वामपंथियों ने तुलसीदास को खारिज किया लेकिन रामविलास शर्मा ने महान कवि बताया

    दिनांक 10-अक्तूबर-2020
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आदित्य कुमार मिश्र
वामपंथी साहित्यकार जिन तुलसीदास को हमेशा खारिज करते रहे, उन्हें रामविलास शर्मा ने मध्यकालीन भारत का महान कवि बताया। इसी तरह, उन्होंने ऐसे इतिहासकारों का विरोध किया जो यह मानते हैं कि प्रारंभ में भारतीय बर्बर और असभ्य थे, जिन्हें अंग्रेजों ने शिक्षित और सभ्य बनाया
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समाज अपनी निजी विचार सरणियों, विभिन्न अभ्यंतर भावधाराओं को व्यापकता से दीर्घकाल तक प्रचारित-प्रसारित किए रहता है। अपनी विशिष्ट अर्थभूमि पर इन सारी चिन्तन सरणियों की विशिष्ट तत्वानुभूतियां सम्पृक्त रूप से एक विशिष्ट शृंखला का निर्माण करती हैं जो निरन्तर अपने आप में कुछ न कुछ नये तत्वों को जोड़ती रहती है तथा निरन्तर अपनी विकसनशीलता को बनाए रखती है, जिसे हम परम्परा कहते हैं। भारतीय समाज परंपरा की उपादेयता के महत्व को समझता है। भारतीयता यदि समाज को अपना प्रदेय देती है तो कुछ न कुछ अपना दायभाग भी लेती है और अपना विस्तार भी करती रहती है। इसी कारण से भारतीय परंपराशीलता में प्रगतिशीलता के सहज गुण पाये जाते हैं जो कि इसे सामाजिक सन्दर्भों में सदैव प्रासंगिक बनाये रखते हैं। रामविलास शर्मा ने इस बात को बहुत अधिक गहराई से समझा था और इसी कारण से उन्होंने भारतीय परम्परा का व्यापकता से अनुशीलन किया और इसके प्रगतिशील मूल्यों की पड़ताल की। रामविलास जी के मित्र और साथी अमृतलाल नागर ने अपने लेख ‘तीस बरसों का साथी’ में लिखा है- ‘‘रामविलास एक ओर जहां धार्मिक ढोंंग धतूरों के कट्टर विरोधी थे, वहीं वे तत्सम्बन्धी साहित्य का नए दृष्टिकोण से मूल्यांकन करते हुए उसके प्रगतिशील तत्वों को पहचान कर उन्हें प्रतिष्ठा देते थे।’’ यहीं उन्होंने एक बात कही कि आवश्यक नहीं कि हम आधुनिकतावादी प्रगतिशील मूल्यों की खोज के लिए सदैव पश्चिम की ओर मुख करें, बल्कि हमें अपनी प्राचीन साहित्य सम्पदा में भी इन मूल्यों की खोज करनी चाहिए। उनके साहित्य चिन्तन की मौलिक अवधारणाओं में यह एक प्रमुख तथ्य है।

