तुर्की-पाकिस्तान और अजरबैजान का नया त्रिकोण!

    दिनांक 01-अक्तूबर-2020   
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तुर्की के सहयोग से सीरिया में लड़ रहे पाकिस्तानी आतंकी आर्मीनिया के खिलाफ लड़ने के लिए पहुंच रहे हैं। टेलीफोन वार्तालापों के इंटरसेप्ट से पता लगा है कि पाकिस्तानी सेना भी इसमें सक्रिय है
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आर्मीनिया और अजरबैजान की लड़ाई के संदर्भ में भारत की दृष्टि से तीन बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं। पहली है कश्मीर के मसले पर अजरबैजान का भारत-विरोधी रवैया। बावजूद इसके भारत ने संतुलित नीति को अपनाया है। दूसरी है भारत की कश्मीर-नीति को आर्मीनिया का खुला समर्थन और तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात है पाकिस्तान-तुर्की और अजरबैजान का नया उभरता त्रिकोण, जिसके राजनयिक और सामरिक निहितार्थ हैं।
इस बीच खबरें हैं कि तुर्की के सहयोग से सीरिया में लड़ रहे पाकिस्तानी आतंकी आर्मीनिया के खिलाफ लड़ने के लिए पहुंच रहे हैं। टेलीफोन वार्तालापों के इंटरसेप्ट से पता लगा है कि पाकिस्तानी सेना भी इसमें सक्रिय है।
पाकिस्तान सरकार ने आधिकारिक रूप से अजरबैजान के प्रति अपने समर्थन की घोषणा की है। पाकिस्तानी विदेश विभाग के प्रवक्ता जाहिद हफीज़ चौधरी ने गत रविवार को कहा कि पाकिस्तान अपने बिरादर देश अजरबैजान का समर्थन करता है और उसके साथ खड़ा है। नागोर्नो-काराबाख के मामले में हम अजरबैजान का समर्थन करते हैं। सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी हैंडलों की बातों से लगता है कि जैसे यह पाकिस्तान की अपनी लड़ाई है। पाकिस्तान अकेला देश है, जिसने आर्मीनिया को मान्यता ही नहीं दी है, जबकि अजरबैजान तक उसे मान्यता देता है।
पाकिस्तानी जिहादी भी पहुंचे
ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर जाएं, तो पाकिस्तानी हैंडलों की प्रतिक्रियाओं से लगता है कि जैसे यह पाकिस्तान की लड़ाई है। इतना ही होता तब भी बात थी। अब खबरें हैं कि पाकिस्तानी जिहादी लड़ाके अजरबैजान की ओर से लड़ाई में शामिल होने के लिए मचल रहे हैं। कुछ सूत्रों ने खबरें दी हैं कि गत 22 सितंबर के बाद से पाकिस्तानी लड़ाकों के दस्तों ने अजरबैजान की राजधानी बाकू में पहुंचना शुरू कर दिया है। इन दस्तों का रुख सीरिया से अजरबैजान की तरफ मोड़ा गया है।
खबरें यह भी हैं कि तुर्की के समन्वय से सीरिया में पाकिस्तानी लड़ाकों की तैनाती की गई है। इनकी संख्या 1400 के आसपास है। हालांकि पाकिस्तान आधिकारिक रूप से अपने लड़ाकों को बाहर भेजने की बात स्वीकार नहीं की है, पर इस बात के अनेक उदाहरण हैं, जिनसे पता लगता है कि पाकिस्तानी जिहादियों को देश के बाहर की लड़ाइयों में भेजने वाली एक मशीनरी लगातार काम करती रहती है।
साठ के दशक से पाकिस्तानी लड़ाकों को जिहाद के नाम पर देश के बाहर भेजा जाता रहा है। सन 1967 में जब इसरायल के खिलाफ कई अरब देशों ने छह दिन का युद्ध छेड़ा था, तब उसमें पाकिस्तानी वायुसेना भी शामिल हुई थी। सन 1973 के इसरायल-विरोधी युद्ध में भी पाकिस्तानी लड़ाके शामिल हुए थे। पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष राहिल शरीफ इन दिनों सऊदी अरब सरकार से वेतन लेते हैं। इंटरनेट पर ऐसी खबरें भी हैं, जिनमें दावा किया गया है कि पाकिस्तानी जिहादियों को तुर्की की सरकार 1500 से 2000 डॉलर का भुगतान कर रही है।
युद्ध की पृष्ठभूमि
अजरबैजान को नागोर्नो-काराबाख से अलग करने वाली रेखा के पास लड़ाई तेज होती जा रही है। आर्मीनिया और अजरबैजान दोनों ने अपने-अपने देश में मार्शल लॉ की घोषणा कर दी है। इन दोनों देशों के बीच वर्तमान विवाद की शुरुआत सोवियत संघ के भंग होने के दो-तीन साल पहले 1988 में हो गई थी। नागोर्नो-कारबाख ने अजरबैजान से स्वतंत्र होने की मांग शुरू कर दी थी। उस दौरान आर्मीनिया और अजरबैजान दोनों तरफ से आबादी का वैसा ही स्थानांतरण हुआ, जैसा भारत के विभाजन के समय हुआ था। आर्मीनिया के बहुसंख्यक निवासी ईसाई हैं और अजरबैजान के मुसलमान। करीब दस लाख लोग इधर से उधर हुए और इस प्रक्रिया में 25 से 30 हजार मौतें हुईं। उस वक्त अर्मीनियाई लोगों ने नागोर्नो-काराबाख के ज्यादातर इलाके पर और अजरबैजान के सात दूसरे इलाकों पर नियंत्रण कर लिया। बहरहाल 1994 में रूसी हस्तक्षेप के बाद युद्धविराम हो गया, जो छिटपुट वारदातों के बावजूद 22 साल तक चला।
सन 1920 में जब सोवियत संघ बन रहा था, तब दोनों क्षेत्र उसमें शामिल थे। सन 1991 में जब विघटन हो रहा था, तब सोवियत संघ ने नागोर्नो-काराबाख को अजरबैजान को सौंप दिया, बावजूद इसके कि वह अर्मीनियाई बहुल क्षेत्र है और उनका अजेरियों से परम्परागत टकराव रहा है। अजरबैजान का हिस्सा होने के बावजूद पर इस क्षेत्र की जनसंख्या अर्मीनियाई है। इस इलाके के लोगों ने सन 2006 में जनमत संग्रह करके स्वतंत्र देश बनाने का फैसला किया। इस देश का नाम आर्टसाक्स गणतंत्र रखा गया है, जो इस इलाके का प्राचीन नाम है। पर इसे संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता नहीं मिली है। यह देश आर्मीनिया से अलग है, पर इसे आर्मीनिया का पूरा समर्थन हासिल है।
करीब 22 साल तक कोई बड़ा टकराव नहीं होने के बावजूद दोनों तरफ विद्वेष की आग जलती रही। दोनों अपनी सामरिक क्षमता का विस्तार करते रहे। उधर अजरबैजान बार-बार घोषणा करता रहा कि जरूरत पड़ी, तो हम सैनिक कार्रवाई करके जमीन पर कब्जा वापस लेंगे। अप्रेल 2016 में अजरबैजान ने कुछ जमीन पर कब्जा किया भी। चार दिन चले उस युद्ध में करीब 200 लोग मारे गए। उसके बाद इस साल जुलाई में एकबार फिर से हिंसा भड़की जिसमें 16 लोगों की मृत्यु हुई। वही हिंसा अब ज्यादा बड़े रूप में सामने आ रही है। अब अजरबैजान के राष्ट्रपति इलहाम अलीयेव और आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान ने कहा है कि हम बड़े स्तर पर पूर्ण-युद्ध के लिए तैयार हैं।
रूस और तुर्की की भूमिकाएं
दक्षिणी कॉकेशस के इस इलाके में रूस और तुर्की की महत्वपूर्ण भूमिकाएं हैं। रूस और आर्मीनिया के बीच सैनिक गठबंधन है, जिसमें नागोर्नो-काराबाख शामिल नहीं हैं। आर्मीनिया के ग्युमरी शहर में एक रूसी सैनिक बेस भी है। उधर अजरबैजान के पास भी रूसी हथियार हैं। आर्मीनिया चारों तरफ जमीन से घिरा देश है। उधर तुर्की ने सन 1993 से आर्मीनिया की आर्थिक नाकेबंदी कर रखी है। इतना ही नहीं उसने खुलेआम अजरबैजान के समर्थन की घोषणा कर रखी है। अर्मीनियाई लोगों के मन में तुर्की के प्रति नफरत की भावना है, क्योंकि 1915 में तुर्की के तत्कालीन उस्मानिया साम्राज्य ने एक भयानक नरमेध किया था, जिसमें करीब 15 लाख अर्मीनियाई मारे गए थे। तुर्की की वर्तमान सरकार इस नरमेध को स्वीकार नहीं करती।
दूसरी तरफ तुर्की और अजरबैजान के बीच धार्मिक भाईचारा है। अजेरी नागरिक तुर्क मूल के हैं और उनका भाषा परिवार भी एक है। तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगान ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के बावजूद पिछले तीस साल से इस मसले का कोई हल नहीं निकला है। आर्मीनिया को फौरन इस जमीन से हट जाना चाहिए। तुर्की नेटो का सदस्य भी है। यदि वह लड़ाई में कूदा, तो नेटो की क्या भूमिका होगी? युद्ध होने पर न तो तुर्की का भला होगा और न रूस का। अंदेशा इस बात का है कि छोटी सी चिंगारी भी बड़ी आग को भड़का सकती है।
दक्षिण-पूर्वी यूरोप की कॉकेशस पहाड़ियाँ सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। अजरबैजान में तेल और गैस के भंडार हैं। वहां से होकर पाइपलाइनें गुजरती हैं, जो काला सागर से कैस्पियन सागर को जोड़ती हैं। इस तरह तुर्की और यूरोप तक पेट्रोलियम और गैस की आपूर्ति होती है। लड़ाई बढ़ी, तो इन पाइपलाइनों को सबसे बड़ा खतरा है। इस विवाद के समाधान की अंतरराष्ट्रीय कोशिशें भी चल रही हैं। सन 1992 में ऑर्गनाइजेशन फॉर द सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप (ओएससीई) का मिंस्क ग्रुप इसके समाधान के प्रयास कर रहा है। इस ग्रुप के तीन सह-अध्यक्ष अमेरिका, फ्रांस और रूस हैं। दिक्कत यह है कि इन तीन देशों के अपने रिश्ते बहुत सौहार्दपूर्ण नहीं हैं और उसके प्रयास भी प्रभावशाली नहीं रहे।