और जोड़ी। इस धारा में नेहरू-लियाकत अली करार के तहत अपने मुल्क में महफूज़ न होने और धर्म के आधार पर भेदभाव की वजह से मुख्यधारा में न आ पाने वाले अल्पसंख्यकों को प्राथमिकता पर एक दूसरे के मुल्क में पनाह देने पर सहमति बनी। यह समझौता दोेनों देशों यानी भारत और पाकिस्तान पर लागू है। बाद में हमारे नागरिकता कानून के नियम मौके और हालात के मुताबिक बदलते रहे। 1963 और 1992 के बाद 2004 मंे भी बदलाव हुए। चाहे कोई भी सरकार सत्ता में रही, लेकिन आधार यही था कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में फैले मजहबी उन्माद का शिकार वहां के अल्पसंख्यक हो रहे हैं और इस हक़ीक़त के बारे में सोशल मीडिया, सरकारी गुप्तचरी और मानवाधिकार संगठनों की रिपोटार्ें से साबित होता रहा है कि वहां के अल्पसंख्यक भारत में शरण लेने लगातार आ रहे हैं। इसलिए सत्ता में रही कोई भी राजनीतिक पार्टी इसे कभी नकार नहीं सकती थी। हां, नज़रअन्दाज़ सबने किया। यह भी सच है कि '90 के दशक में बाबरी ढांचा गिरने के बाद पड़ोसी देशों में हिन्दू-सिख समुदाय सहित सभी अल्पसंख्यकों पर अत्याचार बढ़े, पलायन भी उसी अनुपात में बढ़ गया। आज भी स्थितियां उतनी ही नाज़ुक हैं।
केन्द्र-राज्य की कड़ी
नागरिकता कानून केन्द्र का अधिकार क्षेत्र है। इसलिए हाल ही इस कानून में किए संशोधन को भले ही कुछ राज्य लागू करने में आनाकानी करें, रास्ता तो निकलेगा ही। भाजपा ने सत्ता में आने के बाद 15 दिसम्बर 2014 को यह सूचना जारी की थी जिसमें पाकिस्तान आदि देशों में शादी करके गईं और अब तलाकशुदा या विधवा हो चुकी बेटियों को और भारत के नागरिकों से शादी करने वाली बेटियों को रियायती समय में नागरिकता लेने का अधिकार दिया गया ताकि वे सब व्यवस्था के उत्पीड़न से बच जाएं। इससे जुड़े दिशानिर्देश जारी होने के बाद असल रियायत 2016 से मिलनी शुरू हुई। 16 अगस्त 2016 कोे 11 सूचनाएं जारी की गईं। आधार, पैन कार्ड, लाइसेन्स, बैंक खाता खोलने और अपने धनार्जन का स्रोत बताते हुए अपने रहने के लिए तय क्षेत्रफल की सम्पत्ति खरीदने का अधिकार देकर भारत में लम्बी अवधि के वीज़ा पर सालों से यहां रह रहे विस्थापितों के इज्जत से बसर करने की राह खुली। 2014 से 2016 के बीच इन नियमों की पालना में प्रशासकीय अड़चनें दूर करने के लिए कई स्पष्टीकरण भी जारी हुए। रेज़ीडेण्ट वीज़ा वालों को तो शासन की जानकारी में लाकर नौकरी पाने का हक भी दिया गया।
मगर असलियत यह है कि पाकिस्तान की नागरिकता छोड़कर भारत आने का रास्ता आसान नहीं है। पड़ोसी मुल्क इस पलायन को आधिकारिक तौर पर दर्ज नहीं करना चाहता। इसलिए धार्मिक वीज़ा लेकर ही सीमा लांघी जाती है और फिर इस पार आने के बाद कोई उस पार लौटना नहीं चाहता। लेकिन ये लोग वैध वीज़ा पर आते हैं इसलिए ये कानूनन विस्थापित ही हैं, घुसपैठिए नहीं। दिसम्बर 2016 में नौ राज्यों के 16 जिलाधीशों और राज्य के गृह विभाग को सीधा अधिकार दिया गया कि वे कागजों की जांच