भारतीय नवजागरण का श्रेय मात्र अंग्रेजों को नहीं है जो इतिहासकार इस बात को निरपेक्ष रूप से मानते हैं वे संप्रदायवाद का समर्थन करते हैं।        -डॉ.रामविलास शर्मा
पाश्चात्य और भारतीय दोनों साहित्य परंपराओं का सम्यक् बोध होने के कारण ही रामविलास शर्मा के साहित्य चिन्तन की आधारभूमि दीर्घकाल तक अपनी प्रभावशीलता और दृढ़ता को बनाये रखने में सक्षम है। यह भारतीय और पाश्चात्य दोनों प्रकार के परंपराबोधों, उनके अन्तर्सम्बन्धों तथा उनके द्वारा निर्मित व्यापक मानवी जीवनानुभूतियों पर आधृत साहित्य दृष्टियों की सशक्त उपस्थिति दर्ज करती है। विभिन्न प्रकार की युगीन हलचलों का साहित्य पर प्रभाव, विभिन्न जीवनदर्शनों की साहित्य से की गई अपेक्षाओं तथा विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक और मानुषीय अन्तर्सम्बन्धों का अवबोध और उसके द्वारा निर्मित साहित्य की केन्द्रीय चेतना का अध्ययन रामविलास जी के द्वारा समीक्षित साहित्य के अध्ययन एवं अनुशीलन से संभव हो सकता है। बहुलतावादी समाजों तथा विभिन्न वैयक्तिक स्पृहाओं का सम्मिलित चिन्तन करने के लिए हमें साहित्य के विभिन्न आयामों का सामरिक अध्ययन करने की आवश्यकता है तथा आदिकाल से आधुनिक काल तक हुए विभिन्न प्रकार के परिवर्तनों को जानने एवं समझने की आवश्यकता है। यह सब साहित्य के परम्परापरक अध्ययन और तत्सम्बन्धी प्रगतिधर्मिता के तत्वानुशीलन से ही सम्भव है। सम्भवत: साहित्य के विभिन्न अध्ययनों के दौरान विभिन्न विद्वानों ने इस आवश्यकता को समझा है। अत: हमें इस विषय में गहन अध्ययन करने की आवश्यकता है। समग्र मानवीय स्थितियों तथा उस पर अतीत में पड़े प्रभावों की वैचारिक समीक्षा करते हुए रामविलास जी ने लिखा है- ‘‘दरअसल, मानव इतिहास में ऐसा होता है कि बड़े महत्वपूर्ण विचार सामने आते हैं और फिर दब जाते हैं। फिर किन्हीं अनुकूल स्थितियों में वे अंकुरित हो जाते हैं तथा अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।’’
भारतीय संस्कृति बहुलतावादी बहुआयामी समाज की विभिन्न प्रकार की जीवनधर्मिताओं से निर्मित है। एक खास भौगोलिक क्षेत्र में होने के बावजूद भारतीय समाज सम्पूर्ण विश्व को अपनी आदर्श और उत्कृष्ट परिवार व्यवस्था, भ्रातृभाव तथा व्यापक मानवतावाद के द्वारा सतत आकर्षित करता रहा है। भारतीय संस्कृति के विभिन्न भाष्यकारों ने इसके वैविध्य का निरीक्षण करते हुए इसकी एक ऐसी परिभाषा दी, जिसमें यह ‘व्यक्ति पूर्णता’ और उच्चतम जीवनादर्श के रूप में भी समझी जाती थी। ‘‘संस्कृति मूलत: व्यक्ति के व्यक्तित्व की पूर्णता का ही नाम है। इसके उच्चतम आदर्श केवल उन लोगों के जीवन में ही अभिव्यक्त हुए हैं, जो पूर्णतया धर्मिक थे। उदाहरण के लिए हम वाल्मीकि, तुलसीदास, गांधी, विवेकानन्द, अरविन्द आदि को ले सकते हैं। इन लोगों की प्रत्येक क्रिया में, प्रत्येक रचना में एक सांस्कृतिक उच्चता पाई जाती है।’’ विशिष्टता की बात यह है कि भारतीय संस्कृति संसार की प्राचीनतम संस्कृति होने के बावजूद आज भी अपनी समुन्नत स्थिति में वर्तमान है और सहज ही आकर्षण का केन्द्र बनी है।... अतएव इसी का आदर्श सार्वकालिक और सार्वदेशिक रूप से सतत सर्वमान्य रहा है। संस्कृति की गति सतत ऊर्ध्वमुखी रही है। अत: यह अपने मूल में प्रगतिधर्मी है, रूढ़ नहीं। रामविलास शर्मा ने इसकी इसी विशिष्टता को पहचानते हुए साहित्य का अनुशीलन प्रगतिशील सांस्कृतिक मूल्यों के सन्दर्भ में किया। साम्राज्यवादी इतिहास लेखन की विसंगति यही है कि उन्होंने यह माना कि भारतीय प्रारम्भ में बर्बर और असभ्य थे जिन्हें अंग्रेजों ने शिक्षित और सभ्य बनाया तथा भारत में नवजारण के बीच अंग्रेजों के आने से पनपे। रामविलास जी ने ऐसे इतिहासकारों का विरोध किया कि ‘‘भारतीय नवजागरण का श्रेय मात्र अंग्रेजों को नहीं है जो इतिहासकार इस बात को निरपेक्ष रूप से मानते हैं वे डॉ़ शर्मा के अनुसार संप्रदायवाद का समर्थन करते हैं।’’
यूरोपीय आधुनिकीकरण के समय में एशियाई समाजों के सम्मुख एक बड़ी समस्या थी कि कैसे वर्तमान समय में अपनी मौलिक अस्मिता को बुद्घिवादी वैज्ञानिक चिन्तन के साथ प्रस्तुत किया जाये। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में ही राजा राममोहन राय, केशवचन्द्र सेन, महर्षि देवेन्द्र नाथ ठाकुर, दयानन्द सरस्वती आदि ने भारतीय मनीषा की वैश्विक प्रासंगिकता बनाये रखने के लिए उसकी बुद्घिवादी, वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण ढंग से नई व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने एक ओर भारतीय समाज की रूढ़ियों, अन्धविश्वासों और रूक्ष परम्पराओं का निषेध किया तो दूसरी ओर समाज की विभिन्न प्रगतिशील वृत्तियों के सन्दर्भ में प्राचीन संस्कृति और साहित्य की बौद्घिक, तर्कशील और वैज्ञानिक ढंग से व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने भारतीय मानवतावाद और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे वैश्विक मूल्यों को स्थापित करने के लिए प्रयत्न किए। साहित्य के माध्यम से और प्रेस के आविष्कार के द्वारा उन्होंने अपनी मान्यताओं का प्रचार-प्रसार किया। फलत: भारतीय समाज में व्यापक रूप से एक नई चेतना का उभार हुआ जिसे रामविलास शर्मा ने ‘नवजागरण’ का नाम दिया।
नवजागरण के दौर में सबसे आवश्यक प्रश्न यह था कि हम अपनी परम्पराओं का अनुशीलन करें और भारतीय सामाजिक स्थितियों के सन्दर्भ में उनकी नई व्याख्या प्रस्तुत करें। भारतीय नवजागरण का श्रेय अंग्रेजी राज को देने वाले इतिहासकार परोक्ष रूप से साम्राज्यवादी इतिहास लेखन को ही बल देते हैं। रामविलास जी ने इसके विपरीत नवजागरण की उद्भावना को भारतीय जनमानस की मौलिक सुचिन्तनशीलता के फलस्वरूप विकसित होने वाली एवं दीर्घकालीन रूप को प्रभावी बतलाया। डॉ़ शम्भुनाथ उनकी इसी विशेषता को रेखांकित करते हुए लिखते हैं- ‘‘रामविलास शर्मा भारत में अंग्रेजी राज की प्रगतिशील भूमिका के कट्टर विरोधी हैं।’’
वे पुन: कहते हैं- ‘‘रामविलास शर्मा की हिन्दी नवजागरण सम्बन्धी आवधरणा की पहली बड़ी विशिष्टता है कि इसे उन्होंने तेरहवीं शताब्दी से ही विस्तृत निरंतरता में देखा, यह कहा कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से जो नवजारण शुरू होता है, वह नई परिस्थितियों में पुराने लोक जागरण का ही विकास है।’’ परम्पराएं समाज के द्वारा तथा समाज के लिए निर्मित होती हैं। अत: आवश्यक है कि समाज का मूल्यांकन करते वक्त हम परम्पराओं का भी अनुशीलन करें और सामाजिक स्थितियों पर उनके प्रभावों का अध्ययन करें। भारतीय समाज में विभिन्न जीवन उत्सवों, रीतियों-रिवाजों तथा विभिन्न प्रकार की जीवनशैलियों के दायों का महत्व सर्वविदित है। साहित्य और संस्कृति इन सभी का यथातथ्य प्रतिनिधित्व करते हैं। इसीलिए परंपरा के महत्व की स्वीकार्यता इन सभी मूल्यों की स्वीकार्यता से भिन्न नहीं हो सकती। अंग्रेजी कवि टी.एस. इलियट ने भी महान साहित्य में परंपरा के मूल्यों की अनिवार्यता को मान्यता प्रदान की है। ‘‘आज के सवाल और मार्क्सवाद’’ में अजय तिवारी को दिये गये एक साक्षात्कार में रामविलास जी ने इस बात को स्वीकार करते हुए कहा है कि ‘परंपराएं जो परिष्कृत होकर हमारी प्रगति में योग दें उन्हें हमें अपनाना चाहिए।’ शायद इसी कारण से उन्हें तुलसीदास सर्वाधिक प्रिय कवि लगे थे।
रामविलास शर्मा भारतीय साहित्य के अनुशीलन के लिए पाश्चात्य साहित्यिक मानदण्डों का ही आश्रय ग्रहण करने के पक्षधर कभी नहीं रहे। वस्तुत: सभी प्रकार के वाङ्मय, व्यक्ति परिवेश, रचनाकालिक मनोदशा का साक्षात् बिम्ब होते हैं, अत: उनके अध्ययन के लिए सन्दर्भ से अलग कोई भी प्रतिमान कारगर नहीं हो सकता और यदि हम यही बात पाश्चात्य सन्दर्भों पर लागू करें तो भी इससे भिन्न कोई परिणाम नहीं आएगा। अत: रामविलास जी ने भारतीय साहित्य के मूल्यांकन के लिए भारतीय सामरिक संस्कृति एवं सामाजिक स्थितियों का सन्दर्भगत अनुशीलन किया तथा भारतीय समाज एवं साहित्य की संपृक्तता को आधार बनाया तथा इस सन्दर्भ में पाश्चात्य साहित्यवादी मानदण्डों एवं साहित्य मूल्यों पर भी अपनी सतत दृष्टि बनाये रखी। उनके इसी दृष्टिकोण का परिचय उनके पुत्र डॉ़ विजयमोहन शर्मा ने उनकी एक पुस्तक की भूमिका में दिया है- ‘‘रामविलास जी साहित्य को इतिहास और समाजशास्त्र से जोड़कर देखते थे। भाषा विज्ञान में भी वह ऐतिहासिक और सामाजिक भाषा विज्ञान में विशेष रूचि रखते थे।’’ भारतीय साहित्य में निहित प्रगति तत्वों तथा उन पर आधृत साहित्य मूल्यों तथा पाश्चात्य साहित्य के सुचिन्तित एवं विवेकसम्मत मार्क्सवादी कलामूल्यों के आधार पर एक ऐसा साहित्यशास गठित किया जो विराट जनधर्मी आकांक्षाओं के साथ सतत प्रासंगिक बने रहने में सक्षम है, आवश्यकता उसको जानने और समझने की है। मार्क्सवादी साहित्य की भारतीय सामाजिक प्रासंगिकता एवं विश्वसनीयता तभी पुष्ट हो सकती है, जब भारतीय परिप्रेक्ष्य के आधार पर मार्क्सवाद का भी मूल्यांकन किया जाए।
किसी भी समाज की अपनी सांस्कृतिक विशिष्टताएं होती हैं जिसका प्रतिनिधित्व उसकी भाषा करती है। अत: भाषा का साहित्य इन तीनों के सम्यक् अनुशीलन के बिना सम्भव नहीं है। अतएव रामविलास शर्मा किसी साहित्य का मूल्यांकन असांस्कृतिक आधारों पर नहीं करते। शायद यही कारण है कि वे तुलसीदास के साहित्य में वर्णित अवधी भाषा और अवधी संस्कृति की मूलभूत विशेषताओं की भी पड़ताल करते हैं। उन्होंने सूर के काव्य में ब्रज की संस्कृति तथा भाषिक सौन्दर्य का भी विवेचन किया है। प्रेमचन्द के साहित्य की पारिवारिक संस्कृति का भी अनुशीलन उन पर लिखी पुस्तक में किया। हरिनारायण मिश्र से हुई बातचीत में स्वयं उन्हीं का कथन है- ‘‘ ‘भाषा में समाज’ में मैंने हिन्दी प्रदेश के गण समाजों, सामन्ती व्यवस्था के जनपदों और जातीय भाषा हिन्दी के निर्माण पर ध्यान केन्द्रित किया है।’’ इस प्रकार रामविलास शर्मा का साहित्य चिन्तन भाषा के सांस्कृतिक सम्बन्धों तथा उसके सामाजिक सन्दर्भों पर सतत अपनी दृष्टि बनाये रखता है। इस पर विस्तार से चिन्तन करने की आवश्यकता है।
साहित्य के मूल्यांकन के लिए भारतीय मौलिक एवं युगानुकूल साहित्यशास्त्र आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पहले ही रच चुके थे, लेकिन रामविलास शर्मा ने साहित्य में प्रगति की प्रासंगिकता तथा उसकी अनिवार्यता को महत्व दिया। यही नहीं, आमतौर से विरोधी मानी जाने वाली पारम्परिक साहित्यिक परम्पराओं से उसे जोड़ा। यह उनकी अपनी मौलिक अवधारणा है कि परम्पराएं भी प्रगतिधर्मी होती हैं, बशर्ते उनका सन्दर्भगत अध्ययन किया जाए। रामविलास जी ने यह बात कही ही नहीं, बल्कि अपने व्यापक साहित्यानुशीलन से सतत इस बात को सिद्ध करने के लिए प्रयत्न भी किया। किसी भी देश की भाषा, समाज और साहित्य की एक दीर्घ सांस्कृतिक परम्परा भी होती है। अत: साहित्य का अनुशीलन पारंपरिक सरणियों के मूल्यांकन से रहित होकर सम्भव नहीं हो सकता। रामविलास शर्मा लिखते हैं- ‘‘साहित्य की परम्परा का मूल्यांकन करते हुए सबसे पहले हम उस साहित्य का मूल्य निर्धारित करते हैं जो शोषक वर्गों के विरुद्घ श्रमिक जनता के हितों को प्रतिबिम्बित करता है।’’ रामविलास शर्मा ने भारतीय परम्परा की धारा के समानान्तर साहित्य की चिन्तनधारा का भी अनुशीलन किया और साहित्य की परम्परागत प्रगतिशीलता को किसी काल विशेष से हटकर व्यापक रूप में व्याख्यायित किया। यह साहित्य के क्षेत्र में उनका अपना मौलिक और अद्वितीय कार्य था। परम्परा के प्रति गहरी समझ विकसित करने के लिए वे ऋग्वेद से लेकर गांधी, आम्बेडकर और लोहिया तक सामाजिक चिन्तन करने से नहीं चूके। इस खोज में कुछ नई मान्यताएं भी सामने आर्इं, जिसमें भारतीय आर्य संस्कृति की प्राचीनता और भारतीय अर्थव्यवस्था में पूंजीवाद का विकास जैसे प्रश्न और उन पर किए गये उनके महत्वपूर्ण विमर्श प्रधान हैं।
‘‘मार्क्स का मत है कि पूंजीवाद यूरोप में पहले आया, एशिया में बाद में आया। यह भी कि साम्राज्यवाद के रूप में उसने एशिया में अर्थात् भारत में प्रवेश किया। रामविलास शर्मा मानते हैं कि पूंजीवाद की उत्पत्ति भारत में इंग्लैंड से पहले हो गई थी। उन्होंने सौदागरी पूंजीवाद, औद्योगिक पूंजीवाद और महाजनी पूंजीवाद में भेद किया। मार्क्स ने ‘औद्योगिक पूंजीवाद’ का विश्लेषण किया। डॉ़ शर्मा कहते हैं कि ‘सौदागरी पूंजीवाद’ भारत में 12-13वीं शताब्दी में आ गया था। इसका प्रमाण है जातियों का गठन, जातीय बाजार का निर्माण और जातीय भाषाओं का उदय।’’
भारतीय साहित्य एवं मनीषा की विराटता के समान रामविलास जी का चिन्तन जगत भी विराट है। रामविलास शर्मा ने वैदिक काल की श्रम प्रधान संस्कृति तथा उस युग में श्रमिकों, कामगारों तथा वर्गीय संस्कृति की पहचान की तथा इस पर काम करते हुए ऋग्वेद का पूरा भाष्य ही लिख डाला। वैदिक साहित्य का अनुशीलन करते हुए रामविलास जी ने श्रमिक समाज, मनुष्य का श्रमजन्य सौन्दर्य तथा शिल्पकारों, कामगारों की वर्गीय चेतना का निरीक्षण किया। वे लिखते हैं- ‘‘वैदिक ऋषि काम करते हैं, श्रम से घबराते नहीं हैं। वे समझते हैं कि श्रम करने से ही देव मनुष्य के मित्र बनते हैं।

‘न ॠते श्रान्तस्य सख्याय देवा:’अर्थात् श्रम किए बिना देव मनुष्यों के मित्र नहीं होते। अश्विनी कुमारों के लिए कहा गया है कि किसान जैसे श्रम करते हुए पसीना-पसीना हो जाता है, वैसे ही ये देव हैं। ‘कीनाश इव स्वेदं आसिस्विदाना’ अर्थात् पसीना बह रहा है, किसान काम कर रहा है।’’ मध्यकालीन शासन व्यवस्था में श्रमिक वर्ग की महत्वपूर्ण उपस्थिति, जनपदों एवं प्रान्तों के मध्य व्यापारिक संस्कृति की खोज उनकी मौलिक अवधारणाओं में से है। इस परिप्रेक्ष्य में उन्होंने भारतीय जातीयता की खोज की तथा उसकी शक्तियों की पहचान की। साहित्य के क्षेत्र में उसकी उपादेयता को पहचाना। रामविलास जी से पूर्व किसी भी साहित्यानुशीलक ने इतनी गहराई से इन सारे विषयों पर विचार नहीं किया था। इस सन्दर्भ में भारतीय परम्पराओं, उनका आन्तरिक विन्यास तथा पारस्परिक सौहार्द भावना का भी अनुशीलन रामविलास जी ने किया।
वस्तुत: रामविलास जी का समग्र साहित्य जातीयता, परम्पराधर्मिता और प्रगतिशीलता के तीन आधार बिन्दुओं के साथ भारतीय साहित्य, समाज और संस्कृति का अनुशीलन करता है। समय के प्रवाह में समाज और साहित्य कैसे परिवर्तित होता है और साहित्य से युग किस प्रकार प्रभावित होता है, परम्पराएं वर्तमान के लिए क्यों प्रासंगिक हैं तथा भविष्य के लिए उनकी उपादेयता क्या है, प्रगति तथा परम्परा के आन्तरिक सम्बन्ध क्या हैं और उनकी पहचान कैसे की जाए? इन सारी बातों के लिए आवश्यक है कि हम वर्तमान साहित्य के परिप्रेक्ष्य में रामविलास शर्मा के साहित्य चिन्तन का पुनर्निरीक्षण करें और भारतीय साहित्य को वैश्विक दृष्टि से पुनर्स्थापित का प्रयास करें, जो प्राय: विलुप्त होती जा रही है।

सन्दर्भ ग्रन्थ-
हिन्दी के प्रहरी : रामविलास शर्मा, सं़ -विश्वनाथ त्रिपाठी, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 291

संगीत का इतिहास और भारतीय नवजागरण की समस्याएं, डॉ़. रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 14

भारतीय संस्कृति की महिमा : विविध आयाम, डॉ़ कृष्ण भावुक, प्रेम प्रकाशन मन्दिर, दिल्ली, पृष्ठ 44

रामविलास शर्मा का संस्कृति विवेचन, डॉ़ वीरेन्द्र सिंह, हंसा प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ 105

रामविलास शर्मा, शम्भुनाथ, साहित्य अकादमी, दिल्ली, पृष्ठ 85

वही, पृष्ठ 87

संगीत का इतिहास और भारतीय नवजागरण की समस्याएं, डॉ़ रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 8
 
साक्षात्कार- डॉ़ रामविलास शर्मा से बातचीत, -डॉ. कर्णसिंह चौहान, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ102

परंपरा का मूल्यांकन, डॉ़ रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 10

समकालीन हिन्दी आलोचक और आलोचना, डॉ़ रामबृक्ष, हरियाणा साहित्य अकादमी, चण्डीगढ़, पृष्ठ 42

भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश, खण्ड-1, डॉ़ रामविलास शर्मा, किताबघर प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ42
( लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं )