खिलाफत के 100 साल-9: खिलाफत समिति ने खेला हिजरत का खेल

    दिनांक 01-अक्तूबर-2020
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डॉ. श्रीरंग गोडबोले

1920 में खिलाफत के उफान को कुछ ठंडा पड़ने पर मजहबियों को अफगानिस्तान तक हिजरत के लिए उकसाया गया। अली बंधुओं के अलावा मौलाना आजाद ने भी मुस्लिमों के भारत से पलायन की पैरवी की   
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कविता को भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति माना जाता है। लेकिन लोगों की सामूहिक चेतना को भेदने वाली कविता उनके मानस को भी दर्शाती है।  जैसा कि श्री अरबिंदो ने कहा था, ‘‘तब तक कोई विश्राम, नींद और शांति नहीं हो सकती, जब तक कि उनका मंदिर तैयार नहीं हो जाता, प्रतिमा स्थापित कर उनको हविष्य अर्पित नहीं कर दिया जाता।’’ (ऋषि बंकिम चंद्र्र, कलेक्टेड वर्क्स आॅव श्री अरबिंदो, 16 अप्रैल, 1907) अपने निवास के देश के बारे में समुदाय विशेष का  भिन्न दृष्टिकोण होना संभव है। ऐसों के लिए ‘भूमि के एक टुकड़े को अपनी मां’ के रूप में बताना ‘पवित्रता को दूषित करने के समान है’, और वास्तव में इसे ईश्वरीय मानना और इसके प्रति श्रद्धा रखना तो जैसे कुफ्र है। अपनी नज्म तराना-ए-हिंद (जो ‘सारे जहां से अच्छा’ के रूप में विख्यात है) में इकबाल अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, ‘हम बुलबुलें हैं इसकी, ये गुलिस्तां हमारा’। पक्षी पेड़ों पर लगने वाले फलों का आनंद लेने के लिए बगीचे में जाते हैं। परन्तु यदि बगीचा उजड़ जाता है तो वे  वहां से चले जाते हैं!

1920 की गर्मियों में, खिलाफत आंदोलन आगे की कार्रवाई के संबंध में अनिश्चय की स्थिति में था। मई से नवंबर 1920 तक लगभग 60,000 ‘बुलबुलों’ ने हिजरत की, क्योंकि उनका मानना था कि विधर्मी शक्तियों के कारण उनका ‘निवास अपवित्र हो गया था’। यह समझ से बाहर है कि बिना मजहबी आधार के इतने बड़े पैमाने पर देशांतार कैसे हो सकता है?

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शरीयत के सभी प्रावधानों, समसामयिक घटनाओं, मुसलमानों के हितों, फायदे और नुकसान को ध्यान में रखने के बाद, मैं संतुष्ट महसूस करता हूं। भारत के मुसलमानों के पास भारत से पलायन करने के अलावा कोई मार्ग नहीं है...जो लोग तुरंत नहीं जा सकते, उन्हें मुहाजिरीन की मदद करनी चाहिए।
—अबुल कलाम आजाद (‘हिजरत का फतवा’, 30 जुलाई 1920 से)

हिजरत पर ‘इस्लामी आदेश’
कुरान स्पष्ट रूप से इस्लाम के अनुयायियों को एक ऐसी भूमि की ओर जाने की आज्ञा देती है जहां वे विधर्मियों के बीच रहने की बजाए अपनी मजहबी रीत के हिसाब से जी सकते हैं। उन लोगों के लिए कहा गया है-‘जो यह मानते हैं कि उस जगह उन पर जुल्म किया गया था, फिर भी वे वहां से नहीं जाते, वे (फरिश्ते) कहेंगे, ‘क्या अल्लाह की धरती इतनी विस्तृत नहीं थी कि तुम वहां से पलायन नहीं कर सकते थे? उनका निवास नरक होगा, एक बुरी यात्रा का अंत।’’(कुरान 4.97) इससे केवल वही बच पाएंगे जो कमजोर हैं और किसी योजना को तैयार करने में असमर्थ हैं और जिन्हें कोई रास्ता नहीं दिखाया गया है। कुरान उन लोगों को, जो यह देशांतर करेंगे, आश्वासन देती है, ‘‘जो कोई भी अल्लाह के लिए पलायन करता है, उसे बहुत से घर और बहुतायत में भूमि मिलेगी, जो अल्लाह के लिए घर को छोड़ देता है, और इसमें उसे मृत्यु प्राप्त होती है, तो इसका भी प्रतिफल अल्लाह के पास निश्चित हो गया है।’’(कुरान 4.100)

 पैगंबर ने हिजरत को प्रोत्साहित किया, वास्तव में उन्होंने इसे स्वयं किया। अपने मिशन के पांचवें वर्ष में, जब पैगंबर ने अपने साथियों के दुख को देखा तो उनसे कहा-‘‘यदि आप अबीसीनिया जाना चाहते हैं (तो यह आपके लिए बेहतर होगा), क्योंकि यह एक मित्र देश है, वहां तब तक रहिये जब तक कि अल्लाह आपको संकट से छुटकारा नहीं दिला देता।’’(द लाइफ आॅव मुहम्मद, ए ट्रांस्लेशन आॅव इशाक्स सीरत रसूल अल्लाह विद इंट्रोडक्शन एंड नोट्स, ए. गिलिय्यूम, आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1965, पृष्ठ 146) यहां विपत्ति और क्लेश से तात्पर्य अभी तक गैर-मुस्लिम कुरैश लोगों द्वारा ‘उत्पीड़न’ से है। सन् 622 में, अपने चाचा अबू तालिब की मृत्यु के बाद अपने कबीले के समर्थन अभाव के कारण, पैगंबर ने खुद मक्का से मदीना की ओर हिजरत किया। यहां ध्यान दें कि हिजरत कायरों का पलायन नहीं है। यह इस्लामी भूमि में इकट्ठा होने और फिर इस्लाम के लिए काफिर हो गई भूमि को पुन: प्राप्त करने के लिए युद्ध छेड़ने की रणनीति है। हिजरत और जिहाद अलग नहीं हैं। हिजरत प्रतिशोध के साथ जिहाद छेड़ने की तैयारी रहा है! स्पष्ट रूप से, जो लोग अपने जन्म के देश को दिव्य मातृभूमि के रूप में देखते हैं और ऐसे लोग जिनका देश के प्रति लगाव उनके विश्वास पर निर्भर करता है, दोनों सर्वथा भिन्न हैं। जो लोग इस सरल सत्य को नहीं समझ सकते, वे 1920 के हिजरत की वास्तविकता को नहीं समझ पाएंगे।
मुहाजिरीन को अमीर के अधिकारियों  ने  प्रताड़ित किया, उन्हें पीटा और पैरों तले रौंदा। उनकी महिलाओं को बेइज्जत किया गया। इससे  मुहाजिरीन उन लोगों के प्रति इतनी नफरत  से भर गये कि उन्होंने कसमें खाईं कि अपने घरों को वापस लौटने पर उन मुल्लाओं को गोली मार देंगे
दार-उल-हर्ब के रूप में भारत
1803 के कुछ समय बाद शाह वलीउल्लाह के पुत्र शाह अब्दुल अजीज (1746-1824) ने एक फतवा (फतवा-ए-अजीजी) जारी किया कि देश पर ‘इमाम-उल-मुस्लिमीन’ के आदेश के बिना ईसाई शासकों द्वारा शासन किया जा रहा है। अंग्रेजों के अधीन भारत के संबंध में, उनके शिष्य और दामाद अब्दुल हई (1828) द्वारा जारी मजहबी आदेश और भी अधिक विशिष्ट था। उनके अनुसार यह ‘शत्रु देश’ था, और उनके अनुसार, यहां ‘हमारे पवित्र कानूनों के लिए कोई स्थान नहीं’। परन्तु दिलचस्प बात यह है कि इन्हीं अब्दुल हई ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी स्वीकार कर ली। (खिलाफत मूवमेंट इन इंडिया, 1919-1924, मुहम्मद नईम कुरैशी, लंदन विश्वविद्यालय में प्रस्तुत शोध प्रबंध, 1973, पृ.18; शाह अब्दुल अजीज: हिज लाइफ एंड टाइम; मुशीरुल हक, इंस्टीट्यूट आॅव इस्लामिक कल्चर, 1995, पृ. 24-26) इस्लाम की मजहबी सीख के अनुसार, दार-उल-हर्ब में उन देशों को शामिल किया जाता है जहां मजहबी मामलों, इस्लाम के अनुयायियों और धिम्मियों (वे गैर-मुस्लिम जो सुरक्षा प्राप्त करने के लिए कर का भुगतान करते हैं) की सुरक्षा हेतु मुस्लिम कानून लागू नहीं होते। जब कोई मुस्लिम देश दार-उल-हर्ब बन जाता है, तो सभी मुस्लिमों के लिए यह कर्तव्य हो जाता है कि इस दार-उल-हर्ब पर विजय प्राप्त कर उसे पुन: दार-उल-इस्लाम में वापस लाया जाए। जब सन् 622 में पैगंबर ने मदीना की ओर हिजरत किया, तो वे आठ साल बाद एक विजेता के रूप में मक्का लौटे। 1920 के हिजरत के समर्थकों ने अफगानिस्तान की ओर हिजरत की पैरवी की। पैगम्बर का उदाहरण सदैव उनके सामने था कि कैसे उन्होंने बल एकत्र कर मक्का को पुन: जीत लिया था। (कुरैशी, उक्त, पृ.119) चूंकि ब्रिटिश शासक खिलाफत को खतरे में डाल रहे थे, इसलिए खिलाफतवादियों के दृष्टिकोण से भारत ‘अपवित्र’ हो गया था। इस मत के मुख्य प्रवर्तक अली बंधु थे। 24 अप्रैल, 1919 को वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड को लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा, ‘‘उन्हें (एक मुस्लिम) किसी अन्य अधिक स्वतंत्र स्थान के लिए पलायन करना चाहिए, इस निश्चय के साथ कि जब वह इस्लाम के लिए अधिक सुरक्षित हो जाएगी तो फिर वहां वापस लौटेंगे।... हमारी कमजोर स्थिति को देखते हुए प्रवास हमारे लिए एकमात्र विकल्प है।’’(कुरैशी, उक्त, पृ.119-120)
अफगान प्रस्ताव
चूंकि तुर्की, अरब और फारस यूरोपीय ईसाई शासन के अधीन थे, इसलिए अफगानिस्तान एकमात्र दार-उल-इस्लाम था। अन्य क्षेत्रीय दावेदारों की तरह, अफगानिस्तान भी ओटोमन साम्राज्य के विघटन के कारण पैदा हुए खाली स्थान को भरने का सपना देखता था। 9 फरवरी,1920 को अफगानिस्तान के अमीर अमानुल्लाह (1892-1960) ने एक भाषण दिया, जिसमें कहा गया था कि वे खिलाफत के लिए अपनी जान भी देने को तैयार हैं और भारत से अफगानिस्तान में आने वाले मुहाजिरीन (हिजरत करने वालों) का स्वागत करेंगे। इस भाषण को भारत में व्यापक रूप से प्रचारित किया गया और इसने बड़े पैमाने पर उत्साहवर्धन किया। (द हिजरत आॅव 1920 एंड अफगानिस्तान, अब्दुल अली, प्रोसिडिंग्स आॅव इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, खंड 43, 1982, पृ.726, 727) अमीर अमानुल्लाह ने मुहाजिरीन की सुविधा के लिए निम्नलिखित निजामनामा या अध्यादेश (सोर्स मेटेरियल फॉर हिस्ट्री आॅव फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया: खिलाफत मूवमेंट वॉल्यूम, महाराष्ट्र सरकार, 1982, पृ. 398-399) जारी किया-
(1) कोई भी व्यक्ति, जो अफगानिस्तान में प्रवास करने के बारे में सोचता है, उसे पेशावर या ढाका में पासपोर्ट प्राप्त करना होगा। वह जो अफगानिस्तान की धरती पर पैर रखता है, उसे ऐसी अफगान प्रजा के रूप में माना जाएगा जिसे पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगे। इसके फलस्वरूप वह मोहम्मडन कानून और राज्य के आंतरिक कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य होगा। (2) अफगानिस्तान की धरती पर प्रवेश करने वाले और अफगानिस्तान सरकार के प्रति निष्ठा की कसम खाने वाले किसी भी व्यक्ति को नीचे दिए विवरण के अनुसार खेती योग्य भूखंड दिए जाएंगे-एक अविवाहित आदमी को 6 जरीब (1जरीब=0.49 एकड़ या 2000 वर्गमीटर) भूमि, एक विवाहित व्यक्ति को 8 जरीब जमीन प्राप्त होगी। अविवाहित लड़की या किसी भी नाबालिग को जमीन का कोई भूखंड नहीं मिलेगा। (3) इससे पहले कि उन्हें (मुहाजिरीन) आवंटित भूमि से फसलें तैयार हो जाएं, इन व्यक्तियों को निम्नलिखित राशन मिलेगा-एक वयस्क-5 सीर (काबुल का वजन मात्रक; 1 सीर=7.066 किलोग्राम); प्रतिमाह गेहूं का आटा; एक नाबालिग (6 वर्ष की आयु से लेकर यौवन प्राप्ति तक की अवधि) को 3 सीर गेहूं प्रति माह दिया जाएगा। (4) जिन व्यक्तियों को भूखंड आवंटित किए गए हैं, उन्हें पहले वर्ष में, तकावी के रूप में 6 सीर  गेहूं और 5 रुपए प्रति जरीब दिए जायेंगे ताकि वे इसकी जुताई भली-भांति कर सकें। नकद तकावी तीन साल के बाद, तीन साल की तीन किस्तों में वापस ली जाएगी। (5) भारतीय मुहाजिर को तीन साल की अवधि के लिए भू राजस्व के भुगतान से छूट दी जाएगी। हालांकि, यह चौथे वर्ष में राज्य के नियमों के अनुसार वसूल किया जाएगा। (6) अफगान सरकार से परामर्श के बिना कोई भी राजनीतिक कार्य नहीं किया जाएगा। (7) जो लोग शिक्षित हैं या जो लोग कला और विज्ञान जानते हैं, और सरकार उनकी सेवाओं को राज्य के लिए आवश्यक समझती है, और यदि इसके प्रति मुहाजिर सहमति व्यक्त करते हैं, तो उन्हें सेवा में लिया जाएगा और उनकी योग्यता के अनुसार भुगतान किया जाएगा। बाकी पुरुषों को अन्य किसी भी सेवा में जाने या किसी भी व्यापार या पेशे को अपनाने के लिए स्वतंत्रता होगी। और, (8) भारतीय मुहाजिरीन जब पहली बार अफगानिस्तान की धरती में प्रवेश करेंगे तो एक-दो महीने की अवधि के लिए जबल-उन-सिराज में रुकेंगे, जब तक सरकार द्वारा उन स्थानों का चयन किया जाएगा, जहां उन्हें भूखंड आवंटित किए जाने हैं और आवास उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में उनके लिए ऐसे आवास बनाये जा सकें। 25 अप्रैल, 1920 को दिल्ली में आयोजित खिलाफत कार्यकर्ता सम्मेलन में उक्त अफगान प्रस्ताव का स्वागत किया गया। हिजरत की वकालत करने वाले एक प्रमुख खिलाफतवादी, कांग्रेस के ‘परमप्रिय राष्ट्रवादी’ मौलाना आजाद थे।
आजाद ने की पैरवी
खिलाफत आंदोलन में मौलाना आजाद का योगदान मुख्य रूप से वैचारिक था। 28-29 फरवरी, 1920 को कलकत्ता के खिलाफत सम्मेलन में उनके भाषण ने खिलाफत आंदोलन की मजहबी व्याख्या इस्लामी मजहबी सिद्धांतों के आधार पर की। उनका ग्रंथ मसाला-ए-खिलाफत-वा-जजीरत-अल-अरब (खिलाफत और इस्लाम के पवित्र स्थान) खिलाफत पर भारतीय मुसलमानों के विचारों को रखने वाला प्रमुख इस्लामी दस्तावेज था। 25 मार्च, 1920 को मौलाना आजाद ने तर्क दिया था कि हिजरत संभव नहीं है, क्योंकि मुसलमानों के पास जाने के लिए कोई जगह नहीं थी। परन्तु फिर उन्होंने एक गंभीर मोड़ लिया और तथाकथित ‘हिजरत का फतवा’ लिखा, जो 30 जुलाई, 1920 को अमृतसर के उर्दू दैनिक अहल-ए-हदीस में प्रकाशित हुआ था। यह सलाह उन लोगों के लिए थी जो ‘सही राह’ पर चलना चाहते थे या उनके संपर्क में थे अथवा हिजरत के समर्थक उलेमा से मार्गदर्शन चाहते थे।

अपने फतवे में आजाद ने कहा, ‘‘शरीयत के सभी प्रावधानों, समसामयिक घटनाओं, मुसलमानों के हितों, फायदे और नुकसान (राजनीतिक मुद्दों के) को ध्यान में रखने के बाद, मैं संतष्ट महसूस करता हूं। भारत के मुसलमानों के पास भारत से पलायन करने के अलावा कोई मार्ग नहीं है...जो लोग तुरंत नहीं जा सकते हैं उन्हें प्रवासियों (मुहाजिरीन) की मदद करनी चाहिए।’’ जो लोग भारत में बने रहे, उन्हें ‘इस्लाम के दुश्मन’ के रूप में जाने जाने वाले निकायों के साथ कोई सहयोग या संबंध रखने की अनुमति नहीं थी, और जो ऐसा करने में विफल रहता, पवित्र कुरान के अनुसार वह भी ‘इस्लाम के दुश्मन’ के रूप में गिना जाता।

आजाद का सांसारिक उद्देश्य कॉन्स्टेंटिनोपल को बचाने का नहीं था बल्कि मुस्लिम विश्वास को बचाना था। हिजरत के बारे में उनका एकमात्र संदेह उनके कार्यकरण और आचरण के बारे में था। उनके अनुसार इसे ‘संगठित रूप में किया जाना चाहिए, न कि बेतरतीब ढंग से’। उनकी अन्य विशिष्टता यह थी कि वे वास्तव में पलायन करने से पहले प्रवास की शपथ लेना आवश्यक समझते थे। फिर भी, इस अभियान के उत्तरार्ध में, जब वह अपनी सीमाओं और खतरों को देख पा रहे थे, तब भी अपने सिद्धांतों के प्रति अडिग और सच्चे बने रहे, और केवल व्यावहारिक आधारों पर कुछ मामूली छूटें ही प्रदान कीं। (हिजरत: द फ्लाइट आॅव द फेथफुल-ए ब्रिटिश फाइल आॅन द एज आॅव मुस्लिम पीजेंट्स फ्रॉम नॉर्थ इंडिया टू अफगानिस्तान इन 1920, डिट्रीच रीट्ज, वर्ल. डास अरबिस्क बुच, बर्लिन, 1995, पृ. 35-36)

देश भर में हुआ प्रचार
लगता है, खिलाफत समिति हिजरत अभियान का मुख्य संगठनात्मक आधार रही थी। एक केंद्रीय हिजरत कार्यालय खोला गया जिसकी शाखाएं पूरे भारत में खोली गई थीं। इनसे एक व्यापक-आधार वाला प्रचार अभियान शुरू किया गया। स्थानीय हिजरत समितियां पूरे भारत में, विशेष रूप से सीमांत प्रांतों में फैली हुई थीं।  हिजरत को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य के लिए मस्जिदों का अक्सर उपयोग किया जाता था। मौलवी मस्जिद के मिम्बर से उपदेश देते कि जो मुस्लिम पलायन नहीं करेंगे, वे काफिर बन जाएंगे। अफगानिस्तान में लुभावने जीवन की संभावनाओं को प्रकाशित किया। लोगों को उस गर्मजोशी से भरे स्वागत की कहानियां सुनाई गर्इं, जो मुहाजिरिन का इंतजार कर रहा था। (कुरैशी, उक्त, पृ.125-126)

मजहबियों की भेड़चाल
अभियान की शुरुआत के लिए एक इशारा किया गया था। उर्दू पत्र जमींदार ने 7 मई, 1920 को घोषणा की कि 1338 लोग अफगानिस्तान में आगे बढ़ने के लिए तैयार थे। यह संख्या उस वर्ष चलने वाला मुस्लिम हिजरी वर्ष भी थी। हालांकि कुछ उत्साही लोगों ने गुप्त रूप से सीमा पार करनी शुरू कर दी थी, पर एक संगठित पलायन के रूप में हिजरत 15 मई, 1920 को शुरू हुआ- जिस दिन भारत में तुर्की के साथ शांति की शर्तें प्रकाशित हुई थीं, जब कुछ अति उत्साहित मुहाजिरों का पहला काफिला बहुत खुशी और सफलता के साथ काबुल की सीमा को पार कर गया। शुरुआत में हिजरत ने धीरे-धीरे उड़ान भरी। हिजरत को हकीम अजमल खान, सैफुद्दीन किचलू, जिन्ना, इकबाल जैसे प्रमुख खिलाफतवादियों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा था, जो ईमानदारी से मानते थे कि यह कदम समुदाय के सर्वोत्तम हित में नहीं था। (कुरैशी, उक्त, पृ.126)

हिजरत आंदोलन अखिल-इस्लामवाद की अवधारणा पर विश्वास करवा पाने में विफल रहा। अफगानों ने हिजरत के दुष्प्रभावों को महसूस करना शुरू करते ही इसे निलंबित कर दिया और अपने मुस्लिम भाइयों को और उनकी महिलाओं को बेइज्जत करने के बाद वापस कर दिया

उत्तर-पश्चिम सीमान्त में आने वाले प्रवासियों के पहले जत्थे में 53 लोग शामिल थे, जिन्होंने 15 मई, 1920 को सप्ताहांत के दौरान प्रसिद्ध खैबर दर्रे को पार किया था। अपने चरम के दौरान (जुलाई 1920) यह अभियान उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत तक सीमित रहा था, जहां से कुल प्रवासियों की संख्या के लगभग 85 फीसदी प्रवासियों ने अफगानिस्तान में प्रवेश किया, जबकि लगभग 10 प्रतिशत पंजाब से और दूसरा 5 प्रतिशत हिस्सा सिंध से आया। मुहाजिरीन की संख्या के उच्चतम आकलन के अनुसार 50,000 से अधिक लोग अफगानिस्तान में प्रवेश कर गए थे। (डीट्रिच रीट्ज, उक्त, पृ.52)
अफगानों द्वारा अनुमानित 40,000 मुहाजिरीन के प्रवेश के बाद जब अमीर ने हिजरत को निलंबित करने की घोषणा की, उसके बाद भी 7,000 से अधिक लोग अफगानिस्तान में प्रवेश कर गए। इसके अलावा, कुछ छोटे दल सितंबर 1920 के अंत तक खोस्त के रास्ते अफगानिस्तान चले गए थे। बड़ी संख्या में मुहाजिरीन खैबर दर्रे के अलावा अन्य मार्गों से भी अफगानिस्तान गए थे। इस प्रकार इस हिजरत में शामिल लोगों की कुल संख्या पचास और साठ हजार के बीच मानी जा सकती है। (कुरैशी, उक्त, पृ.148)
दो कारक अंग्रेजों के लिए चिंताजनक थे। जब पूरे गांव खाली कर दिए गए थे और इनके निवासियों की जमीन और संपत्ति को बड़े पैमाने पर जल्दबाजी में बेचा गया था। इसके कारण कीमतें गिर गर्इं। दूसरा पहलू जिसने ब्रिटिश अधिकारियों को चिंतित किया, वह था पुलिस अधिकारियों और सेना पर हिजरत का बढ़ता प्रभाव। अगस्त की शुरुआत में, हिजरत के लिए जाने वाले मुस्लिम सैनिकों की संख्या अधिकारियों से युक्त एक पूरी कंपनी के बराबर थी। (डीट्रिच रीत्ज, उक्त, पृ. 53, 54, कुरैशी, उक्त, पृ. 132)

अखिल-इस्लामवाद का बुलबुला
मुहाजिरीन को भारत की कड़ी गर्मी में बंजर पहाड़ी इलाकों से गुजरना पड़ा जहां भोजन और पानी दुर्लभ थे। भारतीय क्षेत्र से  निकलने के बाद तो उनकी यात्रा एक दु:स्वप्न में बदल गई। अमीर के वादों के बावजूद, वास्तविकता में बहुत कम कार्य किया गया था। मुहाजिरीन को अमीर के अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित किया गया था, जिन्होंने उन्हें पीटा और पैरों तले रौंदा। उनके अपनाए गए देश के लोगों के हाथों भी कठोर और निर्दयतापूर्ण व्यवहार किया गया। उनकी महिलाओं को बेइज्जत किया गया। बताया जाता है, इस सबके कारण मुहाजिरीन उन लोगों के प्रति, जिन्होंने उन्हें हिजरत के लिए प्रेरित किया था, इतनी नफरत  से भर गये कि उन्होंने कसमें खार्इं कि अपने घरों को वापस लौटने पर उन मुल्लाओं को गोली मार देंगे। सीमान्त से काबुल तक की सड़क मुहाजिरीन की कब्रों से पट गई थी। चश्मदीदों के मुताबिक, खैबर दर्रे में लाशों के ढेर लगे हुए थे। (डीट्रिच रीट्ज, उक्त, पृ.69) अगस्त, 1920 के दौरान काबुल की सड़कों पर भीड़भाड़ थी। सर्दी आ रही थी। अफगानिस्तान सर्दियों में केवल 40,000 मुहाजिरिन को समायोजित कर सकता था। 12 अगस्त, 1920 को अमीर ने हिजरत को स्थगित कर दिया। ऐसी खबरें थीं कि अफगान बंदूक और संगीन के बल पर मुहाजिरीन को वापस लौटा रहे थे। (कुरैशी, उक्त, पृ.141)
निराश होकर मुहाजिरीन भारत में वापस आना चाहते थे। लेकिन इससे पहले, खोस्त क्षेत्र के अफगानों के एक समूह ने मुहाजिरीन की लगातार बढ़ती संख्या के दबाव के चलते अपनी ही भूमि से भागने का प्रयास किया और एक तरह से ‘उलटी हिजरत’ करते हुए भारतीय क्षेत्र में आ गए। वे मुहाजिरीनों के लिए अपनी ही भूमि से वंचित कर दिए गए थे। खोस्त क्षेत्र में परेशानी बढ़ रही थी जहां आने वाले प्रवासियों और स्थानीय आबादी, दोनों में गहरा असंतोष था। (डीट्रिच रीट्ज, उक्त, पृ.70) लगभग पचहत्तर प्रतिशत भारतीय मुहाजिरिन भारत लौट आए। (कुरैशी, उक्त, पृ.146)

हिजरत आंदोलन, जैसा कि अनुमान लगाया गया था, उसके विपरीत अखिल-इस्लामवाद की अवधारणा पर विश्वास करवा पाने में विफल रहा। जिन बुलबुलों ने अपने ही बगीचे को उजाड़ दिया था, उन्हें पता चल गया था कि दूसरी तरफ की घास निश्चित रूप से हरी नहीं थी! (क्रमश:...)
(लेखक ने इस्लाम, ईसाई मत, समकालीन बौद्ध-मुस्लिम संबंध, शुद्धि आंदोलन और पांथिक जनसांख्यिकी पर पुस्तकें लिखी हैं)