कर उन्हें नागरिकता सौंप सकते हैं। इसके साथ ही वीज़ा की अवधि बढ़ाने का अधिकार भी राज्य सरकार और सीआईडी के एफआरओ यानी फॉरेनर रजिस्ट्रेशन ऑफिस को दे दिया गया। राज्यों के स्तर पर नागरिकता देने की मियाद दिसम्बर 2018 तक ही थी, जिसे आखिरकार अनिश्चितकाल तक बढ़ाकर नागरिकता पाने की प्रक्रिया को गति देने का रास्ता खुला रहा। यह इसलिए अहम फैसला था क्योंकि हमारी जांच एजेन्सियां बहुत सुस्ती से काम करती हैंं। वेे कागज़ों की पड़ताल में ही सालों लगा देती हैं और खामियाज़ा एक व्यक्ति नहीं बल्कि पीढि़यां भुगतती हैं।
मौजूदा कानून

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 पाकिस्तान से 16 साल पहले आए नेवादू और उनकी पत्नी नीमा बाई-ये 16 साल से मजदूरी करके भारत में बसर कर रहे हैं पर उनके 3 बच्चों को भारत की नागरिकता नहीं मिली है। 
भारत में नागरिकता के लिए जन्म, वंश, विवाह, स्वाभाविक हक और भारत में इलाकों का अधिग्रहण आधार बनता है। इन प्रावधानों के तहत बाहर पैदा हुए लोग भी भारतीय नागरिक से विवाह के आधार पर या वैध तरीके से 11 साल यहां रहने के बाद नागरिकता की दावेदारी कर सकते हैं चाहे वे किसी भी मज़हब और देश के हांे। हाल में कानून में हुए संशोधन पहले से मौजूद इस सामान्य प्रक्रिया के आड़े नहीं आते।
अब मसला है उस कौम का जिनके पुरखे अविभाजित भारत में रहे या जिनके धर्म की जड़ेें यहां हैं, उसे उस वक्त इस देश की ही याद आती है जब उन्हें अपना धर्म और आस्था छोड़ने को कहा जाता है, उनकी सम्पत्तियां जब्त कर ली जाती हैं, बेटी-बहुओं को अगवा कर लिया जाता है। यह हमारी ही कमी कहिए कि पूरी वसुधा को अपना कुटुम्ब कहने वाला देश हिन्दू धर्म और उसकी अन्य धाराओं और पंथों से जुड़े लोगों के साथ सदियों से हो रहे इस अन्याय के लिए कभी दुनिया की संवेदनाएं नहीं बटोर पाया। इस कमी ने समझ के सिरे और उलझा दिए। इसलिए भारत के पास आज भी इन विस्थापितों का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है कि वे किस-किस इलाके में कहां-कहां बसे हैं। हाल ही पारित संशोधन में तीन देशों के परिप्रेक्ष्य में विशिष्ट व्यवस्था की गई है। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से अपना घर, परिवार और कारोबार छोड़कर आए हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियांे, पारसियों और ईसाइयों को अब नए संशोधन केे तहत 11 की बजाय 6 साल में नागरिकता देने के प्रावधान से ये सब जीवन की धारा में लौट आएंगे। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि पहले ही 10-15 साल से वैध तरीके से रह रहे लोग राजनीतिक मंशा न होने और कानून को जमीन पर न उतार पाने की कमजोरी के कारण इस अधिकार से वंचित रहे हैं। संशोधन में यह भी राहत है कि पहले परिवार के हर एक सदस्य को एक-एक करके नागरिकता मिलती थी, लेकिन अब पूरा परिवार एक साथ आवेदन कर सकेगा और सबको एक साथ नागरिकता मिल सकेगी।
एक पक्ष और जानने का है कि धार्मिक आधार पर सताए जा रहे भारत लौटकर आने वाले इन लोगों में से हजारों लोग ऐसे हैं जो अपने मूल देश के पासपोर्ट का नवीनीकरण करवाने से चूक जाते हैं या उसकी फीस देने की क्षमता नहीं होने के कारण अपने मूल दस्तावेज़ों से वंचित हो जाते हैं। इन्हें नए संशोधन के तहत बिना दस्तावेजों के भी नागरिकता की दावेदारी का हक दिया गया है। मगर वैध दस्तावेज़ों के बिना दावा वही पेश कर सकते हैं जो 31 दिसम्बर 2014 से पहलेे भारत आए हैं। आगे भी इनमें से कोई आता है या आया हुआ है और उसके पास पाकिस्तान का जायज पासपोर्ट और भारत का दीर्घावधि वीजा है तो वह पांच साल भारत में रहने के बाद नागरिकता की दावेदारी कर सकेगा, जो पहले सात साल में मिला करती थी। जांच एजेन्सियों की वजह से सारे दस्तावेज और पात्रता होने के बावजूद हजारों आवेदन अटके रहते थे। अब नए संशोधन में इसका भी तोड़ निकाला गया है। अब गृह मंत्रालय को आवेदन के बाद एक साल की तय समय सीमा में ही नागरिकता देने या न देने का निर्णय करना होगा।
अटके हैं आधार
2014 में नई व्यवस्था के तहत आधार कार्ड बनावाने का हक तो इन्हें मिल गया, लेकिन केन्द्र ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि ज़मीनी हकीकत क्या है। राजस्थान जैसे राज्य में, जहां इन विस्थापितों की सबसे ज्यादा तादाद है, वहां 2015 से 2018 तक आधार कार्ड बने सो बने लेकिन पिछले साल से आधार बनाने पर पाबन्दी सी लगी है। दूसरी तरफ सारे कागज और पात्रता पूरी करने वाले नागरिकता के आवेदन भी कलेक्टर दबा कर बैठे हैं। वीजा की अवधि बढ़ाने वाले फॉर्म भी अटके हुए हैं।
आधार कार्ड नहीं होने, वीज़ा की अवधि समय रहते नहीं बढ़ने और पात्र होने के बावजूद नागरिकता में देरी का जिन्दगी से ताल्लुक समझ सकते हैं क्या हम? वैध लोगोें को अपनी ही सौंपी व्यवस्थाओं से वंचित रखने का दोष किस पर मढ़ा जाए? अब इस सारी कानूनी कवायद का मकसद एक ही होना चाहिए कि जुल्म से बचकर आए लोगों का वजूद कायम हो जाए। देश भर में इनकी स्वीकार्यता हो और फिर इसके बाद इनके पुनर्वास, शिक्षा और रोजगार के पुख्ता इन्तजाम करने, सीमा पार रह रहे इनके परिवारों और सम्पत्तियों की सुरक्षा के मसलों को सलझाने का दारोमदार भी गृह मंत्रालय पर होगा।
हमने दुनिया भर के हर मजहब, हर तबके के प्रताडि़त लोगों के लिए दिल-दरवाज़े खुले रखे हैं। लेकिन हम अपने संसाधनों की सीमाओं को भी नजरअन्दाज नहीं कर सकते और जिनका दुनिया में कहीं ठिकाना नहीं और जिनकी पहचान की जड़ें भारत में ही हैं, उन्हें तो भारत को अपनाना ही होगा। बाकी खास मामलों में मजहब से परे देखने पर तो कोई पाबन्दी है भी नहीं।
इस मसले पर फैला भ्रम भी स्वस्थ संवाद से ही दूर होगा। यह भी हमारी संस्कृति की झलक होगी कि जब किसी को अपनाएं तो फिर किसी भी दूरी की गुुंजाइश न रहे और सदियों के जख्म भी भर जाएं। तभी मौजूदा दौर हमारे संस्कारों का आईना बनेगा। (लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं )